Home

Welcome!

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 17 Mar 2021 at 7:22 PM -

स्तूपों की परंपरा

इतिहास - लेखन में इतिहासकार कुछ जोड़ते हैं, कुछ छोड़ते हैं और कुछ का चयन करते हैं। यह छोड़ना, जोड़ना और चयन ही इतिहास का स्वरूप तय करता है। फिर तो तय है कि ऐसा इतिहास - लेखन पूरी मानव - जाति का ... इतिहास नहीं हो सकता है।

वास्तविकता का इतिहास और इतिहासकारों के उपलब्ध इतिहास में फर्क होता है। जैसा कि कहा गया है कि इतिहास - लेखन में इतिहासकार कुछ छोड़ते हैं, कुछ जोड़ते हैं और कुछ का चयन करते हैं और फिर इसे ही किसी देश के इतिहास की संज्ञा प्रदान कर दिया करते हैं। ऐसा इतिहास वस्तुतः राजनीतिक शक्ति मात्र का इतिहास होता है जो भारी पैमाने पर हुई हत्याओं तथा अपराधों के इतिहास से भिन्न नहीं है।

चिनुआ अचैबी ने लिखा है कि जब तक हिरन अपना इतिहास खुद नहीं लिखेंगे, तब तक हिरनों के इतिहास में शिकारियों की शौर्य - गाथाएँ गाई जाती रहेंगी।

इसीलिए भारत के इतिहास में वैदिक संस्कृति उभरी हुई है, बौद्ध सभ्यता पिचकी हुई है और मूल निवासियों का इतिहास बीच - बीच में उखड़ा हुआ है।

इतिहास सिर्फ वो नहीं है, जिसे शासकों ने लिखवाया है और जो लिखा गया है बल्कि इतिहास वो भी है, जिसे हमारे पुरखों ने सहा है, लेकिन लिखा नहीं गया है।

छद्म इतिहास क्या है?

इतिहास - लेखन में वह दावा जो इतिहास की तरह प्रस्तुत किया जाता है, पर वह इतिहास नहीं होता है बल्कि इतिहास जैसा होता है, वह छद्म इतिहास है।

छद्म इतिहास और वास्तविक इतिहास की पहचान करना ही सही इतिहास - दृष्टि है।

2.

यह विचित्र इतिहास - बोध है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के बाद वैदिक युग आया। सिंधु घाटी की सभ्यता नगरीय थी, जबकि वैदिक संस्कृति ग्रामीण थी। उल्टा है।

भला कोई सभ्यता नगरीय जीवन से ग्रामीण जीवन की ओर चलती है क्या?

सिंधु घाटी में बड़े - बड़े नगर थे, स्नागार थे, चौड़ी - चौड़ी सड़कें थीं। बेहद उम्दा किस्म की सभ्यता थी। वहीं वैदिक युग में पशुचारक थे, कच्ची मिट्टी के घर थे, नरकूलों की झोंपड़ियाँ थीं। तुर्रा यह कि ये नरकूलों की झोंपड़ियाँ उसी पश्चिमोत्तर भारत में उगीं, जहाँ बड़े -बड़े सिंधु साम्राज्य के भवन थे।

आपको ऐसा इतिहास - बोध उलटा नहीं लगता है?

आप पढ़ाते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता में लेखन - कला विकसित थी और फिर उसके बाद की वैदिक संस्कृति में पढ़ाने लगते हैं कि वैदिक युग में लेखन - कला का विकास नहीं हुआ था। वैदिक युग में लोग मौखिक याद करते थे और लिखते नहीं थे।

ऐसा भी होता है क्या? पढ़ी - लिखी सभ्यता अचानक अनपढ़ हो जाती है क्या?

आप यह भी पढ़ाते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता में मूर्ति - कला थी। फिर उसके बाद पढ़ाते हैं कि वैदिक युग में मूर्ति - कला नहीं थी।

क्या यह सब उलटा नहीं है?

भारत में स्तूप - स्थापत्य, लेखन - कला, मूर्ति - कला, बर्तन - कला आदि का विकास निरंतर हुआ है। कोई गैप नहीं है। यदि इतिहास में ऐसा गैप आपको दिखाई पड़ रहा है तो वह वैदिक संस्कृति को भारतीय इतिहास में ऐडजस्ट करने के कारण दिखाई पड़ रहा है।

यह कैसा इतिहास - लेखन है कि जिन वेदों के खुद का ही ऐतिहासिक साक्ष्य प्राप्त नहीं हैं, उन्हें ही ऐतिहासिक साक्ष्य मान लिया गया है।

ऋग्वैदिक युग, फिर उत्तर वैदिक युग, फिर सूत्रों का युग, फिर महाकाव्यों का युग, फिर धर्मशास्त्रों का युग - ये भारत का भौतिक इतिहास नहीं है।

ये तो संस्कृत साहित्य का इतिहास है। किसी भी देश का भौतिक इतिहास ऐसे नहीं लिखा जाता है, लिखा भी नहीं गया है। साहित्य का इतिहास ऐसे लिखा जाता है।

वैदिक युग सही मायने में इतिहास का टर्मिनोलाॅजी है ही नहीं ! कहीं पढ़े हैं बाइबिल युग, कुरान युग?

वैदिक युग, महाकाव्य युग और सूत्र युग मूलतः इतिहास का नहीं बल्कि संस्कृत साहित्य के चैप्टर्स हैं वरना दुनिया के इतिहास में किसी देश का ऐतिहासिक चैप्टर्स के नाम बाइबिल युग, कुरान युग और हदीस युग नहीं हैं।

वैदिक भाषा पुरानी है और वैदिक संस्कृति भी पुरानी है, तब इस तथ्य की भी पड़ताल की जानी चाहिए कि वैदिक युग के तथाकथित सोने के सिक्के " निष्क " और चाँदी के सिक्के " रजत " कहाँ गए, जबकि धातु के सिक्के सबसे पहले गौतम बुद्ध के युग में मिलते हैं, जिसे " आहत मुद्रा " कहा जाता है।

3.

