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user image Arvind Swaroop Kushwaha - 28 Jul 2021 at 8:55 AM -

World nature consevation day

इसको हिंदी में 'विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस' कहा जाता है।
उर्दू में प्रकृति को कुदरत कहते हैं। इस लिहाज से इसे 'जहां कुदरत रखरखाव दिवस' कह सकते हैं।

बात जब नेचर के संरक्षण की है तो यह जानना होगा कि नेचर को हानि किससे है।

ग्लोबल वार्मिंग से ... नेचर को सर्वाधिक खतरा है। ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिए हमें कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्पादन कम करना होगा और ऊर्जा की खपत कम करनी होगी।
और भी अनेक विचारणीय बिंदु हैं जिनपके बारे में पता लगाना चाहिए।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 01 Jun 2020 at 4:47 AM -

कोरोना संघर्ष

कल से लॉक डाउन की उलटी गिनती के साथ ही उम्मीदों और अपेक्षाओं के बयार के बीच नयी चिंताएं भी अपने लिए स्थान बना रही हैं। कुछ करोड़ मजदूर घर लौट गए, कुछ लाख लघु-मध्यम उत्पादन इक्काई, व्यापार बंद हो गए। आये दिन सफ़ेद ... कालर कम्पनियाँ जैसे - उबर , ज़ोमेटो, आदि से लोगों की नौकरियां जाने की खबरें आ रही हैं। नोयडा, गुरुग्राम में कई सौ कम्पनियां ऐसी हैं जो दस से सौ लोगों के साथ सॉफ्टवेयर, आउटसोर्स मेंटेनेंस जैसे काम करती हैं। टूरिज्म, होटल जैसे क्षेत्रों में काम करने वालों में से लगभग पचास फीसदी लोगों की नौकरियां छूट चुकी हैं। अकेले दिल्ली एन सी आर में मीडिया से जुड़े दो हज़ार लोग घर बैठ चुके हैं। कार बेचने वाली कम्पनी हों या हाई एंड शो रूम, बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार हो रहे हैं।
कामगार घर लौटे तो वे मेहनत- मजदूरी कर सकते हैं लेकिन जीवन के पच्चीस साल किसी अखबार के सम्पादकीय विभाग में जुड़े रहे तो परचून की दूकान भी नहीं चला सकते. छोटे कस्बों में जाओ तो इस तरह का कोई रोजगार नहीं मिलेगा। गगन चुम्बी ईमारतों में ऐसी कई आवाज़े घुट रही हैं, जिनमें अभी तीन महीने पहले तक पति-पत्नी दोनों काम करते थे लेकिन अब एक की नौकरी गयी और दूसरे का वेतन आधा हो गया। कहने को घर में दो कारें खड़ी हैं लेकिन किश्तें देने को पैसा नहीं। मकान की किश्त तो दूर सोसायटी का मेंटेनेंस देने के भी लाले पड़े हैं। इस समय न तो कार बिक रही है न ही फ्लेट। न किसी को बोल सकते हैं न बच्चों की जरूरतों में कटौती कर सकते हैं। अधिकांश घर ऐसी ही अनेक दुविधाओं में घुट रहे हैं।
इंदौर में एक औद्योगिक ईकाई है। उन्होंने जो समान बाज़ार में उधार दिया उसका पैसा लगभग डूब गया है। नया काम शुरू करना हो तो पूंजी नहीं क्योंकि सारी बचत तीन महीने में खा गये। कुछ नया माल बना लो तो बाज़ार में खपत नहीं है। फिर मजदुर को नगद देना है। ऐसे परिवार भी देश भर में लाखों में हैं। उनकी कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है, लेकिन अपना जीवन स्तर बनाये रखने का दवाब जबर्दस्त है।
ऐसा ही एक और वर्ग है, सरकारी सेवा से रिटायर्ड, या जमापूंजी को बैंक या रियल एस्टेट या शेयर में लगा कर जीवकोपार्जन करने वाला। बैंक में जमा पर ब्याज दरें गिरने, प्रोपर्टी का किराया न मिलने और शेयर बाज़ार के लगातार नकारात्मक होने से इस वर्ग के करोड़ों लोग बेहद दुविधा और कुंठा में हैं। महंगाई बढ़ी लेकिन आय कम हो गयी ऊपर से महंगाई भत्ता बन्द।
कोरोना का हल्ला जैसे जैसे शांत होगा इस मध्य वर्ग के दर्द गहरे होंगे। ये पलायन नहीं कर सकते। ये कोई दूसरा काम नहीं कर सकते। जीवन स्तर में बदलाव के लिए इन्हें अपनी आत्मा को कुचलना होगा।
आपके आस पास यदि ऐसे लोग हैं जिनकी नौकरी का संकट है, जिनके वेतन कम हो गए हिं उनसे बातचीत करते रहें। उनका हौसला भी बढ़ाएं। वे अपनी ओर से कुछ कहेंगे नहीं लेकिन यदि महसूस हो तो उनका सहयोग भी करें। ये लोग न सरकारी राशन ले सकते हैं और न ही खाने की लाईन में लग पायेंगे, लेकिन जरूरतें इनकी भी वही हो चुकी हैं।
यह वर्ग बहुत बेसहारा और उपेक्षित छोड़ दिया गया है और यह बेहद भावुक भी है। इसे नए हालात में ढलने की आदत नहीं। इन्होने केवल प्रगति, विकास और जीडीपी देखी है और उसको ही लक्ष्य माना है। पराभव इनके लिए अकल्पनीय है। इनका साथ भी वैसे ही देना है जैसे हमने कामगारों का दिया है या देने की बात कर रहे हैं

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 29 May 2020 at 5:51 PM -

मांसाहार_वर्सेस_शाकाहार

#मांसाहार_वर्सेस_शाकाहार

जब तब इसपे बहस होती रहती है और शाकाहार समर्थक इस मुद्दे पर मांसाहारियों को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं लेकिन क्या वाकई खानपान का मुद्दा नैतिकता या संवेदनशीलता से जुड़ा होता है, जैसा इसे साबित करने की कोशिश की जाती है? इस सवाल ... से एक तुक्का और जुड़ा है कि जैसा फलाने ने जीव को बनाया है वह वैसा है, मतलब जीवों की वर्तमान स्थिति को फलाने की सुप्रीमेसी साबित करने के लिये इस्तेमाल होती है।

अब इसे बेहद सरल रूप में सर्वाइवल के मुख्य सिद्धांत के रूप में समझिये। दरअसल हमारे आसपास इस यूनिवर्स में जितना भी कुछ है, वह सब एक तरह की इनफार्मेशन है जो आगे सरकती रहती है। जब सिंगल सेल आर्गेनिजम कांपलेक्स आर्गेनिजम के रूप में ढला तो वह सर्वाइवल के लिहाज से अपने आसपास मौजूद स्थितियों के दोहन के हिसाब से ढलता गया और उसमें उत्तरोत्तर सुधार भी आता गया जिससे आगे चल कर जीवन का विभिन्नताओं से भरा वह जटिल रूप सामने आया जो हम आज अपने आसपास देखते हैं।

आप एक बया को देखिये, क्या आप इंटेलिजेंट स्पिसीज होते हुए भी उसके जैसा घोसला बना सकते हैं? पर कोई बया जिसे आप जन्म से ही बिलकुल अलग माहौल में रखें कि उसे यह घोसला बनाने की झलक भी न मिले लेकिन उसके प्राकृतिक आवास में पहुंचते ही वह वैसे ही घोसला बना लेगा.. कछुए/मगरमच्छ के बच्चों को देखा है, पानी से दूर रेत में गड्ढे खोद कर दिये गये अंडों से निकलते ही पानी की तरफ भागते हैं न कि सूखी जमीन की तरफ.. क्यों? क्योंकि उन्हें पता है कि उनका जीवन उधर है। कौन सिखाता है उन्हें? इंसान के सिवा सभी जीवों को पता रहता है कि उन्हें मेटिंग करने का मौका तभी मिलेगा जब वे मादा को रिझाने में कामयाब रहेंगे, इसके लिये वे जान की बाजी तक लगा देते हैं.. कौन सिखाता है उन्हें?

दरअसल सर्वाइवल सबसे अहम कड़ी है जीवन की.. अगर जीवों को उसकी समझ नहीं होगी तो जीवन का पनपना मुमकिन नहीं.. और यह सर्वाइवल तीन मूलभूत पिलर पर डिपेंड रहता है। पहला भोजन क्या हो सकता है और इसे कैसे हासिल करना है, दूसरा प्रजनन कैसे करना है ताकि अपने जींस आगे बढ़ाये जा सकें और तीसरा खतरा क्या है और इसके अगेंस्ट हमें सुरक्षा कैसे करनी है। यह सब इन्फोर्मेशन जीवों के जींस में रहती है जो वे आगे सरका देते हैं अपनी अगली नस्ल में.. तो यह बेसिक समझ सभी जीवों में रहती है और उनका शरीर उसी इनफार्मेशन के हिसाब से ड्वेलप होता है।

मतलब शेर के बच्चे को पता होता है कि उसका भोजन मांस है, घास नहीं। हिरण को पता होता है कि उसका भोजन घास है, मांस नहीं। इनके शरीर का पाचन तंत्र उसी हिसाब से विकसित हुआ है.. आप चाह कर भी शेर को घास और हिरण को मांस नहीं खिला सकते। हर जीव को जन्मजात पता होता है कि उसे अपना वंश कैसे आगे बढ़ाना है और उसके लिये उसके पास क्या स्किल होनी चाहिये.. बया के घोसले या दो जवान नर शेरों की लड़ाई को इसी से जोड़ कर देखिये। उन्हें खतरे का अंदाजा रहता है और उससे सुरक्षा कैसे करनी है, वह भी मोटे तौर पर पता रहता है.. इसे खुद पर अप्लाई करके देख सकते हैं। अंजानी चीजों से कैसे डरते हैं और बचने की कैसे कोशिश करते हैं।

हाँ एक बात यह भी है कि इस इनफार्मेशन के साथ कई बार आदतें और बीमारियां भी ट्रांसफर हो जाती हैं जिन्हें हम अनुवांशिकता के रूप में देखते हैं। बाकी इस जेनेटिक इनफार्मेशन के हिसाब से इंसान सर्वाहारी होता है न कि सिर्फ मांसाहारी या शाकाहारी.. ठीक कुत्ते या भालू की तर्ज पर। कहने का अर्थ यह है कि इंसान का शुद्ध शाकाहारी होना प्राकृतिक नहीं बल्कि यह एक कला है जिसे सीखना पड़ता है, एक नियंत्रण है जिसे पाना पड़ता है तो इस मामले में मांसाहारी तो प्राकृतिक है क्योंकि वह दोनों तरह के भोजन करता है और उसका शरीर उसी हिसाब से डिजाइन हुआ है.. जबकि शुद्ध शाकाहारी होना एक अप्राकृतिक अवस्था है जिसे आपको सीखना पड़ता है।

अब आइये फलाने की सुप्रीमेसी पर कि उसने बनाया तो सब ऐसे हैं.. सब जैसे भी हैं वह इवाॅल्यूशन प्रोसेस का हिस्सा है, उनकी अगली पीढ़ी का भोजन क्या रहेगा, यह इस बात पे निर्भर करता है कि उन्हें कौन सा भोजन आसपास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है.. आगे की इनफार्मेशन उसी हिसाब से बदलती जाती है, जैसे इंसान में अपेंडिक्स उस दौर की पहचान है जब हमने भोजन पका कर खाना नहीं सीखा था, लेकिन फिर सीख लिया तो उसकी जरूरत नहीं रही और देर सवेर इसका सबूत भी शरीर से हट जायेगा।

अब आइये इस मुद्दे पर कि जहाँ फसल उपलब्ध है वहां लोग मांसाहार से परहेज कर सकते हैं क्योंकि है तो यह जीव हत्या पर ही आधारित। बात तार्किक है लेकिन व्यवहारिक नहीं.. हम साढ़े सात सौ करोड़ इंसान हैं और अस्सी प्रतिशत से ऊपर लोग मांसाहार करते होंगे और अगर एक पल के लिये मान लें कि सब शाकाहार अपना लें तो क्या सब्जियों और दालों की उपलब्धता इतनी है कि सबको अन्न मिल सके? क्या हमारे पास इतनी खेती लायक जमीन है? क्या हम जंगल काट कर खेत बनाने की कीमत पर पर्यावरणीय असंतुलन के साइड इफेक्ट समझते हैं? फिर कमी के साथ जो इस खाद्यान्न की कीमत होगी, क्या वह सब लोग चुका पायेंगे.. अभी तो दो सौ रुपये की दाल और सौ रुपये की प्याज के नाम से आंसू आ जाते हैं।

थोड़ा सोचियेगा कि अकाल कैसे पड़ते हैं और इसके क्या प्रभाव होते हैं.. और जब सभी शाकाहारी हो जायेंगे तो इसकी क्या स्थिति बनेगी? ग्लोबल वार्मिंग के दौर में फसल उत्पादन तो वैसे भी अनिश्चित हो चुका है.. जो जैसे तैसे करके उगा भी पायेंगे वह क्या सबका पेट भरने लायक होगा और क्या सब सोने के भाव बिकते उस अनाज की कीमत चुकाने में सक्षम भी होंगे। हाँ सबसे अहम बात.. शाकाहार हो या मांसाहार, इसका नैतिकता या संवेदनशीलता से कोई लेना-देना नहीं होता।

~ अशफ़ाक़ अहमद

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 27 May 2020 at 7:01 PM -

स्त्री और पुरुष

पोस्ट बडी़ है. धैर्य पूर्वक पढे़ (सत्य पर आधारित यह पोस्ट)

मैं यह समझा सकता हूँ कि क्यों लोग (प्रेमी जोड़े या पति-पत्नी) एक दूसरे को कुछ समय बाद छोड़ देते हैं!

