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user image Arvind Swaroop Kushwaha - 21 Jun 2020 at 6:53 PM -

आत्मनिर्भर भारत

चीन दुनिया की फैक्ट्री है,आप इसे स्वीकार कीजिये या मत कीजिये । क्या हमारे कारखाने उस क्वालिटी का और उतना माल बनाने के लिए तैयार हैं ? फैक्ट्री मालिकों से नजदीकी होने के नाते मेरा अनुभव यह है कि हम लोग इंजीनियरिंग और खासकर मैन्युफैक्चरिंग ... के मामले में दुनिया से बहुत पिछड़े हुए हैं।

अपनी फैक्ट्री में एक छोटी सी मशीन बनवाने, या किसी डाई को रिपेयर कराने के लिए हमे जो संघर्ष करना पड़ता है, वह सबको हैरान करता है कि हर साल करोड़ों ग्रैजुएट्स उगलने वाले इस देश के महान शिक्षा संस्थान क्यों कुछ ऐसे लोग नहीं दे पाते जो ठीक से एक डाई भी बना सकें। पिछले 20 सालों की आर्थिक तेजी में जो थोड़ा बहुत कमाल हमने दिखाया है, वह बस सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में है, मैन्युफैक्चरिंग के मामले में हम निकम्मे हैं।

क्या ऐसा इसलिए है कि भारत चिंतन करने वालों का देश रहा है। हाथ से काम करने को यहां नीची निगाह से देखा जाता है , इसलिए हमारी आबादी के सारे तेज दिमाग लोग किसी ऐसे पेशे में नहीं जाते जिसमे हाथ का काम हो। वे सिर्फ पढ़ते, सोचते हैं ! एक अमूर्त कंप्यूटर प्रोग्राम को डिकोड करना हमारे लिए अधिक आसान है बजाएं रंदा चलाकर एक लकड़ी को सीधा करने के ।

हमारे सारे शिक्षा संस्थान सिर्फ सोचना सिखाते हैं, करना नहीं। ऐसे में उस चीन से हम कैसे जीतेंगे जो आठवीं क्लास पास करने के बाद ही बच्चे को सीधे ही कोई हुनर सिखाते हैं,वोकेशनल कोर्स कराते हैं। साथियों ने चीन यात्रा से लौटने के बाद बताया कि चीन ने अपने हुनरमंदों की इज्जत की,उन्हें उद्यमी बनाया। दूसरी तरफ सरकार ने इनफॉरमल इकोनामी कह कर उनकी बेइज्जती की। सरकारी अफसरों ने उन्हें इतना डराया धमकाया कि वे बड़े होने से डरने लगे।
हमारे देश में परंपरा से जो हुनरमंद आते हैं उनकी कद्र बड़ी इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज़ ने भी नहीं की। सिर्फ इसलिए क्योंकि ये हुनरमंद एक अलग भाषा में बात करते हैं। उनकी शब्दावली उनकी दुनिया की है। इसलिए हमारे यहां ये दोनों दुनियाऐं अलग अलग समानांतर चलती रहीं और एक दूसरे को कोई फायदा नहीं पहुंचा पााईं। अगर पढ़े-लिखे इंजीनियर अपना अहंकार छोड़ कर इन दोनों दुनियाओं के बीच में पुल बनाने की कोशिश करते तो आज हम मैन्युफैक्चरिंग के मामले में इतने पिछड़े ना होते।
अब आइए जिसे हम डेमोग्राफिक डिविडेंड मानकर इतराते हैं, उसकी पड़ताल करें।

बेशक हमारे युवा संख्या में बहुत हैं, पर एक बार उनकी क्वालिटी पर भी नजर डालिये। स्कूल कालेजों से कच्ची पक्की परीक्षाएं पास किए यह लोग अब खेती करने में बेइज्जती महसूस करते हैं, पर उनके पास ऐसा कोई ज्ञान या हुनर नहीं है जो फैक्ट्रियों के काम का हो। बारहवीं पास बच्चा किराने की दुकान पर सामान का हिसाब भी ठीक से नहीं जोड़ सकता। हमारे स्कूलों के पाठ्यक्रमों में ऐसा कुछ नहीं है जो बाजार के काम का हो।

चीन से बराबरी करने का सपना देखने वालों को वहां काम करने वाली महिलाओं की संख्या भी देखना चाहिए। हमने देश की 50% आबादी को बेकार घर पर बिठा रखा है। पिछले कुछ सालों की कालेजों की मेरिट लिस्ट उठा कर देखिए। ज्यादातर गोल्ड मेडल लड़कियों ने हासिल किये हैं। वे लड़कियां दफ्तरों दुकानों में क्यों दिखाई नहीं देतीं ? जो समाज इन गोल्ड मेडलों को बैंगल बॉक्स की मखमली कब्रगाहों में दफन कर देता हो उसे डेमोग्राफिक डिविडेंड पर बात करने का क्या हक है ?

