Home

Welcome!

user image Aneeeh Swaroop - 27 Jul 2021 at 6:55 PM -

Income Tax: ITR फाइल करने की डेडलाइन बढ़ी, फिर भी लगेगी पेनल्टी! जानिए आप पर कितना लगेगा चार्ज

Income Tax Return: इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने कोरोना वायरस महामारी को देखते हुए वित्त वर्ष 2020-21 के लिए ITR फाइल करने की डेडलाइन 30 सितंबर, 2021 तक जरूर बढ़ा दी है, लेकिन डेडलाइन बढ़ने का मतलब ये नहीं है कि आपको दंडात्मक ब्याज चार्ज से ... राहत मिल गई है, जिसका भुगतान सेल्फ असेसमेंट टैक्स या एडवांस टैक्स के केस में आउटस्टैंडिंग टैक्स लायबिलिटी के मामले में जरूरी होता है.


बकाया टैक्स पर लगेगा इंटरेस्ट


Times Now News पर छपी खबर के मुताबिक दरअसल, इनकम टैक्स एक्ट 1961 के तीन सेक्शन 234A, 234B और 234C के तहत टैक्सपेयर्स को बकाया टैक्स पर इंटरेस्ट देना जरूरी होता है, अगर उसे इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने में देरी होती है. सेक्शन 234A के मुताबिक, ITR फाइलिंग में देरी पर ब्याज लगता है. मान लीजिए कि ITR फाइल करने की आखिरी तारीख 31 जुलाई, 2021 है और आपने 6 अगस्त, 2021 को फाइल किया. तब ऐसे केस में बकाया टैक्स अमाउंट पर हर महीने 1 परसेंट के हिसाब से ब्याज लगेगा. इस मामले में पूरे एक महीने का ब्याज चार्ज देना होगा, यानी 6 दिन की देरी को पूरे एक महने की देरी माना जाएगा.

किस पर लगेगी इंटरेस्ट पेनल्टी?

हालांकि सेक्शन 234A के तहत उन टैक्सपेयर्स को राहत मिलती है, जिनका सेल्फ असेसमेंट टैक्स 1 लाख रुपये तक है. लेकिन अगर टैक्स लायबिलिटी 1 लाख रुपये से ज्यादा है, उन्हें देरी पर ब्याज देना होगा. इसलिए भले ही इनकम टैक्स रिटर्न भरने की डेडलाइन 30 सितंबर हो, अगर आपकी टैक्स लायबिलिटी 1 लाख रुपये से ज्यादा है तो आपको अगस्त और सितंबर के लिए 1 परसेंट के हिसाब से इंटरेस्ट देना होगा. मान लीजिए की डेडलाइन 30 सितंबर के बाद भी आगे बढ़ती है, तो उसी हिसाब से ब्याज भी लगता रहेगा.

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 03 May 2021 at 8:13 AM -

जनता के कोरोना संबंधी सवालों के जवाब

अगर मास्क कारगर हैं तो 6 फिट की दूरी क्यों ?
क्योंकि कुछ लोग मास्क ठीक से नहीं लगाते।

अगर 6 फिट की दूरी कारगर हैं तो मास्क क्यों ? क्योंकि लोग अक्सर एक दूसरे के बहुत करीब पहुंच जाते हैं। और कभी कभी तो ... 6 फुट दूर रहना संभव ही नहीं।

अगर यह दोनो कारगर हैं तो लाॅक डाउन क्यों ? क्योंकि न तो सभी लोग ठीक से मास्क लगा रहे हैं न ही 6 फुट की दूरी बना कर रह पा रहे हैं।

अगर यह तीनो कारगर हैं तो वेक्सीन क्यों? क्योंकि न तो सभी लोग ठीक से मास्क लगा रहे हैं, न ही हमेशा 6 फुट दूरी मेंटेन कर पा रहे हैं न ही लॉक डाउन का ठीक से पालन ही कर पा रहे हैं।

अगर वेक्सीन कारगर हैं तो फिर मौतें क्यों ? वैक्सीनेशन के बाद भी कोविड पाँजिटिव क्यों ? क्योंकि अभी भी सिर्फ दो प्रतिशत लोगों को ही वैक्सीन लग पाई है और वैक्सीन लगने के बावजूद कुछ लोगों में इम्युनिटी विकसित नहीं हो पा रही है।

वैक्सीनेशन के बाद मौत होने पर जिम्मेदारी किसकी ? किसी की नहीं। एक तो मुफ्त में वैक्सीन लगाओ ऊपर से जिम्मेदारी भी लो। क्या दूसरे कारणों से कभी कोई मरता ही नहीं है।

अगर इसके बाद भी मान लिया जाए कि वैक्सीन सच में कारगर हैं तो फिर लाक डाउन, नाइट कफ्यू क्यों ? क्योंकि वैक्सीन सिर्फ इम्युनिटी बढ़ाती है कोरोना संक्रमण को नहीं रोक सकती।

अगर 6 फिट की दूरी इतना ही जरूरी तो लाखो की राजनीतिक रैली क्यों ,

अगर वास्तव में ही कोरोना हैं तो जांचें नियमित क्यों नहीं? जांचें तो हो रही हैं। कराने वाले करा भी रहे हैं।

मौसम बदलते ही हमेशा हर आदमी को जुकाम बुखार होना आम बात हैं तो जांचें उसी वक्त क्यों ? जांच तो उसी वक्त की जाएगी। पहले से जांच कर लेने से ऐसा तो है नहीं कि जांच हो गयी है तो बाद में कोरोना नहीं हो सकता।

ट्रक ड्राइवर पूरे भारत में घूमते हुए हर होटल का खाना खाते हैं तो भी पोजिटिव क्यों नहीं ? हो तो रहे हैं और मर भी रहे हैं। वो परिश्रमी होते हैं उनके फेफड़े बहुत दमदार होते हैं इसलिए वो कोरोना संक्रमण को आसानी से झेल लेते हैं।

गरीब आदमी को कोरोना क्यों नहीं ? क्योंकि गरीब आदमी के फेफड़े दमदार हैं। वो आसानी से इसे झेल लेते हैं। फिर भी गरीबों को भी कोरोना होने की घटनाएं हो रही हैं।

जब वेक्सिनेशन इसका उपाय हैं तो सबसे पहले स्कूलों के बच्चों को क्यों नहीं? ऐसा ना करके उनकी पढ़ाई बर्बाद क्यों ? क्योंकि जब से वैक्सीन बनी है तब से लग ही रही है। पहले 45 वर्ष तक के लोगों को लगाई गई क्योंकि उनको सबसे ज्यादा खतरा है। अब 18 वर्ष से ऊपर के सभी लोगों को लगाई जा रही है क्योंकि वो काम के लिए घर से बाहर निकलने के मजबूर होते हैं। बाद में बच्चों को भी टीके लगाए जाएंगे।