क्योकि इंसान मौलिक रूप से पोलिगेमस होता है, वैसे 99% सभी जीव ऐसे ही होते ... हैं तो कुछ नया नहीं है। विवाह का अर्थ सेक्स होता है विज्ञान में और लोगों की राय में भी, तो पोलिगेमस को हिंदी में बहुविवाही कह सकते हैं।

दुनिया मे सबसे सम्भोग नहीं किया जा सकता लेकिन जितनों से भी कर लिया जाए, ये मानव का मूलभूत प्रयास रहता है। क्योंकि न तो हर एक सम्भोग में बच्चे हो सकते हैं और न ही हर जन्तु प्रजनन क्रिया करने में सफल ही हो पाता है।

(मानवों में तो यह इसलिए भी बेमौसम होता है क्योंकि एक महिला सिर्फ ४०० अंडे पैदा करने की क्षमता लेकर दुनिया में आती है और माह में केवल एक दिन ही प्रजनन योग्य स्थिति में होती है जो हर माह का 14वां दिन होता है (यदि महिला स्वस्थ है और उसका माहवारी चक्र 28 दिन पर टिका हो)। बच्चे होने के सम्भावित दिवस 14वें दिन से 3 दिन पहले और 3 दिन बाद तक के हो सकते हैं। लेकिन ovolution (अन्डोत्सर्ग) वाले दिन न सिर्फ 100% बच्चे होने की सम्भावना होती है बल्कि महिला इसी दिन सम्भोग के प्रति वास्तविक रूप से लालायित होती है। उसकी योनी में श्लेष्मा का स्राव अधिक होने से सम्भोग की इच्छा अपने आप जागृत हो जाती है। इस एक हफ्ते में यदि वीर्य योनी से गर्भाशय में पहुचता है तो निषेचन की प्रक्रिया होगी अन्यथा यह अंडा आत्महत्या कर लेगा। इसी अंडे की प्रतिमाह आत्महत्या को हम माहवारी कह कर सम्बोधित करते हैं। (है न रोचक जानकारी, अब मत कहना कभी कि मैं महिलाओं को समझ नहीं सकता)।

अब सवाल उठता है कि कैसे पता चले कि अन्डोत्सर्ग वाला दिन कौन सा है? यह पता नहीं लगाया जा सकता क्योंकि अब मानव कपड़े पहन कर रहते हैं। पहले माहवारी के रक्त को बहता देख कर माहवारी के दिन का पता चल जाता था उसके बाद दिनों की गिनती करके अन्डोत्सर्ग का समय पता लगाया जा सकता था लेकिन अब इसे गंदा-घिनौना बता कर छिपा लिया जाता है।

(इससे दाग न लग जाए, इसलिए लोग आज भी गंदा कपड़ा इस्तेमाल करना उचित समझते हैं। सेनेटरी पैड महंगा जो है। अरे हाँ २ रूपये वाला भी आ गया है। लेकिन सिर्फ फिल्म में। अब आ गया है pad man से बढ़ कर चमत्कारी menstrual cup man! (ही ही ही)। जी हाँ, 150 (सिफ़ारिश करता हूँ) रुपए से लेकर 2000 रुपए तक की प्रारम्भिक खर्च के बाद 5 से 10 वर्ष तक माहवारी और कपड़े, सेनेटरी पैड से छुट्टी। खरीदने के लिए सम्पर्क करें)।

इसलिए कुल मिला कर पुरुष जानता ही नहीं कि प्रजनन का दिवस कब है। परिणामस्वरूप पुरुष हर समय सम्भोग की इच्छा जताता रहता है।

ये मानव दिमाग मे भरा हुआ है (coded in gene) कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा किये जायें ताकि मानव जाति या कोई भी जाति (अन्य जीवों के मामले में) बची रहे। इस प्रावस्था को natalism कहते हैं।

प्रकृति में ये ऐसा इसलिये था क्योंकि जब विवाह नहीं था और विज्ञान नहीं था तो सभी मानव बहुत कम समय तक जी पाते थे (अन्य जंतुओं की तरह)।

ऐसे में सिर्फ वही प्रजाति जीवित बची रह सकी जो ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने में सफल हुई। Evolution (उद्विकास) के दौरान केवल वही मानव जीवित बचे जो सम्भोग करने में और अधिक बच्चे पैदा करने में ज्यादा सफल हुए।

इन मानवों में सम्भोग के प्रति बहुत तीव्र इच्छा थी और इसी कारण ये यहाँ तक पहुच सके। यही तीव्र इच्छा आज के मेडिकल साइंस के आ जाने के कारण जनसँख्या बढ़ाने की ज़िम्मेदार कहलाई क्योकि अब लोग चिकित्सा विज्ञान के कारण कम मरते हैं।

लेकिन इंसान की प्रवृत्ति (instinct) नहीं बदली। वह वैसी ही रह गई।

लोगों ने इस प्रवृत्ति को बदलने के लिये monogamy (एकल विवाह) को अनिवार्य बनाया ताकि समाज मे धन का विनिमय करने के लिये मजदूर मिल सकें और प्रति व्यक्ति परिवार के होने के कारण बच्चों का पालनपोषण सुनिश्चित हो सके। इस प्रकार जनसँख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी। समाज की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिये मोनोगैमी काम आई और एक व्यक्ति से विवाह बहुत प्रसिद्ध हुआ।

लेकिन इसके दुष्परिणाम भी समय के साथ सामने आने लगे। एक समाज एक निश्चित स्थान पर स्थित परिवार के समान होता है। प्रायः समाज एक शहर, राज्य या एक देश तक सीमित होता है। संगठित रूप में यह एक समुदाय के रूप में होता है। इसकी एक निश्चित सीमा होती है, निश्चित संसाधन (resources) होते हैं और उनकी जीवटता उन्हीं पर निर्भर होती है। अर्थात यदि संसाधनों में कमी आयी तो समाज में समस्याएं आनी तय हैं।

उदाहरण 1: एक छोटे शहर में 50 घर हैं। वे लोग वर्तमान परिस्थितियों में 60 घरो का खर्च उठा सकें इतना ही कमाते हैं। यानी अभी इसमें 10 और घर बसाए जा सकते हैं। लेकिन जगह की कमी है। इसलिये वह संख्या 50 से आगे कभी नहीं बढ़ सकती। यह 10 घरों की अतिरिक्त राशि सभी परिवार आंशिक रूप से अपने भविष्य की विकट परिस्थितियों (आपातकाल) के लिये सुरक्षित रखते हैं।

लेकिन जनसँख्या समानुपातिक ढंग से बढ़ रही है। कारण है नेटालिस्टिक भावना और संस्कृति द्वारा इसके सन्दर्भ में बनाये गये विवाह और शीघ्र बच्चों को पैदा करने जैसे अनिवार्य व्यवहार/परम्पराएं।

नतीजा साफ है। अपराध जन्म ले चुका है। अतिरिक्त लोग सड़कों पर भिखारी, विकलांग, बेकार, बेरोजगार और गुंडे/चोर बनकर जीवन गुजारने लगे हैं। इससे उन 50 घरों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। उनका वह 10 घरों के बराबर का आंशिक जमा धन इनको पाल रहा है।

लोगों ने कानून बनाया लेकिन फिर भी भृष्टाचारी समाज उसका पालन नहीं कर सका। यही एक सामान्य समाज का आर्थिक ढांचा है। इस प्रकार लोग मरते और नए पैदा होते रहते हैं। लेकिन सिर्फ तभी तक जब तक मृत्युदर और जन्म दर -50 और +60 रहती है। +10 परिवारों की वह अतिरिक्त जनसँख्या है जो अपराध/छेड़छाड़/बलात्कार की जड़ है लेकिन घटिया/भृष्ट समाज में स्वीकार्य है।

उदाहरण 2: उपर्युक्त उदाहरण में एक नियमित समन्वय दिखाया गया है जब परिस्थिति नियंत्रण में है। अब आती है अनियंत्रित परिस्थिति (वर्तमान)। वर्तमान समय में चिकित्सा विज्ञान उत्तरोत्तर प्रगति कर चुका हैं। असाध्य रोग और समस्याएं सुलझाई जा रही हैं। जनसंख्या नियंत्रण खतरे में है। इंसान की औसत आयु 80 तक खिंच गई है। जो भविष्य में और ऊपर जा सकती है।

अब क्या होगा? सीमित जगह, सीमित संसाधन, सीमित स्थान लेकिन अधिक आबादी।

1. आपके बच्चे: मम्मी-पापा का कमरा खाली हो जाता तो उनके पोते-पोतियों को दूसरे शहर में ऋण लेकर नया घर न लेना पड़ता।

2. आपके पोते-पोती: ये बुड्ढे-बुढ़िया मरते क्यों नही? मुझे सम्पत्ति की ज़रूरत है और ये कुंडली मारे बैठे हैं।

3. बैंक: 100 साल तक ही पेंशन मिलेगी माता जी। उसके बाद भी जिंदा रहीं तो कुछ और जुगाड़ ढूंढ लो।

जब लोग ज्यादा और संसाधन कम होंगे तो क्या होगा? सब एक दूसरे का मुहँ ताकना शुरू।

अब क्या करें? फिर से मौत पीछे? फिर क्या फायदा जीकर जब जीने को साधन नहीं। फिर से आदिमकाल शुरू। फिर से संघर्ष? फिर से एक दूसरे से छीनने का दौर शुरू। हिंसात्मक दृश्य। सब लड़-भिड़ के पुनः समाप्ति की ओर। यह क्या? तो क्या करें? बच्चे न पैदा करें? नेटालिस्टिक प्रवृत्ति का लोप कर दें? तब anti-natalist समाज समाप्ति की ओर नहीं बढ़ जाएगा? मानव जाति समाप्त नहीं हो जाएगी?

चलिये देखते हैं। अभी हमने बात की थी कि पोलिगेमस मानव को सदियों से मोनोगेमस बनाये जाने का प्रयास किया गया। लेकिन फिर भी इसका उल्लंघन हुआ और आज भी विश्व के 80% परिवार अपने वंश को नहीं चला रहे हैं।

(असल में तो कोई भी नहीं चला रहा* लेकिन जो सोचते हैं कि वे चला रहे हैं तो उनके लिये बुरी खबर। विदेशों में कुछ वर्ष पूर्व एक सर्वे हुआ। जिसमें कई परिवारों के DNA जांच की गयी और समझिये विस्फोट सा हुआ। कोई भी बच्चा उनके माता-पिता का नहीं निकला। पड़ोसियों के निकले।

*वंश चलाने के लिये यह परम आवश्यक है कि सभी 28 गुणसूत्र एक ही वंश से आये हों। अर्थात आपके माता-पिता एक ही माता-पिता की सन्तानें होना परमावश्यक है। इसी सिद्धान्त पर मिस्र में सदियों तक वंश चले। यदि आपके माता-पिता एक ही परिवार के रक्त सम्बन्धी नहीं हैं तो आपके आधे गुणसूत्र आपके पिता के और आधे आपकी माता के वंश के होंगे। यानी अशुद्ध वंश)।

तो क्या सीखा? मतलब प्रवृत्ति पर पूरी तरह रोक लगाना असम्भव। इसलिये मोनोगैमी की तरह एन्टी नेटालिस्ट सोच लाइये। जनसँख्या को स्वेच्छा से रोकिये। गर्भनिरोधकों का जम कर उपयोग करें। सरकार का सहयोग लें। कंडोम, नसबंदी, मैथुन भंग, डायफ्राम, IUV (आधुनिक और सुरक्षित 3 से 5 वर्ष तक), copper T, फीमेल कंडोम (reusable), 72 घंटे, आई पिल, माला-डी, सहेली, डिम्पा इंजेक्शन इत्यादि का विकल्प चुनें। अनजान साथी से सम्भोग करते समय कंडोम प्रयोग करें या उसकी STD/HIV जांच अवश्य करवा लें।

कुछ लोग मेरी बात कभी नहीं मानेंगे और जो विवाह को त्यागेंगे वे live-in-relationship में बच्चे पैदा करेंगे ही और जनसँख्या संतुलित हो जाएगी।

अब बात आती है कि हम पोलिगेमस हैं तो यह प्यार किस चिड़िया का नाम है? क्यों एक के साथ चिपक जाता है यदि इंसान पोलिगेमस है असल में?