आज का अध्ययन जबकि पुरावशेषों में फ्लोरीन की मात्रा के मापन, काठ कोयले और हड्डी में रेडियोधर्मिता की मात्रा, भूचुंबकीय अवलोकन और वृक्ष - तैथिकी पर आधारित है, तब सत्ययुग या द्वापर जैसे भोथरे काल मापक से किसी नायक या वस्तु की उम्र तय करना निरर्थक है।

मिसाल के तौर पर, वेदों की रचना सृष्टि के आरंभ में हुई है। केतु वृक्ष 1100 योजन ऊँचे हैं। देवताओं का एक वर्ष मनुष्यों के 131521 दिनों का होता है।

ऐसे मामलों में भारत का भौतिक इतिहास ताम्र, कांस्य, लौह जैसी धातुओं और धूसर, काले, गेरुए जैसे मृद्भांडों की राह पकड़ेगा। मगर सावधानी की जरूरत यहाँ भी है।

आपने एक बार झूठ बोल दिया है कि हड़प्पा सभ्यता के बाद उत्तरी भारत में वैदिक युग आया है। अब इसे साबित करने के लिए आप दूसरा झूठ बोल रहे हैं कि उत्तरी भारत में ताम्र युग के बाद सीधे लौह युग आ गया।

आपने कांस्य युग की सभ्यता को वैदिक युग की झूठी तोप से उड़ा दिया।

पश्चिमोत्तर भारत में ताम्र युग के बाद कांस्य युग आया था। सिंधु घाटी की सभ्यता कांस्य युग का प्रतीक है। मगर पूर्वी भारत में इतिहासकारों ने ताम्र युग के बाद सीधे लौह युग ला दिया और वे कांस्य युग को खा गए।

जब लोहे की खोज नहीं हुई थी, तब लोग ताँबे को ही लोहा कहा करते थे।

ताँबे को लोहा इसलिए कहते थे कि ताँबे का रंग लोहित होता है।

लोहित का अर्थ है - लाल रंग का। लाल रंग का कौन होता है - ताँबा या लोहा ?

जाहिर है कि लाल रंग का ताँबा होता है। इसलिए लोग ताँबे को लोहा कहते थे।

लोहा से ही लहू शब्द बना है। लहू का अर्थ है - खून। खून के रंग का कौन होता है - ताँबा या लोहा?

पालि में ताँबे को लोह (लोहा ) भी कहा गया है। अर्थात पालि तब की है, जब लोहे की खोज नहीं हुई थी। तब सरसरी नजर से ही पालि का इतिहास उत्तरी भारत में ईसा से हजार साल पहले छलाँग मार देता है।

4.

स्तूपों का इतिहास, लेखन -कला का इतिहास, मूर्ति-कला का इतिहास सभी कुछ सिंधु घाटी सभ्यता से निरंतर मौर्य काल और आगे तक जाता है।

बशर्ते कि आप मान लीजिए कि सिंधु साम्राज्य से लेकर मौर्य साम्राज्य और आगे तक टूटती - जुड़ती बौद्ध सभ्यता की कड़ियाँ थीं।

भारत में मौजूद सभी स्तूपों को मौर्य काल के बाद का बताया जाना गलत है। अनेक स्तूप सिंधु घाटी सभ्यता के काल के हैं, कुछ सिंधु घाटी सभ्यता के बाद के हैं, कुछ मौर्य काल के हैं, कुछ मौर्य काल के बाद के भी हैं।

कहीं मिट्टी का स्तूप है, कहीं पत्थर का स्तूप है, कहीं ईंट का स्तूप है तो कहीं संगमरमर का स्तूप है। मनौती स्तूप ... छोटा स्तूप ... मझोला स्तूप ... बड़ा स्तूप ... गोल स्तूप ... चौकोर स्तूप ... अति प्राचीन स्तूप ... प्राचीन स्तूप ...वेदी का स्तूप ...बिना वेदी का स्तूप ... सीढ़ीदार स्तूप ... बिना सीढ़ी का स्तूप !

सभी अलग - अलग प्रकार के सैकड़ों स्तूपों को इतिहासकारों ने मौर्य काल से लेकर कुषाण काल के चंद पन्नों में समेट लिया है।

जबकि इतिहास गवाह है कि सिंधु घाटी सभ्यता में भी स्तूप था और पूर्व मौर्य काल में भी स्तूप था। पिपरहवा का स्तूप मौर्य काल से पहले का है। खुद मौर्य काल में नए स्तूप बने और कई पूर्व मौर्य काल के स्तूपों की मरम्मत हुई, जिसमें निग्लीवा सागर का स्तूप शामिल है।

अभिलेखीय साक्ष्य पुख्ता सबूत देता है कि सम्राट अशोक से पहले भी स्तूपों की परंपरा थी।

आप सम्राट अशोक के निग्लीवा अभिलेख को पढ़ लीजिए, जिसमें लिखा है कि अपने अभिषेक के 14 वें वर्ष में उन्होंने निगाली गाँव में जाकर कोनागमन (कनकमुनि ) बुद्ध के स्तूप के आकार को वर्धित करवाया था। ( चित्र - 1 )

कनकमुनि ( कोनागमन ) बुद्ध का स्तूप सम्राट अशोक के काल से पहले बना था, जिसका संवर्धन उन्होंने कराया था। गौतम बुद्ध से कनकमुनि बुद्ध अलग थे और पहले थे।

भारत और भारत के बाहर जो बड़े पैमाने पर स्तूप मिलते हैं, वे सभी मौर्य काल के बाद के नहीं हैं बल्कि अनेक सिंधु घाटी और मौर्य काल के बीच के भी हैं। मगर इतिहासकार गौतम बुद्ध से पहले स्तूप होने की बात सोचते ही नहीं हैं।

परिणामतः वे मौर्य काल से पहले के बने सभी स्तूपों को भी खींचकर मौर्य काल तथा उसके बाद लाते हैं। यदि वे ऐसा नहीं करते तो सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मौर्य काल तक कहीं भी स्तूपों की श्रृंखला नहीं टूटेगी।

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को आठ भागों में बाँटा गया तथा उन पर स्तूपों का निर्माण किया गया। जाहिर है कि स्तूपों की निर्माण - कला बुद्ध से पहले भी मौजूद थी।

बुद्ध ने खुद महापुरुषों की शरीर धातु पर स्तूप बनाने को कहा था। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनंद को चौराहे पर स्तूप निर्मित करने की बात कही थी।

कोई भी शिल्प - कला रातों -रात पैदा नहीं होती है। स्तूप - कला का भी बाकायदे विकास हुआ है। कई पीढ़ियों ने, कई गणों ने इसके विकास में अपना - अपना योगदान किया है।

5.