मैंने रैली वाले प्रश्न को छोड़कर सभी सवालों का जवाब दे दिया है। रैली वाले प्रश्न का जवाब पोलिटिकल लोगों को देना होगा।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 20 May 2020 at 8:03 AM -

एडवर्ड जेनर


17 मई 1749 एडवर्ड जेनर का जन्मदिन है।एडवर्ड जेनर (17 मई सन्‌ 1749-26 जनवरी 1823) अंग्रेज कायचिकित्सक तथा चेचक के टीके के आविष्कारक थे। जेनर को अक्सर "इम्यूनोलॉजी का पिता" कहा जाता है, और उनके काम को "किसी अन्य मानव के काम से ज्यादा ज़िंदगी ... बचाने वाला" कहा जाता है।अपने नगर में सामान्य शिक्षा के उपरांत जेनर ने चिकित्सा विज्ञान का शिक्षण एवं प्रशिक्षण किया।

लगभग ढाई-तीन सौ वर्ष पूर्व तक पाश्चात्य देशो में चेचक सर्वाधिक भयानक रोग माना जाता था साथ ही भारत में भी इस रोग की स्थिति इससे भिन्न नही थी। अठारहवीं सदी में चेचक के महामारी दुनिया भर में, विशेष रूप से यूरोप में फैली हुई थी इस समय एडवर्ड जेनर, ने इन रोगियों के इलाज करने के बारे में सोचा और इसपर विस्तृत अध्यन्न करना शुरू किया। उन्होंने अपने अध्यन्न के दौरान पाया की कभी-कभी गायों में भी ठीक इसी तरह का एक रोग हो जाता है जिसे काऊ पॉक्स(Cowpox) कहते है। इस रोग में गायों के थनो में छोटे-छोटे दानें निकल आते है जिसमें मवाद आ जाता है। जो भी काऊ पॉक्स से पीड़ित गायों के दूध निकालने वाले थे उन्हें भी यह रोग हो जाता, उनके हाथों में भी छोटे-छोटे दानें और फुंसियां निकल आती।

एडवर्ड जेनर ने ध्यान दिया की वे दूधवाले जिन्हें कभी गायों में पाया जाने वाला चेचक(cowpox) हुआ था, वे चेचक(Smallpox) से बहुत कम प्रभावित होते है, उन्हें लगने लगा की इन दोनों रोगों में कुछ सम्बन्ध तो है अब उन्होंने गायों में पाए जाने वाले चेचक का विस्तृत अध्ययन करना शुरू किया।उसी दरम्यान एक औरत अपने बच्चे को लेकर उनके पास आयी, उसका पाँच साल का बच्चा जेम्स फिप्स(James Phipps) स्माल पॉक्स से पीड़ित था। एडवर्ड जेनर ने काफी सोच विचार कर उस बच्चे पर परीक्षण करने का फैसला किया शायद एडवर्ड जेनर को भी नहीं पता था की उनका यह परीक्षण चिकित्सा विज्ञान में बड़ी क्रांति लाने वाला था। उन्होंने चेचक से पीड़ित गाय के थन के फुंसियों में से एक तरल निकला, और उसे उस लड़के के शरीर में प्रविष्ट कर दिया। लड़का कुछ समय तक बुखार से पीड़ित रहा, परन्तु वह जल्दी ही स्वस्थ होने लगा। जेनर ने तब एक और साहसिक प्रयोग करने का निश्चय किया, और उन्होंने चेचक से पीड़ित व्यक्ति के शरीर के छालों में से थोडा तरल लेकर उस लड़के के शरीर में इंजेक्ट कर दिया, अब यह लड़का चेचक से पीड़ित नहीं हो रहा था।

हलाकि शुरूआती दिनों में उनका विरोध भी हुआ लेकिन जेनर इनसब पर ध्यान न देकर अपने काम में लगे रहे। अब विश्व को चेचक का टीका मिल गया था, लोग दूर दूर से एडवर्ड जेनर के पास टीका लगवाने आते अब वे विख्यात हो चुके थे। एडवर्ड जेनर ने सिर्फ चेचक का उपचार नहीं खोजा था बल्कि उनकी इस खोज से इस बात का भी पता चला की हमारा शरीर कैसे एंटीबाडी बनाकर विभिन्न रोगों से हमारी प्रतिरक्षा कर सकता है। उनकी इस महान खोज को कभी भुलाया नहीं जा सकता पूरा विश्व और पूरा चिकित्सा विज्ञान सर्वदा उनका ऋणी रहेगा।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 19 May 2020 at 6:50 PM -

amfan सुपर साइक्लोन

धरती पहले भी खतरे की घंटी बजाती रही है। वो इंसान को आगाह करती रही है कि जो कुछ भी वो कर रहा है, वो बहुत नुकसान ढाने वाला है। मनुष्य उस ताने-बाने को बिगाड़ देने वाला है, जो करोड़ों सालों में विकसित हुआ है। ... इंसान ने शुरुआती चेतावनियों को अनसुना कर दिया। चेतावनियां ज्यादा भयावह तरीके से दी जाने लगीं। अब बंगाल की खाड़ी में एक सुपर साइक्लोन लाखों-करोड़ों लोगों को झकझोरने को तैयार खड़ा है।
जिस समय पूरी दुनिया कोरोना वायरस से निपटने की चिंता में डूबी हुई है, ठीक उसी समय बंगाल की खाड़ी में पर्यावरण संकट ने एक दूसरा रूप धर लिया। माना जा रहा है कि बंगाल की खाड़ी में तैयार हो रहा अम्फान तूफान एक सुपर साइक्लोन होगा। फिलहाल यह बंगाल की खाड़ी में घूम रहा है। अनुमान है कि बीस मई यानी बुधवार की सुबह या दोपहर को यह तट से टकराएगा। इस दौरान दो सौ किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार वाली हवाएं चलेंगी और भारी बारिश होगी। मछुआरों को समुद्र में नहीं जाने की चेतावनी दी जा चुकी है।
अम्फान तूफान ओडीशा, पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और म्यानमार में तबाही मचा सकता है। इसे देखते हुए प्रभावित होने की संभावना वाले स्थानों को खाली कराया जा रहा है। बांग्लादेश में पचास लाख से ज्यादा और बंगाल में बीस लाख से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर लेने जाने की बात कही जा रही है।
आपको अगर याद होगा कि पिछले साल शायद अप्रैल के महीने फौनी तूफान ने अपनी भयावहता से पूरी दुनिया का ध्यान खींचा था। उस समय भी समुद्रतटीय इलाके खाली कराए जाने से बहुत सारे लोगों की जानें बच गई थी। लेकिन, इसने लाखों पेड़ों को जड़ से उखाड़ दिया था। जंगल तहस-नहस कर दिया था। भारतीय मौसम विभाग का अनुमान है कि चक्रवाती तूफान अम्फान एक महाचक्रवाती तूफान है। इससे पहले 1999 में इतना भयंकर तूफान उठा था। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स तो यहां तक कह रही हैं अम्फान तूफान के दौरान हवा की रफ्तार 250 किलोमीटर प्रतिघंटे से ज्यादा तक की हो सकती है।
अम्फान एक भयावह मुसीबत की तरह भारत के तटों की तरफ बढ़ रहा है। यहां पर रहने वालों की सांसें अटकी हुई हैं।
आप समझ सकते हैं कि कोरोना के समय में यह तूफान कितना ज्यादा भयंकर है। तूफान की आपाधापी में इलाके खाली कराने और उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने में सोशल डिस्टेंसिंग का कितना खयाल रखा जा सकेगा। हो सकता है कि तूफान पहले तो अपनी भयावहता से लोगों की जान ले फिर कोरोना की महामारी को कई गुना ज्यादा भयंकर बनाकर छोड़ दे।
पर्यावरण संकट की चेतावनियां अब तेज और विकराल होती जा रही हैं। कोरोना संकट भी इसी का रूप है तो अम्फान तूफान दूसरा। जबकि, टिड्डी दलों का एक तूफान भी अफ्रीका से लेकर अरब तक में तैयार हो रहा है। पूरा अनुमान है कि यह टिड्डी दल भी हमारी फसलों को नंगा-बुच्चा करने के लिए जल्द ही धावा बोलेगा।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 17 May 2020 at 8:29 AM -