तो दिल थाम कर इसका विश्व में प्रथम बार रहस्योद्घाटन देखिये शुभाँशु की कलम से।

इंसान खाली नहीं बैठ सकता। इसलिये उसे कोई न कोई काम चाहिए। कुछ नहीं तो मनोरंजन या गप शप करने के लिये ही सही, एक साथी। ये बात सिर्फ इंसान के लिये ही सही नहीं है। लगभग सभी जीव-जंतु ऐसा ही करते हैं। उनको भी कोई न कोई चाहिए ताकि अपना फालतू समय काट सकें। जिनको यह साथी नहीं मिल पाता वे या तो निर्जीव वस्तुओं से मनोरंजन करते हैं। जैसे खेल इत्यादि या वे सोते रहते हैं।

इस प्रकार जो आनन्द प्राप्त होता है, उससे सभी के मस्तिष्क से डोपामिन, सेरोटोनिन, ऑक्सीटोसिन तथा एंडोर्फिन्स हार्मोन निकलता है जो एडिक्टिव (जिसकी लत लग जाती है) होता है। इनके अतिरिक्त विशेष प्रकार के शरीर से जोड़ रखने वाले फेरोमोन भी होते हैं जो मानव की पसीने की ग्रन्थियों से स्रावित होते हैं। यह ऐसे गुण रखते हैं जो केवल नाक् के विशेष ग्राहियों (receptors) को ही महसूस होते हैं। जिनको आप पहचान नहीं सकते अर्थात गन्धहीन होते हैं। यह सीधे कामोत्तेजना पैदा कर सकते हैं। आपने इसी के कारण पहली ही मुलाकात में प्यार हो जाने वाला गुण पाया है। भाई-बहन-माता-पिता-पुत्री-पुत्र के फेरोमोन समान होने के कारण उनमें इनका प्रभाव हल्का होता है। लेकिन साफसफाई से रहने के कारण यह फेरोमोन अब बेकार हो गए। विपरीत फेरोमोन एक दूसरे को आकर्षित और समान प्रतिकर्षित करते हैं।

प्राचीन काल में पसीने की गंध सेक्स का turn on होती थी। लेकिन आज डिओडरेंट ने इसको एक बुराई में बदल दिया है। अब हम बैक्टीरिया जनित मल की गंध को साफ करने के चक्कर में असली फेरोमोन को भी ख़त्म कर रहे हैं।

इसी लत को प्यार/love/मोहब्बत/इश्क/प्रेम कहते हैं। ये किसी भी चीज से हो सकता है। जिससे भी आनन्द की प्राप्ति हो। परंतु संभोग की इच्छा ऑक्सीटोसिन और डोपामिन का मिला जुला प्रभाव होता है जिसमें ऑक्सीटोसिन love को बढाने वाला addictive हार्मोन कहा जाता है। इसके प्रभाव से यौनांगों का विकास शीघ्र हो जाता है। यह माता में दुग्ध उत्पादन में भी सहयोग करता है।

आवश्यकतानुसार इसमें भेद भी उत्पन्न हुए और जब मानव समाज रिश्ते बना रहा था तो उसने प्रेम को तरह-तरह के भेदों में बांट लिया।

माता-पिता का प्यार, भाई-बहन का प्यार, रिश्तेदारों का प्यार, दोस्तों का प्यार, शिक्षक और विद्यार्थियों का प्यार और सबसे महत्वपूर्ण, रोमांस वाला प्यार (विश्व प्रसिद्ध), आकर्षण का सुख, कामोत्तेजना का आनन्द, संभोग का आनंद।*

(*सम्भोग का आनंद एक ऐसा आनंद है जिसके कारण प्रजनन की भावना जीवित है। यह सभ्यता के साथ-साथ मनोरंजन में बदल गया। इसी के चलते पोलिगेमस स्वभाव फलाफूला। इसे आम भाषा में हवस (lust) कहते हैं। यह डोपामिन और ऑक्सीटोसिन का मिला जुला प्रभाव हैं। यह एक सम्पन्न समाज में एक अनिवार्य समझी जाने वाली बुराई* यानि वैश्यावृत्ति और पोर्न बन कर उभरा। पोलिगेमस पुरुषों ने सत्ता में आकर नगर वधु का चलन शुरू किया। नाम से ही स्पष्ट है कि सारे नगर की पत्नी। यह विधुरों (जिसकी पत्नी मर गई हो) के लिए शुरू की गई सेवा रही होगी लेकिन जल्द ही इसने पूरे नगर को अपनी चपेट में ले लिया। कारण वही, एक बार से दिल नहीं भरता, जाऊंगा मैं फिर दोबारा। क्यों? आखिर क्यों एक साथी से दिल नहीं भरता?

*बुराई इसलिए क्योंकि कुछ लोगों ने इनके चक्कर में अपनी पत्नी ही छोड़ दी।

प्रश्न: इन वैश्याओं के बच्चों का क्या होता है?

उत्तर: लड़की को रख लिया जाता है और लड़के को मार डाला जाता है। जी हाँ, आज भी)।

ऐसा पाया गया है कि एक ही साथी से सम्भोग करते-करते बोरियत हो जाती है। यानि कामोत्तेजना ही समाप्त हो जाती है। अब क्या करें? वियाग्रा/केलियास खाएं? अगर एक के साथ ही रहना है तो अवश्य खाइए लेकिन इसके दुष्परिणाम भी इन्टरनेट पर देखें। बहुत लोग मर गए इन दवाओं के प्रयोग से।

कमाल देखिये, नयी/नया साथी देखते ही ये बंद कलियाँ खिलने लगती हैं। जगह/स्थान/रोल बदलने से भी कुछ समय तक यही असर। फिर क्या कोई 1500-2000 रुपये की गोली लेगा या नया साथी? (अरे भई सेक्स गुरु नहीं हूँ। जानकारी रखता हूँ। अनुभव भी है कुछ।)

प्रारम्भ में केवल विपरीत लिंग के लोगों में ही रोमांस सम्भव माना जाता था परंतु कालांतर में इसके अन्य भेद भी सामने आए। जैसे LGBTQ*

(LGBTQ = Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender, Questioned)।

इन सभी रोमांटिक प्रेमों के खिलाफ धर्म और कानूनों ने व्यापक मुहिम छेड़ दी।

खरबों जोड़ो को मार डाला गया, उनके ही, अपने घरवालों के द्वारा, या जो जोड़े नहीं मार पाए गए, उनको बाकायदा पापी घोषित करके धर्म के ठेकेदारों ने कत्ल कर दिया।

क्यों?

बहुत कड़वा जवाब है इस क्यों का। जानने से पहले खुद को मजबूत कर लो...

तो चलो कुछ सवालों का जवाब ढूंढते हैं पहले:

विवाह जो समर्थन प्राप्त संस्था है, उसकी सामान्य विधि क्या है?

1. अपनी ही जाति और स्टेटस वाले, सुदंर चेहरे वाले या उनसे ऊपर के खानदान से बात चलाई जाती है।

2. यदि बात नहीं बनती तो कम से कम में जो भी मानक पूरे करता हो उसके साथ रिश्ता पक्का किया जाता है।

3. धन का लेनदेन शुरू।

4. विवाह के उम्मीदवारों से या तो कुछ नहीं पूछा जाता है या कुछ लोग (जो खुद को आधुनिक कहते हैं) फ़ोटो दिखा कर या आमने-सामने बिठा कर परिचय करवा देते हैं। ज्यादा सम्पन्न हैं तो आपस में फोन पर बकलोली भी होती है।

5. फिर उचित समय निर्धारित करके, विवाह समारोह आयोजित किया जाता है जिसमे ज्यादा से ज्यादा लोगों को, अपना स्टेटस दिखाने और जान पहचान बढ़ाने के लिये, तथा नेग/उपहार रूपी धन की वापसी की उम्मीद में, बुलाया जाता है।

इनकी आव-भगत की जाती है, वर पक्ष और वधू पक्ष के तमाम लोग इस तमाशे में शामिल होते हैं। जिनको भोजन कराने, ठहराने, घुमाने, लाने और ले जाने की व्यवस्था मेजबान करता है। भारी धन हानि। सूट बूट में तोंद वाले लोग आकर गरिष्ठ और महंगा भोजन भकोसते हैं और भरी हुई प्लेट कूड़े के ढेर में फेंक देते हैं।

6. इस सब के बाद या पहले (परम्परानुसार) विवाह की रस्म होती है। जिसमे कोई धार्मिक पुजारी/काजी/मुल्ला/पादरी आकर वर और वधु को सैकडों लोगों की मौजूदगी में जीवन भर साथ रहने की शपथ दिलवाता है और ईश्वर का डर दिखाता है कि यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो बुरा होगा। सभी लोग इस agreement के गवाह बनते हैं और आज कल तो इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी करा ली जाती है कि कहीं दोनों में से कोई भाग निकला तो पकड़ा जा सके।

7. सम्भोग रात्रि (सुहाग रात): दो अनजान लोग सीधे कुश्ती लड़ते हैं। समाज का कुंवारी कन्या को प्रथम सम्भोग में रक्त रंजित करके यह कहना कि उसकी इस रक्त पात में सहमति थी। कमाल का समाज है न?

(यह तथ्य है कि बिना foreplay के कुवारी कन्या कभी कौमार्य भंग करवाने की इच्छुक नहीं हो सकती। भारतवासी ये foreplay किस चिड़िया का नाम है यही पूछते रहते हैं, आप अब समझ गए होंगे कि बलात्कार संस्कृति कैसे बनता है। कानून भी संस्कृति से प्रेरित। मेरिटल रेप पहले दिन ही हुआ है तो सभी पति जेल में होंगे। इसलिए जज दुरूपयोग का बहाना बना कर इसे टाल देते हैं। कुछ ऐसा ही जैसे पुरुष का बलात्कार कानून में अपराध नहीं है। बस खाली कहने को सम्विधान में समानता का अधिकार है)।

इतनी बड़ी परियोजना केवल 2 लोगों के बच्चे पैदा करने के लिये? नहीं मित्रों, बहुत बड़ी साजिश है इसके पीछे।

ये सब इसलिये ताकि कोई भी अपनी मर्जी से विवाह न कर ले। एक विवाह एक व्यापारी के लिए विज्ञापन, एक कारपोरेट के लिये नए व्यापार के लिये रास्ते खोलने वाला और बड़े लोगो से सम्पर्क बनाना हो सकता है।

धर्म को क्या फायदा है? जितने ज्यादा कमाने वाले होंगे उतना ज्यादा दान। उतने ज्यादा नामकरण, यग्योपवीत संस्कार, मुंडन, इत्यादि 16 संस्कारों में धन कमाने का अवसर। और फिर खानदानी लॉयल्टी।

अब अगर उन माता-पिता के बच्चे खुद ही अपना जीवन साथी चुन लेंगे तो उनके इस प्लान का क्या होगा?

भारत के परिपेक्ष्य में:

वधू पक्ष: कितने निष्ठुर हैं न ये माता पिता? एक तो लड़की को घर से विदा कर दिया जबरन और फिर रोने का नाटक भी? ज़िन्दगी भर अपमान करवाने और ससुराल वालों के नखरे और फरमाइशों को पूरा करने का वादा भी कर लिया। उनकी तरफ के बच्चे का भी चरणस्पर्श। दान देने वाला बाप छोटा और लेने वाला बड़ा?

वर पक्ष: एक तो लड़की ले आये दूसरे की खा पी कर, साथ में पैसा भी ले आये, फिर भी dowry चाहिए? नहीं दें तो?