दुनिया की टाॅप अकादमिक पत्रिकाओं में " साइंस " शुमार है। इसे अमेरीकन एसोसिएशन फाॅर दि एडवांस आॅफ साइंस प्रकाशित करता है।

" साइंस " के अंक 320 में यूनिवर्सिटी ऑफ नेपल्स, इटली के भारत और सेंट्रल एशिया की सभ्यताओं के प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर जिओवान्नि वेरार्डी का मुअनजोदड़ो के स्तूप पर एक लेख छपा है। ( चित्र - 2 )

पुरातत्ववेत्ता वेरार्डी ने गहन जाँच के बाद बताए हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता का स्तूप कोई 2100 ई. पू. का है। स्तूप के नाम को लेकर विवाद हो सकता है। मगर वह इमारत सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन है। यह स्तूप भिक्षुओं के आवास से घिरा है।

आर डब्ल्यू टी एच आकिन विश्वविद्यालय, जर्मनी के पुरातत्ववेत्ता माइकल जेंसन ने वेरार्डी की रिसर्च पर मुहर लगाते हुए लिखा है कि मुअनजोदड़ो का स्तूप सिंधु घाटी सभ्यता के काल का है।

पुरातत्ववेत्ता द्वय ने कहा है कि सिंधु घाटी सभ्यता पर पुनर्विचार करने की जरूरत है क्योंकि यह स्तूप कुषाण काल का नहीं है।

इसीलिए मैं भी कहता हूँ कि सिंधु घाटी की सभ्यता मूलतः बौद्ध सभ्यता है।

जैसा कि भारत और सेंट्रल एशिया की सभ्यताओं के प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर जिओवान्नि वेरार्डी ने जाँचोपरांत बताया है कि मुअनजोदड़ो का स्तूप सिंधु घाटी की सभ्यता के समय का है। यह कुषाण कालीन नहीं है।

अब तक इतिहासकार इसे कुषाण कालीन मानते रहे हैं। कारण कि स्तूप के पूरबी बौद्ध मठ से कुषाण कालीन सिक्के मिले हैं।

प्रोफेसर जिओवान्नि वेरार्डी ने कहा है कि स्तूप के काल - निर्धारण में इन सिक्कों की कोई खास भूमिका नहीं है। स्तूप का अस्तित्व सिक्कों से अलग है।

स्तूप की निर्माण-सामग्री, अभिकल्पन, ईंटें, प्लेटफार्म - सब कुछ सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन हैं। ( चित्र - 3 )

चूँकि कुषाण काल बौद्धों के लिए सुनहरा काल था। बौद्धों को पता रहा होगा कि मुअनजोदड़ो का स्तूप किसी पूर्व बुद्ध का है।

शायद यहीं कारण था कि उनकी आवाजाही उस स्तूप तक थी और ऐसे में वहाँ कुषाण कालीन सिक्कों का मिलना असंभव नहीं है।

मोहनजोदड़ो की खुदाई में विशाल स्नानागार मिला है। स्नानागार के आँगन में जलाशय है। जलाशय के तीन ओर बरामदे और उनके पीछे कई कमरे थे।

इतिहासकार मैके ने बताया है कि कमरे वाला स्नानागार पुरोहितों के लिए था, जबकि विशाल स्नानागार सामान्य जनता के लिए था तथा इसका उपयोग धार्मिक समारोहों के अवसर पर किया जाता था।

डी. डी. कोसंबी ने लिखा है कि पूरे ऐतिहासिक युग में ऐसे कृत्रिम ताल बनाए गए हैं : पहले स्वतंत्र रूप में, बाद में मंदिरों के समीप।

सवाल उठता है कि सिंधु घाटी के लोग विशेष धार्मिक अवसरों पर विशाल स्नानागार में पुरोहितों के संग स्नान तथा शुद्धिकरण करके कहाँ जाते थे? मंदिर तो था नहीं। वहीं स्तूप में! स्नानागार के बगल के स्तूप में !!

उत्तरी बिहार के वैशाली में पुरातत्वविदों ने आनंद स्तूप के बगल में ठीक ऐसा ही विशाल स्नानागार खोज निकाला है, जैसा कि मोहनजोदड़ो में है।

1826 में मैसन ने पहली बार हड़प्पा में स्तूप ही देखा था, बर्नेस ( 1831 ) और कनिंघम ( 1853 ) ने भी स्तूप ही देखा था। सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई बाद में हुई।

राखालदास बंदोपाध्याय ने भी 1922 में मोहनजोदड़ो के बौद्ध स्तूप की खुदाई में ही सिंधु घाटी की सभ्यता की खोज की थी।

इसलिए; सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई में स्तूप नहीं मिला है बल्कि स्तूप की खुदाई में सिंधु घाटी की सभ्यता मिली है।

मगर इतिहासकारों को सिंधु घाटी की सभ्यता के इतिहास को ऐसे लिखने में जाने क्या परेशानी है, जबकि सच यही है।

मोहनजोदड़ो की खुदाई में सिर्फ स्तूप ही नहीं, बौद्ध विहार भी मिला था, जिसका विवरण स्वामी शंकरानंद ने " हिस्ट्री आफ मोहनजोदड़ो एण्ड हड़प्पा " में प्रस्तुत किया है। लिखा है कि राखालदास बंदोपाध्याय को 1922 - 23 के शरद मौसम में खुदाई करते एक बौद्ध विहार मिला। विहार का मुख पूरब की तरफ था। पूरबी भाग में दो बड़े सामान्य कक्ष, एक प्रवेश द्वार, गुफानुमा सुरंग, मूर्ति कक्ष एवं सीढ़ियाँ हैं। कुछ छोटे कक्षों का उपयोग भिक्खुओं के अवशेष रखने के लिए किया जाता है। कमरा सं. 22, 27 एवं 29 ऐसे ही कमरे हैं।
( संदर्भ: बौद्ध धर्म: हड़प्पा मोहनजोदड़ो नगरों का धर्म, पृ. 144 )

गुजरात स्थित धोलावीरा सिंधु घाटी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण नगर है। यहाँ स्तूप मिले हैं। उनमें से एक पंजाब स्थित संघोल के धम्म चक्र स्तूप से मेल खाता है। ऐसे स्तूपों में आरे ( वृत में तिल्ली ) बने होते हैं। ( चित्र- 4 )

स्तूप का नाम सुनते ही दिमाग में एक अर्द्ध गोलाकार संरचना की तस्वीर उभरती है।

मगर हर जगह का स्तूप अर्द्ध गोलाकार नहीं है।स्तूप धम्म चक्क के आकार के भी हैं, जिनमें आठ आरे बने हुए हैं। धम्म चक्क में भी 8 आरे हैं।

एक दूसरे स्तूप में आरों की संख्या क्रमशः 12, 24 और 32 है। 24 और 32 की संख्या अशोक - चक्र की याद दिलाती है। अशोक - चक्र में भी 32 और 24 आरे हैं।