मगर सरकार की आर्थिक नीतियों के आधार जीडीपी की ग्रोथ का अंदाज़ा लगाने वाला समाज अपनी बुराइयों पर बात करना नहीं चाहता । तरक्की का सारा जिम्मा हमने फाइनेंस मिनिस्टरी पर ही डाल रखा है जो बेहद गलत है ।

चीन से बराबरी के सपने देखता समाज चीन की कार्य संस्कृति को क्यों नहीं देखता ? हमारे कारखानों में कामगारों के साल के औसत कार्य दिवस दुनिया के मुकाबले बहुत कम हैं। व्रत, उपवास, शादी ब्याह, त्यौहार , भोजन भंडारे का एक लगातार सिलसिला है जो हमारे लिए काम से ज़्यादा बड़ी प्राथमिकता है।

होली दिवाली, ईद, शादी ब्याह का मौसम, हमारे फैक्ट्री मैनेजर और कंस्ट्रक्शन साइट के सुपरवाइजरोंं के लिए डरावने ख्वाब की तरह आते हैंं, इन सब का मतलब होता हैै हफ्तों के लिए काम बन्द.... भले ही कितने ही जरूरी आर्डर पेंडिंग पड़े रहें।

कारपोरेट के हमारे मैनेजर इंनइफिशिएंट हैं । हमने मैनेजर बनने की एकमात्र योग्यता टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलना बना रखी है। ज्यादातर मैनेजर बस यही एक काम जानते हैं, वह भी ठीक से नहीं जानते । कनेक्टिंग फ्लाइट पकड़ने को अपने व्यस्त रहने का प्रमाण मानते हैं,फाइव स्टार होटलों में बेतुके प्रेजेंटेशन करते ये मैनेजर दुनिया मे हो रहे बदलावों के बारे में कुछ नहीं जानते।

ज्यादातर कारपोरेट मैनेजर बस एक दूसरे को रिपोर्ट देने का काम करते हैं, जिसमें कोई काम की बात नहीं होती। सरकारी तंत्र की जिन बुराइयों से घबरा कर हम प्राइवेट कारपोरेट की शरण में आए थे, अब वह भी उसी भ्रष्टाचार और अक्षमता के शिकार हो गए हैं। वे रिश्वत नहीं लेते, पर मोटी तनख्वाह लेकर बस एक दूसरे के ईगो को सहलाना, जिम्मेदारी से भागना, निर्णय न ले पाना भी एक किस्म का भ्रष्टाचार है। यह बात मैं किसी किताब में पढ़कर नहीं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर कहता हूं।

आप सोचेंगे यदि भारतीय समाज में इतनी बुराइयां हैं तो फिर 20 -30 सालों में हमने इतनी तरक्की कैसे की है ???

मेरे विचार में इसकी एक बड़ी वजह है ज़मीन का पैसा...
1991 में पी वी नरसिम्हा राव की सरकार ने आर्थिक सुधार लागू किए। उससे विदेशी निवेश आया, फिर अटल सरकार ने बड़े राजमार्ग बनाए, होमलोन सस्ते हुए। इन वजहों से जमीन के दामों में बहुत बड़ा उछाल आया। इसने बड़ी मात्रा में काला धन पैदा किया। यह धन किसी मेहनत या हुनर से कमाया हुआ धन नहीं था। यह जमीन के सट्टे की फसल थी।
इस काले धन ने जो डिमांड पैदा की उसके लिए हमारी सप्लाई साइड तैयार नहीं थी। क्योंकि उसके पहले के 20- 25 साल देश में मंदी की वजह से नई फैक्ट्रीयां, नए कारोबार उस तादाद में नहीं लग पाए थे। रातों रात नई फैक्ट्रियां लगना संभव नहीं थी, इसलिये सप्लाई साइड की इनएफिशिएंसी के बावजूद बाजार उछलता रहा।

