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user image Arvind Swaroop Kushwaha - 16 May 2020 at 6:20 AM -

अपनी अपनी बीमारी (व्यंग्य): हरिशंकर परसाई

 

HApni Apni Bimari: Harishankar Parsai

अपनी अपनी बीमारी (व्यंग्य): हरिशंकर परसाई

हम उनके पास चंदा माँगने गए थे। चंदे के पुराने अभ्यासी का चेहरा बोलता है। वे हमें भाँप गए। हम भी उन्हें भाँप गए। चंदा माँगनेवाले और देनेवाले एक-दूसरे के शरीर की गंध बखूबी पहचानते हैं। ... लेनेवाला गंध से जान लेता है कि यह देगा या नहीं। देनेवाला भी माँगनेवाले के शरीर की गंध से समझ लेता है कि यह बिना लिए टल जाएगा या नहीं। हमें बैठते ही समझ में आ गया कि ये नहीं देंगे। वे भी शायद समझ गए कि ये टल जाएँगे। फिर भी हम दोनों पक्षों को अपना कर्तव्य तो निभाना ही था। हमने प्रार्थना की तो वे बोले - आपको चंदे की पड़ी है, हम तो टैक्सों के मारे मर रहे हैं। सोचा, यह टैक्स की बीमारी कैसी होती है। बीमारियाँ बहुत देखी हैं - निमोनिया, कालरा, कैंसर; जिनसे लोग मरते हैं। मगर यह टैक्स की कैसी बीमारी है जिससे वे मर रहे थे! वे पूरी तरह से स्वस्थ और प्रसन्न थे। तो क्या इस बीमारी में मजा आता है ? यह अच्छी लगती है जिससे बीमार तगड़ा हो जाता है। इस बीमारी से मरने में कैसा लगता होगा ?

अजीब रोग है यह। चिकित्सा-विज्ञान में इसका कोई इलाज नहीं है। बड़े से बड़े डॉक्टर को दिखाइए और कहिए - यह आदमी टैक्स से मर रहा है। इसके प्राण बचा लीजिए। वह कहेगा - इसका हमारे पास कोई इलाज नहीं है। लेकिन इसके भी इलाज करनेवाले होते हैं, मगर वे एलोपैथी या होमियोपैथी पढ़े नहीं होते। इसकी चिकित्सा पद्धति अलग है। इस देश में कुछ लोग टैक्स की बीमारी से मरते हैं और काफी लोग भुखमरी से।

टैक्स की बीमारी की विशेषता यह है कि जिसे लग जाए वह कहता है - हाय, हम टैक्स से मर रहे हैं। और जिसे न लगे वह कहता है - हाय, हमें टैक्स की बीमारी ही नहीं लगती। कितने लोग हैं कि जिनकी महत्त्वाकांक्षा होती है कि टैक्स की बीमारी से मरें, पर मर जाते हैं निमोनिया से। हमें उन पर दया आई। सोचा, कहें कि प्रापर्टी समेत यह बीमारी हमें दे दीजिए। पर वे नहीं देते। यह कमबख्त बीमारी ही ऐसी है कि जिसे लग जाए, उसे प्यारी हो जाती है।

मुझे उनसे ईर्ष्या हुई। मैं उन जैसा ही बीमार होना चाहता हूँ। उनकी तरह ही मरना चाहता हूँ। कितना अच्छा होता अगर शोक-समाचार यों छपता - बड़ी प्रसन्नता की बात है कि हिंदी के व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई टैक्स की बीमारी से मर गए। वे हिंदी के प्रथम लेखक हैं जो इस बीमारी से मरे। इस घटना से समस्त हिंदी संसार गौरवान्वित है। आशा है आगे भी लेखक इसी बीमारी से मरेंगे ! मगर अपने भाग्य में यह कहाँ ? अपने भाग्य में तो टुच्ची बीमारियों से मरना लिखा है।