कोरोना संघर्ष

जिस इंसान ने आय से अधिक खर्च करने की आदत डाल ली हो वह न तो लॉक डाउन का पालन कर सकता है न करा सकता है।

मैं अगले लॉकडाउन के पक्ष में नहीं हूँ।

इस देश में लॉक डाउन का मतलब

"जोर का झटका, धीरे से"

भीड़ ... को रोका जाए। बिना जरूरी काम के कोई बाहर न निकले।
ज्यादा से ज्यादा कंडोम बांटे जाएं ताकि लोग आबादी बढ़ाने से बच सकें।

पुरुष नसबंदी अभियान चलाया जाए ताकि बेतहासा बढ़ती आबादी पर रोक लगे।

जनसंख्या नियंत्रण कानून लाया जाए ताकि लोग आबादी बढ़ाकर सरकार पर जिम्मेदारियों का बोझ न बनें।

स्थानीय जरूरतों के अनुरूप उद्योगों को गांव गांव लगाया जाए ताकि मजदूरों का आवागमन न्यूनतम स्तर पर लाया जा सके।

धर्मान्धता फैलाने वालों को आतंकवादियों की तरह ट्रीट किया जाए ताकि राष्ट्र की मजबूती की दिशा में हम आगे बढ़े।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 17 May 2020 at 7:47 AM -

अंधविश्वास andhvishwas

अंधविश्वास का कुप्रसार किसी महामारी से कम नहीं !

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 14 May 2020 at 8:54 PM -

सिद्धि

आज टहलने के लिए निकलने में देर हुई। आजकल हम दो जना साथ में टहलते हैं। एआईजी साहब और हम। छह बजे निकले थे। वहीं नदी तीर तक टहलने का निश्चय हम किए हैं, वहाँ तक आने-जाने में पाँच किमी से अधिक का चलना हो ... चुका होता है। खैर कभी-कभी हमारे बीच आध्यात्मिक परिचर्चा टाइप की होती है। आज जब एआईजी साहब ने कहा कि हम जो सिद्धियों की बात करते हैं वह और कुछ नहीं, जिसे जो काम मिला है उसमें उसकी दक्षता और उसको सही तरीके से करना ही हमारी सिद्धि है। हाँ आगे उन्होंने यह भी कहा, जो अपनी सिद्धियों का दुरूपयोग करता है, तो उसके लिए उसकी सिद्धियाँ विपरीत परिणामकारी होती हैं और बेकार हो जाती हैं। एक बात और उनके अनुसार हमारा जीवन ही अंतिम सत्य है, मने अंतिम सत्य हमसे पृथक की चीज नहीं है। लेकिन एक बात जब मैंने कही कि हमारी अनुभूतियाँ भी हमारे शरीर के रहने तक ही रहती हैं उसके बाद इनका कोई मतलब नहीं, इसपर उनका मत था कि 'नहीं, चेतना शरीर के न रहने पर भी होती है और चेतना को ये अनुभूतियाँ होती रहती हैं। हलांकि हमारी यादों से ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता इसलिए इसे सिद्ध किया जाना संभव नहीं है।'

कुलमिलाकर टहलते हुए हम ऐसी ही बातें करते जाते हैं आज वाकई में अंतिम सत्य मुझे प्याज टाइप का प्रतीत हुआ जिसके छिलके उतारते जाइए और अंत में कुछ नहीं मिलेगा, लेकिन ऊपर से आँख से आँसू जरूर निकल आएंगे! खैर, हम अपनी सिद्धियों का कितना दुरूपयोग करते है, कभी इसपर विचार भी नहीं करते! सच तो यह है कि अपनी सिद्धियों के दुरूपयोग के कारण ही हम दुख और तनाव के बीच से गुजरते हैं और हमारा स्वास्थ्य भी खराब होता है।

आज टहलते हुए मेरे दिमाग में यह भी आया था कि हम लाख पढ़ने का दावा करें दरअसल हम कुछ भी नहीं पढ़ते। मेरे हिसाब से, आदमी स्वयं अपने लिए एक पुस्तक है इसलिए पहले उसे स्वयं को पढ़ना चाहिए। अपने को पढ़ लेने के बाद ही उसे दूसरी पुस्तक की बात समझ में आएगी!

टहलते समय कुछ श्रमिक चकरोड पर आते दिखाई पड़े, हमने तत्काल उनसे सोशल डिस्टेंसिंग स्थापित किया। पता चला कि वे लोग राजकोट गुजरात से आ रहे हैं, जिले में परीक्षण के पश्चात गाँव में घर को जा रहे हैं, इन बेचारों की पाँच जगह टेस्टिंग हो चुकी थी।

इन्हें देखते हुए मैं सोच रहा था, जिसका पेट भरा हो और जिसके सामने विकल्पों का समुच्चय हो, ऐसे ही लोग स्वस्थ रहने के तरीके खोजते हैं तथा विकल्पों के मोह और इनके चयन में उपजे ऊहापोह के बीच ही ये संवेदित होते हैं। लेकिन इससे न इनका कोई स्वास्थ्य सुधरता है और न ही इनकी संवेदनाओं का कोई सामाजिक मूल्य ही होता है। शायद इसीलिए तो महामारी और श्रमिकों की मौत की खबरों के बीच विज्ञापन दिखाए जाते हैं!