बाप दादाओं के खेत बेचकर स्कॉर्पियो खरीदने वाला एक नया वर्ग पैदा हुआ। विदेश यात्राएं, होटलिंग, महंगा इंटीरियर डेकोरेशन, बड़ी कारें, नए मॉडल के मोबाइल। पान ठेलों पर दिन काटने वाले आवारा लड़के जब जमीनों की दलाली में धनकुबेर बने, तो इन नये पीरों को अपने जैसे मुरीद चाहिए थे। उन्होंने आलीशान बंगले बनाए, जिनके बाथरूम में पचास हज़ार का एक नल लगाने को आर्किटेक्ट और इंटीरियर डिजाइनर्स ने इसे कला का नाम दिया और बाल बढ़ा कर खुद को विंची और पिकासो के समकक्ष घोषित कर दिया।

आर्किटेक्टस के ऑफिस के बाहर ठेकेदार और कंपनियों के सेल्समैन लाइन लगाकर मंगल गीत गाते रहे, ताकि वे अपने देवत्व को भूलकर कहीं गरीबों के लिए अच्छे और सस्ते मकान बनाने की तकनीक ना खोजने में लग जाएं।

पिछले 20 सालों में हमारे डिजाइनर, इंजीनियर और उद्यमियों की ऊर्जा और समय इस आवारा पूंजी की अश्लील चाकरी में बीता।
अपने देश की परिस्थितियों और गरीबी के हिसाब से कोई नया सस्ता मकान या अन्य कोई तकनीक ढूंढ़ने में किसी का ध्यान नहीं था..जैसे एक पार्टी चल रही थी,किसी ने यह नहीं सोचा इस दौरान कुछ ऐसा किया जाए कि पार्टी खत्म ना हो।

कोरोना इस तरह से वरदान है कि ईजी मनी के नशे में ग़ाफ़िल हमारे देश की प्रतिभाओं को शायद यह नींद से जगा दे। मजबूरी में ही सही हम अपने कंफर्ट जोन से बाहर आएं।

शायद हम सोचें कि ऑपरेशनल एफिशिएंसी क्या है कि मुंह बनाकर अंग्रेजी बोलना सिर्फ भाषाई योग्यता है, तरक्की के लिए मेहनत भी करनी होती है।

शायद हम सीखें कि 'आउट ऑफ बॉक्स थिंकिंग' का मुहावरा किसी कॉरपोरेट कांफ्रेंस में तालियां हासिल कर भूल जाने के लिए नहीं है, अब वह जिंदा बचे रहने की तरकीब है। शायद हमें एहसास हो कि धर्म और जाति नहीं गरीबी और भुखमरी अधिक महत्वपूर्ण है। और इस वक्त हमें एक दूसरे का हाथ पकड़कर इस मुसीबत से पार पाना है।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब दुनिया ने जर्मनी का बहिष्कार कर दिया, तब वहां के इंजीनियरों ने लगभग हर मामले में अपने देश को आत्मनिर्भर बना लिया। हर आपदा हमें झकझोरती है, हमें कंफर्ट जोन से निकालती है। कोरोना में यदि कुछ अच्छा है तो बस यही है ।

उपेंद्र सिंह

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 25 May 2020 at 1:24 PM -

जातिभेद उन्मूलन

आरक्षण का विरोध करने वाले लोग अभी तक आपसी जातिभेद तक तो समाप्त नहीं कर पाए, और दावा करते हैं कि "देश मे जातिवाद सिर्फ आरक्षण की वजह से है।"

जातिवाद समाप्त कीजिये और साथ ही आरक्षण भी।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 22 May 2020 at 7:55 PM -

सृष्टि की अनिश्चितता

#यूनिवर्स_की_अनिश्चितता

दुनिया के ज्यादातर धार्मिक लोगों का मानना है कि ब्रह्मांड वेल डिजाइंड है, इंटेलिजेंट डिजाइन है, और कैसे सबकुछ व्यवस्थित रूप से चल रहा है जो यह साबित करता है कि कोई क्रियेटर है जिसे हम ईश्वर या अल्लाह कह सकते हैं.. लेकिन क्या ... आप जानते हैं कि यह सिर्फ लैक ऑफ नाॅलेज के आधार पर बना पर्सेप्शन है, क्योंकि हकीकतन ऐसा कुछ है ही नहीं।