उनका दुख देखकर मैं सोचता हूँ, दुख भी कैसे-कैसे होते हैं। अपना-अपना दुख अलग होता है। उनका दुख था कि टैक्स मारे डाल रहे हैं। अपना दुख है कि प्रापर्टी नहीं है जिससे अपने को भी टैक्स से मरने का सौभाग्य प्राप्त हो। हम कुल 50 रु. चंदा न मिलने के दुख में मरे जा रहे थे।

मेरे पास एक आदमी आता था, जो दूसरों की बेईमानी की बीमारी से मरा जाता था। अपनी बेईमानी प्राणघातक नहीं होती, बल्कि संयम से साधी जाए तो स्वास्थ्यवर्द्धक होती है। कई पतिव्रताएँ दूसरी औरतों के कुलटापन की बीमारी से परेशान रहती हैं। वह आदर्श प्रेमी आदमी था। गांधीजी के नाम से चलनेवाले किसी प्रतिष्ठान में काम करता था। मेरे पास घंटो बैठता और बताता कि वहाँ कैसी बेईमानी चल रही है। कहता, युवावस्था में मैंने अपने को समर्पित कर दिया था। किस आशा से इस संस्था में गया और क्या देख रहा हूँ। मैंने कहा - भैया, युवावस्था में जिनने समर्पित कर दिया वे सब रो रहे हैं। फिर तुम आदर्श लेकर गए ही क्यों ? गांधीजी दुकान खोलने का आदेश तो मरते-मरते दे नहीं गए थे। मैं समझ गया, उसके कष्ट को। गांधीजी का नाम प्रतिष्ठान में जुड़ा होने के कारण वह बेईमानी नहीं कर पाता था और दूसरों की बेईमानी से बीमार था। अगर प्रतिष्ठान का नाम कुछ और हो जाता तो वह भी औरों जैसा करता और स्वस्थ रहता। मगर गांधीजी ने उसकी जिंदगी बरबाद की थी। गांधीजी विनोबा जैसों की जिंदगी बरबाद कर गए। बड़े-बड़े दुख हैं ! मैं बैठा हूँ। मेरे साथ 2-3 बंधु बैठे हैं। मैं दुखी हूँ। मेरा दुख यह है कि मुझे बिजली का 40 रु. का बिल जमा करना है और मेरे पास इतने रुपए नहीं हैं।

तभी एक बंधु अपना दुख बताने लगता है। उसने 8 कमरों का मकान बनाने की योजना बनाई थी। 6 कमरे बन चुके हैं। 2 के लिए पैसे की तंगी आ गई है। वह बहुत-बहुत दुखी है। वह अपने दुख का वर्णन करता है। मैं प्रभावित नहीं होता। मगर उसका दुख कितना विकट है कि मकान को 6 कमरों का नहीं रख सकता। मुझे उसके दुख से दुखी होना चाहिए, पर नहीं हो पाता। मेरे मन में बिजली के बिल के 40 रु. का खटका लगा है।

दूसरे बंधु पुस्तक-विक्रेता हैं। पिछले साल 50 हजार की किताबें पुस्तकालयों को बेची थीं। इस साल 40 हजार की बिकीं। कहते हैं - बड़ी मुश्किल है। सिर्फ 40 हजार की किताबें इस साल बिकीं। ऐसे में कैसे चलेगा ? वे चाहते हैं, मैं दुखी हो जाऊँ, पर मैं नहीं होता। इनके पास मैंने अपनी 100 किताबें रख दी थीं। वे बिक गईं। मगर जब मैं पैसे माँगता हूँ, तो वे ऐसे हँसने लगते हैं जैसे मैं हास्यरस पैदा कर रहा हूँ। बड़ी मुसीबत है व्यंग्यकार की। वह अपने पैसे माँगे, तो उसे भी व्यंग्य-विनोद में शामिल कर लिया जाता है। मैं उनके दुख से दुखी नहीं होता।