हम टहल रहे थे और हमारे पीछे-पीछे एक कुत्ता भी चला आ रहा था। मैंने मुड़कर उसकी ओर देखा तो वह सहम कर रुक गया। लेकिन मैं उसे नजरअंदाज कर दिया। एआईजी साहब ने कहा, जो कुत्ता कुत्ता होता है वही काटता है, सब नहीं। यह नहीं काटेगा। खैर कुछ दूर पीछे-पीछे चलने के बाद कुत्ता दूसरी ओर मुड़ गया। मुझे लगा यह कुत्ता, कुत्ता नहीं था।

#चलते_चलते

संवेदनाएं यदि चयनाधारित न होकर बालसुलभ हों, तो जीवन की दशा और दिशा बदल देती हैं! (नेटफ्लिक्स पर 'लिफ्ट ब्वाय' देखते हुए पाया ज्ञान)

#सुबहचर्या- विनय कुमार तिवारी
(13.05.2020)

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 14 May 2020 at 7:41 PM -

आत्मनिर्भर भारत

'मेक इन इंडिया' अधूरा था।
'आत्म निर्भर भारत' पूर्ण है।

6 साल और एक महामारी लग गए इतनी छोटी सी बात समझने में।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 06 May 2020 at 6:30 AM -

लॉक डाउन कितना वाजिब

मौतें तो होनी हैं। अमीर कोरोना से मरेगा और गरीब भूख से मरेगा।

गरीब भी कोरोना से मर सकता है लेकिन सवाल यह है कि अभी भी लाखों मजदूर दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में फंसे हैं और लाखों मजदूर तथाकथित सोशल डिस्टेंसिंग का ... हर रोज उल्लंघन करते हैं, उनमें से कितने मरे।

arvind swaroop kushwaha

user image Pankaj Kumar Verma

Sir suruaat ab hogi, bahar ka aagman hone laga h

Wednesday, May 6, 2020
user image Arvind Swaroop Kushwaha - 04 May 2020 at 8:48 AM -

लीडरशिप, leadership

क्वारंटाइन कॉन्सपिरेसी के लिए उत्तम माहौल देता है। जब लोग घरों में लगातार बन्द होते हैं , तब वे समाज से कट जाते हैं। वे केवल उस / उनकी सुनते हैं , जिसपर वे सबसे अधिक भरोसा करते हैं। यह भरोसा परिवार के किसी ख़ास ... शक्तिशाली व्यक्ति पर हो सकता है। ऐसा व्यक्ति धर्मगुरु हो सकता है , राजनेता भी। ऐसे लोग जो बुरे-से-बुरे समय में भी चेहरे पर शिकन न लाएँ। इस तरह बात करें कि उनके पास महाप्रलय का भी समाधान है। ऐसे ही लोग महामारियों के समय ढेर सारे लोगों के महानायक बने रहते या बन जाते हैं।

जो जितना डरा हुआ है , वह उतना आक्रामक होगा। जो आक्रामक होगा , वह कॉन्सपिरेसी से और अधिक चिपकेगा। जितना कॉन्सपिरेसी में विश्वास , उतना भय का विकास। जितनी भयवृद्धि , उतनी आक्रामकता में भी वृद्धि। जितनी अधिक आक्रामकता , उतना कॉन्सपिरेसी से और अधिक चिपकाव। कॉन्सपिरेसी-भय-आक्रामकता के इस चक्र का चलते जाना।

आक्रामकता हद दर्ज़े की स्वार्थी है। वह करुणा से दूर-बहुत दूर चली जाती है। व्यक्ति का आक्रामक होना केवल वैचारिक बात नहीं है। वह ढेरों आचार-सम्बन्धी बदलाव लाती है। ऐसे ही लोग खाने-पीने के सामानों की जमाखोरी करते हैं , अफ़वाहें फैलाते हैं। इसी प्रकार के लोग दोषारोपण के लिए बलि-के-बकरे तलाशते हैं , उनके मत्थे सारा किया-धरा मढ़ देते हैं। इन लोगों में सामाजिक समानुभूति बहुत कम होती है , ये केवल अपने ( या बहुत हुआ तो अपने परिवार ) के बारे में सोचते हैं। जीवन को पूँजी मानकर ये डरे हुए आक्रामक लोग कॉन्सपिरेसीमय होकर ही महामारी का दौर काटते हैं।

कॉन्सपिरेसी में जीने वाला हमेशा धार्मिक व्यक्ति हो ज़रूरी नहीं। वह धर्मनिरपेक्ष भी हो सकता है। सेक्युलर होना आपको साइंटिफिक टेम्पर नहीं देता। सेक्युलरिज़्म धर्मों के प्रति समभाव या उदासीनता रखने को कहते हैं। यह एक सामाजिक सोच है , जिसमें आप कई बार तार्किकता को एकदम किनारे लगा देते हैं। कोई बुरा न मान जाये , इसलिए तर्क ही न करो। सब ख़ुश रहें , बुरा न मानें। लेकिन तर्क का आह्वान न करने से तर्क करने की क्षमता कमज़ोर पड़ती जाती है। फिर ऐसे अतार्किक सेक्युलर लोग विज्ञान से दूर हटते हुए सेक्युलर कॉन्स्पिरेसियों के जाल में फँस सकते हैं। ध्यान रहे : वैज्ञानिक सोच के मामले में समभाव या उदासीनता नहीं रखी जा सकती , वहाँ तर्क का पक्ष लेना ही पड़ता है। ऐसे में कोई भी ऐसी ख़बर जिसमें राजनीतिक या आर्थिक शक्तिशालियों की गुटबाज़ी शामिल हो , उसमें भी कॉन्सपिरेसी के बीज पड़ सकते हैं।

जिस समस्या पर व्यक्ति का ज़ोर नहीं चलता , उससे परेशान होकर वह अपने स्थूल नायक की सुनता है। नायक-वायक की अनुपस्थिति में अनेक बार अपनी राजनीतिक विचारधारा को ही नायक बना लेता है। उसके चश्मे से महामारी के सापेक्ष हर शक्तिशाली व्यक्ति को देखने लग जाता है। शक्तिशालियों की खेमेबाज़ी तो पैंडेमिक-काल में चल ही रही है। अमेरिका की अमुक पार्टी दूसरी पार्टी पर दोष लगा रही है। अमुक सरकार दूसरी सरकार पर। अमुक देश के लोग दूसरे देश के लोगों पर। एक ही देश के अमुक लोग दूसरे लोगों पर। इन सबमें बड़े उद्योगपति भी सायास / अनायास शामिल हैं , अनेक डॉक्टर-वैज्ञानिक भी। इतने आरोप, इतने प्रत्यारोप , इतनी बातें और इतने विरोधाभास कि व्यक्ति डरते-डरते अपना सिर पकड़ कर बैठ जाता है।

उपाय क्या है ? वही जिसे घर का कोई भी विवेकवान् बड़ा-बूढ़ा आसानी से बता देगा। उस पर बात या चर्चा करो , जिसे बदल सकते हो। जिस पर बस नहीं , उसपर बात करने से कोई लाभ नहीं। तुम्हारे प्रयास तुम्हारी सीमा हैं। बाक़ी आरोप-दोष-कॉन्सपिरेसी-षड्यन्त्र केवल ख़याली जुगाली। चाहे जितना चबाते रहो : सीआईए या एमआई श्वेतपत्र तो लाकर तुम्हें देंगी नहीं। और दे भी देंगी, तो क्या सच ही होगा वह ?

