Home

Welcome!

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 09 May 2020 at 7:51 PM -

माता का हृदय - मुंशी प्रेम चंद

 Hindi Kahani- हिंदी कहानी

Mata Ka Hriday
Munshi Premchand
माता का हृदय - मुंशी प्रेम चंद

1
माधवी की आँखों में सारा संसार अँधेरा हो रहा था। कोई अपना मददगार न दिखायी देता था। कहीं आशा की झलक न थी। उस निर्धन घर में वह अकेली पड़ी रोती थी और ... कोई आँसू पोंछनेवाला न था। उसके पति को मरे हुए 22 वर्ष हो गये थे। घर में कोई सम्पत्ति न थी। उसने न-जाने किन तकलीफों से अपने बच्चे को पाल-पोसकर बड़ा किया था। वही जवान बेटा आज उसकी गोद से छीन लिया गया था और छीननेवाले कौन थे ? अगर मृत्यु ने छीना होता तो वह सब्र कर लेती। मौत से किसी को द्वेष नहीं होता। मगर स्वार्थियों के हाथों यह अत्याचार असह्य हो रहा था। इस घोर संताप की दशा में उसका जी रह-रहकर इतना विकल हो जाता कि इसी समय चलूँ और उस अत्याचारी से इसका बदला लूँ जिसने उस पर यह निष्ठुर आघात किया है। मारूँ या मर जाऊँँ। दोनों ही में संतोष हो जायगा। कितना सुन्दर, कितना होनहार बालक था ! यही उसके पति की निशानी, उसके जीवन का आधार, उसकी उम्र-भर की कमाई थी। वही लड़का इस वक्त जेल में पड़ा न जाने क्या-क्या तकलीफें झेल रहा होगा ! और उसका अपराध क्या था ? कुछ नहीं। सारा मुहल्ला उस पर जान देता था। विद्यालय के अध्यापक उस पर जान देते थे। अपने-बेगाने सभी तो उसे प्यार करते थे। कभी उसकी कोई शिकायत सुनने ही में नहीं आयी। ऐसे बालक की माता होने पर अन्य माताएँ उसे बधाई देती थीं। कैसा सज्जन, कैसा उदार, कैसा परमार्थी ! खुद भूखों सो रहे मगर क्या मजाल कि द्वार पर आनेवाले अतिथि को रूखा जवाब दे। ऐसा बालक क्या इस योग्य था कि जेल में जाता ! उसका अपराध यही था, वह कभी-कभी सुनने वालों को अपने दुखी भाइयों का दुखड़ा सुनाया करता था, अत्याचार से पीड़ित प्राणियों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता था। क्या यही उसका अपराध था ? दूसरों की सेवा करना भी अपराध है ? किसी अतिथि को आश्रय देना भी अपराध है ? 
इस युवक का नाम आत्मानंद था। दुर्भाग्यवश उसमें वे सभी सद्गुण थे जो जेल का द्वार खोल देते हैं। वह निर्भीक था, स्पष्टवादी था, साहसी था, स्वदेशप्रेमी था, निःस्वार्थ था, कर्त्तव्यपरायण था। जेल जाने के लिए इन्हीं गुणों की जरूरत है। स्वाधीन प्राणियों के लिए वे गुण स्वर्ग का द्वार खोल देते हैं, पराधीनों के लिए नरक के ! आत्मानंद के सेवा-कार्य ने, उसकी वक्तृताओं ने और उसके राजनीतिक लेखों ने उसे सरकारी कर्मचारियों की नजरों में चढ़ा दिया था। सारा पुलिस-विभाग नीचे से ऊपर तक उससे सतर्क रहता था, सबकी निगाहें उस पर लगी रहती थीं। आखिर जिले में एक भयंकर डाके ने उन्हें इच्छित अवसर प्रदान कर दिया। आत्मानंद के घर की तलाशी हुई, कुछ पत्र और लेख मिले, जिन्हें पुलिस ने डाके का बीजक सिद्ध किया। लगभग 20 युवकों की एक टोली फाँस ली गयी। आत्मानंद इसका मुखिया ठहराया गया। शहादतें हुईं। इस बेकारी और गिरानी के जमाने में आत्मा से ज्यादा सस्ती और कौन वस्तु हो सकती है ! बेचने को और किसी के पास रह ही क्या गया है ! नाममात्र का प्रलोभन देकर अच्छी-से-अच्छी शहादतें मिल सकती हैं, और पुलिस के हाथ पड़कर तो निकृष्ट-से-निकृष्ट गवाहियाँ भी देववाणी का महत्त्व प्राप्त कर लेती हैं। शहादतें मिल गयीं, महीने-भर तक मुकदमा चला, मुकदमा क्या चला एक स्वाँग चलता रहा और सारे अभियुक्तों को सजाएँ दे दी गयीं। आत्मानंद को सबसे कठोर दंड मिला, 8 वर्ष का कठिन कारावास ! माधवी रोज कचहरी जाती; एक कोने में बैठी सारी कार्रवाई देखा करती। मानवीय चरित्र कितना दुर्बल, कितना निर्दय, कितना नीच है, इसका उसे तब तक अनुमान भी न हुआ था। जब आत्मानंद को सजा सुना दी गयी और वह माता को प्रणाम करके सिपाहियों के साथ चला तो माधवी मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ी। दो-चार दयालु सज्जनों ने उसे एक ताँगे पर बैठाकर घर तक पहुँचाया। जब से वह होश में आयी है उसके हृदय में शूल-सा उठ रहा है। किसी तरह धैर्य नहीं होता। उस घोर आत्म-वेदना की दशा में अब अपने जीवन का केवल एक लक्ष्य दिखायी देता है और वह इस अत्याचार का बदला है। 
अब तक पुत्र उसके जीवन का आधार था। अब शत्रुओं से बदला लेना ही उसके जीवन का आधार होगा। जीवन में अब उसके लिए कोई आशा न थी। इस अत्याचार का बदला लेकर वह अपना जन्म सफल समझेगी। इस अभागे नर-पिशाच बागची ने जिस तरह उसे रक्त के आँसू रुलाये हैं उसी भाँति यह भी उसे रुलायेगी। नारी-हृदय कोमल है, लेकिन केवल अनुकूल दशा में; जिस दशा में पुरुष दूसरों को दबाता है, स्त्री शील और विनय की देवी हो जाती है। लेकिन जिसके हाथों अपना सर्वनाश हो गया हो उसके प्रति स्त्री को पुरुष से कम घृणा और क्रोध नहीं होता। अंतर इतना ही है कि पुरुष शस्त्रों से काम लेता है, स्त्री कौशल से। 
रात भीगती जाती थी और माधवी उठने का नाम न लेती थी। उसका दुःख प्रतिकार के आवेश में विलीन होता जाता था। यहाँ तक कि इसके सिवा उसे और किसी बात की याद ही न रही। उसने सोचा, कैसे यह काम होगा ? कभी घर से नहीं निकली। वैधव्य के 22 साल इसी घर में कट गये; लेकिन अब निकलूँगी। जबरदस्ती निकलूँगी, भिखारिन बनूँगी, टहलनी बनूँगी, झूठ बोलूँगी, सब कुकर्म करूँगी। सत्कर्म के लिए संसार में स्थान नहीं। ईश्वर ने निराश होकर कदाचित् इसकी ओर से मुँह फेर लिया है। जभी तो यहाँ ऐसे-ऐसे अत्याचार होते हैं और पापियों को दंड नहीं मिलता। अब इन्हीं हाथों से उसे दंड दूँगी। 


संध्या का समय था। लखनऊ के एक सजे हुए बँगले में मित्रों की महफिल जमी हुई थी। गाना-बजाना हो रहा था। एक तरफ आतशबाजियाँ रखी हुई थीं। दूसरे कमरे में मेजों पर खाना चुना जा रहा था। चारों तरफ पुलिस के कर्मचारी नजर आते थे। वह पुलिस के सुपरिंटेंडेंट मिस्टर बागची का बँगला है। कई दिन हुए उन्होंने एक मार्के का मुकदमा जीता था। अफसरों ने खुश होकर उनकी तरक्की कर दी थी। और उसी की खुशी में यह उत्सव मनाया जा रहा था। यहाँ आये दिन ऐसे उत्सव होते रहते थे। मुफ्त के गवैये मिल जाते थे, मुफ्त की आतशबाजी; फल और मेवे और मिठाइयाँ आधे दामों पर बाजार से आ जाती थीं और चट दावत हो जाती थी। दूसरों के जहाँ सौ लगते, वहाँ इनका दस से काम चल जाता था। दौड़-धूप करने को सिपाहियों की फौज थी ही। और यह मार्के का मुकदमा क्या था ? वह जिसमें निरपराध युवकों को बनावटी शहादत से जेल में ठूँस दिया गया था। 
गाना समाप्त होने पर लोग भोजन करने बैठे। बेगार के मजदूर और पल्लेदार जो बाजार से दावत और सजावट के सामान लाये थे, रोते या दिल में गालियाँ देते चले गये थे; पर एक बुढ़िया अभी तक द्वार पर बैठी हुई थी। अन्य मजदूरों की तरह वह भुनभुनाकर काम न करती थी। हुक्म पाते ही खुश-दिल मजदूर की तरह दौड़-दौड़कर हुक्म बजा लाती थी। यह माधवी थी, जो इस समय मज़ूरनी का वेष धारण करके अपना घातक संकल्प पूरा करने आयी थी। 
मेहमान चले गये। महफिल उठ गयी। दावत का सामान समेट दिया गया। चारों ओर सन्नाटा छा गया; लेकिन माधवी अभी तक यहीं बैठी थी। 
सहसा मिस्टर बागची ने पूछा- बुड्ढी, तू यहाँ क्यों बैठी है ? तुझे कुछ खाने को मिल गया ? 
माधवी- हाँ हुजूर, मिल गया। 
बागची- तो जाती क्यों नहीं ? 
माधवी- कहाँ जाऊँ सरकार, मेरा कोई घर-द्वार थोड़े ही है। हुकुम हो तो यहीं पड़ी रहूँ। पाव-भर आटे की परवस्ती हो जाय हुजूर। 
बागची- नौकरी करेगी ? 
माधवी- क्यों न करूँगी सरकार, यही तो चाहती हूँ। 
बागची- लड़का खेला सकती है ?
माधवी- हाँ हुजूर, वह मेरे मन का काम है। 
बागची- अच्छी बात है। तू आज ही से रह। जा, घर में देख, जो काम बतायें, वह कर। 