ऐसे स्तूप पंजाब के जिला फतेहगढ़ साहिब के गाँव संघोल में मिले हैं। कभी संघोल में भिक्षु संघ था। इसीलिए इसका नाम संघोल है। ( चित्र - 5 )

स्तूप की खुदाई 1968 में हुई थी। स्तूप से एक सोप पत्थर की मंजूषा मिली है।

मंजूषा के ढक्कन पर खरोष्ठी लिपि में एक बौद्ध स्काॅलर का नाम लिखा है। वह स्काॅलर भद्रक थे। उन्हीं का अस्थि - भस्म उस मंजूषा में है।

धोलावीरा का स्तूप संघोल के स्तूप से मेल खाता है।

सिंध साम्राज्य के अनेक नगरों में स्तूप मिले हैं। हड़प्पा में स्तूप मिला है, मोहनजोदड़ो में स्तूप मिला है और फिर धोलावीरा में भी स्तूप मिला है।

जाने क्यों, इतिहासकार बताते हैं कि ये स्तूप कुषाण काल के हैं। भाई, कुषाण काल तो बुद्ध की मूर्तियों के लिए जाना जाता है। यदि सिंधु घाटी सभ्यता के ये स्तूप कुषाणों ने बनवाए तो वे सिर्फ स्तूप ही क्यों बनवाते?

वे तो सिंधु घाटी की गली - गली में ... हर चौक - चौराहे पर बुद्ध की मूर्तियाँ बनवाते। वे तो गांधार कला के आविष्कारक थे और बुद्ध की मूर्तियों के लिए तो कुषाण राजे इतिहास में जाने जाते हैं।

यदि सिंध साम्राज्य के ये स्तूप कुषाण काल के हैं तो कुषाणों से करीब डेढ हजार साल पहले तो आपके अनुसार आर्य आए थे, जो सिंध साम्राज्य पर कब्जा किए। फिर वे सिंधु घाटी के डगर - डगर में मंदिर, अवतारों की मूर्तियाँ क्यों नहीं बनवाए?

मान लीजिए कि 1500 ई. पू. में आर्यों का आक्रमण हुआ और हड़प्पा - मुअनजोदड़ो नेस्तनाबूद हो गए। सिंध साम्राज्य जीत लिया गया और आर्य साम्राज्य स्थापित हो गया तो क्या सिंध साम्राज्य के ऊपरी लेयर पर आर्य साम्राज्य के निशान मिलते हैं?

क्या मंदिर मिलते हैं ? ... क्या संस्कृत मिलती है ? ... कोई वैदिक देवी - देवता मिलते हैं? ...क्या इंद्र वंश का शासन आया?... क्या वरूण वंश का राज आया?... नहीं।

6.

इतिहासकार मौर्य साम्राज्य पर शुंगों के कब्जे को ही आर्य आक्रमण बताते हैं और उसे पीछे खींचकर 1500 ई. पू. में ले जाते हैं क्योंकि इसके बाद धीरे- धीरे आर्य- सभ्यता के तमाम निशान मिलने लगते हैं ... संस्कृत ... यज्ञ ... मंदिर आदि- आदि।

वैदिक साहित्य में लिखित " दास " कौन है?

भारत और पश्चिम के अनेक इतिहासकारों ने " दास " की अनेक व्याख्याएँ की हैं। उस भूल - भुलैया में हमें नहीं पड़ना है।

दास मूल रूप से " बौद्ध " थे। साँची और भरहुत के स्तूपों पर अनेक दास तथा दासी उपाधिधारक बौद्धों के शिलालेख हैं, जिन्होंने स्तूप - निर्माण में मदद की थी।

अरहत दास थे ....अरहत दासी थीं ....यमी दास थे.... जख दासी थीं .....अनेक ...सभी के नाम लिखे हुए हैं।

साँची स्तूप पर थूप दास का वर्णन है। लिखा है - मोरगिरिह्मा थूपदासस दान थंभे। ( चित्र - 6 )

थूप दास मोरगिरि ( महाराष्ट्र ) के निवासी थे और भरहुत के एक स्तंभ - निर्माण में मदद की थी।

वैदिक साहित्य में वर्णित आर्यों का सांस्कृतिक संघर्ष इन्हीं बौद्ध दास - दासियों से हुआ था।

वैदिक साहित्य इन दास - दासियों के बारे में बताता है कि ये लोग यज्ञ नहीं करते और न ये इंद्र - वरुण की पूजा करते हैं...स्पष्ट है कि ये बौद्ध हैं।

प्राकृत भाषा में " दास " ( दसन ) का अर्थ द्रष्टा है। मगर आर्यों ने सांस्कृतिक दुश्मनी के कारण अपनी पुस्तकों में " दास " का अर्थ " गुलाम/ नौकर " कर लिए हैं।

दास और आर्यों का यह सांस्कृतिक संघर्ष 1500 ई.पू. में नहीं बल्कि मौर्य काल के बाद हुआ था।

सभी शिलालेख पढ़ जाइए। मौर्य काल तक किसी भी पुरुष और महिला के नाम में " दास / दासी " नहीं जुड़ा है।

दास/ दासी जुड़े नाम शिलालेखों में मौर्य काल के बाद दिखाई पड़ते हैं। साँची - भरहुत के स्तूपों पर पहली बार अनेक नाम दास / दासी से जुड़े दिखाई पड़ते हैं।

दास / दासी से जुड़े ये सभी नाम बौद्धों के हैं।

इन्हीं दास / दासियों से आर्यों का वैचारिक संघर्ष हुआ था, जो वेदों में लिखा हुआ है।

वेदों में लिखे आर्य - दास संघर्ष को हम कतई मौर्य काल से पहले नहीं ले जा सकते हैं। कारण कि मौर्य काल तक हमें दास/ दासी उपाधि धारक कोई नाम मिलता ही नहीं है।

वेद और वेदों में वर्णित यह सांस्कृतिक संघर्ष की गाथा मौर्य काल के बाद की है।

यहीं कारण है कि ऋग्वेद में भी स्तूपों के संदर्भ मिलते हैं और रामायण में चैत्यों के मिलते हैं।

यह तो बहुत बताया जाता है कि ऋग्वेद में गंगा का एक बार और यमुना का तीन बार वर्णन है, मगर यह बहुत कम बताया जाता है कि ऋग्वेद में स्तूप का वर्णन दो बार है।