व्यक्तिगत-परिवारगत-समाजगत सकारात्मकता के अलावा बाक़ी ख़बरों का प्रसार केवल भय और आक्रामकता का माहौल बनाना है। डर भीड़ को खेमों में लामबन्द करने का सबसे आसान तरीक़ा है। इससे व्यक्ति को बड़ी आसानी से भीड़ में बदला जा सकता है। भीड़ समाज नहीं है। भीड़ और समाज में उतना ही अन्तर है , जितना पत्थरों के ढेर और पत्थर की दीवार में। दीवार में निर्मिति निहित है , ढेर में ध्वंस बैठा है।

और इस माहौल वाली भीड़ का इस्तेमाल कहाँ किया जाता है , यह तो सभी जानते हैं।

--- स्कन्द।

#skandshukla22

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 03 May 2020 at 4:45 PM -

कोरोना वैक्सीन की आशा

कोविड-19 के टीके पर सारी उम्मीदों को टिका देना ? क्या टीका बन ही जाएगा ?

मनुष्य-जाति में सात कोरोनाविषाणु संक्रमण करते रहे हैं। सातवाँ कोरोनाविषाणु अभी कुछ महीनों पहले नया-नया हमारी सूक्ष्म-जैविक जनसंख्या का सदस्य बना है और इसके कारण हम एक वैश्विक महामारी झेल ... रहे हैं। ऐसे में सरकारों , वैज्ञानिकों-डॉक्टरों , मीडिया व आम जन की ढेर सारी उम्मीदें वैक्सीन यानी टीके से हैं। 'टीका बन जाने के बाद ...' , 'जब टीका बन जाएगा ...' , 'कब-तक टीका बन जाएगा ...' --- जैसे आशान्वित वाक्य जगह-जगह सुनायी देने लगे हैं। पर ऐसे में यह चिन्ताजनक प्रश्न भी अपना महत्त्व रखता है कि अगर टीका बन ही न सका , तो क्या होगा ?

इस प्रश्न को सुनकर ढेरों लोग निराश महसूस कर सकते हैं। ऐसा भी सम्भव है कि वे आशा के अतिरेक में इसे खारिज करने लगें। अरे , जब फ़्लू के खिलाफ़ टीका बन गया तो इसके खिलाफ़ क्यों नहीं बनेगा ! पोलियो का टीका है , चेचक का है और ख़सरे का भी है। ढेरों टीके छोटे बच्चों को लगते रहते हैं। ऐसे में वर्तमान कोरोनाविषाणु के खिलाफ़ टीका क्यों न बनेगा ! कैसी नकारात्मक प्रश्नीयता है यह !

जहाँ दुनिया-भर के वैज्ञानिक अहर्निश इस विषाणु के खिलाफ़ प्रतिरोधी टीके के निर्माण में लगे पड़े हैं , वहाँ इस सत्य से हम-आप मुँह नहीं मोड़ सकते कि पिछले छह कोरोनाविषाणुओं में से एक के खिलाफ़ भी हमारे पास टीका नहीं है। और अन्य प्रजातियों के विषाणुओं के खिलाफ़ उपलब्ध वैक्सीनों के कारण हम इस सार्ससीओवी 2 के खिलाफ़ टीके के लिए अत्युत्साह और अत्याशा से भर कर नहीं रह सकते।

हर विषाणु भिन्न है , उसकी संरचना अलग। जिस तरह से ह्यूमन पैपिलोमा विषाणु त्वचा पर मस्सों से लेकर योनि-शिश्न का कैंसर तक उत्पन्न करता है ,वह तरीक़ा उस एचआईवी से अलग है , जो रक्तकोशिकाओं को नष्ट करके प्रतिरक्षा को क्षीण करता है। ख़सरे का विषाणु अलग ढंग से काम करता है , पोलियो का अलग ढंग से। ऐसे में एक विषाणु की समझ से दूसरे को पूरी तरह समझ पाने का भरोसा बहुधा ग़लत भी साबित हो सकता है। यहाँ तक कि पिछली फ़्लू-महामारियों से भी कोविड-19 की तुलना जब-तब की जा रही है। यह बात लोगों को ध्यान नहीं रहती कि वह विषाणु एक इल्फ्लुएन्ज़ा-विषाणु है और यह एक कोरोनाविषाणु। दोनों एकदम भिन्न परिवार के हैं : ऐसे में एक से मिले सबकों से दूसरे को समझना कितना उचित कहा जा सकता है ?

प्रश्न से प्रश्न निकलते हैं। अब यह प्रश्न उठता है कि पिछले किसी कोरोनाविषाणु के खिलाफ़ हम-लोग टीका क्यों न बना सके ? सार्स का टीका क्यों बन सका ? मर्स का क्यों न बना ? इसके लिए यह समझ ज़रूरी हो जाती है कि टीका-निर्माण उतना आसान नहीं , जितना मीडिया व आम जन समझते हैं। मनुष्य के ऊपरी श्वसन-मार्ग को समझना भी वर्तमान कोरोनाविषाणु-संक्रमण को समझने के लिए आवश्यक है। ऊपरी श्वसन-मार्ग यानी नाक से आरम्भ होकर जो वायुमार्ग श्वासनली तक जाता है , वह कई भिन्नताएँ लिए हुए है। वैक्सीन-तकनीकी के लिए यह इतना सुगम ढंग से भेद्य नहीं है। व्यावहारिक ढंग से इसे आप त्वचा के ही रूप में समझकर देखिए : त्वचा का वह हिस्सा जो भीतर श्वास-मार्ग की ओर चला गया है।

क्या त्वचा पर मौजूद विषाणु की किसी टीके से रोकथाम की गयी है अब तक ? उत्तर लगभग 'न' है। त्वचा व ऊपरी श्वसन-मार्ग जैसे रास्ते विषाणुओं से अपने ढंग से लड़ते हैं और चूँकि ये एक तरह से शरीर से 'बाहर' हैं , इनसे 'भीतरी' शत्रुओं की तरह लड़ा नहीं जा सकता। ध्यान रहे , शरीर के भीतरी शत्रु-कीटाणुओं से लड़ने के लिए टीके बनाना कहीं आसान है , जबकि शरीर के बाहर सतह पर बैठे कीटाणुओं के खिलाफ़ बनाना अपेक्षाकृत मुश्किल। इन बाहरी सतहों पर आ-बैठा विषाणु प्रतिरक्षा-तन्त्र को उस तरह सक्रिय नहीं करता , जिस तरह यह विषाणु भीतर पहुँचने पर करता है। इसे इस तरह समझिए : आपके घर के बाहर कोई आवांछित व्यक्ति खड़ा होता है , तब आपकी प्रतिक्रिया क्या होती है ? क्या यह प्रतिक्रिया उतनी और वैसी ही होती है , जैसी वह तब होती जब यह व्यक्ति आपके बेडरूम में होता ? आपके फेफड़े आपका बेडरूम हैं , आपकी नाक व श्वासनली आपके घर का दरवाज़ा या फिर हद-से-हद बैठक-भर। ऐसे में प्रतिरक्षा-तन्त्र की सजगता और फिर सुरक्षा एक-जैसी कैसे हो सकती हैं ?