एक महीना गुजर गया। माधवी इतना तन-मन से काम करती है कि सारा घर उससे खुश है। बहूजी का मिजाज बहुत ही चिड़चिड़ा है। वह दिन-भर खाट पर पड़ी रहती हैं और बात-बात पर नौकरों पर झल्लाया करती हैं। लेकिन माधवी उनकी घुड़कियों को भी सहर्ष सह लेती है। अब तक मुश्किल से कोई दाई एक सप्ताह से अधिक ठहरी थी। माधवी ही का कलेजा है कि जली-कटी सुनकर भी मुख पर मैल नहीं आने देती। 
मिस्टर बागची के कई लड़के हो चुके थे, पर यही सबसे छोटा बच्चा बच रहा था। बच्चे पैदा तो हृष्ट-पुष्ट होते, किन्तु जन्म लेते ही उन्हें एक-न-एक रोग लग जाता था और कोई दो-चार महीने, कोई साल-भर जीकर चल देते थे। माँ-बाप दोनों इस शिशु पर प्राण देते थे। उसे जरा जुकाम भी हो तो दोनों विकल हो जाते। स्त्री-पुरुष दोनों शिक्षित थे, पर बच्चे की रक्षा के लिए टोना-टोटका, दुआ-ताबीज, जंतर-मंतर एक से भी उन्हें इनकार न था। 
माधवी से यह बालक इतना हिल गया कि एक क्षण के लिए भी उसकी गोद से न उतरता। वह कहीं एक क्षण के लिए चली जाती तो रो-रोकर दुनिया सिर पर उठा लेता। वह सुलाती तो सोता, वह दूध पिलाती तो पीता, वह खेलाती तो खेलता, उसी को वह अपनी माता समझता। माधवी के सिवा उसके लिए संसार में कोई अपना न था। बाप को तो वह दिन-भर में केवल दो-चार बार देखता और समझता यह कोई परदेशी आदमी है। माँ आलस्य और कमजोरी के मारे गोद में लेकर टहल न सकती थी। उसे वह अपनी रक्षा का भार सँभालने के योग्य न समझता था, और नौकर-चाकर उसे गोद में लेते तो इतनी बेदर्दी से कि उसके कोमल अंगों में पीड़ा होने लगती थी। कोई उसे ऊपर उछाल देता था, यहाँ तक कि अबोध शिशु का कलेजा मुँह को आ जाता था। उन सबों से वह डरता था। केवल माधवी थी जो उसके स्वभाव को समझती थी। वह जानती थी कि कब क्या करने से बालक प्रसन्न होगा। इसीलिए बालक को भी उससे प्रेम था। 
माधवी ने समझा था, यहाँ कंचन बरसता होगा; लेकिन उसे देखकर कितना विस्मय हुआ कि बड़ी मुश्किल से महीने का खर्च पूरा पड़ता है। नौकरों से एक-एक पैसे का हिसाब लिया जाता था और बहुधा आवश्यक वस्तुएँ भी टाल दी जाती थीं। एक दिन माधवी ने कहा- बच्चे के लिए कोई तेज गाड़ी क्यों नहीं मँगवा देतीं। गोद में उसकी बाढ़ मारी जाती है। 
मिसेज़ बागची ने कुंठित होकर कहा- कहाँ से मँगवा दूँ, कम-से-कम 50-60 रुपये में आयेगी। इतने रुपये कहाँ हैं ? 
माधवी- मालकिन, आप भी ऐसा कहती हैं ! 
मिसेज़ बागची- झूठ नहीं कहती। बाबूजी की पहली स्त्री से पाँच लड़कियाँ और हैं। सब इस समय इलाहाबाद के एक स्कूल में पढ़ रही हैं। बड़ी की उम्र 15-16 वर्ष से कम न होगी। आधा वेतन तो उधर ही चला जाता है। फिर उनकी शादी की भी तो फिक्र है। पाँचों के विवाह में कम-से-कम 25 हजार लगेंगे। इतने रुपये कहाँ से आयेंगे। मैं चिंता के मारे मरी जाती हूँ। मुझे कोई दूसरी बीमारी नहीं है, केवल यही चिंता का रोग है। 
माधवी- घूस भी तो मिलती है। 
मिसेज़ बागची- बुढ़िया, ऐसी कमाई में बरकत नहीं होती। यही क्यों, सच पूछो तो इसी घूस ने हमारी यह दुर्गति कर रखी है। क्या जानें औरों को कैसे हजम होती है। यहाँ तो जब ऐसे रुपये आते हैं तो कोई-न-कोई नुकसान भी अवश्य हो जाता है। एक आता है तो दो लेकर जाता है। बार-बार मना करती हूँ, हराम की कौड़ी घर में न लाया करो, लेकिन मेरी कौन सुनता ! 
बात यह थी कि माधवी को बालक से स्नेह होता जाता था। उसके अमंगल की कल्पना भी वह न कर सकती थी। वह अब उसी की नींद सोती और उसी की नींद जागती थी। अपने सर्वनाश की बात याद करके एक क्षण के लिए उसे बागची पर क्रोध तो हो आता था और घाव फिर हरा हो जाता था; पर मन पर कुत्सित भावों का आधिपत्य न था। घाव भर रहा था, केवल ठेस लगने से दर्द हो जाता था। उसमें स्वयं टीस या जलन न थी। इस परिवार पर अब उसे दया आती थी। सोचती, बेचारे यह छीन-झपट न करें तो कैसे गुजर हो। लड़कियों का विवाह कहाँ से करेंगे ! स्त्री को जब देखो बीमार ही रहती है। उन पर बाबूजी को एक बोतल शराब भी रोज चाहिए। यह लोग तो स्वयं अभागे हैं। जिसके घर में 5-5 क्वाँरी कन्याएँ हों, बालक हो-होकर मर जाते हों, घरनी सदा बीमार रहती हो, स्वामी शराब का लती हो, उस पर तो यों ही ईश्वर का कोप है। इनसे तो मैं अभागिनी ही अच्छी ! 