संस्कृत का स्तूप मूल रूप से पालि थूप का बिगड़ा हुआ रूप है। पालि में थूप से अनेक शब्द बनते हैं जैसे थूप, थूपिका, थूपीकत, थूपारह आदि।

मगर संस्कृत में स्तूप से अनेक शब्द नहीं बनेंगे। कारण कि स्तूप संस्कृत के लिए बाहरी शब्द है। किसी भी भाषा में अमूमन बाहरी शब्द बाँझ होते हैं। उनमें शब्दों को जनने की क्षमता नहीं होती है।

संस्कृत के लिए स्तूप बाँझ शब्द है। इसीलिए संस्कृत का स्तूप पालि थूप का रूपांतरण है और वे भाष्यकार जो ऋग्वेद में प्राप्त स्तूप की व्याख्या किसी अन्य अर्थ में करते हैं, वे गलत हैं।

"स्तूप ....बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः"
अर्थात इसमें बुद्ध अन्तर्निहित हैं।

यह ऋग्वेद के प्रथम मंडल, सूक्त 24, छठवाँ अनुवाक का श्लोक संख्या 7 है। इसमें राजा वरुण को अबौद्ध (अबुध्ने) राजा भी कहा गया है। पूरा का पूरा अर्थ एक दूसरे से जुड़ा हुआ है।

सायण भाष्य में अर्थ कुछ भिन्न है।

"अबुध्ने राजा वरुणो वनस्योर्ध्वं स्तूपं ददते पूतदक्षः नीचीना स्थुरुपरि बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः केतवः स्युः॥७॥" ( चित्र - 7)

अर्थात पवित्र पराक्रम युक्त राजा वरुण (सबको आच्छादित करने वाले) दिव्य तेज पुञ्ज सूर्यदेव को आधाररहित आकाश में धारण करते हैं। इस तेज पुञ्ज सूर्यदेव का मुख नीचे की ओर और मूल ऊपर की ओर है। इससे मध्य में दिव्य किरणें विस्तीर्ण होती चलती हैं।

परन्तु यह अर्थ जो सायण भाष्य पर आधारित है, गलत है। लगभग सभी अनुवादकों ने ऐसा ही अर्थ किया है। अर्थ करते वक्त संदर्भ को देखना जरूरी होता है। जैसा कि उपरोक्त से स्वतः स्पष्ट है कि वरुण राजा की उपाधि अबुध्ने है। मतलब कि वरुण बौद्ध विरोधी राजा थे। आगे स्तूप को उलटने की बात है।

अशोक द्वारा 84000 स्तूप बनाए जाने का जिक्र फाहियान ने अपने यात्रा - विवरण के 27 वें खंड में किए हैं।

साँची एवं भरहुत स्तूपों का निर्माण मूल रूप से अशोक ने ही कराया था। ह्वेनसांग ने अशोक द्वारा निर्मित अनेक स्तूपों का उल्लेख किया है, जिन्हें उसने खुद देखा था।

सारनाथ तथा तक्षशिला स्थित धर्मराजिका स्तूप का निर्माण भी मूलतः अशोक के समय में ही कराया गया था। बाद के शासकों ने उन्हें परिवर्धित करवाए।

मीनाण्डर यवन थे। विदेशी थे। लेकिन धम्म की राह चुनी थी। बुतकारा स्तूप के पहले लेयर को अशोक ने बनवाए थे तो दूसरे को मीनाण्डर ने बनवाए थे। दूसरे लेयर से मीनाण्डर का सिक्का मिला है।

मीनाण्डर बड़े दार्शनिक थे...इंडो -यूनानी इतिहास में दूजा नहीं हुआ।

सो वे बड़े न्यायप्रिय थे। न्यायप्रियता ने इन्हें जनता में बड़ी शोहरत दिलाई थी।

एक दिन एक शिविर में अचानक इनकी मृत्यु हुई।

प्लूटार्क ने लिखा है कि मीनाण्डर के भस्म को लेकर जनता में झगड़े उठ खड़े हुए ....क्योंकि वे इतना जनप्रिय थे कि लोग उनके भस्म पर अलग - अलग स्तूप बनाना चाहते थे।

भारत के इतिहास में बुद्ध के बाद मीनाण्डर, मीनाण्डर के बाद कबीर और कबीर के बाद नानक का नाम आता है, जिनके मृत शरीर को भी अपनाने के लिए जनता व्याकुल थी।

क्षेमेन्द्र रचित अवदानकल्पलता से पता चलता है कि मीनाण्डर ने अनेक स्तूपों का निर्माण कराया था।

सम्राट अशोक के बाद पश्चिमोत्तर तथा उत्तरी भारत में सर्वाधिक स्तूप बनवाने का श्रेय कनिष्क को है।

उन्होंने विभिन्न स्थानों पर अनेक स्तूप बनवाए। पेशावर के निकट कनिष्क ने एक बड़ा स्तूप बनवाए थे, जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे गए थे। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि इसे एक यूनानी इंजीनियर अगिलस ने बनाया था।

जाहिर है कि यूनानी अभियंताओं ने यूनानी तकनीक का प्रयोग किया। यहीं ग्रीको - बुद्धिस्ट कला है, जिससे स्तूप - निर्माण भी अछूता नहीं रहा।

गंधार क्षेत्र के स्तूपों का वास्तु - विन्यास मध्य भारतीय स्तूपों जैसा नहीं है। गंधार स्तूप काफी ऊँचे हैं, चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ हैं और संपूर्ण स्तूप एक बुर्ज जैसा दिखाई देता है।

कनिष्क के पुरुषपुर स्थित 400 फीट ऊँचा स्तूप का विवरण फाहियान तथा ह्वेनसांग दोनों ने दिए हैं। फाहियान ने लिखा है कि उसने जितने भी स्तूप देखे थे, उनमें यह सर्वाधिक प्रभावशाली है।

तक्षशिला स्थित धर्मराजिका स्तूप का निर्माण अशोक के समय में हुआ, किंतु कनिष्क के समय में आकारवर्धन हुआ। ऊँचे चबूतरे पर निर्मित यह स्तूप गोलाकार है। चारों दिशाओं में चार सीढ़ियाँ हैं। ( चित्र - 8 )

कनिष्क के काल में बल्ख तथा खोतान तक अनेक स्तूप निर्मित करवाए गए थे। मनिक्याल क्षेत्र में कई स्तूप बने थे। मनिक्याल, रावलपिंडी से 20 मील की दूरी पर है। यहाँ से प्राप्त एक अभिलेख से पता चलता है कि कनिष्क के 18 वें वर्ष में इन स्तूपों को बनवाया गया था।