अगर कोई विषाणु प्रतिरक्षा-तन्त्र को सजग नहीं करता और उसे 'मूर्ख' बना लेता है , तब उसके खिलाफ़ टीका बनाना मुश्किल होगा। प्रतिरक्षा-तन्त्र को ही जो चकमा दे गया , उससे टीके से हम-आप कितना लड़ पाएँगे ! फिर अगली समस्या टीके के बनने व लगने के बाद शुरू हो सकती है। टीके के कारण मिलने वाली प्रतिरक्षा गलत या अत्यधिक हो सकती है। यानी टीका लगाने के बाद जो प्रतिरक्षण उत्पन्न हुआ , उसने शरीर को ही हानि पहुँचानी शुरू कर दी ! ऐसा पिछले कोरोना-टीकों के साथ हुआ है। टीका लगने के बाद व्यक्ति अधिक बीमार पड़ गया : इससे बेहतर तो वह तब था , जब वह अपने प्रतिरक्षा-तन्त्र-भर के सहयोग से लड़ रहा था ! सार्स के खिलाफ़ टीका-विकास में यह दुष्परिणाम हमें देखने को मिल चुके हैं : टीका लगने के बाद पशु-शरीर पहले से भी अधिक रोगग्रस्त हो गया यानी स्वयं टीके ने पशुओं की स्वास्थ्य-स्थिति बिगाड़ दी।

वर्तमान कोरोनाविषाणु के खिलाफ़ सक्षम व सफल टीका बनाना आसान नहीं होगा। ऐसे में टीके के ऊपर अपनी सारी उम्मीदें टिका देना जेठ में सावन की आशा पालना है। रोकथाम के विशिष्ट वैज्ञानिक उपायों पर जब अतिनिर्भर हो जाते हैं , जब सामान्य सामाजिक उपायों की उपेक्षा करने लगते हैं। हमें यही नहीं करना है : टीका जब आएगा , तब आएगा। और नहीं भी आया , तब स्वच्छता और शुचिता के नवीन मानदण्डों के साथ इस नये विषाणु से जूझना है।

--- स्कन्द।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 01 May 2020 at 9:23 AM -

herd immunity, हर्ड इम्यूनिटी

जब कोरोना-19 के खिलाफ कोई वैक्सीन ही नहीं बनी तो herd-immunity लायी कैसे जाए।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 28 Apr 2020 at 7:12 AM -

मलेरिया

25 अप्रैल को मनाया जाता है विश्व मलेरिया दिवस

मण्डला 25 अप्रैल 2020
जिला मलेरिया अधिकारी रामशंकर साहू ने बताया कि 25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस के रूप में मनाया जाता है। संपूर्ण विश्व आज कोरोना महामारी से ग्रसित होकर उसके संक्रमण एवं नियंत्रण में ... व्यस्त है किन्तु हमें मलेरिया बीमारी के बारे में भी ध्यान देने की आवश्यकता है। आगामी समय में मलेरिया रोग का संक्रमण काल शुरू होने वाला है जोकि वर्षाकाल / मानसून जून से प्रकोप धीरे-धीरे बढ़ता जाता है जो वर्ष के नवम्बर तक अधिक रहता है तथा दिसम्बर के अंत से धीरे-धीरे कम होने लगता है। लॉकडाऊन के दौरान भी हम सभी अपने घरों में सोने के लिए मच्छरदानी का उपयोग करें, घरों में मच्छर निरोधक जालियों, मच्छर निरोधक क्रीम, ऑईल तथा रेपेलेंट का उपयोग करें। अपने घरों में मच्छर निरोधक पौधे जैसे लेमनग्रास, लहसुन, लेवेन्डर, गेंदा, तुलसी, सिट्रोनेला आदि लगायें, घरों के आसपास सफाई रखें, अनावश्यक पानी जमा न होने दें। घरों की छतों पर रखे अनुपयोगी वस्तुओं की सफाई कर उनमें जमा होने वाले पानी को खाली करें, टंकी तथा पानी के बर्तन को ढककर रखें। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष मंडला में 59.3 प्रतिशत मलेरिया के मामलों में कमी आई है। जिला मलेरिया अधिकारी ने बुखार आने पर तुरंत खून की जांच करने की समझाईश दी है। मलेरिया पॉजीटिव पाये जाने पर डॉक्टर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता या आशा द्वारा दिये जाने वाले उपचार को अपनाने की सलाह दी है।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 19 Apr 2020 at 3:20 PM -

राजेश चंद्रा

।।बुद्ध और उनका धम्म।।
-राजेश चन्द्रा-

14 अक्टूबर'1956 को भारत में, नागपुर में, महान धम्म दीक्षा के उपरान्त बोधिसत्व बाबा साहेब श्रीलंका की यात्रा पर गये थे, विश्वभ्रातृत्व बौद्ध सम्मेलन में प्रतिभाग करने। इतनी महान धम्म क्रान्ति करके बाबा साहेब ने बौद्ध जगत के समस्त देशों सहित ... पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट कर लिया था। श्रीलंका में वहाँ महापण्डित राहुल सांकृत्यायन से भी उनका आमना-सामना हुआ था, प्रसंगवशात उन्होंने कहा: "यदि मैं दस साल और रह गया तो भारत को बुद्धमय बना दूँगा।"

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने वक्तव्य दिया: " डा. अम्बेडकर ने भारत में बुद्ध धम्म का ऐसा स्तम्भ गाड़ दिया है कि अब उसे कोई उखाड़ नहीं सकता।"

बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के बौद्ध अनुयायी भी बाबा साहेब के संकल्प को प्रायः दोहराते हैं कि भारत को बुद्धमय बनाना है!

प्रश्न है कि भारत बुद्धमय होगा कैसे? क्या कुछेक जाति-बिरादरियों के बुद्धधम्मोन्मुख हो जाने से भारत बुद्धमय हो जाएगा? क्या सिर्फ कथित दलितों के बौद्ध हो जाने से भारत बुद्धमय हो जाएगा? भारत को बुद्धमय बनाने की कार्य योजना क्या है? इस विषय में बाबा साहेब का क्या दिशानिर्देश है?