दुर्बल बालकों के लिए बरसात बुरी बला है। कभी खाँसी है, कभी ज्वर, कभी दस्त। जब हवा में ही शीत भरी हो तो कोई कहाँ तक बचाये। माधवी एक दिन अपने घर चली गयी थी। बच्चा रोने लगा तो माँ ने एक नौकर को दिया, इसे बाहर से बहला ला। नौकर ने बाहर ले जाकर हरी-हरी घास पर बैठा दिया। पानी बरस कर निकल गया था। भूमि गीली हो रही थी। कहीं-कहीं पानी भी जमा हो गया था। बालक को पानी में छपके लगाने से ज्यादा प्यारा और कौन खेल हो सकता है। खूब प्रेम से उमग-उमगकर पानी में लोटने लगा। नौकर बैठा और आदमियों के साथ गप-शप करता रहा। इस तरह घंटों गुजर गये। बच्चे ने खूब सर्दी खायी। घर आया तो उसकी नाक बह रही थी। रात को माधवी ने आकर देखा तो बच्चा खाँस रहा था। आधी रात के करीब उसके गले से खुरखुर की आवाज निकलने लगी। माधवी का कलेजा सन से हो गया। स्वामिनी को जगाकर बोली- देखो तो, बच्चे को क्या हो गया है। क्या सर्दी-वर्दी तो नहीं लग गयी। हाँ, सर्दी ही तो मालूम होती है। 
स्वामिनी हकबका कर उठ बैठी और बालक की खुरखुराहट सुनी तो पाँव तले से जमीन निकल गयी। यह भयंकर आवाज उसने कई बार सुनी थी और उसे खूब पहचानती थी। व्यग्र होकर बोली- जरा आग जलाओ। थोड़ा-सा चोकर लाकर एक पोटली बनाओ, सेंकने से लाभ होता है। इन नौकरों से तंग आ गयी। आज कहार जरा देर के लिए बाहर ले गया था, उसी ने सर्दी में छोड़ दिया होगा। 
सारी रात दोनों बालक को सेंकती रहीं। किसी तरह सबेरा हुआ। मिस्टर बागची को खबर मिली तो सीधे डाक्टर के यहाँ दौड़े। खैरियत इतनी थी कि जल्द एहतियात की गयी। तीन दिन में बच्चा अच्छा हो गया; लेकिन इतना दुर्बल हो गया था कि उसे देखकर डर लगता था। सच पूछो तो माधवी की तपस्या ने बालक को बचाया। माता सोती, पिता सो जाता, किंतु माधवी की आँखों में नींद न थी। खाना-पीना तक भूल गयी। देवताओं की मनौतियाँ करती थी, बच्चे की बलाएँ लेती थी, बिलकुल पागल हो गयी थी। यह वही माधवी है जो अपने सर्वनाश का बदला लेने आयी थी। अपकार की जगह उपकार कर रही थी। विष पिलाने आयी थी, सुधा पिला रही थी। मनुष्य में देवता कितना प्रबल है ! 
प्रातःकाल का समय था। मिस्टर बागची शिशु के झूले के पास बैठे हुए थे। स्त्री के सिर में पीड़ा हो रही थी। वहीं चारपाई पर लेटी हुई थी और माधवी समीप बैठी बच्चे के लिए दूध गरम कर रही थी। सहसा बागची ने कहा- बूढ़ा, हम जब तक जियेंगे तुम्हारा यश गायेंगे। तुमने बच्चे को जिला लिया। 
स्त्री- यह देवी बनकर हमारा कष्ट निवारण करने के लिए आ गयी। यह न होती तो न-जाने क्या होता। बूढ़ा, तुमसे मेरी एक विनती है। यों तो मरना-जीना प्रारब्ध के हाथ है, लेकिन अपना-अपना पौरा भी बड़ी चीज है। मैं अभागिनी हूँ। अबकी तुम्हारे ही पुण्य-प्रताप से बच्चा सँभल गया। मुझे डर लग रहा है कि ईश्वर इसे हमारे हाथ से छीन न लें। सच कहती हूँ बूढ़ा, मुझे इसको गोद में लेते डर लगता है। इसे तुम आज से अपना बच्चा समझो। तुम्हारा होकर शायद बच जाय, हम अभागे हैं, हमारा होकर इस पर कोई-न-कोई संकट आता रहेगा। आज से तुम इसकी माता हो जाओ। तुम इसे अपने घर ले जाओ, जहाँ चाहे ले जाओ, तुम्हारी गोद में देकर मुझे फिर कोई चिंता न रहेगी। वास्तव में तुम्हीं इसकी माता हो, मैं तो राक्षसी हूँ। 
माधवी- बहूजी, भगवान् सब कुशल करेंगे, क्यों जी इतना छोटा करती हो ? 
मिस्टर बागची- नहीं-नहीं बूढ़ी माता, इसमें कोई हरज नहीं है। मैं मस्तिष्क से तो इन बातों को ढकोसला ही समझता हूँ; लेकिन हृदय से इन्हें दूर नहीं कर सकता। मुझे स्वयं मेरी माताजी ने एक धोबिन के हाथ बेच दिया था। मेरे तीन भाई मर चुके थे। मैं जो बच गया तो माँ-बाप ने समझा बेचने से ही इसकी जान बच गयी। तुम इस शिशु को पालो-पोसो। इसे अपना पुत्र समझो। खर्च हम बराबर देते रहेंगे। इसकी कोई चिंता मत करना। कभी-कभी जब हमारा जी चाहेगा, आकर देख लिया करेंगे। हमें विश्वास है कि तुम इसकी रक्षा हम लोगों से कहीं अच्छी तरह कर सकती हो। मैं कुकर्मी हूँ। जिस पेशे में हूँ, उसमें कुकर्म किये बगैर काम नहीं चल सकता। झूठी शहादतें बनानी ही पड़ती हैं, निरपराधों को फँसाना ही पड़ता है। आत्मा इतनी दुर्बल हो गयी है कि प्रलोभन में पड़ ही जाता हूँ। जानता हूँ कि बुराई का फल बुरा ही होता है; पर परिस्थिति से मजबूर हूँ। अगर न करूँ तो आज नालायक बनाकर निकाल दिया जाऊँ। अँग्रेज हजारों भूलें करें, कोई नहीं पूछता। हिंदुस्तानी एक भूल भी कर बैठे तो सारे अफसर उसके सिर हो जाते हैं। हिंदुस्तानियों को तो कोई बड़ा पद न मिले, वही अच्छा। पद पाकर तो उनकी आत्मा का पतन हो जाता है। उनको हिन्दुस्तानियत का दोष मिटाने के लिए कितनी ही ऐसी बातें करनी पड़ती हैं जिनका अंग्रेज के दिल में कभी खयाल ही पैदा नहीं हो सकता। तो बोलो, स्वीकार करती हो ? 
माधवी गद्गद होकर बोली- बाबूजी, आपकी इच्छा है तो मुझसे भी जो कुछ बन पड़ेगा, आपकी सेवा कर दूँगी। भगवान् बालक को अमर करें, मेरी तो उनसे यही विनती है। 
माधवी को ऐसा मालूम हो रहा था कि स्वर्ग के द्वार सामने खुले हैं और स्वर्ग की देवियाँ अंचल फैला-फैलाकर आशीर्वाद दे रही हैं, मानो उसके अंतस्तल में प्रकाश की लहरें-सी उठ रही हैं। इस स्नेहमय सेवा में कितनी शांति थी। 
बालक अभी तक चादर ओढ़े सो रहा था। माधवी ने दूध गरम हो जाने पर उसे झूले पर से उठाया, तो चिल्ला पड़ी। बालक की देह ठंडी हो गयी थी और मुँह पर पीलापन आ गया था जिसे देखकर कलेजा हिल जाता है, कंठ से आह निकल जाती है और आँखों से आँसू बहने लगते हैं। जिसने उसे एक बार देखा है फिर कभी नहीं भूल सकता। माधवी ने शिशु को गोद से चिपटा लिया, हालाँकि नीचे उतार देना चाहिए था। 
कुहराम मच गया। माँ बच्चे को गले से लगाये रोती थी; पर उसे जमीन पर न सुलाती थी। क्या बातें हो रही थीं और क्या हो गया। मौत को धोखा देने में आनंद आता है। वह उस वक्त कभी नहीं आती जब लोग उसकी राह देखते हैं। रोगी जब सँभल जाता है, जब वह पथ्य लेने लगता है, उठने-बैठने लगता है, घर-भर खुशियाँ मनाने लगता है, सबको विश्वास हो जाता है कि संकट टल गया, उस वक्त घात में बैठी हुई मौत सिर पर आ जाती है। यही उसकी निठुर लीला है। 
आशाओं के बाग लगाने में हम कितने कुशल हैं। यहाँ हम रक्त के बीज बोकर सुधा के फल खाते हैं। अग्नि से पौधों को सींचकर शीतल छाँह में बैठते हैं। हा, मंदबुद्धि ! 
दिन-भर मातम होता रहा; बाप रोता था, माँ तड़पती थी और माधवी बारी-बारी से दोनों को समझाती थी। यदि अपने प्राण देकर वह बालक को जिला सकती तो इस समय अपना धन्य भाग समझती। वह अहित का संकल्प करके यहाँ आयी थी और आज जब उसकी मनोकामना पूरी हो गयी और उसे खुशी से फूला न समाना चाहिए था, उसे उससे कहीं घोर पीड़ा हो रही थी जो अपने पुत्र की जेल-यात्रा से हुई थी। रुलाने आयी थी और खुद रोती जा रही थी। माता का हृदय दया का आगार है। उसे जलाओ तो उसमें दया की ही सुगंध निकलती है, पीसो तो दया का ही रस निकलता है। वह देवी है। विपत्ति की क्रूर लीलाएँ भी उस स्वच्छ निर्मल स्रोत को मलिन नहीं कर सकतीं।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 05 May 2020 at 8:14 PM -

Jihaad - Munshi Premchand

जिहाद - मुंशी प्रेम चंद

बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश से भागा चला आ रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष ... का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान; मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे। पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है। एक मुल्ला ने न जाने कहाँ से आ कर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जागृत कर दिया है। उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहिनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं। वह शेरों की तरह गरज कर कहता है-खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिष्र के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशनी कर देने का सवाब सारी उम्र के रोजे, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हूरें तुम्हारी बलाएँ लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर मलेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा। और सारी जनता यह आवाज सुन कर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है। उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है। उन्हीं हिंदुओं पर जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाये जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियाँ दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं; बिखरे हुए हैं, इस नयी परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पाँव फूले हुए हैं, कितने ही तो अपनी जमा-जथा छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आँधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिष्ला भी उन्हीं भागनेवालों में था। दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिये जाने का खटका लगा हुआ था। यहाँ तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छाँह में विश्राम करने लगे। सहसा कुछ दूर पर एक कुआँ नजर आया। वहीं डेरे डाल दिये। भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो। दो युवकों ने बंदूक भर कर कंधे पर रखीं और चारों तरफ गश्त करने लगे। बूढ़े कम्बल बिछा कर कमर सीधी करने लगे। स्त्रियाँ बालकों को गोद से उतार कर माथे का पसीना पोंछने और बिखरे हुए केशों को सँभालने लगीं। सभी के चेहरे मुरझाये हुए थे। सभी चिंता और भय से त्रास्त हो रहे थे, यहाँ तक कि बच्चे जोर से न रोते थे। 
दोनों युवकों में एक लम्बा, गठीला रूपवान है। उसकी आँखों से अभिमान की रेखाएँ-सी निकल रही हैं, मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता, मानो उसकी एक-एक गत पर आकाश के देवता जयघोष कर रहे हैं। दूसरा कद का दुबला-पतला, रूपहीन-सा आदमी है, जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है, मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं, मानो वह दीपक की भाँति रो-रो कर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है। उसका नाम धर्मदास है; इसका ख़ज़ाँचन्द। 
धर्मदास ने बंदूक को जमीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा-तुमने अपने लिए क्या सोचा? कोई लाख-सवा लाख की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी ? 
ख़ज़ाँचंद ने उदासीन भाव से उत्तर दिया-लाख-सवा लाख की तो नहीं, हाँ, पचास-साठ हजार तो नकद ही थे। 
'तो अब क्या करोगे ?' 
'जो कुछ सिर पर आयेगा, झेलूँगा ! रावलपिंडी में दो-चार सम्बन्धी हैं, शायद कुछ मदद करें। तुमने क्या सोचा है ?' 
'मुझे क्या गम ! अपने दोनों हाथ अपने साथ हैं। वहाँ इन्हीं का सहारा था, आगे भी इन्हीं का सहारा है।' 
'आज और कुशल से बीत जाये तो फिर कोई भय नहीं।' 
'मैं तो मना रहा हूँ कि एकाध शिकार मिल जाय। एक दरजन भी आ जायँ तो भून कर रख दूँ।' 
इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा-डोर लिये निकली और सामने कुएँ की ओर चली। प्रभात की सुनहरी, मधुर, अरुणिमा मूर्तिमान हो गयी थी। 
दोनों युवक उसकी ओर बढ़े लेकिन ख़ज़ाँचंद तो दो-चार कदम चल कर रुक गया, धर्मदास ने युवती के हाथ से लोटा-डोर ले लिया और ख़ज़ाँचंद की ओर सगर्व नेत्रों से ताकता हुआ कुएँ की ओर चला। ख़ज़ाँचंद ने फिर बंदूक सँभाली और अपनी झेंप मिटाने के लिए आकाश की ओर ताकने लगा। इसी तरह कितनी ही बार धर्मदास के हाथों पराजित हो चुका था। शायद उसे इसका अभ्यास हो गया था। अब इसमें लेशमात्र भी संदेह न था कि श्यामा का प्रेमपात्रा धर्मदास है। ख़ज़ाँचंद की सारी सम्पत्ति धर्मदास के रूपवैभव के आगे तुच्छ थी। परोक्ष ही नहीं, प्रत्यक्ष रूप से भी श्यामा कई बार ख़ज़ाँचंद को हताश कर चुकी थी; पर वह अभागा निराश हो कर भी न जाने क्यों उस पर प्राण देता था। तीनों एक ही बस्ती के रहनेवाले थे। श्यामा के माता-पिता पहले ही मर चुके थे। उसकी बुआ ने उसका पालन-पोषण किया था। अब भी वह बुआ ही के साथ रहती थी। उसकी अभिलाषा थी कि ख़ज़ाँचंद उसका दामाद हो, श्यामा सुख से रहे और उसे भी जीवन के अंतिम दिनों के लिए कुछ सहारा हो जाये; लेकिन श्यामा धर्मदास पर रीझी हुई थी। उसे क्या खबर थी कि जिस व्यक्ति को वह पैरों से ठुकरा रही है, वही उसका एकमात्र अवलम्ब है। ख़ज़ाँचंद ही वृद्धा का मुनीम, खजांची, कारिंदा सब कुछ था और यह जानते हुए भी कि श्यामा उसे जीवन में नहीं मिल सकती। उसके धन का यह उपयोग न होता, तो वह शायद अब तक उसे लुटा कर फकीर हो जाता। 


धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखायी दिये। जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि कुल पाँच आदमी हैं। उनकी बंदूक की नलियाँ धूप में साफ चमक रही थीं। धर्मदास पानी लिये हुए दौड़ा कि कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोटा-डोर लिये वह बहुत तेज न दौड़ सकता था। फासला दो सौ गज से कम न था। रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे-फूटे पड़े हुए थे। भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाय, कहीं पैर न फिसल जायँ। इधर सवार प्रतिक्षण समीप होते जाते थे। अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या, उस पर मंजिलों का धावा हुआ। मुश्किल से पचास कदम गया होगा कि सवार उसके सिर पर आ पहुँचे और तुरंत उसे घेर लिया। धर्मदास बड़ा साहसी था; पर मृत्यु को सामने खड़ी देख कर उसकी आँखों में अँधेरा छा गया, उसके हाथ से बंदूक छूट कर गिर पड़ी। पाँचों उसी के गाँव के महसूदी पठान थे। एक पठान ने कहा-उड़ा दो सिर मरदूद का। दग़ाबाज़ काफिष्र। 
दूसरा-नहीं नहीं, ठहरो, अगर यह इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले, तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं। क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दग़ा की क्या सजा दी जाय ? हमने तुम्हें रात-भर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था। मगर तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुँचा दिये जाओ; लेकिन हम तुम्हें फिर मौका देते हैं। यह आखिरी मौका है। अगर तुमने अब भी इस्लाम न कबूल किया, तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी। 
धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा-जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे ... 
पहले सवार ने आवेश में आकर कहा-मजहब को अक्ल से कोई वास्ता नहीं। 
तीसरा-कुफ्र है ! कुफ्र है ! 
पहला- उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआँ इस पार। 
दूसरा-ठहरो-ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, जिला लेना मुश्किल है। तुम्हारे और साथी कहाँ हैं धर्मदास ? 
धर्मदास-सब मेरे साथ ही हैं। 
दूसरा-कलामे शरीफ़ की कसम; अगर तुम सब खुदा और उनके रसूल पर ईमान लाओ, तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा। 
धर्मदास-आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौका न देंगे। 
इस पर चारों सवार चिल्ला उठे-नहीं, नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे, यह आखिरी मौका है। 
इतना कहते ही पहले सवार ने बंदूक छतिया ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला-बस बोलो, क्या मंजूर है ? 
धर्मदास सिर से पैर तक काँप कर बोला-अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूँ तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जायेगी ? 
दूसरा-हाँ, अगर तुम जमानत करो कि वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे। 
पहला-हम इस शर्त को नहीं मानते। तुम्हारे साथियों से हम खुद निपट लेंगे। तुम अपनी कहो। क्या चाहते हो ? हाँ या नहीं ? 
धर्मदास ने जहर का घूँट पी कर कहा-मैं खुदा पर ईमान लाता हूँ। 
पाँचों ने एक स्वर से कहा-अलहमद व लिल्लाह ! और बारी-बारी से धर्मदास को गले लगाया। 


श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी। वह मन में पछता रही थी कि मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा ? अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगा, तो मैं प्यासों मर जाती, पर इन्हें न जाने देती। श्यामा से कुछ दूर ख़ज़ाँचंद भी खड़ा था। श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देख कर कहा- अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती। 
ख़ज़ाँचंद-बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है। 
श्यामा-न जाने क्या बातें हो रही हैं। अरे गजब ! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है ! 
ख़ज़ाँ.-जरा और समीप आ जायँ, तो मैं बंदूक चलाऊँ। इतनी दूर की मार इसमें नहीं है। 
श्यामा-अरे ! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं। यह माजरा क्या है ? 
ख़ज़ाँ.-कुछ समझ में नहीं आता। 
श्यामा-कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया ? 
ख़ज़ाँ.-नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है। 
श्यामा-मैं समझ गयी। ठीक यही बात है। बंदूक चलाओ।
ख़ज़ाँ.-धर्मदास बीच में हैं। कहीं उन्हें न लग जाय। 
श्यामा-कोई हर्ज नहीं। मैं चाहती हूँ, पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े। कायर ! निर्लज्ज ! प्राणों के लिए धर्म त्याग किया। ऐसी बेहयाई की जिंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है। क्या सोचते हो। क्या तुम्हारे भी हाथ-पाँव फूल गये। लाओ, बंदूक मुझे दे दो। मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूँगी। 
ख़ज़ाँ.-मुझे तो विश्वास नहीं होता कि धर्मदास ... 
श्यामा-तुम्हें कभी विश्वास न आयेगा। लाओ, बंदूक मुझे दो। खडे़ क्या ताकते हो ? क्या जब वे सिर पर आ जायँगे, तब बंदूक चलाओ? क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि मुसलमान हो कर जान बचाओ ? अच्छी बात है, जाओ। श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है; मगर उसे अब मुँह न दिखाना। 
ख़ज़ाँचंद ने बंदूक चलायी। एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गयी। जिहादियों ने 'अल्लाहो अकबर !' की हाँक लगायी। दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी। घोड़ा वहीं गिर पड़ा। जिहादियों ने फिर 'अल्लाहो अकबर !' की सदा लगायी और आगे बढ़े। तीसरी गोली आयी। एक पठान लोट गया; पर इसके पहले कि चौथी गोली छूटे, पठान ख़ज़ाँचंद के सिर पर पहुँच गये और बंदूक उसके हाथ से छीन ली। 
एक सवार ने ख़ज़ाँचंद की ओर बंदूक तान कर कहा-उड़ा दूँ सिर मरदूद का, इससे खून का बदला लेना है। 
दूसरे सवार ने जो इनका सरदार मालूम होता था, कहा-नहीं-नहीं, यह दिलेर आदमी है। ख़ज़ाँचंद, तुम्हारे ऊपर दगा, खून और कुफ्र, ये तीन इल्ज़ाम हैं, और तुम्हें कत्ल कर देना ऐन सवाब है, लेकिन हम तुम्हें एक मौका और देते हैं। अगर तुम अब भी खुदा और रसूल पर ईमान लाओ, तो हम तुम्हें सीने से लगाने को तैयार हैं। इसके सिवा तुम्हारे गुनाहों का और कोई कफारा (प्रायश्चित्त) नहीं है। यह हमारा आखिरी फैसला है। बोलो, क्या मंजूर है ? 
चारों पठानों ने कमर से तलवारें निकाल लीं, और उन्हें ख़ज़ाँचंद के सिर पर तान दिया मानो 'नहीं' का शब्द मुँह से निकलते ही चारों तलवारें उसकी गर्दन पर चल जायँगी ! 
ख़ज़ाँचंद का मुखमंडल विलक्षण तेज से आलोकित हो उठा। उसकी दोनों आँखें स्वर्गीय ज्योति से चमकने लगीं। दृढ़ता से बोला-तुम एक हिन्दू से यह प्रश्न कर रहे हो ? क्या तुम समझते हो कि जान के खौफ से वह अपना ईमान बेच डालेगा ? हिंदू को अपने ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी नबी, वली या पैगम्बर की जरूरत नहीं ! चारों पठानों ने कहा-काफिर ! काफिर ! 
ख़ज़ाँ.-अगर तुम मुझे काफिर समझते हो तो समझो। मैं अपने को तुमसे ज्यादा खुदापरस्त समझता हूँ। मैं उस धर्म को मानता हूँ, जिसकी बुनियाद अक्ल पर है। आदमी में अक्ल ही खुदा का नूर (प्रकाश) है और हमारा ईमान हमारी अक्ल ... 
चारों पठानों के मुँह से निकला 'काफिर ! काफिर !' और चारों तलवारें एक साथ ख़ज़ाँचंद की गर्दन पर गिर पड़ीं। लाश जमीन पर फड़कने लगी। धर्मदास सिर झुकाये खड़ा रहा। वह दिल में खुश था कि अब ख़ज़ाँचंद की सारी सम्पत्ति उसके हाथ लगेगी और वह श्यामा के साथ सुख से रहेगा; पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। श्यामा अब तक मर्माहत-सी खड़ी यह दृश्य देख रही थी। ज्यों ही ख़ज़ाँचंद की लाश जमीन पर गिरी, वह झपट कर लाश के पास आयी और उसे गोद में लेकर आँचल से रक्त-प्रवाह को रोकने की चेष्टा करने लगी। उसके सारे कपड़े खून से तर हो गये। उसने बड़ी सुंदर बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ पहनी होंगी, पर इस रक्त-रंजित साड़ी की शोभा अतुलनीय थी। बेल-बूटोंवाली साड़ियाँ रूप की शोभा बढ़ाती थीं, यह रक्त-रंजित साड़ी आत्मा की छवि दिखा रही थी। 
ऐसा जान पड़ा मानो ख़ज़ाँचंद की बुझती आँखें एक अलौकिक ज्योति से प्रकाशमान हो गयी हैं। उन नेत्रों में कितना संतोष, कितनी तृप्ति, कितनी उत्कंठा भरी हुई थी। जीवन में जिसने प्रेम की भिक्षा भी न पायी, वह मरने पर उत्सर्ग जैसे स्वर्गीय रत्न का स्वामी बना हुआ था। 