मेरे मन में बिजली कटने का खटका लगा हुआ है। तीसरे बंधु की रोटरी मशीन आ गई। अब मोनो मशीन आने में कठिनाई आ गई है। वे दुखी हैं। मैं फिर दुखी नहीं होता। अंतत: मुझे लगता है कि अपने बिजली के बिल को भूलकर मुझे इन सबके दुख में दुखी हो जाना चाहिए। मैं दुखी हो जाता हूँ। कहता हूँ - क्या ट्रेजडी है मनुष्य-जीवन की कि मकान कुल 6 कमरों का रह जाता है। और कैसी निर्दय यह दुनिया है कि सिर्फ 40 हजार की किताबें खरीदती है। कैसा बुरा वक्त आ गया है कि मोनो मशीन ही नहीं आ रही है।

वे तीनों प्रसन्न हैं कि मैं उनके दुःखों से आखिर दुखी हो ही गया।
तरह-तरह के संघर्ष में तरह-तरह के दुख हैं। एक जीवित रहने का संघर्ष है और एक संपन्नता का संघर्ष है। एक न्यूनतम जीवन-स्तर न कर पाने का दुख है, एक पर्याप्त संपन्नता न होने का दुख है। ऐसे में कोई अपने टुच्चे दुखों को लेकर कैसे बैठे ?
मेरे मन में फिर वही लालसा उठती है कि वे सज्जन प्रापर्टी समेत अपनी टैक्सों की बीमारी मुझे दे दें और मैं उससे मर जाऊँ। मगर वे मुझे यह चांस नहीं देंगे। न वे प्रापर्टी छोड़ेंगे, न बीमारी, और मुझे अंततः किसी ओछी बीमारी से ही मरना होगा।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 18 Nov 2018 at 7:23 PM -

आज प्रातःकाल गेरुआ वस्त्र धारी एक युवा पुजारी रसीद कट्टा लिए भंडारे के लिए चंदा मांगने आया।

मैंने कहा आप उनसे मांगिये जिनको श्रद्धा हो।

पुजारी- आपको श्रद्धा नहीं है क्या?
मैं- मुझमें ईश्वर के प्रति पूरी श्रद्धा है। लेकिन वह कभी मांगता ही नहीं।

user image Rajnish Kumar - 08 Nov 2018 at 10:36 PM -

Raajneeti ka kadwa sach

अपनी प्रशंसा और दूसरे की बुराई करने में दिन-रात एक कर रहा है। नेता लोग दूसरे की सबसे अधिक आलोचना जिस मुद्दे पर करते हैं, वह है भ्रष्टाचार। लेकिन चुनाव जीतते ही अधिकांश लोग उसी काम में लग जाते हैं, जिसकी आलोचना कर वे ... चुनाव जीतते हैं। कई साल पुरानी बात है। दिल्ली में मेरा एक मित्र कई साल से पार्षद है। उसके क्षेत्र में नगरीय के साथ ही कुछ ग्रामीण क्षेत्र भी है। उससे एक बार इस बारे में चर्चा हुई, तो उसने मुझे दिन भर अपने साथ रहने को कहा, जिससे मैं उसकी कठिनाई समझ सकूं। मैंने उसकी बात मान ली। सुविधा के लिए हम उसका नाम रमेश रख लेते हैं।

दो दिन बाद बसंत पंचमी का अवकाश था। मैं सुबह उसके घर पहुंच गया। नाश्ते के बाद हम लोग बैठक कक्ष में आ गये। वहां पहले से 20-25 लोग जमे थे। रमेश ने एक कर्मचारी उन्हें चाय पिलाने के लिए रखा हुआ था। बैठक कक्ष से लगी एक अलग रसोई थी। आगंतुकों के लिए वहीं चाय बन रही थी। दोपहर तक हम वहां बैठे रहे। कई आगंतुकों के साथ सुरक्षाकर्मी होते थे। उनके तथा गाड़ी चालकों के लिए बार-बार चाय बाहर भी जा रही थी। मैंने अनुमान लगाया कि दिन भर में 200 कप चाय तो जरूर बनती होगी।

