Home

Welcome!

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 28 May 2020 at 6:48 PM -

अजब गजब

कोलकाता में रहने वाले एक परिवार के तीन सदस्यों को कोरोना पॉजिटिव आया। चुकी इनलोगों के पास हेल्थ इन्सुरेंस था तो ये लोग सरकारी आइसोलेशन सेन्टर न जाकर किसी कॉरपोरेट हॉस्पिटल में एडमिट हो गए। ये लोग कुल ग्यारह दिन एडमिट रहे और बिल बना ... चौदह लाख का। बंदे ने पूछा कि भाई... ऐसे कैसे इतना बिल हो गया... कोई दवा तो चला ही नही। तो बताया गया कि हर दिन एक आदमी पर एक पीपीई किट मतलब तीन पीपीई किट प्रतिदिन। ग्यारह दिन में तेंतीस पीपीई किट और एक किट सतहत्तर सौ रुपये का। इसके अलावा रोजाना मास्क, सेनेटाइजर, ग्लब्स, खाना, इम्युनिटी बूस्टर ड्रिंक, एयरकंडीशनर कमरा, डॉक्टर विजिट, थर्मल स्क्रीनिंग और कई बार कोरोना टेस्टिंग। ये सब मिलाकर तीन आदमी का चौदह लाख का बिल हुआ। जिसमें हेल्थ इन्सुरेंस कंपनी ने सिर्फ सात लाख चुकाया और बाकी इसे खुद से चुकाना पड़ा। इन्सुरेंस कम्पनी ने पीपीई किट,मास्क सहित कुछ अन्य खर्चों का पैसा चुकाने से मना कर दिया।

अब वो बंदा कह रहा है कि कोरोना से एकदम बच के रहिए। बहुत खतरनाक बीमारी है। ये भी सबक है कि हेल्थ इन्शुरन्स की शर्तों को जरूर पढ़ें।

~ आनन्द प्रकाश

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 24 Oct 2018 at 12:00 AM -

PAC = लोक लेखा समिति

लोकलेखा समिति की भूमिका
=====================
15 वर्ष बाद लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन के प्रयासों से केन्द्र व राज्यों के विधानमंडलों की लोकलेखा समितियों के अध्यक्षों का सम्मेलन हुआ। इसकी महत्ता भारत के संसदीय लोकतन्त्र में किसी भी रूप में कम करके नहीं आंकी जा सकती क्योंकि ... इनके विचार-विमर्श से निकले अमृत से ही भारत का लोकतन्त्र सर्वदा युवा रहता है और इस देश के आगे बढऩे की ऊर्जा से सम्पन्न रहता है।
लोकलेखा समिति सरकारी खर्च का बारीकी से विश्लेषण करती है और उसे सार्वजनिक लेखे-जोखे के दायरे में खड़ा करती है। महालेखा नियन्त्रक सरकारी खर्चों के न्यायसंगत व तर्कसंगत रूप से खर्च करने के विभिन्न पहलुओं की जांच-पड़ताल करके अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपते हैं और फिर संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के समावेश से बनी लोकलेखा समिति इस पर ब्यौरेवार विचार करके उन कमियों की तरफ सरकार की जवाबदेही तय करती है जिनकी तरफ लेखा महानियन्त्रक ध्यान दिलाते हैं।
लेखा महानियन्त्रक एक संवैधानिक संस्था है जो मुख्य रूप से कार्यपालिका के धन खर्च करने की प्रणाली की समीक्षा करती है। वास्तव में यह सरकार द्वारा स्वयं अपने ऊपर ही अंकुश लगाये रखने का ऐसा तन्त्र है जिससे भारत की समूची प्रशासन व्यवस्था सीधे आम लोगों के प्रति संसद के माध्यम से जवाबदेह बनी रहे। इसे और ज्यादा पारदर्शी बनाने का कार्य लोकलेखा समिति करती है।
लोकलेखा समिति का कार्यबहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि उसके पास भारत की राजनीतिक संसदीय व्यवस्था सेउत्पन्न प्रशासन प्रणाली के मुख्य अंग कार्यपालिका के बड़े से बड़े अधिकारी को तलब करने के साथ ही विशेष परिस्थितियों में राजनीतिक नेतृत्व की जांच-पड़ताल करने का भी अधिकार होता है मगर प्रधानमन्त्री को बुलाने का उसके पास अधिकार नहीं है क्योंकि प्रधानमन्त्री अपने मन्त्रिमंडल के माध्यम से सामूहिक जिम्मेदारी के तहत सीधे संसद के प्रति जिम्मेदार होते हैं और लोकलेखा समिति सरकार के विभागीय दायरों के कामकाज की समीक्षा करती है
परन्तु समिति की प्रमुख जिम्मेदारी नौकरशाही की सीधे जवाबतलबी की होती है क्योंकि सरकारी योजनाओं के लिए आवंटित धन का खर्च सरकार से सीधे नौकरशाही के माध्यम से ही होता है। उस विभाग के राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका यदि समिति को संदिग्ध नजर आती है तो समितिके पास अधिकार है कि वह सम्बद्ध मन्त्री की जवाब तलबी कर ले। ऐसा हमने 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले के मामले में देखा जब पिछली मनमोहन सरकार के कार्यकाल के दौरान लोकलेखा समिति के अध्यक्ष रहते हुए भाजपा के नेता डा. मुरली मनोहर जोशी ने तत्कालीन वित्तमन्त्री पी. चिदम्बरम को तलब करने का प्रयास किया था मगर कांग्रेस के सदस्यों ने उन्हें यह काम नहीं करने दिया लेकिन समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में 2-जी घोटाले के लिए अंतत: श्री चिदम्बरम को ही दोषी पाया।
दूसरे समिति की अंतिम रिपोर्ट सर्वसम्मति से तैयार होनी चाहिए। इसका अनुपालन पिछले 15 वर्षों से नहीं हो पा रहा है। अत: सम्मेलन में इस मुद्दे पर भी विचार होना चाहिए। इसके साथ दूसरा सबसे महत्वपूर्ण मामला यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था पूर्णत: बाजार मूलक होने की दिशा में बढ़ रही है जबकि लेखा महानियन्त्रक और लोकलेखा समिति का कार्य सरकारी खर्चों की समीक्षा करना ही है। बदले हुए आर्थिक माहौल में लेखा महानियन्त्रक कार्यालय को भी अपनी कार्यप्रणालीमें परिवर्तन लाना आवश्यक होगा क्योंकि सरकार विकास को समावेशी बनाने हेतु जिस तरह समाज के गरीब वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर धन खर्च कर रही है वह उसके बजट का प्रमुख हिस्सा बनता जा रहा है।
ऐसी परियोजनाओं के लेखे-जोखे का वक्त अब करीब आ गया है। इस कार्य में केवल केन्द्रीय लोकलेखा समिति का ही दायित्व नहीं बनता है बल्कि राज्यों की समितियों का भी दायित्व बनता है क्योंकि केन्द्र की किसी भी सामाजिक सुरक्षा की योजना को लागू तो राज्य सरकारें ही करती हैं। हमें यह ध्यान रखना होगा कि अभी तक जो व्यवस्था थी वह पंचवर्षीय योजना और योजना आयोग को केन्द्र में रखकर थी। अब यह व्यवस्था समाप्त हो रही है तो हमें अपनी संस्थाओं की भूमिका में भी परिवर्तन करना होगा। मेरे विचार से सबसे बड़ी चुनौती यही है।