धर्मदास ने श्यामा का हाथ पकड़ कर कहा-श्यामा, होश में आओ, तुम्हारे सारे कपड़े खून से तर हो गये हैं। अब रोने से क्या हासिल होगा ? ये लोग हमारे मित्र हैं, हमें कोई कष्ट न देंगे। हम फिर अपने घर चलेंगे और जीवन के सुख भोगेंगे ? 
श्यामा ने तिरस्कारपूर्ण नेत्रों से देख कर कहा-तुम्हें अपना घर बहुत प्यारा है, तो जाओ। मेरी चिंता मत करो, मैं अब न जाऊँगी। हाँ, अगर अब भी मुझसे कुछ प्रेम हो तो इन लोगों से इन्हीं तलवारों से मेरा भी अंत करा दो। 
धर्मदास करुणा-कातर स्वर से बोला-श्यामा, यह तुम क्या कहती हो, तुम भूल गयीं कि हमसे-तुमसे क्या बातें हुई थीं ? मुझे खुद ख़ज़ाँचंद के मारे जाने का शोक है; पर भावी को कौन टाल सकता है ? 
श्यामा-अगर यह भावी थी, तो यह भी भावी है कि मैं अपना अधम जीवन उस पवित्र आत्मा के शोक में काटूँ, जिसका मैंने सदैव निरादर किया। यह कहते-कहते श्यामा का शोकोद्गार, जो अब तक क्रोध और घृणा के नीचे दबा हुआ था, उबल पड़ा और वह ख़ज़ाँचंद के निस्पंद हाथों को अपने गले में डाल कर रोने लगी। 
चारों पठान यह अलौकिक अनुराग और आत्म-समर्पण देख कर करुणार्द्र हो गये। सरदार ने धर्मदास से कहा-तुम इस पाकीजा खातून से कहो, हमारे साथ चले। हमारी जाति से इसे कोई तकलीफ न होगी। हम इसकी दिल से इज्जत करेंगे। 
धर्मदास के हृदय में ईर्ष्या की आग धधक रही थी। वह रमणी, जिसे वह अपनी समझे बैठा था, इस वक्त उसका मुँह भी नहीं देखना चाहती थी। बोला-श्यामा, तुम चाहो इस लाश पर आँसुओं की नदी बहा दो, पर यह जिंदा न होगी। यहाँ से चलने की तैयारी करो। मैं साथ के और लोगों को भी जा कर समझाता हूँ। खान लोेग हमारी रक्षा करने का जिम्मा ले रहे हैं। हमारी जायदाद, जमीन, दौलत सब हमको मिल जायगी। ख़ज़ाँचंद की दोैलत के भी हमीं मालिक होंगे। अब देर न करो। रोने-धोने से अब कुछ हासिल नहीं। 
श्यामा ने धर्मदास को आग्नेय नेत्रों से देख कर कहा-और इस वापसी की कीमत क्या देनी होगी ? वही जो तुमने दी है ? 
धर्मदास यह व्यंग्य न समझ सका। बोला-मैंने तो कोई कीमत नहीं दी। मेरे पास था ही क्या ? 
श्यामा-ऐसा न कहो। तुम्हारे पास वह खजाना था, जो तुम्हें आज कई लाख वर्ष हुए ऋषियों ने प्रदान किया था। जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण, बुद्ध और शंकर, शिवाजी और गोविंदसिंह ने की थी। उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया। इन पाँवों पर लोटना तुम्हें मुबारक हो! तुम शौक से जाओ। जिन तलवारों ने वीर ख़ज़ाँचंद के जीवन का अंत किया, उन्होंने मेरे प्रेम का भी फैसला कर दिया। जीवन में इस वीरात्मा का मैंने जो निरादर और अपमान किया, इसके साथ जो उदासीनता दिखायी उसका अब मरने के बाद प्रायश्चित्त करूँगी। यह धर्म पर मरने वाला वीर था, धर्म को बेचनेवाला कायर नहीं ! अगर तुममें अब भी कुछ शर्म और हया है, तो इसका क्रिया-कर्म करने में मेरी मदद करो और यदि तुम्हारे स्वामियों को यह भी पसंद न हो, तो रहने दो, मैं सब कुछ कर लूँगी। 
पठानों के हृदय दर्द से तड़प उठे। धर्मान्धता का प्रकोप शांत हो गया। देखते-देखते वहाँ लकड़ियों का ढेर लग गया। धर्मदास ग्लानि से सिर झुकाये बैठा था और चारों पठान लकड़ियाँ काट रहे थे। चिता तैयार हुई और जिन निर्दय हाथों ने ख़ज़ाँचंद की जान ली थी उन्हीं ने उसके शव को चिता पर रखा। ज्वाला प्रचंड हुई। अग्निदेव अपने अग्निमुख से उस धर्मवीर का यश गा रहे थे। 
पठानों ने ख़ज़ाँचंद की सारी जंगम सम्पत्ति ला कर श्यामा को दे दी। श्यामा ने वहीं पर एक छोटा-सा मकान बनवाया और वीर ख़ज़ाँचंद की उपासना में जीवन के दिन काटने लगी। उसकी वृद्धा बुआ तो उसके साथ रह गयी, और सब लोग पठानों के साथ लौट गये, क्योंकि अब मुसलमान होने की शर्त न थी। ख़ज़ाँचंद के बलिदान ने धर्म के भूत को परास्त कर दिया। मगर धर्मदास को पठानों ने इस्लाम की दीक्षा लेने पर मजबूर किया। एक दिन नियत किया गया। मसजिद में मुल्लाओं का मेला लगा और लोग धर्मदास को उसके घर से बुलाने आये; पर उसका वहाँ पता न था। चारों तरफ तलाश हुई। कहीं निशान न मिला। 
साल-भर गुजर गया। संध्या का समय था। श्यामा अपने झोंपड़े के सामने बैठी भविष्य की मधुर कल्पनाओं में मग्न थी। अतीत उसके लिए दुःख से भरा हुआ था। वर्तमान केवल एक निराशामय स्वप्न था। सारी अभिलाषाएँ भविष्य पर अवलम्बित थीं। और भविष्य भी वह, जिसका इस जीवन से कोई सम्बन्ध न था ! आकाश पर लालिमा छायी हुई थी। सामने की पर्वतमाला स्वर्णमयी शांति के आवरण से ढकी हुई थी। वृक्षों की काँपती हुई पत्तियों से सरसराहट की आवाज निकल रही थी, मानो कोई वियोगी आत्मा पत्तियों पर बैठी हुई सिसकियाँ भर रही हो। 
उसी वक्त एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने झोंपड़ी के सामने खड़ा हो गया। कुत्ता जोर से भूँक उठा। श्यामा ने चौंक कर देखा और चिल्ला उठी-धर्मदास ! 
धर्मदास ने वहीं जमीन पर बैठते हुए कहा-हाँ श्यामा, मैं अभागा धर्मदास ही हूँ। साल-भर से मारा-मारा फिर रहा हूँ। मुझे खोज निकालने के लिए इनाम रख दिया गया है। सारा प्रांत मेरे पीछे पड़ा हुआ है। इस जीवन से अब ऊब उठा हूँ; पर मौत भी नहीं आती। 
धर्मदास एक क्षण के लिए चुप हो गया। फिर बोला-क्यों श्यामा, क्या अभी तुम्हारा हृदय मेरी तरफ से साफ नहीं हुआ ! तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया ! 
श्यामा ने उदासीन भाव से कहा-मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी। 
'मैं अब भी हिंदू हूँ। मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है।' 
'जानती हूँ !' 
'यह जान कर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती !' 
श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली-तुम्हें अपने मुँह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती ! मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूँ, जिसने हिंदू-जाति का मुख उज्ज्वल किया है। तुम समझते हो कि वह मर गया ! यह तुम्हारा भ्रम है। वह अमर है। मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूँ। तुमने हिंदू-जाति को कलंकित किया है। मेरे सामने से दूर हो जाओ। 
धर्मदास ने कुछ जवाब न दिया ! चुपके से उठा, एक लम्बी साँस ली और एक तरफ चल दिया। 
प्रातःकाल श्यामा पानी भरने जा रही थी, तब उसने रास्ते में एक लाश पड़ी हुई देखी। दो-चार गिद्ध उस पर मँडरा रहे थे। उसका हृदय धड़कने लगा। समीप जा कर देखा और पहचान गयी। यह धर्मदास की लाश थी। 