सिर्फ बुद्ध के अवशेषों पर ही नहीं बल्कि कनिष्क ने बौद्ध साहित्य की टीकाओं को भी ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण करा कर विशेष रूप से निर्मित एक स्तूप में सुरक्षित रखवाया था। ह्वेनसांग ने इस पर विस्तार से लिखा है।

स्तूप- निर्माण की परंपरा अशोक और कनिष्क के बाद हर्षवर्धन के शासन-काल में सर्वाधिक समृद्ध हुई।

सम्राट हर्षवर्धन ने विक्रमादित्य की नहीं बल्कि शीलादित्य की उपाधि धारण की थी। शीलादित्य वह है, जिसे विक्रम ( बल ) से अधिक शील पसंद हो।

वहीं शील जिसे बुद्ध ने अपनी देशना में प्रमुख स्थान दिया था।

वो शिलादित्य ऐसे शीलवान निकले कि हर 5 वें वर्ष अपना संपूर्ण खजाना गरीबों- असहायों को दान कर देते थे।

ह्वेनसांग ने लिखा है कि उन्होंने गंगा के किनारों पर कई हजार स्तूप सौ - सौ फीट ऊँचे बनवाए।

सब स्थानों पर जहाँ - जहाँ गौतम बुद्ध के कुछ भी चिह्न थे, संघाराम स्थापित किए।

इतिहास से सवाल है कि आखिर शीलादित्य के बनवाए हजारों स्तूप और संघाराम कहाँ गए?

ह्वेनसांग ने पूर्वी भारत में अशोक द्वारा निर्मित ताम्रलिप्ति, कर्णसुवर्ण, समतट और पुण्ड्रवर्धन में स्तूपों का उल्लेख किया है। महास्थानगढ़ अभिलेख से भी यह पुष्ट होता है। बाद के पाल शासकों ने पूर्वी भारत में बौद्ध धर्म का संरक्षण प्रदान किए।

पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में पाल कालीन अनेक स्तूपों के अवशेष मिलते हैं।

पाल वंश के बड़े राजाओं में देवपाल ( 810 - 850 ) शुमार हैं। उत्साही बौद्ध थे। 40 बरसों का शासन था। सुजाता स्तूप का आखिरी पुनर्निर्माण इन्होंने ने ही कराए थे। वहाँ के उत्खनन से प्राप्त एक अभिलेख से इसकी पुष्टि होती है। ( चित्र - 9 )

पश्चिमोत्तर और उत्तरी भारत में स्तूप - निर्माण की जो परंपरा सिंधु घाटी सभ्यता से चली थी, वह पाल कालीन पूर्वी भारत में 12 वीं सदी तक अनवरत चलती रही।

7.

बौद्ध सभ्यता के प्रचार - प्रसार का जो काम उत्तर के मौर्यों ने किया, वही काम दक्षिण में सातवाहनों ने किया।

अशोक के सभी अभिलेख प्राकृत में हैं तो सातवाहनों के भी सभी अभिलेख प्राकृत में हैं।

उत्तर में मौर्य काल तक संस्कृत के अभिलेख नहीं मिलते हैं तो दक्षिण में भी सातवाहन काल तक संस्कृत के अभिलेख नहीं मिलते हैं।

मौर्यों ने अनेक स्तूप, चैत्य और विहार बनवाए तो सातवाहनों ने भी अनेक स्तूप, चैत्य और विहार बनवाए।

अमरावती, गोली, जगय्यपेटा, घंटसाल, भट्टीप्रोलु, नागार्जुन कोंडा जैसे स्थानों के स्तूप इन्हीं सातवाहनों के हैं। ( चित्र- 10 )

बौद्ध स्थलों में से पूर्वोत्तर भारत स्थित बौद्ध स्मारकों का जिक्र कम होता है। हिंदी इतिहासों में इसका उल्लेख नगण्य है।

त्रिपुरा के सेपहीजाला जिले में बोक्सानगर है। बोक्सानगर का प्राचीन नाम अभिलेखों के आधार पर बिराक बताया जाता है। यह एक विराट बौद्ध स्थल है।

इस विराट बौद्ध स्थल को खुदाई से पहले मानसा का स्मारक कहा जाता था। मानसा सर्पों की देवी हैं। साल 1997 के जुलाई महीने में पुरातत्वविद डाॅ. जीतेन्द्र दास यहाँ आए। उन्हें यहाँ गौतम बुद्ध की मूर्ति मिली। वे अनुमान कर लिए कि बोक्सानगर बौद्ध स्थल है और इसकी सूचना उन्होंने पुरातत्व विभाग को दे दी।

पुरातत्व विभाग ने 2001 से 2004 तक बोक्सानगर की खुदाई की। खुदाई में विशाल बौद्ध स्तूप, चैत्यगृह, बौद्ध विहार, बुद्ध की कांस्य मूर्तियाँ, ब्राह्मी अभिलेखित सील तथा अन्य बौद्ध अवशेष मिले। ( चित्र - 11)

स्तूप विशाल और शानदार है। चैत्यगृह आयताकार और स्तूप के पूरब दिशा में है। चैत्यगृह से पूरब बौद्ध विहार है। बौद्ध विहार का गलियारा काफी लंबा है। गलियारा के दोनों ओर भिक्षुओं के लिए कमरे बने हैं।

दक्षिण त्रिपुरा में पिलक है। पिलक का प्राचीन नाम पिरोक बताया जाता है। पिलक की पहचान भी बौद्ध स्थल के रूप में हुई है। पिलक के उत्खनन से भी बौद्ध स्तूप और बुद्ध की अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

पूर्वोत्तर भारत कभी बौद्ध सभ्यता के प्रभाव में था।

न केवल संपूर्ण भारत में बल्कि भारत के बाहर भी स्तूप बनाए जाने की समृद्ध परंपरा रही है।स्तूपों की परंपरा

इतिहास - लेखन में इतिहासकार कुछ जोड़ते हैं, कुछ छोड़ते हैं और कुछ का चयन करते हैं। यह छोड़ना, जोड़ना और चयन ही इतिहास का स्वरूप तय करता है। फिर तो तय है कि ऐसा इतिहास - लेखन पूरी मानव - जाति का इतिहास नहीं हो सकता है।