1. लड़की केरोसीन stove से जल मरी। दुर्घटना है।

2. लड़की ने जहर खा लिया। कायर है।

3. लड़की के फांसी लगा ली। चाय में चीनी डालने को कह दिया, इतनी सी बात पर नाराज हो गई थी।

4. नई शादी...

5. Repeat...

यदि दहेज की मांग पूरी करते रहे:

वधू पक्ष:

1. गरीबी में जीवन।

2. अपनी ही लड़की को कोसना।

3. किस्मत को कोसना।

4. अपने लड़के की शादी में 2 गुना दहेज माँगूँगा तब जा कर कुछ आराम मिलेगा।

उधर वर-वधु का जीवन:

पति:

1. तू लाई ही क्या थी? ये दो कौड़ी का सामान?

2. तेरे बाप ने तुझे यही सिखा पढ़ा के भेजा है कि तू हमसे जुबान लड़ाती है?

3. अब तेरे में वो पहले वाली बात नहीं रही, अब तेरे साथ मज़ा नहीं आता।

4. आफिस में अपनी जूनियर को पटाऊंगा। वो नया माल लगती है।

5. अब मस्त ज़िंदगी है, घरवाली और बाहरवाली दोनों होनी चाहिए।

सास:

1. अरे करमजली, फिर दूध जला दिया, यही सिखा कर भेजा है तेरी माँ ने?

2. अरे नास पीटी, तुझ से कहा था कि मुझे नाश्ता टाइम पर चाहिए, अभी तेरे बाप को बुलाती हूँ ठहर जा।

3. अरे ये पोछे का पानी अब तक नहीं सूखा? अभी मैं गिर जाती तो? मार डालने का प्लान है।

4. फिर लड़की? लड़का कब देगी तू डायन?

ससुर:

1. बहू, ज़रा मेरा भी थोड़ा ध्यान रख लिया कर, तेरी सास तो कुछ करती नहीं है, तू आ गई तो लगा कि जीवन आराम से कट जाएगा, मेरे कपड़े, सामान वगेरह का ध्यान तुमको ही रखना है अब।

बहू:

1. एक आदमी से शादी की थी, ये तो पूरा कुटुंब ही पल्ले पड़ गया। क्या क्या कर लूँ अकेले मैं?

2. इज़्ज़त तो कोई है नहीं, नौकर बन कर जीना पड़ रहा है।

3. लड़का क्या पड़ोस से कर लूं? जो होगा वही तो मिलेगा? में क्या जानू पेट मे क्या पल रहा है?

4. मैं कहाँ फंस गई?

5. वो पी कर आते हैं, 1 मिनट से ज्यादा सम्भोग नहीं करते, में तड़पती रहती हूं।

6. देवर की नज़र मेरे ऊपर है, अब तक खुद को रोका लेकिन अब कहीं फिसल न जाऊं।

7. पड़ौस का लड़का बहुत लाइन मारता है, इधर मुझे ये खुश कर नहीं पाते, कहीं मन बहक न जाये।

8. अब क्या कर सकती हूं, ऐसे ही जीना है अब मुझको। चुप रहूंगी।

ऑफिस की जूनियर:

1. Sir ने मेरा रेप किया। किस से कहूं? सहेली से कहती हूँ।

2. पागल हो गई क्या? वो तेरे से मजे ले रहा है तो लेने दे, मैंने भी यही झेला है। कुछ कहेगी तो demotion करवा देगा या निकलवा देगा, कॉन्ट्रासेप्टिव लेती रहना। सब ठीक होगा। किसी से कहना मत, नहीं तो सब तुझे ही गलत कहेंगे। सोसायटी लड़कियों को जॉब करते नहीं देख सकती, उनके लिये तो हम हमेशा धंधे वाली ही रहेंगे। और तुझे करना क्या है? शादी ही न? कर देगा तेरा बाप।

परिणाम: विवाह सफल! बधाई हो। लड़का हुआ है।

गुलामी स्वीकार कर लो तो कोई दिक्कत नहीं है। लड़की समाज के पांव की जूती ही तो है। लड़की का तो नाम ही समर्पण है। बोले तो आत्मसमर्पण (surrender)।

विरोध किया तो? समस्या शुरू। यहीं से सब दिक्कत शुरू है। समाज कहता है कि विरोध मत करो।

तो मत करिए, यही चाहते हैं न आप सब भी? जो चलता है चलने दो न। शुभांशु जी काहे पंगा ले रहे हैं दुनिया से? उंगली न करें। अच्छा नहीं होगा। है न?

इस सब का विरोध शुरू से क्यों नहीं हुआ? क्योकि इसको चलाने में धर्म का बहुत बड़ा हाथ था जिसके डर से लोगों ने विरोध नहीं किया।

"लड़की की अब लाश ही वापस आएगी।"

"पति का घर ही अब उसका घर है।"

इसी तरह लोग अपनी वास्तविक पृवृत्ति को छुपा कर जीने लगे, अपने पोलिगेमस होने को दबाए रहे, लेकिन समय बदला और इसके बुरे परिणाम सामने आने लगे, क्योकि इंसान अपनी पृवृत्ति को नहीं बदल सकता और बलात्कार का आविष्कार हुआ।

विवाहेतर सम्बन्ध, बलात्कार और हत्या सब अवैध कहलाने के डर से चुप चाप होने लगीं।

समाज के ठेकेदारों ने इस पर सजा रख दी लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, बलात्कार के बाद सज़ा के डर से लड़की को मारा जाने लगा, यानी सज़ा से फायदे के स्थान पर नुकसान हो गया।

आज भी यही हो रहा है, दिल्ली रेप केस में ज्यादातर लड़के शादी शुदा थे। जो नाबालिग थे उनको शादीशुदा लोग भड़काते और उकसाते हैं। कहते हैं, नहीं करेगा? मर्द नही है साला।

शादी शुदा जीवन तो पत्नी का बलात्कार ही होता है 90%। कितनी पत्नियां होंगी जो खुद पति से आकर कहती हैं, "ऐ जी बहुत मन कर रहा है आज, चलो कमरे में।"

हमेशा पति ही अपनी इच्छा पूर्ति करता रहता है, महिला तो कह तक नहीं पाती। और यदि कहे तो? रंडी है, छिनाल है। पति भी कौन सा स्टैमिना वाला होता है, 1 या 2 मिनट में out। मौसम की तरह। जब मौसम का मजा आने लगता है तभी खत्म।

जो लोग बलात्कार नही कर सकते थे वो gf-bf खेलने लगे। वैसे इसमें भी पहले दिन बलात्कार होता ही है। इसे डेट रेप कहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ये बलात्कारी प्यार का वास्ता देकर मना लेता है, जबकि दूसरे बन्दूक दिखा कर या ब्लैकमेल करके।

और क्या आपको सबसे बढ़िया उपाय पता है बलात्कार के केस से बचने का? लड़की से समझौता करके शादी कर लो। वह केस अपने आप ही निरस्त हो जाएगा। फिर चाहे उसी दिन तलाक/divorce देकर मुक्त हो जाओ। कमाते हो तो गुजारा भत्ता देने का नुकसान होगा। साथ ही कभी-कभी माफी मांगने भी जा सकते हैं, रात भर माफी मांगिये फिर अपने रस्ते। लड़की तलाक न दे तो? घरेलू हिंसा है न। झक मार के देगी...तलाक।

जब मुझे ये सब पता है तो मैं प्यार का नाटक नहीं करता, जिसके साथ सेक्स का मन है उस से सेक्स करो और जिस से प्यार करना है उस से प्यार करो। दोनों को मिलाने से ही क्लेश और अपराध होते हैं। सेक्स लोयल्टी की निशानी नहीं होता, लेकिन प्यार होता है।

इतना गन्दा समाज, इतना घटिया सिस्टम, इतने घटिया लोग। फिर क्यों न मैं साथ दूँ लिव इन रिलेशनशिप का? कोई दखल नहीं दूसरे का। आज़ादी, दो लोगों का व्यक्तिगत सम्बन्ध। ये उनके लिए जो बच्चे चाहते हैं।

जिनके बच्चे नहीं और अलग/व्यस्त रहते हैं तो वे अपने माता-पिता की देखभाल के लिये नौकर रख लें और माता-पिता स्वीकार लें इस सम्बंध को। नौकर, जिसकी पुलिस पड़ताल हो चुकी हो।

जो Antinatalist Vegans* हैं, वे Freesex का concept पढ़ें और सेफ सेक्स और प्यार को कायदे से मैनेज करें।

*Vegan: बहुत हो गया और जानकारी फिर कभी! इतने में ही मेरे को मारने को ढूंढ रहे होंगे आप सब। सबकी पोल जो खोल के फैला दी है! (ही ही ही) फिर से पिटने के लिए जल्द ही आऊंगा। डंडों को तेल पिला कर लगे रहिये मेरी जासूसी में।

अस्वीकरण: मेरी व्यक्तिगत सोच, किसी को बाध्य नहीं किया गया है। वही करें जो दिल कहे। धन्यवाद।

Final Edited: 2018/02/16 17:55 IST, First written: 2017/06/16 06:51 IST

मौलिक लेख: ~ Shubhanshu Singh Chauhan.....

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 25 May 2020 at 9:02 PM -

कुम्भ

।।कुम्भ।।
-राजेश चन्द्रा-

मिथक व किंवदंतियों से परे वर्तमान में प्रचलित कुम्भ पर्व का अपना इतिहास भी है।

ईस्वी 636 में चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत की यात्रा पर थे। वह महज़ यात्री भर नहीं थे बल्कि वे एक बौद्ध भिक्षु भी थे। विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालय, नालन्दा विश्वविद्यालय, ... में रह कर उन्होंने बुद्ध धम्म का गहन अध्ययन किया था। चारो तरफ उनकी विद्वता की ख्याति थी। उन्होंने धम्म का बौद्धिक अध्ययन मात्र नहीं किया था बल्कि आध्यात्मिक साधनाओं का गहन अभ्यास भी किया था। उनकी प्रतिभा की चारो ओर चर्चा थी।

न केवल इतना, बल्कि महान भिक्खु ह्वेनसांग ने भगवान बुद्ध के चरण चिन्हों का अनुगमन भी किया था। जहाँ-जहाँ भगवान बुद्ध ने चारिका की थी, पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण चारों दिशाओं में, लगभग उन सारे स्थानों की पूज्य ह्वेनसांग ने श्रद्धापूर्वक यात्रा की थी। उन्होंने उन सारे स्थानों का विस्तृत विवरण लिपिबद्ध किया था। इस कारण बौद्धकालीन भारत के इतिहास का सबसे प्रमाणिक स्रोत ह्वेनसांग का यात्रा विवरण माना जाता है। आज भी उत्खनन में यदि कहीं बौद्ध अवशेष मिलते हैं तो उसकी पुष्टि ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से की जाती है। आज भूखण्ड पंजीकरण, खसरा-खतौनी, दाखिल-ख़ारिज में मापन की जो पद्यति अपनायी जाती है ह्वेनसांग ने बौद्ध स्थलों के चिन्हीकरण में उन सबका सटीक व बारीक इस्तेमाल किया है। यथा जब कोई भूखण्ड पंजीकृत किया जाता है तो चिन्हांकन के लिए भूखण्ड के पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण दिशा में क्या-क्या है इस विवरण को सन्दर्भ बनाया जाता है जैसे कि, भूखण्ड के सामने सड़क है, पीछे मकान या भूखण्ड है, दाएं-बाएं अमुक भूखण्ड संख्या है। ह्वेनसांग ने इसी पद्धति से दो हजार साल पहले पूरे भारत को नाप लिया, हर बौद्ध तीर्थ का चिन्हांकन किया और इन्हीं चिन्हांकनों के आधार पर पुरातत्वविद धरातल से लुप्त हो चुके बौद्ध स्थलों का उद्धार कर सके।

ब्रिटिश काल में विलियम जोन्स तथा जनरल कनिंघम ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की थी। पुरातात्विक उत्खनन के स्थानों को चिन्हित करने में जनरल कनिंघम को सबसे अधिक मदद ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से मिली थी। आज भारत में जो भी बौद्ध स्थल जीवन्त दिख रहे हैं - बोधगया, श्रावस्ती, सारनाथ, संकिसा, कुशीनगर, सांची, नालन्दा विश्वविद्यालय के अवशेष इत्यादि- सबके उत्खनन में ह्वेनसांग के यात्रा विवरण जानकारी के मुख्य स्रोत रहे हैं।