इस दौरान सात-आठ समूह चंदा मांगने आये। किसी के मोहल्ले में जागरण था, तो कहीं मंदिर बन रहा था। कोई अपने गांव के किसी अन्य सामाजिक काम के लिए चंदा लेने आया था। कई लोग तो उनके चुनाव क्षेत्र के भी नहीं थे। मान न मान, मैं तेरा मेहमान। रमेश कभी 21 रु. से शुरू करता, तो कभी 51 रु. से; पर कोई सौ से कम में नहीं टला। दो समूहों के साथ ग्राम प्रधान भी थे। अतः उन्हें 501 तथा 1,100 रु. देने पड़े। रमेश ने बताया कि प्रधान जी के प्रभाव में गांव के वोट रहते ही हैं। इसलिए अच्छी रसीद कटवानी पड़ती है।

दो बजे खाना खाकर हम फिर बैठक में आ गये। अब एक सज्जन आये। वे पार्टी के अच्छे कार्यकर्ता थे। उनकी बेटी का विवाह था। उन्हें दो दिन के लिए कार चाहिए थी। उनकी इच्छा भी पूरी की गयी। रमेश ने बताया कि उसके पास तीन कार हैं। एक अपने लिए, दूसरी परिवार के लिए और तीसरी मांगने वालों के लिए। मांगने वालों को चालक और तेल सहित गाड़ी देनी पड़ती है। रमेश ने बताया कि महीने में 20 दिन एक गाड़ी इन कामों में बाहर रहती ही है।

इसी तरह लोगों से मिलते हुए शाम हो गयी। उस दिन बसंत पंचमी थी। इस दिन बिना मुहूर्त देखे शादियां होती हैं। रमेश के पास भी लगभग 25 निमन्त्रण पत्र आये हुए थे। उन्होंने सबसे लिए लिफाफे बनाये। उन्हें तीन भागों में बांटा। कुछ बड़े बेटे को दिये और कुछ छोटे को। बाकी अपनी जेब में रखे और शाम को सात बजे निकल पड़े। उन्होंने बताया कि इन लिफाफों में शुभकामना और आशीर्वाद के लिए क्रमशः 101, 251 और 501 रु. हैं। एक लिफाफा 1,100 रु. वाला भी था। सात-आठ जगह हम लोग गये। सब जगह कुछ न कुछ खाना पड़ा। रात में बारह बजे लौटकर हम सो गये।

अगले दिन सुबह जब हम नाश्ता करने बैठे, तो रमेश ने पूछा, ‘‘तुम्हारा क्या विचार है, कल मेरे कितने पैसे खर्च हुए होंगे?’’ मुझे चुप देखकर बोला, ‘‘हर दिन इसी तरह 20 से 25 हजार रु. खर्च होते हैं। पार्षद के नाते हमें जो वेतन आदि मिलता है, उससे तो एक हफ्ता भी नहीं खिंच सकता। और ये तो चुनाव जीतने के बाद है। चुनाव से पहले टिकट मिल जाए, इसके लिए जो भागदौड़ और नेताओं की सेवा-टहल करनी पड़ती है, उसमें भी कई लाख रु. खर्च होते हैं। दिल्ली में इतनी तरह के नेता रहते हैं। कभी कोई आ जाता है, तो कभी कोई बुला लेता है। वे आएं या हम जाएं, पैसे तो हर बार लगते ही हैं। पेट गाड़ी का भी भरना पड़ता है और साथ चलने वालों का भी।

- और चुनाव में?

- बस इतना ही समझ लो कि इस बार मैंने लगभग दो करोड़ रु. खर्च किये हैं।

- यानि राजनीति में भ्रष्टाचार के बिना काम नहीं चलता?

- अपवाद तो सब जगह हैं; पर ये एक कड़वा सच है। या तो हम राजनीति छोड़ दें; पर इसमें रहना है तो फिर सौ प्रतिशत ईमानदारी से काम नहीं चलता। हम चाहें या नहीं, पर सिस्टम ऐसा बना हुआ है कि भ्रष्टाचार हो ही जाता है।

- वो कैसे?