वास्तविकता का इतिहास और इतिहासकारों के उपलब्ध इतिहास में फर्क होता है। जैसा कि कहा गया है कि इतिहास - लेखन में इतिहासकार कुछ छोड़ते हैं, कुछ जोड़ते हैं और कुछ का चयन करते हैं और फिर इसे ही किसी देश के इतिहास की संज्ञा प्रदान कर दिया करते हैं। ऐसा इतिहास वस्तुतः राजनीतिक शक्ति मात्र का इतिहास होता है जो भारी पैमाने पर हुई हत्याओं तथा अपराधों के इतिहास से भिन्न नहीं है।

चिनुआ अचैबी ने लिखा है कि जब तक हिरन अपना इतिहास खुद नहीं लिखेंगे, तब तक हिरनों के इतिहास में शिकारियों की शौर्य - गाथाएँ गाई जाती रहेंगी।

इसीलिए भारत के इतिहास में वैदिक संस्कृति उभरी हुई है, बौद्ध सभ्यता पिचकी हुई है और मूल निवासियों का इतिहास बीच - बीच में उखड़ा हुआ है।

इतिहास सिर्फ वो नहीं है, जिसे शासकों ने लिखवाया है और जो लिखा गया है बल्कि इतिहास वो भी है, जिसे हमारे पुरखों ने सहा है, लेकिन लिखा नहीं गया है।

छद्म इतिहास क्या है?

इतिहास - लेखन में वह दावा जो इतिहास की तरह प्रस्तुत किया जाता है, पर वह इतिहास नहीं होता है बल्कि इतिहास जैसा होता है, वह छद्म इतिहास है।

छद्म इतिहास और वास्तविक इतिहास की पहचान करना ही सही इतिहास - दृष्टि है।

2.

यह विचित्र इतिहास - बोध है कि सिंधु घाटी की सभ्यता के बाद वैदिक युग आया। सिंधु घाटी की सभ्यता नगरीय थी, जबकि वैदिक संस्कृति ग्रामीण थी। उल्टा है।

भला कोई सभ्यता नगरीय जीवन से ग्रामीण जीवन की ओर चलती है क्या?

सिंधु घाटी में बड़े - बड़े नगर थे, स्नागार थे, चौड़ी - चौड़ी सड़कें थीं। बेहद उम्दा किस्म की सभ्यता थी। वहीं वैदिक युग में पशुचारक थे, कच्ची मिट्टी के घर थे, नरकूलों की झोंपड़ियाँ थीं। तुर्रा यह कि ये नरकूलों की झोंपड़ियाँ उसी पश्चिमोत्तर भारत में उगीं, जहाँ बड़े -बड़े सिंधु साम्राज्य के भवन थे।

आपको ऐसा इतिहास - बोध उलटा नहीं लगता है?

आप पढ़ाते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता में लेखन - कला विकसित थी और फिर उसके बाद की वैदिक संस्कृति में पढ़ाने लगते हैं कि वैदिक युग में लेखन - कला का विकास नहीं हुआ था। वैदिक युग में लोग मौखिक याद करते थे और लिखते नहीं थे।

ऐसा भी होता है क्या? पढ़ी - लिखी सभ्यता अचानक अनपढ़ हो जाती है क्या?

आप यह भी पढ़ाते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता में मूर्ति - कला थी। फिर उसके बाद पढ़ाते हैं कि वैदिक युग में मूर्ति - कला नहीं थी।

क्या यह सब उलटा नहीं है?

भारत में स्तूप - स्थापत्य, लेखन - कला, मूर्ति - कला, बर्तन - कला आदि का विकास निरंतर हुआ है। कोई गैप नहीं है। यदि इतिहास में ऐसा गैप आपको दिखाई पड़ रहा है तो वह वैदिक संस्कृति को भारतीय इतिहास में ऐडजस्ट करने के कारण दिखाई पड़ रहा है।

यह कैसा इतिहास - लेखन है कि जिन वेदों के खुद का ही ऐतिहासिक साक्ष्य प्राप्त नहीं हैं, उन्हें ही ऐतिहासिक साक्ष्य मान लिया गया है।

ऋग्वैदिक युग, फिर उत्तर वैदिक युग, फिर सूत्रों का युग, फिर महाकाव्यों का युग, फिर धर्मशास्त्रों का युग - ये भारत का भौतिक इतिहास नहीं है।

ये तो संस्कृत साहित्य का इतिहास है। किसी भी देश का भौतिक इतिहास ऐसे नहीं लिखा जाता है, लिखा भी नहीं गया है। साहित्य का इतिहास ऐसे लिखा जाता है।

वैदिक युग सही मायने में इतिहास का टर्मिनोलाॅजी है ही नहीं ! कहीं पढ़े हैं बाइबिल युग, कुरान युग?

वैदिक युग, महाकाव्य युग और सूत्र युग मूलतः इतिहास का नहीं बल्कि संस्कृत साहित्य के चैप्टर्स हैं वरना दुनिया के इतिहास में किसी देश का ऐतिहासिक चैप्टर्स के नाम बाइबिल युग, कुरान युग और हदीस युग नहीं हैं।

वैदिक भाषा पुरानी है और वैदिक संस्कृति भी पुरानी है, तब इस तथ्य की भी पड़ताल की जानी चाहिए कि वैदिक युग के तथाकथित सोने के सिक्के " निष्क " और चाँदी के सिक्के " रजत " कहाँ गए, जबकि धातु के सिक्के सबसे पहले गौतम बुद्ध के युग में मिलते हैं, जिसे " आहत मुद्रा " कहा जाता है।

3.

आज का अध्ययन जबकि पुरावशेषों में फ्लोरीन की मात्रा के मापन, काठ कोयले और हड्डी में रेडियोधर्मिता की मात्रा, भूचुंबकीय अवलोकन और वृक्ष - तैथिकी पर आधारित है, तब सत्ययुग या द्वापर जैसे भोथरे काल मापक से किसी नायक या वस्तु की उम्र तय करना निरर्थक है।

मिसाल के तौर पर, वेदों की रचना सृष्टि के आरंभ में हुई है। केतु वृक्ष 1100 योजन ऊँचे हैं। देवताओं का एक वर्ष मनुष्यों के 131521 दिनों का होता है।

ऐसे मामलों में भारत का भौतिक इतिहास ताम्र, कांस्य, लौह जैसी धातुओं और धूसर, काले, गेरुए जैसे मृद्भांडों की राह पकड़ेगा। मगर सावधानी की जरूरत यहाँ भी है।

आपने एक बार झूठ बोल दिया है कि हड़प्पा सभ्यता के बाद उत्तरी भारत में वैदिक युग आया है। अब इसे साबित करने के लिए आप दूसरा झूठ बोल रहे हैं कि उत्तरी भारत में ताम्र युग के बाद सीधे लौह युग आ गया।

आपने कांस्य युग की सभ्यता को वैदिक युग की झूठी तोप से उड़ा दिया।

पश्चिमोत्तर भारत में ताम्र युग के बाद कांस्य युग आया था। सिंधु घाटी की सभ्यता कांस्य युग का प्रतीक है। मगर पूर्वी भारत में इतिहासकारों ने ताम्र युग के बाद सीधे लौह युग ला दिया और वे कांस्य युग को खा गए।

जब लोहे की खोज नहीं हुई थी, तब लोग ताँबे को ही लोहा कहा करते थे।

ताँबे को लोहा इसलिए कहते थे कि ताँबे का रंग लोहित होता है।

लोहित का अर्थ है - लाल रंग का। लाल रंग का कौन होता है - ताँबा या लोहा ?