यह बेहद खतरनाक, वायलेंट, अस्थिर और असुरक्षित जगह है जिसे हम यूनिवर्स के रूप में जानते हैं, लेकिन इसके साईज के हिसाब से जो इसकी चाल है वह हमारे लिये इतनी सुस्त है कि अगर कहीं दो चार लाख साल भी सुरक्षित निकल जायें तो हम साठ सत्तर साल की जिंदगी जीने वालों को लगने लगता है कि वाह कितनी सुरक्षित और बढ़िया जगह है.. लेकिन यूनिवर्स के स्केल पर दूरी और समय का जो पैमाना है, वहां यह सब जो हम अपने आसपास देखते महसूस करते हैं, वह नगण्य है।

पृथ्वी से दूर हर पल पूरी बेरहमी से ग्रहों, उपग्रहों का कत्ले-आम होता रहता है और यह सिलसिला अनवरत चल रहा है। किसी ग्रह की सीमा से बाहर निकलते ही आपको समझ में आता है कि कोई काॅस्मिक वेव आपके शरीर के एटम्स तोड़ कर एक सेकेंड में आपको हवा कर सकती है, कोई चावल के आकार का कंकर आपके लोहे के बने यान में गोली की तरह छेद कर सकता है। हर सेकेंड हजारों काॅस्मिक रेज यूनिवर्स में चकराती फिर रही होती हैं जो एक इंसान के तौर पर हमें एक पल में मार सकती हैं।

जो मैग्नेटोस्फियर हमें सोलर फ्लेअर से बचाता है, काॅस्मिक रेडिएशन से बचाता है, वह किसी ऐसे ही ज्यादा ताकतवर रेडिएशन के आगे दम तोड़ सकता है और यह सोलर फ्लेअर रोज हम पे चढ़ने दौड़ती हैं। इसके क्या इफेक्ट होंगे, यह हाॅलीवुड मूवी "द कोर" से समझ सकते हैं। 2004 में हमसे पचास हजार प्रकाशवर्ष दूर एक मैग्नेटार से पैदा हुई एक काॅस्मिक वेव ने हमारी ओजोन लेयर को बुरी तरह डैमेज किया था और इसके बारे में हमें पहले से कुछ नहीं पता था और न आगे पता होगा। अगर यह और नजदीक होता तो इसने पूरी लेयर डैमेज कर देनी थी। फिर हमारे लिये जिंदगी नामुमकिन थी यहां।

कहने का मतलब यह है कि यूनिवर्स में अरबों खरबों स्टार्स हैं, लगातार नये बन रहे हैं और खत्म हो रहे हैं, जब यह खत्म होते हैं तो इनमें तमाम एक सुपरनोवा विस्फोट करते हैं जिससे काॅस्मिक रेज की एक वेव पैदा होती है, या गामा रेज बर्स्ट, जो काफी दूरी तक अपने आसपास के सोलर सिस्टम्स को खत्म कर देती है.. साधारण भाषा में अपने जैसी संभावित दुनियायें समझिये। फिर यह मैग्नेटार, पल्सार, न्यूट्रान स्टार बन कर भी चैन से नहीं बैठते.. इनमें पैदा किसी तरह के फ्रिक्शन या हलचल वैसी ही शाॅक वेव पैदा करते हैं जैसी हमने 2004 में झेली थी। यह भी कई संभावित दुनियाओं को, उनके वातावरण को खत्म कर देते हैं।

यह सिलसिला यूनिवर्स में लगातार चल रहा है, कुछ प्लेनेट अभी बर्बाद हो कर लाखों या करोड़ों साल बाद फिर हैबिटेबल हो जाते हैं (डायनासोर युग के बाद पृथ्वी की तरह), तो कुछ हमेशा के लिये बर्बाद हो जाते हैं (मंगल या शुक्र की तरह).. हमारी अपनी गैलेक्सी में कई ऐसे न्यूट्रान, पल्सार, मैग्नेटार हैं और कुछ नजदीकी भविष्य में बन सकते हैं, बाकी इसके बाहर दूसरी लाखों गैलेक्सीज में तो यह ड्रामा निरंतर चल ही रहा है।