- वो ऐसे कि हमारे क्षेत्र में जो भी नया निर्माण हो रहा है, वह सरकारी हो या निजी, उसमें हमारा और हमसे ऊपर वालों का निश्चित हिस्सा है। वह अपने आप पहुंच जाता है। इसे लोग भ्रष्टाचार नहीं मानते। हां, इससे अधिक हम कुछ मांगें; या हिस्सा मिलने पर भी काम में बाधा डालें, तो वह भ्रष्टाचार है।

- अच्छा?

- जी हां। हमने चुनाव में जो दो करोड़ खर्च किये हैं, दो साल तो उन्हें पूरा करने में ही लगेंगे। फिर अगले तीन साल में तीन करोड़ बचाने हैं। तभी तो अगला चुनाव लड़ सकेंगे। जितना इस बार खर्च हुआ है, अगली बार उससे डेढ़ गुना खर्च होगा। आपका जनाधार कितना भी बड़ा हो, पर पैसे ना हों, तो पार्टी वाले भी नहीं पूछते। जनता भी नेताओं के भ्रष्टाचार पर खास ध्यान नहीं देती। अब तो लोग सोचते हैं कि चुनाव के दौरान हमें क्या मिला? इसलिए चुनाव जीतने के लिए सब हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। और इस सबमें पैसा खर्च होता है। सरकारी योजनाओं में जो पैसा आता है, वह जन प्रतिनिधि की इच्छा के बिना खर्च नहीं होता।

- शायद इसीलिए लोग आजकल ग्राम प्रधान बनने के लिए भी लाखों रु. खर्च कर देते हैं।

- बिल्कुल ठीक कह रहे हो। एक बार कुरसी मिल जाए, फिर तो बिना कुछ किये ही पेट भरने लगता है। शासन-प्रशासन में सौ प्रतिशत लोग यह जानते हैं और 90 प्रतिशत इसे तंत्र का एक भाग समझकर मानते भी हैं।

- तो फिर इसका इलाज क्या है?

- जो व्यवस्था आज है, उसमें तो कोई इलाज नहीं है। बल्कि इसके बढ़ने की ही संभावना अधिक है। जिसके हाथ में काम रुकवाने या बिगाड़ने की ताकत है, उसे घर बैठे माल पहुंच जाता है। हम तो भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि हमारे हाथ से किसी का बुरा न हो जाए। बस..।

उस दिन रमेश के साथ रहकर मुझे जो ज्ञान मिला, वह अकल्पनीय था। मोदी जी आजकल भारत को ‘डिजीटल और कैशलैस’ बनाने में लगे हैं। उनका मत है कि इससे पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार रुकेगा। बहुत से लोग उनके समर्थक हैं; पर कुछ लोग ‘तुम डाल-डाल, हम पात-पात’ के अनुयायी भी हैं। भगवान करे मोदी जी इस मुहिम में सफल हों; पर वे होंगे या नहीं, और होंगे तो कितने, ये तो समय ही बताएगा।

user image Rajnish Kumar - 08 Nov 2018 at 10:35 PM -

Raajneeti ka kadwa sach

अपनी प्रशंसा और दूसरे की बुराई करने में दिन-रात एक कर रहा है। नेता लोग दूसरे की सबसे अधिक आलोचना जिस मुद्दे पर करते हैं, वह है भ्रष्टाचार। लेकिन चुनाव जीतते ही अधिकांश लोग उसी काम में लग जाते हैं, जिसकी आलोचना कर वे ... चुनाव जीतते हैं। कई साल पुरानी बात है। दिल्ली में मेरा एक मित्र कई साल से पार्षद है। उसके क्षेत्र में नगरीय के साथ ही कुछ ग्रामीण क्षेत्र भी है। उससे एक बार इस बारे में चर्चा हुई, तो उसने मुझे दिन भर अपने साथ रहने को कहा, जिससे मैं उसकी कठिनाई समझ सकूं। मैंने उसकी बात मान ली। सुविधा के लिए हम उसका नाम रमेश रख लेते हैं।