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 24 Oct 2019 at 3:59 PM -

रासायनिक सूत्र

फॉर्मूले एवं जानकारियां
1.आक्सीजन—O₂
2. नाइट्रोजन—N₂
3. हाइड्रोजन—H₂
4. कार्बन डाइऑक्साइड—CO₂
5. कार्बन मोनोआक्साइड—CO
6. सल्फर डाइऑक्साइड—SO₂
7. नाइट्रोजन डाइऑक्साइड—NO₂
8. नाइट्रोजन मोनोऑक्साइड (नाइट्रिक ऑक्साइड) — NO
9. डाईनाइट्रोजन ऑक्साइड (नाइट्रस ऑक्साइड) — N₂O
10. क्लोरीन — Cl₂
11. हाइड्रोजन क्लोराइड—HCl
12. अमोनिया — NH₃
अम्ल
13. हाइड्रोक्लोरिक एसिड — HCl
14. सल्फ्यूरिक एसिड — H₂SO₄
15. नाइट्रिक एसिड — ... HNO₃
16. फॉस्फोरिक एसिड — H₃PO₄
17. कार्बोनिक एसिड — H₂CO₃
क्षार
18. सोडियम हाइड्राक्साइड—NaOH
19. पोटेशियम हाइड्राक्साइड—KOH
20. कैल्शियम हाइड्राक्साइड—Ca(OH)₂
लवण
21. सोडियम क्लोराइड—NaCl
22. कार्बोनेट सोडियम—Na₂CO₃
23. कैल्शियम कार्बोनेट — CaCO₃
24. कैल्शियम सल्फेट — CaSO₄
25. अमोनियम सल्फेट — (NH₄)₂SO₄
26. नाइट्रेट पोटेशियम—KNO₃
आम रसायनों के व्यावसायिक एवं रासायनिक नाम
व्यावसायिक नाम — IAPUC नाम — अणु सूत्र
27. चाक — कैल्सियम कार्बोनेट — CaCO₃
28. अंगूर का सत — ग्लूकोज — C6H₁₂O6
एल्कोहल — एथिल 29. एल्कोहल — C₂H5OH
30. कास्टिक पोटाश — पोटेशियम हाईड्राक्साईड — KOH
31. खाने का सोडा — सोडियम बाईकार्बोनेट — NaHCO₃
32. चूना — कैल्सियम आक्साईड — CaO
33. जिप्सम — कैल्सियम सल्फेट — CaSO₄.2H₂O
34. टी.एन.टी. — ट्राई नाईट्रो टालीन — C6H₂CH₃(NO₂)₃
35. धोने का सोडा — सोडियम कार्बोनेट — Na₂CO₃
36. नीला थोथा — कॉपर सल्फेट — CuSO₄
37. नौसादर — अमोनियम क्लोराईड — NH₄Cl
38. फिटकरी — पोटैसियम एलुमिनियम सल्फेट — K₂SO₄Al₂(SO₄)₃.24H₂O
39. बुझा चूना — कैल्सियम हाईड्राक्साईड — Ca(OH)₂
40. मंड — स्टार्च — C6H10O5
41. लाफिंग गैस — नाइट्रस आक्साईड — N₂O
42. लाल दवा — पोटैसियम परमैगनेट — KMnO₄
43. लाल सिंदूर — लैड परआक्साईड — Pb₃O₄
44. शुष्क बर्फ — ठोस कार्बन-डाई-आक्साईड — CO₂
45. शोरा — पोटैसियम नाइट्रेट — KNO₃
46. सिरका — एसिटिक एसिड का तनु घोल — CH₃COOH
47. सुहागा — बोरेक्स — Na₂B₄O7.10H₂O
48. स्प्रिट — मैथिल एल्कोहल — CH₃OH
49. स्लेट — सिलिका एलुमिनियम आक्साईड — Al₂O₃2SiO₂.2H₂O
50.हरा कसीस — फैरिक सल्फेट — Fe₂(SO₄)

*[फल/फुल/सब्जी आदि का वैज्ञानिक नाम]*

1.मनुष्य---होमो सैपियंस
2.मेढक---राना टिग्रिना
3.बिल्ली---फेलिस डोमेस्टिका
4.कुत्ता---कैनिस फैमिलियर्स
5.गाय---बॉस इंडिकस
6.भैँस---बुबालस बुबालिस
7.बैल---बॉस प्रिमिजिनियस टारस
8.बकरी---केप्टा हिटमस
9.भेँड़---ओवीज अराइज
10.सुअर---सुसस्फ्रोका डोमेस्टिका
11.शेर---पैँथरा लियो
12.बाघ---पैँथरा टाइग्रिस
13.चीता---पैँथरा पार्डुस
14.भालू---उर्सुस मैटिटिमस कार्नीवेरा
15.खरगोश---ऑरिक्टोलेगस कुनिकुलस
16.हिरण---सर्वस एलाफस
17.ऊँट---कैमेलस डोमेडेरियस
18.लोमडी---कैनीडे
19.लंगुर---होमिनोडिया
20.बारहसिँघा---रुसर्वस डूवासेली
21.मक्खी---मस्का डोमेस्टिका
22.आम---मैग्नीफेरा इंडिका
23.धान---औरिजया सैटिवाट
24.गेहूँ---ट्रिक्टिकम एस्टिवियम
25.मटर---पिसम सेटिवियम
26.सरसोँ---ब्रेसिका कम्पेस्टरीज
27.मोर---पावो क्रिस्टेसस
28.हाथी---एफिलास इंडिका
29.डॉल्फिन---प्लाटेनिस्टा गैँकेटिका
30.कमल---नेलंबो न्यूसिफेरा गार्टन
31.बरगद---फाइकस बेँधालेँसिस
32.घोड़ा---ईक्वस कैबेलस
33.गन्ना---सुगरेन्स औफिसीनेरम
34.प्याज---ऑलियम सिपिया
35.कपास---गैसीपीयम
36.मुंगफली---एरैकिस
37.कॉफी---कॉफिया अरेबिका
38.चाय---थिया साइनेनिसस
39.अंगुर---विटियस
40.हल्दी---कुरकुमा लोँगा
41.मक्का---जिया मेज
42.टमाटर---लाइकोप्रेसिकन एस्कुलेँटम
43.नारियल---कोको न्यूसीफेरा
44.सेब---मेलस प्यूमिया/डोमेस्टिका
45.नाशपाती---पाइरस क्यूमिनिस
46.केसर---क्रोकस सैटिवियस
47.काजू---एनाकार्डियम अरोमैटिकम
48.गाजर---डाकस कैरोटा
49.अदरक---जिँजिबर ऑफिसिनेल
50.फुलगोभी---ब्रासिका औलिरेशिया
51.लहसून---एलियम सेराइवन
52.बाँस---बेँबुसा स्पे
53.बाजरा---पेनिसिटम अमेरीकोनम
54.लालमिर्च---कैप्सियम एनुअम
55.कालीमिर्च---पाइपर नाइग्रम
56बादाम---प्रुनस अरमेनिका
57.इलायची---इलिटेरिया कोर्डेमोमम
58.केला---म्यूजा पेराडिसिएका
59.मुली---रेफेनस

तरंग चलती हैं, तो वे अपने साथ ले जाती हैं
Ans : - -ऊर्जा
2.: - सूर्य ग्रहण के समय सूर्य का कौन-सा भाग दिखाई देता है?
Ans : - किरीट
3.: - कपड़ों से जंग के धब्बे हटाने के लिये प्रयोग किया

Ans : - -ऑक्ज़ैलिक अम्ल
4.: - गन्ने में ‘लाल सड़न रोग’ किसके कारण उत्पन्न होता है?
Ans : - कवकों द्वारा
5.: - टेलीविजन का आविष्कार किसने किया था?
Ans : - जे. एल. बेयर्ड
6.: - किस प्रकार के ऊतक शरीर के सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं?
Ans : - एपिथीलियम ऊतक
7.: - मनुष्य ने सर्वप्रथम किस जन्तु को अपना पालतू बनाया?
Ans : - कुत्ता
8.: - किस वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम बर्फ़ के दो टुकड़ों को आपस में घिसकर पिघला दिया?
Ans : - डेवी
9: - हीरा चमकदार क्यों दिखाई देता है?
Ans : - सामूहिक आंतरिक परावर्तन के कारण
10.: - ‘गोबर गैस’ में मुख्य रूप से क्या पाया जाता है।
Ans : - मिथेन
11.: - निम्न में से कौन-सा आहार मानव शरीर में नये ऊतकों की वृद्धि के लिए पोषक तत्व प्रदान करता है?
Ans : - पनीर
12.: - निम्न में से कौन एक उड़ने वाली छिपकली है?
Ans : - ड्रेको
13.: - अंगूर में कौन-सा अम्ल पाया जाता है?
Ans : - टार्टरिक अम्ल
14.: - कैंसर सम्बन्धी रोगों का अध्ययन कहलाता है
Ans : - oncology
15.: - घोंसला बनाने वाला एकमात्र साँप कौन-सा है?
Ans : - किंग कोबरा
16.: - भारत में पायी जाने वाली सबसे बड़ी मछली कौन-सी है?
Ans : - ह्वेल शार्क
17.: - दालें किसका एक अच्छा स्रोत होती हैं?
Ans : - प्रोटीन
18.: - देशी घी में से सुगन्ध क्यों आती है?
Ans : - डाइएसिटिल के कारण
19.: - इन्द्रधनुष में किस रंग का विक्षेपण अधिक होता है?
Ans : - लाल रंग
20.: - सूर्य की किरण में कितने रंग होते हैं?
Ans : - 7
21.: - ‘टाइपराइटर’ (टंकण मशीन) के आविष्कारक कौन हैं?
Ans : - शोल्स
22.: - सिरका को लैटिन भाषा में क्या कहा जाता है।
Ans : - ऐसीटम
23.: - दूध की शुद्धता का मापन किस यन्त्र से किया जाता है?
Ans : - लैक्टोमीटर
24.: - पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला धातु तत्त्व कौन-सा है?
Ans : - ऐलुमिनियम
25.: - मोती मुख्य रूप से किस पदार्थ का बना होता है?
Ans : - कैल्सियम कार्बोनेट
26.: - मानव शरीर में सबसे अधिक मात्रा में कौन-सा तत्व पाया जाता है?
Ans : - ऑक्सीजन
27.: - आम का वानस्पतिक नाम क्या है?
Ans : - मेंगीफ़ेरा इण्डिका
28.: - कॉफी पाउडर के साथ मिलाया जाने वाला ‘चिकोरी चूर्ण’ प्राप्त होता है
Ans : - -जड़ों से
29.: - ‘विटामिन-सी’ का सबसे अच्छा स्त्रोत क्या है?
Ans : - आंवला
30.: - सबसे अधिक तीव्रता की ध्वनि कौन उत्पन्न करता है?
Ans : - बाघ
31.: - मानव शरीर में सबसे लम्बी कोशिका कौन-सी होती है?
Ans : - तंत्रिका कोशिका
32.: - दाँत मुख्य रूप से किस पदार्थ के बने होते हैं?
Ans : - डेंटाइन के
33.: - किस जंतु की आकृति पैर की चप्पल के समान होती है?
Ans : - पैरामीशियम
34.: - निम्न में से किस पदार्थ में प्रोटीन नहीं पाया जाता है?
Ans : - चावल
35.: - मानव का मस्तिष्क लगभग कितने ग्राम का होता है?
Ans : - 1350
36.: - रक्त में पायी जाने वाली धातु है
Ans : - -लोहा
37.: - मांसपेशियों में किस अम्ल के एकत्रित होने से थकावट आती है?
Ans : - लैक्टिक अम्ल
38.: - किण्वन का उदाहरण है
Ans : - -दूध का खट्टा होना,खाने की ब्रेड का बनना,गीले आटे का खट्टा होना
39.: - केंचुए की कितनी आँखें होती हैं?
Ans : - एक भी नहीं
40.: - गाजर किस विटामिन का समृद्ध स्रोत है?
Ans : - विटामिन A