फिर हमारे लिये यही खतरे नहीं हैं.. गौर कीजिये कि यूनिवर्स में आवारा ग्रहों और रनअवे स्टार्स की भरमार है, मतलब जिनके पास कोई सोलर सिस्टम नहीं है.. ऐसा कोई स्टार हमारे सिस्टम के आसपास भी आया तो वह सभी ग्रहों-उपग्रहों के पथ अपनी ग्रेविटी से करप्ट कर देगा, साथ ही पूरे ओर्ट क्लाउड को अंदर की तरफ धकेल देगा और फिर यहाँ कुछ नहीं बचेगा। स्टार तो फिर नजर में आ जायेगा ऐसा करने से पहले लेकिन कोई बड़ा प्लेनेट अगर पास आया तो वह हम देख तक नहीं सकेंगे और वह पूरे सोलर सिस्टम को इस तरह डिस्टर्ब कर देगा कि फिर यहाँ कुछ नहीं बचेगा।

इनके सिवा हमारे आसपास अरबों छोटे बड़े काॅमेट्स/एस्टेराईड्स मौजूद हैं जिन्हें हम देख नहीं पाते, वे जब सूरज के नजदीक होते हैं तो उनके मटेरियल के वेपराइज होने पर बनने वाली टेल के जरिये उन्हें डिटेक्ट किया जाता है लेकिन यह प्रक्रिया उस वक्त होती है जब वे हमारे इतने नजदीक पहुंच चुके होते हैं कि हमारे पास बचाव का वक्त नहीं होता.. तो हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते और कोई एक बड़ा काॅमेट या एस्टेराईड पृथ्वी पर एक झटके से जीवन को खत्म कर सकता है जैसे डायनासोर काल में किया था।

ऐसे ढेरों इत्तेफाक हैं जिनके सहारे हम बच रहे हैं, आपको बचने के लिये लगातार ऐसे सुखद इत्तेफ़ाक़ों की जरूरत है जबकि बर्बाद होने के लिये बस एक बार किसी एक सुखद इत्तेफाक का न घटना.. जरूरी नहीं कि पृथ्वी हमेशा के लिये वीरान हो जायेगी लेकिन अगर इसकी किसी इत्तेफाक में मैग्नेटिक फील्ड तबाह होती है, या वातावरण नष्ट जाता है तब यह शुक्र या मंगल की तरह यह हमेशा के लिये बंजर हो जायेगी वर्ना डायनासोर युग की तरह खत्म होने के बाद भी करोड़ों साल तक हैबिटेबल बनी रही तो देर सवेर फिर जीवन पनप जायेगा..

यूं तो मंगल और शुक्र पर भी समंदर हुआ करते थे, मोटा वातावरण, मैग्नेटोस्फियर सब मौजूद थे और जीवन पनपने लायक स्थितियां मौजूद थीं लेकिन फिर एक झटके से सब खत्म हो गया.. यही इस वायलेंट यूनिवर्स की अनिश्चितता और असुरक्षा और सच्चाई है.. ऐसा ही एक इत्तेफाक कभी भी पृथ्वी को इसी परिणति पर ले जा सकता है। यह मत सोचिये कि ऐसा होने में लाखों या करोड़ों साल हैं.. सच यह है कि यह आज और अभी भी हो सकता है और हमें अहसास तक न हो सकेगा।

वेल.. आप यह सवाल उठा सकते हैं कि यह सब कैसे मान लें तो उसका जवाब यह है कि इसी दुनिया में बैठ कर पचासों टेलीस्कोप लगाये हजारों लोग यह सब पूरे यूनिवर्स में होते देख रहे हैं। अरबों खरबों गैलेक्सी, स्टार्स, प्लेनेट इसीलिये तो हैं कि हम लाईव माॅडल के सहारे उनका बनना, बिगड़ना और बिगाड़ना सब खुद से देख सकें जो उन ऑब्जेक्ट्स के लिये भले करोड़ों साल में होने वाली प्रक्रिया हो लेकिन एक कलेक्टिव सैम्पल के रूप में हमारे लिये तो सबकुछ अभी ही हो रहा है। यह किसी इंसान के पूरे जीवन को कुछ दिन में समझने जैसा है कि आप बच्चे से बूढ़े तक के हर एज/वर्ग के लोग एक जगह इकट्ठे कर लें और सभी संभावनाओं को जान समझ लें।

अगर आप इन बातों को ठीक से समझने में सक्षम हैं और फिर भी मानते हैं कि यूनिवर्स बहुत परफैक्ट और इंटेलिजेंट डिजाइन है, और किसी परमपिता ने आपके लिये एक बहुत सुरक्षित और निश्चितता से भरे जीवन की रचना की है तो आप बहुत क्यूट हैं जी.. हमारे दायें-बायें ही दो ऐसे ग्रह हैं जो कभी हमारे जैसे थे लेकिन आज नर्क हैं।