बाबा साहेब के पास भारत को बुद्धमय बनाने की पूरी कार्य योजना थी। इस कार्य योजना का सुव्यवस्थित क्रमबद्ध मानचित्र बाबा साहेब के कई-कई आलेखों में मिलता है, जिनमें सर्वाधिक मार्गदर्शक आलेख उन्होंने सन् 1950 में लिखा था जो महाबोधि सोसाइटी की पत्रिका में बुद्ध पूर्णिमा के अंक में छपा था- बुद्धा एण्ड द फ्यूचर ऑफ हिज़ रिलीजन- नाम से, अंग्रेजी में। "बुद्ध और उनके धम्म का भविष्य" पांच खण्डों में लिखा गया यह एक विस्तृत आलेख है। डा. अम्बेडकर राइटिंग एण्ड स्पीचेस में खण्ड 17 में यह आलेख है। वैसे गूगल पर भी उपलब्ध है।

इस विस्तृत आलेख में भारत को बुद्धमय बनाने की दिशा में सारांश रूप में तीन महत्वपूर्ण बिन्दु हैं:

1. बौद्धों की एक हस्तपुस्तिका होना
2. भिक्खु संघ के उद्देश्य व लक्ष्यों में परिवर्तन करना
3. एक विश्व बौद्ध मिशन तैयार करना

फिर इन तीनों बिन्दुओं को उन्होंने क्रमिक रूप से विस्तार दिया है। मैं यहाँ उन सारे विस्तार के विस्तार में न जा कर सिर्फ पहले बिन्दु का उद्देश्य विशेष से सारांश देना चाहूँगा।

"1. बौद्धों की एक हस्तपुस्तिका होना", इस बिन्दु की व्याख्या में बोधिसत्व बाबा साहेब तुलनात्मक रूप से कहते हैं कि ईसाइयों के पास एक सुविधाजनक बात यह है कि उनका एक धर्मग्रन्थ है बाइबिल, जिसे आसानी से हाथ में लेकर जाया जा सकता है यानी ग्रन्थ हैण्डी है। यही बात इस्लाम के साथ भी है कि उनके पास एक धर्मग्रन्थ क़ुरआन है, सिक्खों के पास गुरुग्रन्थ साहेब है...

यह सारी तुलानाएं करके बाबा साहेब निष्कर्ष देते हैं कि बौद्धों के पास धर्मग्रन्थ के नाम पर कोई एक पुस्तक न होकर विशाल त्रिपिटक है जिस समन्दर को पार पाना सबके बस की बात नहीं है। वह सुझाव देते हैं हस्तपुस्तिका, हैण्डबुक, जैसी बौद्धों की एक पुस्तक भी होनी चाहिए जिसमें बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी मूलभूत शिक्षाएं दी हों जिनका उपासकगण नित्य पाठ कर सकें। उसमें पूजापाठ, जन्मदिन, विवाह, मृतक संस्कार आदि का भी परिशिष्ट हो।

"2. भिक्खु संघ के उद्देश्य व लक्ष्यों में परिवर्तन करना", इस दूसरे बिन्दु के विस्तार में वर्तमान भिक्खु संघ की वह विवेचना करते हैं और धम्म प्रचार के लिए वे उनको बिल्कुल अनुपयुक्त करार देते हैं। बड़े कठोर शब्दों में वर्तमान भिक्खु संघ को वे निकम्मों की फौज, आइडलर्स आर्मी, तक कहते हैं। कुल मिलाकर उनका सारांश यह है कि भारत को बुद्धमय बनाने के लिए धम्म ज्ञान से सम्पन्न नये क़िस्म का आधुनिक विज्ञान व शिक्षा से भी सुपरिचित धम्म प्रचारक चाहिए, जिसमें नालन्दा विश्वविद्यालय की प्राचीन परम्परा वाली सेवा भावना भी हो। बाबा साहेब सवाल करते हैं कि जब भी मानवता पर कोई संकट आता है तो लोग सेवा के लिए रामकृष्ण मिशन को याद करते हैं। भिक्खु संघ को कोई याद नहीं करता। सेवा किसका धर्म होना चाहिए? रामकृष्ण मिशन का या भिक्खु संघ का? बाबा साहेब जेसुइट पादरियों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि पूरे एशिया में इसाइयत शिक्षा, सेवा और चिकित्सा के ज़रिये फैली है। बाबा साहेब के कहने का तात्पर्य यह है कि भारत को बुद्धमय बनाने के लिए धम्म प्रचारकों को शिक्षा, सेवा, चिकित्सा का रास्ता अपनाना चाहिए, धम्म साहित्य वितरित करना चाहिए तथा धम्म प्रचारक उच्च शिक्षित होना चाहिए।

"3. एक विश्व बौद्ध मिशन तैयार करना", इस तीसरे बिन्दु की व्याख्या में वे कहते हैं कि एक विश्व बौद्ध मिशन तैयार करना चाहिए जिसके अन्तर्गत भारत के बौद्धों का विश्व के बौद्धों से सम्पर्क व मैत्री हो ताकि भारतीय बौद्धों को यह गौरवमय अनुभूति हो कि वे एक विश्व समाज का अंग हैं।

इस मार्गदर्शक आलेख का समापन उन्होंने इस प्रेरक वचन के साथ किया है:

"बुद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार करना सच्ची मानव सेवा है।"

बाबा साहेब के द्वारा मार्गनिर्देशित किये गये तीनों बिन्दु भारत को बुद्धमय बनाने का मानचित्र है, जिसमें पहला बिन्दु बाबा साहेब ने स्वयं अपने जीवनकाल में पूरा कर दिया। "बुद्ध और उनका धम्म", यही वह महान ग्रन्थ है जिसका संकेत उन्होंने अपने आलेख में किया था। यह ग्रन्थ सम्पूर्ण त्रिपिटक का सार है। इसे उस हर बौद्ध को कई-कई बार पढ़ना, मनन करना चाहिए जो मन के किसी कोने में भारत को बुद्धमय बनाने का सपना देखते हैं। इस ग्रन्थ का अध्ययन करने मात्र से भारत बुद्धमय नहीं हो जाएगा लेकिन कम से कम आपका जीवन तो बुद्धमय होगा। ऐसे एक-एक व्यक्ति रूपान्तरित होगा तो एक दिन पूरा भारत बुद्धमय होगा।

इस लाॅकडाउन अवधि का सदुपयोग कीजिए। इस ग्रन्थ का अध्ययन कर लीजिये, चिन्तन, मनन कर लीजिये।