भारत की यात्रा के दौरान ईस्वी 636 में वह कानपुर पहुँचे। उस काल में कानपुर को कान्यकुब्ज कहते थे और ह्वेनसांग ने अपने चीनी उच्चारण में इस समृद्ध नगर को 'कानुकुरो' लिखा है। उस काल में कानुकुरो वस्त्र उत्पादन का महत्वपूर्ण केन्द्र था। ब्रिटिश काल तक वस्त्र उत्पादन के क्षेत्र में कानपुर को भारत का मैनचेस्टर कहा जाता था।

ह्वेनसांग ने विवरण दिया है कि कानपुर में उस समय सौ बुद्ध विहार थे जिनमें दस हजार बौद्ध भिक्षु रहते थे।

ह्वेनसांग कानपुर से कन्नौज पहुँचे। उस समय कन्नौज साम्राज्य पर सम्राट हर्ष वर्धन का शासन था। जब भिक्खु ह्वेनसांग कन्नौज पहुँचे उस समय सम्राट हर्ष वर्धन एक विजय अभियान पर बंगाल में थे। ह्वेनसांग चारिका करते हुए असम पहुँच गये जहाँ सम्राट भास्कर वर्मन का शासन था। सम्राट ने महान भिक्षु ह्वेनसांग का भव्य स्वागत-सत्कार किया।

यह वह काल था जब भारतमें सर्वत्र बुद्ध धम्म व्याप्त था। सम्राट अशोक के समय से शुरू हुआ बुद्ध धम्म का स्वर्णिम काल अपने शिखर पर था। शासक और सम्राट तो हमेशा से प्रजा व जनता की भावनाओं के अनुरूप बर्ताव करते हैं। सम्राट भी बुद्धानुयायी व बुद्ध धम्म के पोषक थे।

कन्नौज वापस आकर सम्राट हर्षवर्धन को जब यह ज्ञात हुआ कि महान बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग उनके साम्राज्य में आकर चले गए हैं तो उन्हें बड़ा पछतावा हुआ। अपने दूतों के द्वारा उन्हें मालूम हुआ कि ह्वेनसांग अभी आसाम में है। उन्होंने तत्काल सम्राट भास्कर वर्मन के पास संदेश भेजा कि वह पूज्य ह्वेनसांग को स्वयं लेकर कन्नौज में पधारें। भास्कर वर्मन के साथ सम्राट हर्ष वर्धन के मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। पूज्य ह्वेनसांग को कन्नौज आमंत्रित करने के लिए उन्होंने अपने साम्राज्य में एक विशाल धम्म परिषद रखी जिसकी अध्यक्षता के लिए पूज्य ह्वेनसांग को आमंत्रित किया।

पूज्य ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार ही कन्नौज की उस धम्म परिषद में उस काल में 20 देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हुए तथा पूरे भारत से 30000 बौद्ध भिक्षु एकत्रित हुए। यह परिषद 18 दिन चली। आज भी यह विवरण पढ़ कर गर्व होता है कि भारत की एक धम्म परिषद में 20 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए और तीस हजार भिक्खु सम्मिलित हुए। 18 दिन तक निरंतर चलने वाली इस धम्म परिषद में हजारों की संख्या में उपासक-उपासिकाओं ने धम्म सेवा की, भिक्खुओं को भोजन दान दिया, वस्त्र दान किया, औषधि दान किया, अष्ट परिष्कार दान किया। 30000 बौद्ध भिक्षुओं को कानपुर और कन्नौज के वस्त्र व्यापारियों ने चीवर दान किया क्योंकि कन्नौज और कानपुर उस समय वस्त्र उत्पादन का प्रमुख केंद्र था। जिन शद्धालु लोगों ने विशाल भिक्खु संघ को चीवर दान किया, उन्हें चीवर रंग कर दिया, श्रद्धा और भक्ति से पूज्य भिक्खु संघ को दान दिया, धम्म सेवा की, कन्नौज का वही समुदाय आज अपने को कन्नौजिया लिखता है। आज का कन्नौजिया समाज मौलिक रुप से बौद्ध उपासक समाज है।

कन्नौज की महान धम्म परिषद के उपरान्त महान भिक्षु ह्वेनसांग स्वदेश अर्थात चीन लौट जाने को तत्पर हुए तो सम्राट हर्ष वर्धन ने उनसे पुनः कुछ और दिन रुक जाने का आग्रह किया।

साधु को कोई रोटी और कपड़े के लिए न बुला सकता है, न रोक सकता है। साधु को सिर्फ धर्म के लिए बुलाया जा सकता है और सिर्फ धर्म के लिए रोका जा सकता है। जो रोटी और कपड़े के लिए बुलाने पर आ जाए और रोकने पर रुक जाए वह साधु ही नहीं है।

महान भिक्षु ह्वेनसांग को कुछ और दिन भारत में रोक लेने के लिए बौद्ध श्रद्धालु सम्राट शीलादित्य, जो इतिहास में हर्ष वर्धन के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं, ने अपने राज्यान्तर्गत प्रयाग के तट पर एक "महामोक्ष्य परिषद" का आयोजन किया, सन् 644 में, जिसमें पूज्य भिक्खु संघ को असदृशदान दिया गया जैसा असृदशदान राजा प्रसेनजित, राजा बिम्बिसार के द्वारा भगवान बुद्ध के समय में किया गया था। असृदशदान का वही महान पर्व आज "कुम्भ" कहलाता है तथा सम्राट हर्षवर्धन ने इसे प्रतिवर्ष दान पर्व और प्रत्येक बारह वर्ष पर महादान पर्व के रूप में स्थापित किया। कहते हैं कि एक अवसर पर उसने अपने वस्त्र तक दान कर दिये थे उसकी बहन ने उसे वस्त्र प्रदान किये। कुम्भ पर्व मौलिक रूप से एक बौद्ध पर्व है जो आज अपभ्रंशित स्वरूप में प्रचलन में दिखता है। यह पर्व मौलिक रूप से बौद्ध साधुओं को महादान देने का उत्सव था।

दान पर्व जब सम्राट आयोजित कर रहा हो तो पात्र से अधिक अपात्र इकठ्ठा होने लगते हैं। यह अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि खोटा सिक्का असली मुद्रा को चलन से बाहर कर देता है। अगर किसी की जेब में एक नकली और दूसरी असली मुद्रा हो तो मुद्राधारक का पहला प्रयास रहता है कि नकली मुद्रा चला दी जाए। इस सरल से सिद्धांत के कारण नकली मुद्रा असली मुद्रा को चलन के बाहर कर देती है। कुम्भ पर्व के साथ यही हुआ है। साधु से अधिक असाधु इकट्ठा होने लगे। श्रद्धा पर अंधश्रद्धा का प्रचार होने लगा। इतिहास पर मिथक हावी होने लगा। पराकाष्ठा यहाँ तक हो गयी कि कालान्तर में बौद्ध उपासक-उपासिकाओं तथा भिक्खुओं को बेदखल करने के लिए नग्न स्नान की परम्परा शुरू हुई, नतीजतन साधुओं की कुटियां 'अखाड़े' बन गये, इतिहास पर मिथक हावी हो गया। नग्न स्नान की परम्परा आज भी पूरी दुनिया में भारत का कितना अपमान कराती है कि हर भारत प्रेमी आहत महसूस करता है। नग्न स्नान की इस निर्लज्ज परम्परा ने एक महान आध्यात्मिक पर्व की आध्यात्मिकता और धार्मिकता को तार-तार कर दिया है और यह सब कुछ कथित धर्म के नाम पर हो रहा है, पूरे महिमामण्डन के साथ हो रहा है। किसी कथित धर्म प्रेमी में यह कहने का साहस नहीं है कि यह निर्लज्ज परम्परा कानूनन बन्द किया जाना चाहिए।

उज्जैन के कुम्भ की शुरुआत 18वीं शताब्दी में हुई। मराठा शासक रानोजी शिन्दे ने उज्जैन के एक स्थानीय उत्सव के लिए नासिक से साधुओं को आमंत्रित किया। सम्राट हर्षवर्धन का अनुकरण करते हुए रानोजी शिन्दे ने भी इस उत्सव को महादान का स्वरूप दिया।

मराठा शासक रानोजी शिन्दे की पहल के परिणामस्वरूप कालान्तर में नासिक और उज्जैन के साधुओं की परस्पर प्रतिस्पर्धा ने क्षिप्रा के तट पर उज्जैन में और गोदावरी के तट पर नासिक में कथित कुम्भ की शुरुआत हुई, वहाँ भी 'अमृत' बूंदें गिर गयीं। हरिद्वार के गंगा तट इसका विस्तार सम्राट हर्षवर्धन के समय ही हो चुका था और ब्रिटिश काल तक आते-आते यह एक स्थापित पर्व बन चुका था।

प्रसिद्ध इतिहासज्ञ डी. पी. दुबे का कथन है: "किसी भी हिन्दू ग्रन्थ में प्रयाग मेला कुम्भ मेला के रूप में दर्ज़ नहीं है।"
'कुम्भ मेला' का पहला लिखित विवरण इस्लामी इतिहास ग्रंथों 'खुलासत-उल-तवारीख'(सन् 1695) और 'चाहर गुलशन'(सन् 1759) में मिलता है।

आधुनिक काल में 'कुम्भ मेला' का सर्वप्रथम उल्लेख ब्रिटिश काल की एक आख्या, रिपोर्ट, में सन् 1868 में "Coomb fair" के रूप में मिलता है जो कि सन् 1870 में होना था। मैक्लियन के विवरणानुसार:" प्रयाग के प्रयागवाल ब्राह्मण ने सर्वप्रथम तीर्थ की महत्ता को महिमामण्डित करने के लिए माघ मेला को कुम्भ के रूप में आत्मसात किया।"

इन ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में देखें तो आज का वर्तमान कुम्भ मौलिक रूप से बौद्धों के द्वारा स्थापित महादान का एक महापर्व है- महामेक्ष्य परिषद। समय की मांग तो यह है कि इस पर्व को भारत पर्व बना दिया जाए जहाँ समता-स्वतंत्रता-बन्धुता-न्याय का उत्सव हो क्योंकि यह भी दुनिया में एक अनुपम मिसाल है जहाँ बिना निमंत्रण के लाखों की संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं, विविध भारत एक दिखता है। यह भारत की एकता का पर्व भी बनाया जा सकता है। इसकी पहल हर भारत प्रेमी को करना चाहिए। इसकी मौलिक आध्यात्मिकता व धार्मिकता को संरक्षित करना हर भारत प्रेमी का नैतिक कर्तव्य है। जिस दिन यह पर्व अपनी मौलिक आध्यात्मिकता को पुनः उपलब्ध होगा भारत फिर विश्व गुरू होगा।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 07 May 2020 at 9:31 PM -

समन्वय आचरण

आधुनिक बुद्ध के अनुसार समन्वित आचरण-
1.समय से उठना.
2.व्यायाम,ध्यान, विपश्यना.
3. साधारण,पौष्टिक खाना
4.बिना झूठ बोले उद्यम कर खुद,घर परिवार,पशु,संभव हो तो पक्षियों को भोजन पानी का इंतजाम करना.
5.पाली में नहीं, हिंदी या स्थानीय भाषा में ही ज्ञान, विज्ञान सम्मत चर्चा.
6.अपनी आंतरिक ऊर्जा, लाइफ एनर्जी को सक्रिय बनाये ... रखने के लिये सक्रिय ध्यान.
7.कभी भी क्रोध को अपने इर्द,गिर्द न फटकने देना, लेकिन अपने सही विचारों के प्रचार हेतु लगातार प्रयासरत रहना और अपने साथियों को सक्रिय बनाये रखना.
8. पर्यावरण संरक्षण, पानी ,बिजली की बचत के साथ यथासंभव आसपास, सफाई का ध्यान रखना और उसके प्रति लोगों को सचेत करते रहना.
9.अपने आसपास, नाते रिश्तेदार, मित्र दोस्तों में से किसी का शिशु अशिक्षित न रह जाय,ऐसी चौकन्नी निगाह रखना और संभव हो तो मददगार बनना.
10. किसी भी हालात में मनुष्य-मनुष्य और स्त्री-पुरूष के कमतर ,अधिकतर के सिद्धांत को नहीं मानना.
11. किसी भी तरह की अकेडमिक, साहित्यिक या ऐतिहासिक पुस्तकों का संरक्षण कर उन्हें जरुरतमंद विद्यार्थियों तक पहुंचाना नहीं तो अपनी विचारधारा के किसी पुस्तकालय को दान में देना ताकि जरूरत मंद उसका लाभ ले सकें.
12. यदि गांव में रहते हैं तो जल संरक्षण, वृक्षारोपण, घरेलू पशुपालन, बिना रसायन की खेती, ज्यादा उत्पादन, किसानों के लिये लाभकारी उत्पाद, उनके मूल्य,घूंघट,बुर्का विरोध, शिक्षा के प्रति जागरुकता,गांव की आपसी एकता,तर्क करने की शक्ति का विकास,राजनैतिक घटनाक्रमों का विश्लेषण,सरकार द्वारा किसानों,विद्यार्थियों ,मजदूरों, नागरिकों हेतु लाभकारी योजनाओं पर चर्चा करते रहना.
13. सत्य कड़वा होता है,लेकिन यदि विचारक अध्ययनशील, जानकारी और सूचनाओं से लैश,अपने आसपास के सामाजिक, राजनीतिक परिवेश के प्रति सचेत है तो लोग बात सुनते हैं.
14.घृणास्पद बातों से परहेज, किसी को बिना ठेस पहुंचाये अपने बात समझा देने की क्षमता रखना ही बुद्ध का मार्ग है.
15. नफरत किसी से नहीं, प्रेम सभी से,भरोसा सोच समझ कर.
16.कोई भी मनुष्य कभी पूर्ण नहीं हो सकता, अतः सर्वदा सीखने की ललक बनाये रखना.यदि इनसे ऊपर उठ गये हों तो प्रज्ञा शक्ति के विकास और गहन अध्ययन, विश्लेषण हेतु अपने जैसे ही साथियों से विमर्श करते रहना.