*भौतिक राशि Physical quantities अन्य भौतिक राशियों से संबंध*

1. क्षेत्रफल Area लंबाई × चौड़ाई

2. आयतन Volume लंबाई× चौड़ाई×ऊंचाई

3. द्रव्यमान घनत्व Density द्रव्यमान/आय
4. आवृत्ति Frequency 1/आवर्तकाल

5. वेग Velocity विस्थापन/समय

6. चाल Speed दूरी/समय

7. त्वरण Acceleration वेग/समय

8. बल Force द्रव्यमान × त्वरण

9. आवेग Impulse बल × समय

10. कार्य Work बल × दूरी

11. ऊर्जा Energy बल × दूरी

12. शक्ति Power कार्य/समय

13. संवेग Momentum द्रव्यमान × वेग

14. दाब Pressure बल/क्षेत्रफल

15. प्रतिबल Stress बल/क्षेत्रफल

16. विकृति Strain विमा में परिवर्तन/मूल विमा

17. प्रत्यास्थता गुणांक Coefficient of elasticity प्रतिबल/विकृति

18. पृष्ठ तनाव Surface tension बल/लंबाई

19. पृष्ठ ऊर्जा Surface energy ऊर्जा/क्षेत्रफल

20. वेग प्रवणता Velocity gradient वेग/दूरी

21. दाब प्रवणता Pressure gradient दाब/दूरी

22. श्यानता गुणांक Coefficient of viscosity बल/(क्षेत्रफल× वेग प्रवणता)

23. कोण Angel चाप/त्रिज्या

24. त्रिकोणमितीय अनुपात Trigonometric ratio लंबाई/लंबाई

25. कोणीय वेग Angular velocity कोण/समय

26. कोणीय त्वरण Angular acelleration कोणीय वेग/समय

27. कोणीय संवेग Angular momentum जड़त्व आघूर्ण × कोणीय वेग

28. जड़त्व आघूर्ण Moment of inertia द्रव्यमान× (परिभ्रमण त्रिज्या)2

29. बल आघूर्ण Torque बल × दूरी

30. कोणीय आवृत्ति Angular frequency 2π × आवृत्ति

31. गुरुत्वीय सार्वत्रिक नियतांक Universal constant of gravity बल× (दूरी)2/(द्रव्यमान)2

32. प्लांक नियतांक Plank’s constant ऊर्जा/आवृत्ति

33. विशिष्ट उष्मा Specific heat उष्मीय ऊर्जा/(द्रव्यमान× ताप)

34. उष्मा धारिता Heat capacity ऊष्मीय ऊर्जा/ताप

35. बोल्टजमान नियतांक Boltzmann’s constant ऊर्जा/ताप

36. स्टीफन नियतांक Stefan’s constant (ऊर्जा/क्षेत्रफल× समय)/(ताप)4

37. गैस नियतांक Gas constant (दाब× आयतन)/(मोल× ताप )

38. आवेश Charge विद्युत धारा × समय

39. विभवातंर Potential difference कार्य/आवेश

40. प्रतिरोध Resistance विभवांतर/विद्युत धारा

41. धारिता Capacity आवेश/विभवांतर

42. विद्युत क्षेत्र Electric field वैद्युत बल/आवेश

43. चुम्बकीय क्षेत्र Magnetic field बल/(विद्युत धारा× लंबाई)

44. चुम्बकीय फ्लक्स Magnetic flux चुम्बकीय क्षेत्र × लंबाई

45. प्रेरकत्व Inductance चुम्बकीय फ्लक्स/विद्युत धारा

46. वीन नियतांक Wein’s constant तरंगदैर्ध्य ×ताप

47. चालकता Conductivity 1/प्रतिरोध

48. एंट्रॅापी Entropy ऊष्मीय ऊर्जा / ताप

49. गुप्त उष्मा Latent heat उष्मीय ऊर्जा / द्रव्यमान

50. तापीय प्रसार गुणांक Coefficient of thermal expansion विमा में परिवर्तन / (मूल विमा × ताप )

nbsp51. आयतन प्रत्यास्थता गुणांक Bulk modulus ( आयतन × दाब में परिवर्तन )/आयतन में परिवर्तन

52. वैद्युत प्रतिरोधकता Electric resistance ( प्रतिरोध × क्षेत्रफल )/ लंबाई

53. वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण Electric dipole moment बल आघूर्ण / विद्युत क्षेत्र

54. चुम्बकीय द्विध्रुव आघूर्ण Magnetic dipole moment बल आघूर्ण / चुम्बकीय क्षेत्र

55. चुम्बकीय क्षेत्र प्रबलता चुम्बकीय आघूर्ण / आयतन

56. अपवर्तनांक Refractive index निर्वात में प्रकाश की चाल/माध्यम में प्रकाश की चाल

57. तरंग संख्या Wave number 2π / तरंगदैर्ध्य

58. विकिरण शक्ति Radiant power उत्सर्जित ऊर्जा / समय

59. विकिरण तीव्रता Radiant intensity विकिरण शक्ति / घन कोण

60. हबल नियतांक Hubble constant पश्च सरण चाल /दूरी

जीव विज्ञान के प्रश्न-

1.: - मांसपेशियों में किस अम्ल के एकत्रित होने से थकावट आती है?
Ans : - लैक्टिक अम्ल
2.: - अंगूर में कौन-सा अम्ल पाया जाता है?
Ans : - टार्टरिक अम्ल
3.: - कैंसर सम्बन्धी रोगों का अध्ययन कहलाता है
Ans : - -ऑरगेनोलॉजी
4.: - मानव शरीर में सबसे लम्बी कोशिका कौन-सी होती है?
Ans : - तंत्रिका कोशिका
5.: - दाँत मुख्य रूप से किस पदार्थ के बने होते हैं?
Ans : - डेंटाइन के
6.: - किस जंतु की आकृति पैर की चप्पल के समान होती है?
Ans : - पैरामीशियम
7.: - केंचुए की कितनी आँखें होती हैं?
Ans : - एक भी नहीं
8.: - गाजर किस विटामिन का समृद्ध स्रोत है?
Ans : - विटामिन A
9.: - निम्न में से किस पदार्थ में प्रोटीन नहीं पाया जाता है?
Ans : - चावल
10.: - मानव का मस्तिष्क लगभग कितने ग्राम का होता है?
Ans : - 1350
11.: - रक्त में पायी जाने वाली धातु है
Ans : - -लोहा
12.: - किण्वन का उदाहरण है
Ans : - -दूध का खट्टा होना,खाने की ब्रेड का बनना,गीले आटे का खट्टा होना
13.: - निम्न में से कौन-सा आहार मानव शरीर में नये ऊतकों की वृद्धि के लिए पोषक तत्व प्रदान करता है?
Ans : - पनीर
14.: - निम्न में से कौन एक उड़ने वाली छिपकली है?
Ans : - ड्रेको
15.: - घोंसला बनाने वाला एकमात्र साँप कौन-सा है?
Ans : - किंग कोबरा
16.: - भारत में पायी जाने वाली सबसे बड़ी मछली कौन-सी है?
Ans : - ह्वेल शार्क
17.: - दालें किसका एक अच्छा स्रोत होती हैं?
Ans : - प्रोटीन
18.: - देशी घी में से सुगन्ध क्यों आती है?
Ans : - डाइएसिटिल के कारण
19.: - इन्द्रधनुष में किस रंग का विक्षेपण अधिक होता है?
Ans : - लाल रंग
20.: - टेलीविजन का आविष्कार किसने किया था?
Ans : - जे. एल. बेयर्ड
21: - हीरा चमकदार क्यों दिखाई देता है?
Ans : - सामूहिक आंतरिक परावर्तन के कारण
22.: - ‘गोबर गैस’ में मुख्य रूप से क्या पाया जाता है।
Ans : - मिथेन
23.: - दूध की शुद्धता का मापन किस यन्त्र से किया जाता है?
Ans : - लैक्टोमीटर
24.: - पृथ्वी पर सबसे अधिक मात्रा में पाया जाने वाला धातु तत्त्व कौन-सा है?
Ans : - ऐलुमिनियम
25.: - मोती मुख्य रूप से किस पदार्थ का बना होता है?
Ans : - कैल्सियम कार्बोनेट
26.: - मानव शरीर में सबसे अधिक मात्रा में कौन-सा तत्व पाया जाता है?
Ans : - ऑक्सीजन
27.: - किस प्रकार के ऊतक शरीर के सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं?
Ans : - एपिथीलियम ऊतक
28.: - मनुष्य ने सर्वप्रथम किस जन्तु को अपना पालतू बनाया?
Ans : - कुत्ता
29.: - किस वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम बर्फ़ के दो टुकड़ों को आपस में घिसकर पिघला दिया?
Ans : - डेवी
30.: - सबसे अधिक तीव्रता की ध्वनि कौन उत्पन्न करता है?
Ans : - बाघ
31.: - जब ध्वनि तरंग चलती हैं, तो वे अपने साथ ले जाती हैं
Ans : - -ऊर्जा
32.: - सूर्य ग्रहण के समय सूर्य का कौन-सा भाग दिखाई देता है?
Ans : - किरीट
33.: - सूर्य की किरण में कितने रंग होते हैं?
Ans : - 7
34.: - ‘टाइपराइटर’ (टंकण मशीन) के आविष्कारक कौन हैं?
Ans : - शोल्स
35.: - सिरका को लैटिन भाषा में क्या कहा जाता है।
Ans : - ऐसीटम
36.: - कपड़ों से जंग के धब्बे हटाने के लिये प्रयोग किया जाता है
Ans : - -ऑक्ज़ैलिक अम्ल
37.: - गन्ने में ‘लाल सड़न रोग’ किसके कारण उत्पन्न होता है?
Ans : - कवकों द्वारा
38.: - आम का वानस्पतिक नाम क्या है?
Ans : - मेंगीफ़ेरा इण्डिका
39.: - कॉफी पाउडर के साथ मिलाया जाने वाला ‘चिकोरी चूर्ण’ प्राप्त होता है
Ans : - -जड़ों से
40.: - ‘विटामिन-सी’ का सबसे अच्छा स्त्रोत क्या है?
Ans : - आंवला
☄भारतीय संविधान - प्रश्नोत्तर☄