धम्म प्रचार के लिए नये क़िस्म का भिक्खु संघ तो भिक्खु संघ ही बनाएगा, जो कि अभी तक नहीं बन सका है, लेकिन हम नये किस्म का उपासक संघ तो बना सकते हैं। प्रकारान्तर से देखिये तो यह युग उपासकों का है। आधुनिक भारत में विराट धम्म क्रान्ति महान उपासक बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने की। भगवान की विपस्सना विद्या को पुनर्स्थापित करने का महान कार्य एक उपासक श्री सत्यनारायण गोयनका जी ने किया। श्रावस्ती में महान स्वर्णिम स्तूप तथा उपासिका संघ का निर्माण महान उपासिका डा. ब्रान्कट सिथिपोल , थाई माता, ने किया है तथा भारत में अन्तरराष्ट्रीय त्रिपिटक संगायन का नेतृत्व एक महोपासिका श्रीमती वांगमो डिक्सी कर रही हैं। भारत के किसी भी जनपद में देख लीजिए, अधिकांश स्थानों पर धम्म गतिविधियों का नेतृत्व उपासकगण कर रहे हैं।

भारत में विगत 15 वर्षो से आयोजित हो रहा अन्तरराष्ट्रीय त्रिपिटक संगायन एक ऐसा आयोजन है जिससे सक्रियता से जुड़ कर भारतीय बौद्ध बाबा साहेब द्वारा संकेतित तीसरे बिन्दु को भी साकार रूप दे सकते हैं।

"बुद्ध और उनका धम्म" ग्रन्थ पढ़ने के लिए आपको इतना जोर देकर आग्रह क्यों किया जा रहा है? ताकि आप बाबा साहेब की परिकल्पित परियोजना का अंग बन सकें, कुछ अपना भी योगदान दे सकें।

सरकारी तौर पर लाॅकडाउन अवधि 3 मई'2020 तक बढ़ा दी गयी है। परिस्थितियों को देखते हुए यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि बाबा साहेब की जयंती की तरह ही बुद्ध जयंती, बुद्ध पूर्णिमा भी सार्वजनिक रूप से न मना कर घरेलू स्तर पर ही मनायी जाएगी। सभी जन प्रयास करें कि इस पावन ग्रन्थ तथा धम्मपद का सम्पूर्ण पाठ यथासम्भव 3 मई'2020 तक पूर्ण हो जाए अन्यथा बुद्ध पूर्णिमा 7 मई'2020 तक तो अनिवार्यतः हो जाए।

धम्म ग्रन्थ का पाठ पूरा होने पर उत्सव मनाने की धार्मिक परम्परा है- परिजनों के साथ सामूहिक रूप से पूजा करना, दीप जलाना, गन्ध अर्पण करना, मिष्ठान्न अर्पित करना और परिजनों के साथ यथा सामर्थ्य प्रीति भोज करना और अनिवार्य रूप से दान अवश्य करना। बुद्ध पूर्णिमा के दिन पारिवारिक स्तर पर ऐसी ही योजना बनाइये। अपने आसपास देखिये कि लाॅकडाउन के कारण कोई भूखा तो नहीं सो रहा है। सोशल डिस्टैंसिंग का अनुपालन करते हुए भोजन भण्डारे का आयोजन कर सकते हैं तो प्रशासन की अनुमति से वह भी करें।

कोरोना महामारी तथा उसके कारण लागू लाॅकडाउन अवधि का सदुपयोग कीजिए- स्वयं अपने जीवन को, परिजनों के जीवन को, घर को तथा संसार को धम्म की तरंगों से आन्दोलित कीजिए। पूरे संसार को मैत्री की तरंगें प्रेषित कीजिए- सब का मंगल हो, सब का कल्याण हो, सब स्वस्थ रहें, निरोगी हों, दीर्घजीवी हों...

आप यूँ भी सूक्ष्म रूप से स्वयं अपना और संसार का हित कर सकते हैं।

पुनश्च:

1. "बोधिसत्व से बुद्ध की ओर" अभियान में लगे उपासक-उपासिकाओं ने श्रद्धा-भावना से कई बड़े प्यारे अनुभव साझा किये हैं। ऐसे अनुभवों से लोगों को प्रेरणा मिलती है। कृपया शेष लोग भी अपने अनुभव साझा करें।

2. इसी श्रंखला के पूर्व आलेख "बोधिसत्व से बुद्ध की ओर" कृपया 10 अप्रैल'2020 का आलेख सन्दर्भित करें : https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3407000802663052&id=100000594960974

3. उपरोक्त विषयक किसी जिज्ञासा की स्थिति में कृपया श्री महेश सत्यार्थी जी (08004906369) से सम्पर्क करें।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 03 Apr 2020 at 7:01 AM -

महामारी की मेकेनिज्म

सुतली बम का विस्फोट कैसे होता है-
1 पहले तीली जलाई जाती है।
2 फिर तीली उस बम से बाहर निकली एक बारूद युक्त डोरी को जला देती है।
3 फिर डोरी जलते जलते आग को अंदर ले जाती है।
4 फिर अंदर की बारूद जलने लगती है जिससे ... सुतलियाँ तनाव में आ जाती हैं।
5 फिर सुतलियाँ टूट जाती हैं।
6 फिर सारा माल हर दिशा में फैलना शुरू करता।
7 फिर उसकी फैलने की रफ्तार तेजी से बढ़ती है।
8 फिर फैलने की रफ्तार बढ़नी बन्द होती है लेकिन माल फैलता रहता है।
9 फिर फैलने की रफ्तार कम होनी शुरू होती है लेकिन माल फैलता रहता है।
10 फिर फैलना भी बन्द हो जाता है।

इसी तरह कोरोना विस्फोट को समझिए।

1 चीन में कोरोना फैल गया। यानी तीली जल गई।
2 चीन गए विदेशियों को होने लगा यानी डोरी में आग लग गयी।
3 विदेशी अपने अपने देश को भागे यानी बम की डोरी की आग बम के अंदर की ओर तेजी से भागी।
4 बीमार लोग अपने देश में पहुंच गए यानी बारूदी डोर के सहारे आग बम के अंदर पहुंच गई।
5 देश के लोग बीमार होने लगे यानी अंदर की बारूद भी जलने लगी।
6 पुलिस ने जनता कर्फ्यू, लॉक डाउन, नाके बंदी आदि चालू कर दी यानी सुतलियों में तनाव आ गया।
7 बीमार लोग नाकेबंदी का उल्लंघन करते हुए आते जाते भागते रहे यानी सुतलियाँ टूटने लगीं।
8 बीमारों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी यानी बारूद का माल तेजी से फैलने लगा।
एक विस्फोट की मेकेनिक्स की दृष्टि से देखा जाय तो भारतीय कोरोना आठवें चरण में आ चुका है।
देश बहुत बड़ा है इसलिए आठवां चरण लम्बा चलेगा। शायद डेढ़ से दो माह।
फिर नौवां चरण होगा।
फिर दसवां चरण।