दो दिन बाद बसंत पंचमी का अवकाश था। मैं सुबह उसके घर पहुंच गया। नाश्ते के बाद हम लोग बैठक कक्ष में आ गये। वहां पहले से 20-25 लोग जमे थे। रमेश ने एक कर्मचारी उन्हें चाय पिलाने के लिए रखा हुआ था। बैठक कक्ष से लगी एक अलग रसोई थी। आगंतुकों के लिए वहीं चाय बन रही थी। दोपहर तक हम वहां बैठे रहे। कई आगंतुकों के साथ सुरक्षाकर्मी होते थे। उनके तथा गाड़ी चालकों के लिए बार-बार चाय बाहर भी जा रही थी। मैंने अनुमान लगाया कि दिन भर में 200 कप चाय तो जरूर बनती होगी।

इस दौरान सात-आठ समूह चंदा मांगने आये। किसी के मोहल्ले में जागरण था, तो कहीं मंदिर बन रहा था। कोई अपने गांव के किसी अन्य सामाजिक काम के लिए चंदा लेने आया था। कई लोग तो उनके चुनाव क्षेत्र के भी नहीं थे। मान न मान, मैं तेरा मेहमान। रमेश कभी 21 रु. से शुरू करता, तो कभी 51 रु. से; पर कोई सौ से कम में नहीं टला। दो समूहों के साथ ग्राम प्रधान भी थे। अतः उन्हें 501 तथा 1,100 रु. देने पड़े। रमेश ने बताया कि प्रधान जी के प्रभाव में गांव के वोट रहते ही हैं। इसलिए अच्छी रसीद कटवानी पड़ती है।

दो बजे खाना खाकर हम फिर बैठक में आ गये। अब एक सज्जन आये। वे पार्टी के अच्छे कार्यकर्ता थे। उनकी बेटी का विवाह था। उन्हें दो दिन के लिए कार चाहिए थी। उनकी इच्छा भी पूरी की गयी। रमेश ने बताया कि उसके पास तीन कार हैं। एक अपने लिए, दूसरी परिवार के लिए और तीसरी मांगने वालों के लिए। मांगने वालों को चालक और तेल सहित गाड़ी देनी पड़ती है। रमेश ने बताया कि महीने में 20 दिन एक गाड़ी इन कामों में बाहर रहती ही है।

इसी तरह लोगों से मिलते हुए शाम हो गयी। उस दिन बसंत पंचमी थी। इस दिन बिना मुहूर्त देखे शादियां होती हैं। रमेश के पास भी लगभग 25 निमन्त्रण पत्र आये हुए थे। उन्होंने सबसे लिए लिफाफे बनाये। उन्हें तीन भागों में बांटा। कुछ बड़े बेटे को दिये और कुछ छोटे को। बाकी अपनी जेब में रखे और शाम को सात बजे निकल पड़े। उन्होंने बताया कि इन लिफाफों में शुभकामना और आशीर्वाद के लिए क्रमशः 101, 251 और 501 रु. हैं। एक लिफाफा 1,100 रु. वाला भी था। सात-आठ जगह हम लोग गये। सब जगह कुछ न कुछ खाना पड़ा। रात में बारह बजे लौटकर हम सो गये।

अगले दिन सुबह जब हम नाश्ता करने बैठे, तो रमेश ने पूछा, ‘‘तुम्हारा क्या विचार है, कल मेरे कितने पैसे खर्च हुए होंगे?’’ मुझे चुप देखकर बोला, ‘‘हर दिन इसी तरह 20 से 25 हजार रु. खर्च होते हैं। पार्षद के नाते हमें जो वेतन आदि मिलता है, उससे तो एक हफ्ता भी नहीं खिंच सकता। और ये तो चुनाव जीतने के बाद है। चुनाव से पहले टिकट मिल जाए, इसके लिए जो भागदौड़ और नेताओं की सेवा-टहल करनी पड़ती है, उसमें भी कई लाख रु. खर्च होते हैं। दिल्ली में इतनी तरह के नेता रहते हैं। कभी कोई आ जाता है, तो कभी कोई बुला लेता है। वे आएं या हम जाएं, पैसे तो हर बार लगते ही हैं। पेट गाड़ी का भी भरना पड़ता है और साथ चलने वालों का भी।

- और चुनाव में?