सुरेन्द्र कुशवाहा.

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 28 Apr 2020 at 7:20 PM -

bcg का टीका

"यह बचाएगा कोविड-19 से भारत को ... और दुनिया को भी ! यह !" मदन भाई अपनी टीशर्ट का आधा बाज़ू ऊपर मोड़ते हुए उल्लास-भरे स्वर में कहते हैं। उनकी उँगली का इशारा बायीं भुजा की सतह पर बने उस निशान की ओर है , ... जिसे संसार बीसीजी के नाम से जानता है।

"बैसिलस कैलमेट गीरैन। आपको इससे इतनी उम्मीद क्यों हैं ?" मैं उनके समाचारीय सुख को टटोलता हूँ।

"अख़बारों में , टीवी-चैनलों में हर जगह छाया हुआ है यह बीसीजी का टीका। जहाँ इसे जनता लगवाती रही है , वहाँ कोविड-मामले भी कम हैं और मृत्यु-दर भी। तुम्हें नहीं लगता ? कुछ दम तो है इसमें !"

"अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी पुख़्ता तौर पर। किन्तु चलिए इसी बात पर बीसीजी की कहानी कही-सुनी जाए। सुनेंगे आप ?"

मदन भाई की उत्साही भौहें खिंच जाती हैं।

"निन्यानवे साल पुराना टीका है बीसीजी। यानी बैसिलस कैलमेट गीरैन। इस टीके में एक ख़ास माइकोबैक्टीरियम बोविस नाम का जीवाणु है , जिसे क्षीण यानी एटेनुएट किया गया है। यह जीवाणु गायों में टीबी-रोग पैदा करता है।"

"गायों में टीबी करता है ! पर यह जीवाणु टीबी से हमें कैसे बचाता है ? बीसीजी तो टीबी में काम करता है --- ऐसा सुना था !" मदन भाई का प्रश्न है।

"जी। टीबी-रोग मायोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस से होता है। किन्तु बीसीजी में एक दूसरा मायकोबैक्टीरियम बोविस है। ये कई मामलों में मिलते-जुलते हैं। अलबर्ट कैलमेट और कैमिल गीरैन से इस टीका का निर्माण किया। मनुष्यों में इसका पहला प्रयोग सन् 1921 में किया गया। तबसे न जाने कितने ही शिशुओं और नवजातों को यह लगाया जा चुका है। इसका मुख्य उद्देश्य : ट्यूबरकुलर मेनिन्जायटिस व डिस्सेमिनेटेड टीबी से व्यक्ति की रक्षा।"

"ये दोनों अजीब-ओ-ग़रीब नाम ऐसे हैं ?"

"ये टीबी-रोग के दो गम्भीर स्वरूप हैं। ट्यूबरकुलर मेनिन्जायटिस मस्तिष्क की मेनिंजेज़ नामक बाहरी झिल्लियों को प्रभावित करने वाला रोग है और डिस्सेमिनेटेड टीबी उस स्थिति को कहा जाता है , जब टीबी पूरे शरीर में फैल जाती है।"

"अरे ! तब तो ये बड़ी घातक बीमारियाँ हुईं ! एक दिमाग़ पर असर डाल रही है , दूसरी समूचे जिस्म पर !"

"यक़ीनन। तो इन्हीं को रोकने के लिए बीसीजी का इस्तेमाल किया जाने लगा। कामयाबी भी काफ़ी मिली , हालांकि टीबी इ अन्य स्वरूपों में इसकी सफलता विवादास्पद रही।"

"इनके अलावा भी कहीं यह टीका इस्तेमाल हुआ ?"

"जी। मूत्राशय के कैंसर में। वहाँ भी इसके प्रयोग से यूरोलॉजिस्टों-ऑन्कोसर्जनों ने रोगियों में लाभ होता पाया। लेकिन बीसीजी बड़ी दिलचस्प वैक्सीन रही दूसरे मायनों में।"

"कैसे ?"

"बीसीजी का टीका जब नवजातों को लगने लगा , तब ओवरऑल शिशु-मृत्यु-दर में भी कमी पायी जाने लगी। केवल टीबी से ही बच्चे कम मर रहे हों , ऐसा नहीं था। बीसीजी का टीका लगने से बच्चों में फेफड़ों के संक्रमण और सेप्सिस जैसे गम्भीर भी घटते पाये गये।"

"अरे वाह ! यह तो कमाल हो गया ! आम-के-आम-गुठलियों-के दाम !"

"हाँ , पर विज्ञान तो मुहावरों के आधार बना कर उत्सव मनाता नहीं। उसकी उल्लासधर्मिता को तो प्रमाण चाहिए पहले। सो दुनिया-भर के इम्यूनोलॉजिस्ट जुटे बीसीजी का अध्ययन करने के लिए कि ये एक-से-अधिक लाभ मिल क्यों और कैसे रहे हैं ? जानते हैं उन्हें क्या मिला ?"

"अब थोड़ी इम्यूनोलॉजी की जटिल भाषा को सरल करके समझाने का प्रयास करता हूँ। मोटी बात यह समझिए कि वैज्ञानिकों ने पाया कि बीसीजी का टीका शरीर में अन्य संक्रमणों से बचाने के लिए तीन स्तर पर काम करता है। मान लीजिए किसी बच्चे को बीसीजी का टीका लगा। टीके में एक जीवाणु है , जिसका नाम आप जान चुके हैं। शरीर के भीतर जो प्रतिरक्षक लिम्फोसाइट-कोशिकाएँ हैं ( दो प्रकार की : टी-लिम्फोसाइट व बी-लिम्फोसाइट ) उन्हें इस बीसीजी के जीवाणु का प्रयोग करके टीबी से लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है। यानी शरीर के सैनिकों को ट्रेनिंग देने वाली कोशिकाएँ बीसीजी के टुकड़े ( यानी एंटीजन ) इन लिम्फोसाइट-सैनिकों के सामने प्रस्तुत करते हुए कहती हैं कि , "इसे देख रहे हो ? बाहर जो टीबी की बीमारी पैदा करने वाला दुश्मन है न , वह इसी से मिलता-जुलता है। इससे लड़ने का अभ्यास करो। इससे लड़ना सीख लोगे , तो उससे लड़ने में भी आसानी होगी।" इस तरह से शरीर की टी-लिम्फोसाइट व बी-लिम्फोसाइट बीसीजी के टीके से ट्रेनिंग लेकर टीबी-रोग से लड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं। फिर ये शरीर में ट्रेनिंग की स्मृति लेकर चुपचाप पड़ी रहती हैं कि कब टीबी का जीवाणु भीतर दाखिल हो और कब वे इससे लड़ें। किन्तु जब टीबी के जीवाणु की जगह दूसरे श्वसन-रोग पैदा करने वाले विषाणु शरीर में घुसते हैं , तब ये स्मृतियुक्त लिम्फोसाइट इन विषाणुओं और बीसीजी-जीवाणु के टुकड़ों ( यानी एंटीजनों ) कुछ समानता पाते हैं और इन विषाणुओं पर हमला कर देते हैं।"

"यानी ट्रेनिंग बीसीजी से ली थी , टीबी के लिए ली थी और हमला करके मार दिये वायरस ! गज्जब भाई ! कमाल !"

"हाँ मदन भाई। आण्विक स्तर पर बीसीजी और विषाणुओं को एक-सा दिखना मॉलीक्यूलर मिमिक्री कहलाता है और इस मिमिक्री के कारण विषाणुओं का सफाया हो जाता है। यह बीसीजी-टीके का टीबी के अतिरिक्त अन्य संक्रामक रोगों में काम करने का पहला ढंग हुआ।"

"दूसरा ढंग क्या है ?"

"बीसीजी एक-दूसरे ढंग से सीधे प्रतिरक्षा-तन्त्र की इन बी व टी-लिम्फोसाइटों को विषाणुओं के खिलाफ़ सक्रिय कर सकता है। इस तरीक़े को हेटेरोलॉगस इम्यूनिटी कहा जाता है। इसमें बीसीजी और विषाणुओं के मिलते-जुलते एंटीजन ज़िम्मेदार नहीं होते , यह सीधे काम के लिए उन्हें तैयार करता है। यानी बीसीजी का टीका लगा तो केवल टीबी-रोग से लड़ने वाले सैनिक नहीं तैयार हुए , विषाणु से लड़ने वाले सैनिक भी तैयार हो गये।"

"और तीसरा ढंग क्या है ?"

"तीसरा ढंग अन्तिम और सर्वाधिक शोध का विषय बना हुआ है। इसे ख़ास नाम दिया गया है : ट्रेंड इम्यूनिटी। मोनोसाइट-मैक्रोफेजों जैसी प्रतिरक्षक कोशिकाओं के भीतर जीनों के ख़ास प्रमोटर नामके स्विचों को ऑन-ऑफ़ करके उनके भीतर प्रतिरक्षक रसायनों का निर्माण और स्राव कराया जाता है। यह रासायनिक निर्माण और स्राव भी बीसीजी कराता है। अब जब विषाणु शरीर में दाखिल होते हैं , तब बीसीजी के आधार पर मिली ट्रेनिंग के कारण ये मोनोसाइट-मैक्रोफेज उन्हीं रसायनों का उत्पादन और स्राव शुरू कर देते हैं , जिनकी ट्रेनिंग पहले बीसीजी ने उन्हें दी थी। इस रसायनों के तरह-तरह के प्रयोगों से विषाणु मारे जाते हैं।"

"यानी इन तीन तरीक़ों से बीसीजी विषाणुओं के खिलाफ़ इम्यूनिटी देता है। वाह ! तब तो कोविड-19 में इससे मिलने वाली प्रतिरक्षा की बात में दम है ! है न !"

"जैसा कि मैंने कहा कि विज्ञान उल्लास से पहले प्रमाण जुटाता है। बीसीजी काम करता है , इसके कुछ प्रमाण हैं। अवश्य हैं। पर यह काम करता है , तो क्या इतना जानने-भर से काम चल जाएगा ? यह सच है कि इटली और अमेरिका जैसे देशों में , जहाँ इस टीके का प्रयोग व्यापक रूप में नहीं है , वहाँ अधिक मौतें हुई हैं और दक्षिणी कोरिया , जापान और भारत जैसे देशों में कम , जहाँ इस टीके का ख़ूब इस्तेमाल होता रहा है। लेकिन यह प्रमाण परिवेश-जन्य भी हो सकता है और अनेक दूसरे कारण भी मौत के आँकड़ों में अन्तर के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं। अभी कई शोध चल रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया , नीदरलैंड्स व अमेरिका में बीसीजी का टीका स्वास्थ्य-कर्मियों को लगाया जा रहा है ताकि यह देखा जा सके कि क्या यह उनकी कोविड-19 से रक्षा करता है अथवा नहीं। फिर बुज़ुर्गों में इस टीके को लगाकर गम्भीर कोविड-संक्रमण की रोकथाम पर भी शोध चल रहे हैं। जर्मनी भी बीसीजी से मिलते-जुलते टीके को बुज़ुर्गों अथवा स्वास्थ्य-कर्मियों को लगाकर शोध में लगा हुआ है।"

"चलो यार ! बस नतीजे पॉज़िटिव आएँ !"