प्रश्‍न 1- भारतीय संविधान सभा की प्रथम बैठक कब हुई ।
उत्‍तर - 9 दिसम्‍बर 1946 ।
प्रश्‍न 2- स‍ंविधान सभा का स्‍थाई अध्‍यक्ष कौन था ।
उत्‍तर - डॉ. राजेंन्‍द्र प्रसाद ।
प्रश्‍न 3- संविधान सभा का अस्‍थाई अध्‍यक्ष कौन था ।
उत्‍तर - डॉ. सच्चिदानंद सिन्‍हा ।
प्रश्‍न 4- संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्‍यक्ष कौन थे ।
उत्‍तर - डॉ. भीमराव अम्‍बेडकर ।
प्रश्‍न 5- संविधान सभा का औपचारिक रूप से प्रतिपादन किसने किया ।
उत्‍तर - एम. एन. राय ।
प्रश्‍न 6- भारत में संविधान सभा गठित करने का आधार क्‍या था ।
उत्‍तर - कैबिनेट मिशन योजना (1946) ।
प्रश्‍न 7- संविधान के गठन की मांग सर्वप्रथम 1895 में किस व्‍यक्ति ने की ।
उत्‍तर - बाल गंगाधर तिलक ।
प्रश्‍न 8- संविधान सभा में देशी रियासतों के कितने प्रतिनिधि थे ।
उत्‍तर - 70 ।
प्रश्‍न 9- संविधान सभा में किस देशी रियासत के प्रतिनिधि ने भाग नही लिया ।
उत्‍तर - हैदराबाद ।
प्रश्‍न 10- बी. आर. अम्‍बेडकर कहॉं के संविधान सभा में निर्वाचित हुए ।
उत्‍तर - बंगाल से ।
प्रश्‍न 11- संविधान सभा का संवैधानिक सलाहकार किसे नियुक्‍त किया गया था ।
उत्‍तर - बी. एन. राव ।
प्रश्‍न 12- संविधान सभा की प्रारूप समिति का गठन कब हुआ ।
उत्‍तर - 29 अगस्‍त 1947 ।
प्रश्‍न 13- संविधान की प्रारूप समिति के समक्ष प्रस्‍तावना का प्रस्‍ताव किसने रखा ।
उत्‍तर - जवाहर लाल नेहरू ।
प्रश्‍न 14- संविधान सभा की रचना हेतु संविधान का विचार सर्वप्रथम किसने प्रस्‍तुत किया ।
उत्‍तर - स्‍वराज पार्टी ने 1924 में ।
प्रश्‍न 15- संविधान सभा में भारत के संविधान को कब स्‍वीकृत किया ।
उत्‍तर - 26 नवम्‍बर 1946 ।
प्रश्‍न 16- संविधान को बनाने में कितना समय लगा ।
उत्‍तर - 2 वर्ष 11 माह 18 दिन ।
प्रश्‍न 17- स‍ंविधान में कितने अनुच्‍छेद है।
उत्‍तर - 444 ।
प्रश्‍न 18- संविधान में कितने अध्‍याय है।
उत्‍तर - 22 ।
प्रश्‍न 19- भारतीय सभा में कितनी अनुसूचियॉ है।
उत्‍तर - 12 ।
प्रश्‍न 20- संविधान सभा का चुनाव किस आधार पर हुआ ।
उत्‍तर - वर्गीय मताधिकार पर ।*महत्वपूर्ण फॉर्मूले एवं जानकारियां*

user image Akash Kushwaha - 01 Dec 2018 at 11:19 AM -

दोस्तों, रिश्तेदारों और सबसे बढ़कर, अपने जीवन साथी जैसे दूसरे लोगों के साथ संबंधों में पैदा होने वाली समस्याएँ या खटास!

पहली बात तो यह कि वही पुराना सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है: कोई कदम उठाने से पहले समस्या पर शांत-चित्त होकर विचार करें। ... स्वाभाविक ही, किसी प्रियकर के साथ कोई कलह, कोई असहमति वाली बात या कोई वाद-विवाद, मतभेद या झड़प आपको बुरी तरह विचलित कर सकते हैं। आप बुरी तरह क्रोधित हो सकते हैं या आपको ऐसा लग सकता है कि आपका संसार टूटकर बिखर गया है, आपकी आँखों से आँसू निकल सकते हैं और विषाद से आप थर-थर काँपने लग सकते हैं। आप सोच सकते हैं कि आपकी बात सही थी या आप खुद अपनी करनी पर पछता रहे हो सकते हैं लेकिन फिर भी इससे आगे विचार करने से पहले या अगली कार्यवाही करने से पहले आपको अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।

इसका अर्थ यह नहीं है कि आप सामने वाले के प्रति कोई कोई सहानुभूति न रखें या यही भूल जाएँ कि उसने आपके साथ कोई बुरा व्यवहार किया है! बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप अपनी भावनाओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं और जानते हैं कि उसका उद्गम क्या है। इसका विश्लेषण करें: आपके मन में इस तरह की भावनाएँ पैदा होने का मूल कारण क्या है? क्या सामने वाले की कोई बात इसका कारण है? या आपके किसी व्यवहार के चलते ऐसा हुआ है? आपको ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? क्या वाकई ऐसा व्यवहार आपकी ओर से या सामने वाले की ओर से हुआ है या यह महज आपकी कल्पना है, जो आपको परेशान कर रही है?

मैं खुद भी बहुत भावुक व्यक्ति हूँ लेकिन जबकि कुछ लोगों के लिए यह दिमागी प्रक्रिया बहुत जटिल और कष्टदायी लग सकती है, मेरा मानना है कि समस्या की जड़ तक पहुँचने के लिए कभी-कभी ऐसी पहेलियों से जूझना ही पड़ता है। अगर मैं इतना भावुक हूँ कि मुझे यह भी पता नहीं चल पाता कि मेरी भावनाएँ ऐसी क्यों है तो यह मेरे व्यवहार में भी व्यक्त हो सकता है।

अपने गुस्से पर काबू में न रख पाने के कारण लोग बड़े भयानक और हास्यास्पद अपराध कर बैठते हैं। बाद में अक्सर ऐसा होता है कि उन्हें समझ में भी नहीं आता कि ऐसा उन्होंने क्यों किया! वे क्रोधित थे-लेकिन गुस्सा उतरने पर वे अच्छी तरह जान रहे होते हैं कि उनका व्यवहार कतई तर्कसंगत और न्यायोचित नहीं था। कि किसी दुख या पीड़ा के चलते उन्हें क्रोध आया था, यह सही है लेकिन सामने वाला बेचारा यह भी नहीं जानता होगा कि उनकी पीड़ा का जिम्मेदार वह है।

इसलिए, अगर आपको पता चल जाए कि आप वैसा क्यों महसूस कर रहे हैं तो आप उस समस्या का समाधान निकाल सकते हैं।

अगर आपसे कोई गलती हुई है और अब आपको पछतावा हो रहा है तो मेरे खयाल से तुरंत माफी मांग लेनी चाहिए। लेकिन सामने वाले से आप यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि हर हाल में वह आपकी माफी स्वीकार कर ही ले लेकिन आपके लिए यह कदम उठाना और खुद अपने आपको यह तसल्ली देना कि आपसे गलती हुई थी और आपने माफी मांगली, उचित ही होगा। क्योंकि भले ही सामने वाले ने माफ नहीं किया लेकिन आपने कोशिश तो की। और इतना करने के बाद आप अपने मन में शांति का अनुभव करेंगे और प्रकरण को वहीं विराम देकर आगे बढ़ सकेंगे।

यदि सामने वाले ने आपके साथ कोई दुर्व्यवहार किया है, तब आपके पास मौका होता है कि आपको इस विषय में क्या करना चाहते हैं। आप उसके सामने अपनी भावनाएँ रख सकते हैं या यह तय कर सकते हैं कि आप इस विषय में आगे क्या करेंगे। ऐसी स्थिति में आपके पास क्रोध के आवेश में व्यक्त क्षणिक व्यवहार के अलावा अपने मन की वास्तविक भावनाओं के अनुरूप व्यवहार करने का मौका होता है।

अंत में यही कि कुछ भी हो, संदेश एक ही है: कोई भी समस्या सामने हो, आपका संसार टूटकर बिखरने वाला नहीं है। शांत बने रहें और इस बारे में विचार करें कि आप इस विषय में क्या कर सकते हैं!