~ अशफ़ाक़ अहमदसनिश्चितस्त

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 17 May 2020 at 5:58 PM -

रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिये

यह एक ऐतिहासिक पुरुष का नाम है- ब...लोल ...दी

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 08 May 2020 at 9:16 AM -

समय के साथ ताल मेल

आज से 10 साल पहले कोई ऐसी जगह नहीं होती थी जहां PCO न हो। फिर जब सब की जेब में मोबाइल फोन आ गया, तो PCO बंद होने लगे.. फिर उन सब PCO वालों ने फोन का recharge बेचना शुरू कर दिया। अब तो ... रिचार्ज भी ऑन लाइन होने लगा है।

आजकल बाज़ार में हर दसवीं दूकान में मोबाइल फोन रिचार्ज हो जाता है।
sale, service, recharge , accessories, repair, maintenance की दूकान भी हर जगह दिखती है।

अब भुगतान Paytm से हो जाता है.. अब तो लोग रेल का टिकट भी अपने फोन से ही बुक कराने लगे हैं.. अब पैसे का लेनदेन भी बदल रहा है.. Currency Note की जगह पहले Plastic Money ने ली और अब सारा Digital हो गया है।

दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है.. आँख कान नाक खुले रखिये वरना आप पीछे छूट जायेंगे..।

1998 में Kodak में 1,70,000 कर्मचारी काम करते थे और वो दुनिया का 85% फ़ोटो पेपर बेचते थे..चंद सालों में ही Digital photography ने उनको बाज़ार से बाहर कर दिया.. Kodak दिवालिया हो गयी और उनके सब कर्मचारी सड़क पे आ गए।

क्या आपको अंदाजा है कि आने वाले 10 सालों में दुनिया पूरी तरह बदल सकती है और आज चलने वाले 50% बड़े उद्योग बदल सकते हैं।

चौथी औद्योगिक क्रान्ति में आपका स्वागत है...

Uber सिर्फ एक software है। उनकी अपनी खुद की एक भी Car नहीं इसके बावजूद वो दुनिया की सबसे बड़ी Taxi Company है।

Airbnb दुनिया की सबसे बड़ी Hotel Company है, जब कि उनके पास अपना खुद का एक भी होटल नहीं है।

US में अब युवा वकीलों के लिए कोई काम नहीं बचा है, क्यों कि IBM Watson नामक Software पल भर में ज़्यादा बेहतर Legal Advice दे देता है। अगले 10 साल में US के 50% वकील बेरोजगार हो जायेंगे।

Watson नामक Software मनुष्य की तुलना में Cancer का Diagnosis 4 गुना ज़्यादा Accuracy से करता है। 2030 तक Computer मनुष्य से ज़्यादा Intelligent हो जाएगा।

2018 तक Driverless Cars सड़कों पे उतरने लगेंगी। 2020 तक ये एक अकेला आविष्कार पूरी दुनिया को बदलने की शुरुआत कर देगा।

अगले 10 सालों में दुनिया भर की सड़कों से 50% cars गायब हो सकती हैं... जो बचेंगी वो या तो Electric Cars होंगी या फिर Hybrid...सडको पर वाहनों की भीड़ कम हो सकती है। Petrol की खपत 50% घट जायेगी, सारे अरब देश खनिज तेल के साथ साथ दूसरे तेल भी बेचने लगेंगे।

आप Uber जैसे एक Software से Car मंगाएंगे और कुछ ही क्षणों में एक Driverless कार आपके दरवाज़े पे खड़ी होगी...उसे यदि आप किसी के साथ शेयर कर लेंगे तो वो ride आपकी Bike से भी सस्ती पड़ेगी।

Cars के Driverless होने के कारण 90% Accidents होने बंद हो जायेंगे.. इस से Car Insurance नामक धन्धा भी मंदा हो जाएगा।

ड्राईवर का रोज़गार भी गायब हो जाएगा। जब शहरों और सड़कों से 50% Cars गायब हो जायेंगी, तो Traffic और Parking जैसी समस्याएं स्वतः समाप्त हो जायेंगी...क्योंकि एक कार आज की 10 Cars के बराबर होगी।