"केवल नतीजों के पॉज़िटिव आने से प्रश्न समाप्त नहीं होते मदन भाई। लोग पूछेंगे कि टीका लगने से कितने दिन-महीने-साल की सुरक्षा मिलेगी इस कोरोनाविषाणु से ? दूसरे देशों की जनता यह भी पूछेगी कि टीका लगवाने की सही उम्र क्या है ? कितनी बार ? क्या बचपन में लगा बीसीजी और जवानी या बुढ़ापे में लगा बीसीजी एक-सा काम करेंगे ?"

"सवाल तो लाज़िमी हैं ये सारे।"

"इसीलिए विज्ञान त्वरित उत्सवधर्मिता में कंजूसी दिखाता है। पहले वह यह सिद्ध करने में लगा है कि सचमुच बीसीजी कोविड-19 में काम करता है अथवा नहीं। फिर यह सिद्ध करने में की किस तरह। फिर बीसीजी-टीका देने-सम्बन्धी पॉलिसी के गठन के बारे में। इतना सब जानने के बाद ही वह उल्लसित हो सकता है।"

"तब तक हम आम लोग तो लॉकडाउन में ख़ुश हो ही सकते हैं न भाई ! टीका हम-हिन्दुस्तानियों को जन्म के तुरन्त बाद लगाया जाता है और सम्भावना जगा रहा है। इस बुरे दौर में उम्मीद पर इतना खुश होना तो बनता है न !" कहते हुए वे भुजा के उस बीसीजी के निशान को चूम लेते हैं।

"अन्वेषकों ने जनता को उम्मीद रखने से कहाँ रोका है ! वे तो बस इतना कह रहे हैं कि आसमान ताकते हुए ज़मीन पर जमे रहना है , गिरना नहीं। बीसीजी की इस नयी कहानी के सुखद अन्त की हम-सबको प्रतीक्षा है।"

--- स्कन्द।

#skandshukla
चिकित्सक-मित्र नेचर-रिव्यूज़-यूरोलॉजी

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 21 Apr 2020 at 8:05 AM -

वर्ण व्यवस्था

आर्य जब भारत आये तो उनके साथ बाल काटने वाले, कपड़े धोने वाले, समान उठाने-ढोने वाले, जूते सिलने वाले, खाना बनाने वाले, पानी लाने वाले और थके हुओं की चम्पी करने वाले भी थे। लड़ने वाले और गप्प सुनाने वाले तो थे ही। उनके साथ ... कुछ व्यापारी भी रहे होंगे जो रास्तों में मिलने वाली काम की वस्तुएं खरीदते बेचते चले जा रहे हों। शायद गाय पालने वाले भी आये हों।

किन्तु यह स्पष्ट है कि गेहूँ, धान, गन्ना, गाजर, कद्दू उगाने वाले और नाव खेने वाले उनके साथ नहीं आ सकते थे।

इसीलिए अधिकांश हिन्दू ग्रंथों में वर्णव्यवस्था के अंतर्गत कृषकों और पशुपालकों आदि के बारे में कुछ लिखा नहीं मिला।

संभवतः जब वो भारत आ गए तब उन्होनें गीता में कृषकों और पशुपालकों को अपनी वर्णव्यवस्था में जोड़ते हुए उनको वैश्य कहा।

ओबीसी की अधिकांश जातियां वर्ण व्यस्वस्था का हिस्सा नहीं हैं बल्कि पूरी वर्णव्यवस्था उन्हीं का शोषण करती रही।
ब्राह्मण कथा, भागवत, श्राद्ध, हवन, ग्रहशांति के नाम पर। क्षत्रिय रक्षा, राज्यकर और गुण्डाटैक्स के रूप में। वैश्य उपयोगी वस्तु तिगुने चौगुने मूल्य पर बेचकर और उनकी वस्तु उत्पादन लागत से भी कम मूल्य पर खरीद कर। शूद्र यथा नाई, धोबी आदि जन्म, विवाह, मृत्यु आदि हर खुशी और गम के अवसर पर नेग के नाम पर।

हजार साल तक यही कृषक-आदि वर्ग हिन्दू वर्ण-व्यवस्था में अपना स्थान खोजता रहा। वह स्वयं गीता पढ़ नहीं सकता था और न ही उसका अर्थ निकाल सकता था। लड़ने में सक्षम हुआ तो खुद को क्षत्रिय बोलने लगा और अपनी जमीन नहीं बचा पाने की स्थिति में ब्राह्मणों-क्षत्रियों की जमीन पर खेती करने अथवा जानवरों की सेवा करने लगा तो शूद्र बोला जाने लगा।

अगर कोलगेट, डालडा, पतंजलि के उत्पादक व्यापारी अर्थात वैश्य हैं तो गेहूं, गाजर, तेल, दूध, मछली और घड़े आदि के उत्पादक शूद्र कैसे हो गए।

जिस मंदिर में लिखा हो "शूद्र प्रवेश न करें" उसमें क्या कभी किसी काछी, तेली, कुम्हार, अहीर, लोधी, जाट या कुर्मी को घुसने से रोका गया। क्या ब्राह्मणों ने इन जातियों के घर खाना नहीं खाया या कथा, पूजा आदि नहीं करवाया। जिन मंदिरों में वर्तमान राष्ट्रपति को भी घुसने नहीं दिया गया, क्या कभी इन मंदिरों में किसी काछी, कुर्मी, अहीर आदि को घुसने से रोका गया।

यदि गीता मैंने खुद न पढ़ी होती तो मैं साफ साफ यह घोषणा कर देता की ओबीसी की उक्त जातियां हिन्दू वर्ण-व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं। किंतु गीता के कारण मैंने इनको वैश्य मान लिया।

इन जातियों को हिन्दू वर्ण-व्यवस्था के बाहर मानने की पुष्टि sc/st एक्ट भी कर रहा है। हिन्दू वर्ण-व्यवस्था का शूद्र भी जब चाहे तब हमें जेल भिजवा सकता है।

ब्राह्मण क्षत्रिय उक्त जातियों को जब चाहे गरियावे, जब चाहे जाति सूचक शब्दों से अपमानित करे किन्तु शुद्र को गाली देने की सोचे भी नहीं।

इतना सबकुछ होने के बावजूद जब कोई कुशवाहा अथवा जाट खुद को शूद्र बोलता है तो उसकी मूढ़ता पर तरस आता है। उसको यह नहीं दिख रहा कि वह अपने आप को यदि वैश्य नहीं मान रहा तो वह आधुनिक हिन्दू वर्ण-व्यवस्था का पांचवाँ वर्ण है। उसको शूद्र भी जब चाहे तब जेल भिजवा सकता है।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 05 Apr 2020 at 8:29 AM -

हमारी आंतरिक सुरक्षा

एंटीबायोटिक, एंटीवायरल और वैक्सीन आखिर क्या फर्क है इनमें?

ये तो साफ़ है कि तीनों ही हमारे शरीर में घुसे घुसपैठियों के इलाज में काम आती हैं लेकिन घुसपैठियों के प्रकार और कार्यपद्धति के अनुसार इनमें कुछ भेद हैं। इनकी कार्यपद्धति और भेद को समझने के ... लिए पहले हम अपने इम्यून सिस्टम यानी प्रतिरक्षा तंत्र के बारे में कुछ बेसिक चीजें समझ लेते हैं।

हमारा इम्यून सिस्टम एक जबरजस्त रक्षा तंत्र है जो बहुत ही होशियारी से बाहरी खतरों से शरीर की रक्षा करता है। इस त्रिस्तरीय रक्षा तंत्र का पहला सुरक्षा घेरा है हमारी त्वचा और म्यूकस ग्रंथियां। त्वचा और म्यूकस न केवल घुसपैठियों के लिए एक दीवार का काम करते हैं बल्कि इनमें मौजूद हेल्दी बैक्टीरिया और रसायन कई तरह के हानिकारक बैक्टीरिया और फंगी से हमारी रक्षा करते हैं और इन्हें शरीर में घुसने से पहले ही नष्ट कर देते हैं। दूसरा सुरक्षा घेरा है नॉन स्पेसिफिक वाइट ब्लड सेल जो घुसपैठियों को घेरकर खा जाने के लिए कुख्यात हैं। तीसरा घेरा बाकी दो से तकनीकी रूप से उन्नत है और आर्मी के इंटेलीजेंस यूनिट जैसा है जो घुसपैठिये की पहचान करता है और खास रणनीति और हथियारों से उनसे निपटता है एकदम सर्जिकल स्ट्राइक की तरह। इस यूनिट के योद्धा हैं दो ख़ास किस्म में वाइट ब्लड सेल जिन्हें B-सेल और T-सेल के नाम से जानते हैं।

B-सेल की सतह पर मौजूद रिसेप्टर घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें मार्क करता जाता है ताकि सबको पता चल जाए दुश्मन कौन है। T-सेल का काम भी कुछ ऐसा ही है लेकिन फर्क बस इतना है कि ये घुसपैठियों के बजाये अपने ही शरीर के उन सेल्स को मार्क करता है जो संक्रमित हो चुके हैं ताकि उन्हें मिटाकर संक्रमण को फैलने से रोका जा सके। एक बात जो इन दोनों सेल्स को सबसे ख़ास बनाती है वो ये कि एक बार किसी घुसपैठिये से भिडंत होने के बाद ये उस घुसपैठिये की हिस्ट्रीशीट तैयार कर लेते हैं ताकि अगली बार उसके घुसते ही उसे पहचानकर उसका काम तमाम किया जा सके।

तो ये तो बात हुयी हमारे इम्यून सिस्टम की। अब वापस आते हैं अपने सवाल पर। सबसे पहले बात करते हैं एंटीबायोटिक की। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है एंटी बायो यानी जीव रोधी। एंटीबायोटिक का काम है बैक्टीरिया को नष्ट करना। एंटीबायोटिक में मौजूद ख़ास केमिकल बैक्टीरिया को दो तरह से ख़त्म कर देते हैं, पहला उसकी मेम्ब्रेन को कमजोर कर और दूसरा कुछ ख़ास प्रोटीन का उत्पादन रोककर। लेकिन इस काम में कुछ लाभदायक बैक्टीरिया भी नष्ट हो जाते हैं। हालाँकि एंटीबायोटिक इस तरह तैयार किये जाते हैं कि लाभदायक बैक्टीरिया को कम से कम नुकसान पहुंचे। एंटीबायोटिक से बैक्टीरिया जनित रोगों की तो रोकथाम की जा सकती है लेकिन वायरस पर ये बेअसर हैं।

वायरस चूँकि अपनी संख्या बढ़ाने के लिए हमारे ही सेल्स का इस्तेमाल करते हैं इसलिए उन्हें एंटीबायोटिक से नष्ट नहीं किया जा सकता। वायरस से निपटने के लिए कुछ ख़ास तरह की दवाएं विकसित की गयी हैं जिन्हें एंटीवायरल कहते हैं। एंटीवायरल वायरस के प्रजनन को धीमा कर इससे निपटती हैं। इनमें मौजूद केमिकल्स शरीर में उन कुछ ख़ास प्रोटीन्स के उत्पादन को कम कर देते हैं जो कि वायरस के निर्माण के लिए जरूरी हैं। लिहाजा इन प्रोटीन्स के आभाव में वायरस का रिप्रोडक्शन धीमा पड़ जाता है।

एंटीवायरल के निर्माण में चुनौती ये है कि इसके लिए वायरस में मौजूद उन प्रोटीन्स का पता होना जरूरी है जिनका उत्पादन कम होने से बाकी अंदरूनी शारीरिक गतिविधियों पर कोई फर्क न पड़े। वे वायरस जिनकी वैक्सीन अभी नहीं बनाई जा सकी है जैसे एड्स, हर्पीज, इन्फ्लूएंजा में एंटीवायरल ही एकमात्र इलाज है। ये एंटीवायरल दवाओं की ही मेहरबानी है कि कभी जानलेवा समझे जाने वाले एड्स के रोगी भी इन दवाओं के जरिये लम्बा जीवन जी पाते हैं। हालाँकि इन दवाओं से एड्स वायरस नष्ट तो नहीं होता लेकिन फिर भी इतना निष्प्रभावी हो जाता है कि रोगी सामान्य जीवन जी सकता है।