- बस इतना ही समझ लो कि इस बार मैंने लगभग दो करोड़ रु. खर्च किये हैं।

- यानि राजनीति में भ्रष्टाचार के बिना काम नहीं चलता?

- अपवाद तो सब जगह हैं; पर ये एक कड़वा सच है। या तो हम राजनीति छोड़ दें; पर इसमें रहना है तो फिर सौ प्रतिशत ईमानदारी से काम नहीं चलता। हम चाहें या नहीं, पर सिस्टम ऐसा बना हुआ है कि भ्रष्टाचार हो ही जाता है।

- वो कैसे?

- वो ऐसे कि हमारे क्षेत्र में जो भी नया निर्माण हो रहा है, वह सरकारी हो या निजी, उसमें हमारा और हमसे ऊपर वालों का निश्चित हिस्सा है। वह अपने आप पहुंच जाता है। इसे लोग भ्रष्टाचार नहीं मानते। हां, इससे अधिक हम कुछ मांगें; या हिस्सा मिलने पर भी काम में बाधा डालें, तो वह भ्रष्टाचार है।

- अच्छा?

- जी हां। हमने चुनाव में जो दो करोड़ खर्च किये हैं, दो साल तो उन्हें पूरा करने में ही लगेंगे। फिर अगले तीन साल में तीन करोड़ बचाने हैं। तभी तो अगला चुनाव लड़ सकेंगे। जितना इस बार खर्च हुआ है, अगली बार उससे डेढ़ गुना खर्च होगा। आपका जनाधार कितना भी बड़ा हो, पर पैसे ना हों, तो पार्टी वाले भी नहीं पूछते। जनता भी नेताओं के भ्रष्टाचार पर खास ध्यान नहीं देती। अब तो लोग सोचते हैं कि चुनाव के दौरान हमें क्या मिला? इसलिए चुनाव जीतने के लिए सब हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। और इस सबमें पैसा खर्च होता है। सरकारी योजनाओं में जो पैसा आता है, वह जन प्रतिनिधि की इच्छा के बिना खर्च नहीं होता।

- शायद इसीलिए लोग आजकल ग्राम प्रधान बनने के लिए भी लाखों रु. खर्च कर देते हैं।

- बिल्कुल ठीक कह रहे हो। एक बार कुरसी मिल जाए, फिर तो बिना कुछ किये ही पेट भरने लगता है। शासन-प्रशासन में सौ प्रतिशत लोग यह जानते हैं और 90 प्रतिशत इसे तंत्र का एक भाग समझकर मानते भी हैं।

- तो फिर इसका इलाज क्या है?

- जो व्यवस्था आज है, उसमें तो कोई इलाज नहीं है। बल्कि इसके बढ़ने की ही संभावना अधिक है। जिसके हाथ में काम रुकवाने या बिगाड़ने की ताकत है, उसे घर बैठे माल पहुंच जाता है। हम तो भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि हमारे हाथ से किसी का बुरा न हो जाए। बस..।

उस दिन रमेश के साथ रहकर मुझे जो ज्ञान मिला, वह अकल्पनीय था। मोदी जी आजकल भारत को ‘डिजीटल और कैशलैस’ बनाने में लगे हैं। उनका मत है कि इससे पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार रुकेगा। बहुत से लोग उनके समर्थक हैं; पर कुछ लोग ‘तुम डाल-डाल, हम पात-पात’ के अनुयायी भी हैं। भगवान करे मोदी जी इस मुहिम में सफल हों; पर वे होंगे या नहीं, और होंगे तो कितने, ये तो समय ही बताएगा।