*समय के साथ खुद को बदलने की तैयारी कीजिये

जब बेरोजगारी बढ़ेगी तब भी व्यभिचारी स्त्रियों को कुछ कम दिक्कत होगी, लेकिन उनका भी टाइम ज्यादा नहीं चलेगा क्योंकि लेडी रोबोट बाजार में आ चुकी हैं और कानूनी झंझटों तथा aids आदि बीमारियों के दृष्टिगत जीवित महिला से रोबोट ज्यादा सूटेबल लगने लगेगी।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 30 Apr 2020 at 9:24 PM -

अधर्म

कल एक तमाशा देखने का मौका हमें इरफान ने दिया था, दूसरा मौका ऋषि कपूर ने आज दिया है.. एक ने मुसलमान हो कर कुर्बानी को पसंद करने से इनकार किया था और दूसरे ने हिंदू हो कर बीफ खाने की आजादी का समर्थन किया ... था..

हम कहते हैं, जानते हैं और समझते हैं कि वे कलाकार के तौर पर जाति धर्म के दायरे से परे होते हैं लेकिन कुछ धार्मिक लोग इन्हें हमेशा धर्म के नजरिये से ही देखते हैं और यही चीज ऐसे संवेदनशील मौके पर नफरती आचरण करने पर उकसाती है और फिर यह दावा भी यही लोग करते ज्यादा पाये जाते हैं कि धर्म हमें यह अच्छाई सिखाता है, धर्म हमें वह सदाचरण सिखाता है.. इन दो दिनों में जाने कितने ऐसे ही लोग सच्चे मुस्लिम और सच्चे हिंदू बन कर सामने आये।

धर्म आपको क्या सिखाता है, या यह कितना अच्छा है.. लोग इसे आपके आचरण से जज करते हैं न कि आपके दावों से। अगर किसी इंसान की मौत पर आप सिर्फ इसलिये खुश हैं कि आपको अतीत में उसकी कही कोई बात पसंद नहीं थी, धर्म के खिलाफ लगी थी.. तो यकीन कीजिये कि आपकी वह खुशी आपके धर्म के अच्छे पहलू को नहीं बल्कि उसके कुरूप चेहरे को उजागर कर रही है।

ऐसे लोग असल में नफरत से भरे होते हैं, इनका नजरिया हमेशा नकारात्मक होता है.. आप इनसे संवेदनशीलता की उम्मीद नहीं कर सकते, हो सकता है कि इनके सामने कोई मदद का ख्वाहा #इंसान मर रहा हो और यह उसमें #हिंदू या #मुसलमान ढूंढ कर आगे बढ़ जायें। ऐसा नहीं है कि इनमें इंसानियत नहीं होती, लेकिन बेहद सीमित और सिलेक्टिव होती है।

खैर.. इनसे हट कर देखें तो मुझे यह अहसास हो रहा है कि यह सबसे बुरा साल गुजरना है हमारी अब तक की जिंदगी का.. तकलीफ इस बात की है कि अभी इस मनहूस साल के बस चार महीने ही गुजरे हैं।

ऋषि कपूर उन दो अभिनेताओं में से थे, बचपन में जिनकी फिल्में मैं बड़े चाव से देखता था.. एक अमिताभ और दूसरे ऋषि। बाद में बड़े होने पर और भी लोग पसंद आये लेकिन यह दोनों लोग हमेशा मेरी पसंद बने रहे। मेरे लिये वे कलाकार रहे, कभी उनमें कोई हिंदू मुस्लिम दिखा ही नहीं। इंसान के तौर पर कमियां हो सकती हैं, वह हर किसी में होती हैं। कौन है जो कमियों से पाक है.. मुझे कल भी बहुत अफसोस था, मुझे आज भी बहुत अफसोस है। वह ऋषि कपूर चला गया, जिसे बचपन से देखते मैं बड़ा हुआ।

छोड़िये इन नफरत करने वालों को.. न इन्हें आज ठीक से कोई जानता है न कल याद रखेगा लेकिन इरफान हों या ऋषि वे हमेशा याद रहेंगे। हमेशा याद रखे जायेंगे। उस कला की बदौलत जो इंसानी इतिहास में अमर हो जाती है।

#RIP_RishiKapoor

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 19 Feb 2019 at 9:47 PM -

पीए- सर, पुलवामा में 43 जवान मारे गए।
मोदी- उनसे कहो 430 आतंकवादी मार दें।

पीए- सर नोटबन्दी के कारण घाटी में इतने आतंकवादी बचे ही नहीं।
मोदी- तो सीमा पार जाकर मारें।