वैक्सीन के काम करने का ढंग इन दोनों प्रकार की दवाओं से एकदम जुदा है। वैक्सीन में सीधे तौर पर ऐसा कुछ नहीं होता जो घुसपैठियों को नष्ट कर सके। वैक्सीन एक तरीका है हमारे इम्यून सिस्टम को घुसपैठियों की पहचान कराने का। जैसा कि लेख के शुरू में मैंने बताया था कि B&T सेल घुसपैठियों से भिडंत होने पर उनकी हिस्ट्रीशीट तैयार कर लेते हैं ताकि अगली बार उसके शरीर में दाखिल होते ही पहचानकर उसका काम तमाम कर सकें। आपने शायद सुना भी होगा कि जिसको एक बार खसरा या चेचक हो जाए उसको जीवन में दोबारा कभी ये बीमारी नहीं होती। इसका कारण यही है कि हमारा इम्यून सिस्टम घुसपैठिये को अब पहचान चुका है। इम्यून सिस्टम के इसी गुण का उपयोग वैक्सीन बनाने के लिए किया जाता है।

वैक्सीन असल में निष्क्रिय वायरस बैक्टीरिया का मिश्रण है, जिनको शरीर में दाखिल किया जाता ताकि इम्यून सिस्टम इन घुसपैठियों की पहचान कर सके और भविष्य में यदि कोई सक्रीय घुसपैठिया दाखिल होता है तो उसको पहचानकर नष्ट कर सके। लेकिन वैक्सीन की भी कुछ सीमायें हैं। बहुत से वायरस ऐसे हैं जो तेजी से म्यूटेट करते हैं। ऐसे वायरसों के लिए वैक्सीन बनाना एक टेढ़ी खीर है। क्योंकि घुसपैठिया तेजी से अपनी पहचान बदलता जाता है। आप इम्यून सिस्टम को उसकी पहचान करा भी दें तो वह भेस बदलकर घुस आता है।

लेकिन बावजूद इसके वैक्सीन्स की खोज मानवजाति के लिए एक वरदान सिद्ध हुयी है। इनके कारण तमाम ऐसी बीमारियाँ जैसे खसरा, चेचक, पोलियो इत्यादि जो दुनिया भर में समय समय पर अपना कहर बरपाती थीं अब लुप्तप्राय हो चुकी हैं। वैक्सीन से होने वाला लाभ दोहरा है। ये न केवल जिसने इसे लगवाया है उसे सुरक्षा देती है बल्कि समुदाय में उस संक्रामक बीमारी के फैलने से रोकने में बैरियर का काम करती है। यही कारण है कि दुनिया भर की सरकारें टीकाकरण पर इतना जोर देती हैं।
Arpit Dwivedi

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 02 Apr 2020 at 8:22 PM -

कोरोना

22 दिन के लॉक डाउन का फायदा यह है कि जनता में जागरूकता काफी आ गयी है।
यद्यपि अभी भी कुछ प्रतिशत लोग घोर लापरवाही कर रहे हैं लेकिन चूंकि 80-90 प्रतिशत लोग सचेत हो गए हैं इसलिए लापरवाही करने वाले भी काफी हद तक बच ... जाएंगे और सावधानी बरतने वालों में से मरने वालों का अनुपात काफी हद तक कम रहेगा।

यह ध्यान रहे कि कोरोना का टीका बनने तक हमें यह जंग जारी रखनी होगी। दुनिया इतनी बड़ी है कि टीका विकसित किये बिना इसे खत्म करने में कई साल लग सकते हैं। फिल हाल हम इसे अगले तीन महीने में खत्म कर पाने की सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं।

भारत जैसे देशों के लिए तीन महीने ही बहुत होते हैं। सौभाग्य से हम आज भी कृषि उत्पादन में आत्मनिर्भर हैं। लेकिन खनिज तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स में नहीं। हमें अपने कारखानों को सुरक्षित तरीके से चालू रखने के बारे में सोचना चाहिए। जब तक कोरोना जिंदा है और टीका बनना बाकी है तब तक के लिए हम भीड़ भरे बाजारों की कल्पना छोड़ दें।
अगर बात सिर्फ तीन महीने की हो तो झेला जा सकता है किंतु यदि वास्तविक समय सीमा इससे ज्यादा लम्बी हो तो हमें नई अर्थव्यवस्था की ओर अभी से ध्यान देना चाहिए।

हमें खनिज तेल आधारित परिवहन का विकल्प खोजना होगा। जैसे- सायकिल, रिक्शा, रेहड़ी, e-रिक्शा और तांगा आदि।
हमें घने बाजारों का विकल्प खोजना होगा। जैसे- फेरी वाले और दूर दूर बिखरे छोटे दुकानदार आदि।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 17 May 2019 at 8:45 PM -

अंडा बनाम दूध

1 मुर्गी अंडा अपने आप देती है, जबकि दूध हम निकालते हैं। अर्थात अंडा अधिक अहिंसामूलक है।
2. अंडे में मिलावट संभव नहीं, जबकि दूध में मिलावट की सीमा ही नहीं है। अर्थात अंडा अधिक मिलावटमुक्त/शुद्ध है।
3. अंडे को सुरक्षित रखने के लिए न तो गर्म ... करना पड़ता है, न ही फ्रिज में रखना पड़ता है, न ही कोई जहरीला केमिकल मिलाना पड़ता है। अर्थात अंडे का संरक्षण अधिक आसान और यह अधिक स्वास्थ्यानुकूल है।
4. मुर्गी को बहुत कम जगह चाहिए जबकि गाय को बहुत ज्यादा जगह। अर्थात मुर्गी पालना अधिक आसान है।
5. अंडे तीन दिन में भी एक बार निकाले जाएं तो कोई दिक्कत नहीं अर्थात उत्पादन नहीं घटेगा लेकिन दूध तो दोनों पहर निकालना पड़ता है नहीं तो उत्पादन घट जाता है।
6. मुर्गी वध निरोधक कानून अभी नहीं आया अर्थात मुर्गी हर उम्र में एक संसाधन है।
जबकि गोवध निरोधक कानून होने के कारण गाय एक सामाजिक समस्या का रूप ले चुकी है।
7. अंडे की तुलना दूध से नहीं बल्कि रबड़ी से करने लायक है क्योंकि दूध में पानी का प्रतिशत बहुत ज्यादा होता है।

8. कुछ चीजें सिर्फ दूध से बन सकती हैं और कुछ चीजें सिर्फ अंडे से इसलिए दोनों का अलग अलग महत्व है।
9. अंडे में पौष्टिकता भी अधिक है और 40 साल की उम्र के बाद के व्यक्ति के लिए दूध से कई गुना ज्यादा महत्वपूर्ण है, तथा कुछ मामलों में अपरिहार्य है।
10. मुर्गी पालन के लिए श्रम भी कम चाहिए।
11. मुर्गी के कारण देश में कोई दंगे फसाद भी नहीं होते ।

उपरोक्त बातें निजी अनुभव और कुछ उच्चकोटि के चिकित्सकों के परामर्श के आधार पर लिखी गयी हैं।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 28 Oct 2018 at 8:10 PM -

सुबह-सुबह चना चबाने/खाने के फायदे

चने मे मैंगनीज की प्रचुर मात्रा होती है। इसके अलावा इसमें पोषक तत्व जैसे थियामिन, मैग्नीशियन और फॉस्फोरस भी पाएं जाते हैं। मैंगनीज के सेवन से आपके शरीर को उर्जा के उत्पादन में मदद मिलती है साथ ही इससे इम्यूनिटी को भी बढ़ाया जा सकता ... है।

आप ये तो जानते ही होंगे कि बहुत से लोग सुबह उठकर खाली पेट भिगोया हुआ देशी चना खाते हैं। खासतौर पर वो लोग जो जिम करते हैं या सुबह व्यायाम करते हैं। क्या आप जानते हैं कि लोग इस साधारण से दिखने वाले आहार के साथ अपने दिन की शुरुआत क्यों करते हैं क्योंकि इसमें समाएं है अनेक स्वास्थ्यवर्धक गुण। वसा की मात्रा कम, फाइबर की उच्च मात्रा, विटामिन और खनिजों से भरपूर होने के कारण, काला चना वास्तव में आपके आहार में शामिल करने के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है। चने का सेवन करने से आपको बादाम या अन्य ड्राई फ्रूट से अधिक लाभ होते हैं। रोज सुबह भीगे हुए चने खाने से होने वाले स्वास्थ्य लाभ इस प्रकार है। [ये भी पढ़ें: सर्दी-जुकाम से छुटकारा पाना है तो करें इन सुपरफूड्स का सेवन]

उर्जा और इम्यूनिटी को बढ़ाता है: काले चने मे मैंगनीज की प्रचुर मात्रा होती है। इसके अलावा इसमें पोषक तत्व जैसे थियामिन, मैग्नीशियन और फॉस्फोरस भी पाएं जाते हैं। मैंगनीज के सेवन से आपके शरीर को उर्जा के उत्पादन में मदद मिलती है साथ ही इससे इम्यूनिटी को भी बढ़ाया जा सकता है। इसका सेवन आपको व्यायाम करते वक्त अधिक पसीना निकालने में मदद करता है।

मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है: चने में आयरन की प्रचुर मात्रा होती है जो कि आपको एनीमिया जैसी समस्या से बचाता है साथ ही इसेक सेवन से आपका मेटाबॉलिज्म भी बढ़ता है। मेटाबॉलिज्म उर्जा के स्तर को बनाएं रखने के महत्वपूर्ण होता है।

user image Aneeeh Swaroop

Very useful information

Sunday, October 28, 2018
user image Arvind Swaroop Kushwaha - 26 Oct 2018 at 2:15 PM -

पानी की कमी के लक्षण

0 अजीब संकेत जो बताते हैं कि आपको अभी पानी पीने की जरुरत है

शरीर में पानी की सही मात्रा होना जरुरी होता है नहीं तो इससे कई समस्याएं होने की संभावना बढ़ जाती है। अगर आपको कुछ अजीब संकेत नजर आ रहे हैं तो यह संकेत ... होते हैं कि आपको तुरंत पानी पीना चाहिए।

कहा जाता है कि मनुष्य के शरीर में लगभग 60 प्रतिशत तक पानी होता है और व्यक्ति को जीवित रहने के लिए सही मात्रा में पानी पीना जरुरी होता है। हमारे शरीर से पसीने, यूरिन, सांसों के माध्यम से पानी बाहर निकल जाता है इसलिए पानी पीते रहना चाहिए नहीं तो शरीर में पानी की कमी हो जाती है और आपको डिहाईड्रेशन की समस्या का सामना करना पड़ता है। डिहाईड्रेशन से बचने के लिए जब भी आपको प्यास लगे तो उसी दौरान एक गिलास पानी पी लेना चाहिए। शरीर में पानी की कमी होने पर कुछ अजीब संकेत दिखने लगते हैं तो इस दौरान आपको पानी पी लेना चाहिए। तो आइए आपको इन संकेतों के बारे में बताते हैं जो आपको तुरंत पानी पीने की तरफ इशारा करते हैं। [ये भी पढ़ें: भूख बढ़ाने के आसान तरीके]

पेशाब नहीं आना: अगर आप ध्यान देते हैं कि आप दिन में एक बार भी पेशाब करने नहीं गए हैं तो आपको एक बोतल पानी पीने की जरुरत होती है। पेशाब कम आना डिहाईड्रेशन के संकेत होते हैं और अगर पेशाब का रंग गहरा पीला आने लगे तो यह संकेत होता है कि आपको पानी कम पीना चाहिए।

आंसू नहीं आना: जब आप रोते हैं और आंसू ना आएं तो यह शरीर का संकेत होता है कि आपको एक गिलास पानी पी लेना चाहिए। अगर आपकी आंखों में आंसू का उत्पादन नहीं हो रहा हो तो यह आप प्यासे हो सकते हैं। [ये भी पढ़ें: कारण जिनसे आपकी आंखों में बार-बार पानी आता रहता है]

त्वचा का शुष्क होना: कई लोग अपनी त्वचा को कोमल बनाने के लिए मॉइश्चराइजर का इस्तेमाल करते हैं। जिनका परिणाम आपकी त्वचा पर झुर्रियां हो सकता है। त्वचा को शुष्क होने से बचाने के लिए पैसे खर्च करने की बजाय पानी पीने की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए। सही मात्रा में पानी पीना त्वचा को शुष्क होने से बचाने में मदद करती है।

भूख लगना: कभी-कभी आपको लगता है कि आपको किसी चीज का सेवन करना चाहिए पर समझ नहीं आता है कि यह खाने की इच्छा है या पीने की। अगर आप भूखे हैं तो आपके शरीर को पानी की जरुरत होती है।

मुंह सूखना: अगर आपकी सांसों से बदबू आती है तो यह मुंह सूखने की वजह से होता है। अगर आपके मुंह में लार का उत्पादन नहीं हो रहा है तो यह सही मात्रा में पानी ना पीने के कारण हो सकता है। सांसों की बदबू को दूर करने के लिए मिंट का सेवन करने से बेहतर है कि आपको एक गिलास पानी पीना चाहिए