पीए- सर, सर्जिकल स्ट्राइक के कारण वहां भी नहीं बचे।
मोदी- यह तो बढ़िया बात है।

पीए- लेकिन ... सर, पब्लिक 1 के बदले 10 सिर मांग रही है।
मोदी- कह दो 2030 तक ला देंगे।

पीए- सर, जनता चाहती है कि इस संकट की घड़ी में आप राजनीति न करो,
मोदी- जनता को कौन भड़का रहा है।
पीए- भक्त जनता से कहते हैं कि संकट की इस घड़ी में राजनीति मत करो।
मोदी- सही तो कह रहे हैं।
पीए- सर, जनता भी तो यही कह रही है।

मोदी- तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ।
पीए- देश की सुरक्षा की चिंता कीजिये
मोदी- पूरा देश कर तो रहा है।
पीए- सर आप भी कीजिये
मोदी- मैंने रैलियों में लफ्फाजी सीखी है और वही कर रहा हूँ।
मैंने बीवी को छोड़ा तो मोहल्ला पकड़ लिया। मोहल्ले को छोड़ा तो जिला पकड़ लिया। जिले को छोड़ा तो प्रदेश पकड़ लिया। प्रदेश को छोड़ा तो देश पकड़ लिया। अब अगर देश को भी छोड़ना पड़ेगा तो दुनिया पकड़ लूंगा। और जब दुनिया छोड़नी पड़ेगी तो छोड़ दूंगा। अब उम्र ही कितनी बची है।

पीए- सर अम्बानी जी काल पर हैं।
मोदी- हेलो सर क्या आदेश है।
अम्बानी- मोदी जी आप चुनावी रैलियों पर ध्यान दीजिए। फेसबुक को तो मैं जब भी चाहूंगा बन्द कर दूंगा।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 26 Oct 2018 at 2:34 PM -

बेहतर जीवन के लिए टिप्स :

1. प्रतिदिन 10 से 30 मिनट टहलने की आदत बनायें. टहलते समय चेहरे पर मुस्कराहट रखें.

2. प्रतिदिन कम से कम 30 मिनट चुप रहकर बैठें.

3. पिछले साल की तुलना में इस साल ज्यादा पुस्तकें पढ़ें.

4. 70 साल की उम्र से अधिक आयु के बुजुर्गों और ... 6 साल से कम आयु के बच्चों के साथ भी कुछ समय व्यतीत करें.

5. प्रतिदिन 3 से 5 लीटर पानी पियें.

6. प्रतिदिन कुछ (कम से कम तीन) लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करें.

7. गपशप पर अपनी कीमती ऊर्जा बर्बाद न करें. दिन भर में 30 मिनट से अधिक गपशप ठीक नहीं।

8. अतीत के मुद्दों को भूल जायें, अतीत की गलतियों को अपने जीवनसाथी को याद न दिलायें.

9. एहसास कीजिये कि जीवन एक स्कूल है और आप यहां सीखने के लिये आये हैं. जो समस्याएं आप यहाँ देखते हैं, वे पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं.

10. सुबह अपनी पसंद का नाश्ता लें जो दिन की खुराक का आधा हो, दोपहर का भोजन पौष्टिक और पर्याप्त लें, रात का खाना सुपाच्य एवं खुराक का तीन चौथाई ही खायें.

11. दूसरों से नफरत करने में अपना समय व ऊर्जा बर्बाद न करें. नफरत के लिए ये जीवन बहुत छोटा है.

12. आपको हर बहस में जीतने की जरूरत नहीं है, कभी कभी असहमति पर भी अपनी मौन सहमति दें.

13. अपने जीवन की तुलना दूसरों से न करें.

14. गलती के लिये गलती करने वाले को माफ करना सीखें.

15. ये सोचना आपका काम नहीं कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं.

16. याद रखें। समय सब घाव भर देता है.

17. ईर्ष्या करना समय की बर्बादी है. "जरूरत का सब कुछ आपके पास है" इस प्रकार की सोच विकसित करें।

18. प्रतिदिन दूसरों का कुछ भला करें.

19. जब आप सुबह जगें तो अपने माता-पिता को धन्यवाद दें, क्योंकि माता-पिता की कुशल परवरिश के कारण आप इस दुनियां में हैं.

20. जो गुजर गया उससे सबक लो और भविष्य के बारे में विचार करते हुए वर्तमान पे ध्यान केंद्रित करें ।