जाहिर है कि लाल रंग का ताँबा होता है। इसलिए लोग ताँबे को लोहा कहते थे।

लोहा से ही लहू शब्द बना है। लहू का अर्थ है - खून। खून के रंग का कौन होता है - ताँबा या लोहा?

पालि में ताँबे को लोह (लोहा ) भी कहा गया है। अर्थात पालि तब की है, जब लोहे की खोज नहीं हुई थी। तब सरसरी नजर से ही पालि का इतिहास उत्तरी भारत में ईसा से हजार साल पहले छलाँग मार देता है।

4.

स्तूपों का इतिहास, लेखन -कला का इतिहास, मूर्ति-कला का इतिहास सभी कुछ सिंधु घाटी सभ्यता से निरंतर मौर्य काल और आगे तक जाता है।

बशर्ते कि आप मान लीजिए कि सिंधु साम्राज्य से लेकर मौर्य साम्राज्य और आगे तक टूटती - जुड़ती बौद्ध सभ्यता की कड़ियाँ थीं।

भारत में मौजूद सभी स्तूपों को मौर्य काल के बाद का बताया जाना गलत है। अनेक स्तूप सिंधु घाटी सभ्यता के काल के हैं, कुछ सिंधु घाटी सभ्यता के बाद के हैं, कुछ मौर्य काल के हैं, कुछ मौर्य काल के बाद के भी हैं।

कहीं मिट्टी का स्तूप है, कहीं पत्थर का स्तूप है, कहीं ईंट का स्तूप है तो कहीं संगमरमर का स्तूप है। मनौती स्तूप ... छोटा स्तूप ... मझोला स्तूप ... बड़ा स्तूप ... गोल स्तूप ... चौकोर स्तूप ... अति प्राचीन स्तूप ... प्राचीन स्तूप ...वेदी का स्तूप ...बिना वेदी का स्तूप ... सीढ़ीदार स्तूप ... बिना सीढ़ी का स्तूप !

सभी अलग - अलग प्रकार के सैकड़ों स्तूपों को इतिहासकारों ने मौर्य काल से लेकर कुषाण काल के चंद पन्नों में समेट लिया है।

जबकि इतिहास गवाह है कि सिंधु घाटी सभ्यता में भी स्तूप था और पूर्व मौर्य काल में भी स्तूप था। पिपरहवा का स्तूप मौर्य काल से पहले का है। खुद मौर्य काल में नए स्तूप बने और कई पूर्व मौर्य काल के स्तूपों की मरम्मत हुई, जिसमें निग्लीवा सागर का स्तूप शामिल है।

अभिलेखीय साक्ष्य पुख्ता सबूत देता है कि सम्राट अशोक से पहले भी स्तूपों की परंपरा थी।

आप सम्राट अशोक के निग्लीवा अभिलेख को पढ़ लीजिए, जिसमें लिखा है कि अपने अभिषेक के 14 वें वर्ष में उन्होंने निगाली गाँव में जाकर कोनागमन (कनकमुनि ) बुद्ध के स्तूप के आकार को वर्धित करवाया था। ( चित्र - 1 )

कनकमुनि ( कोनागमन ) बुद्ध का स्तूप सम्राट अशोक के काल से पहले बना था, जिसका संवर्धन उन्होंने कराया था। गौतम बुद्ध से कनकमुनि बुद्ध अलग थे और पहले थे।

भारत और भारत के बाहर जो बड़े पैमाने पर स्तूप मिलते हैं, वे सभी मौर्य काल के बाद के नहीं हैं बल्कि अनेक सिंधु घाटी और मौर्य काल के बीच के भी हैं। मगर इतिहासकार गौतम बुद्ध से पहले स्तूप होने की बात सोचते ही नहीं हैं।

परिणामतः वे मौर्य काल से पहले के बने सभी स्तूपों को भी खींचकर मौर्य काल तथा उसके बाद लाते हैं। यदि वे ऐसा नहीं करते तो सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मौर्य काल तक कहीं भी स्तूपों की श्रृंखला नहीं टूटेगी।

बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को आठ भागों में बाँटा गया तथा उन पर स्तूपों का निर्माण किया गया। जाहिर है कि स्तूपों की निर्माण - कला बुद्ध से पहले भी मौजूद थी।

बुद्ध ने खुद महापुरुषों की शरीर धातु पर स्तूप बनाने को कहा था। उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनंद को चौराहे पर स्तूप निर्मित करने की बात कही थी।

कोई भी शिल्प - कला रातों -रात पैदा नहीं होती है। स्तूप - कला का भी बाकायदे विकास हुआ है। कई पीढ़ियों ने, कई गणों ने इसके विकास में अपना - अपना योगदान किया है।

5.

दुनिया की टाॅप अकादमिक पत्रिकाओं में " साइंस " शुमार है। इसे अमेरीकन एसोसिएशन फाॅर दि एडवांस आॅफ साइंस प्रकाशित करता है।

" साइंस " के अंक 320 में यूनिवर्सिटी ऑफ नेपल्स, इटली के भारत और सेंट्रल एशिया की सभ्यताओं के प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर जिओवान्नि वेरार्डी का मुअनजोदड़ो के स्तूप पर एक लेख छपा है। ( चित्र - 2 )

पुरातत्ववेत्ता वेरार्डी ने गहन जाँच के बाद बताए हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता का स्तूप कोई 2100 ई. पू. का है। स्तूप के नाम को लेकर विवाद हो सकता है। मगर वह इमारत सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन है। यह स्तूप भिक्षुओं के आवास से घिरा है।

आर डब्ल्यू टी एच आकिन विश्वविद्यालय, जर्मनी के पुरातत्ववेत्ता माइकल जेंसन ने वेरार्डी की रिसर्च पर मुहर लगाते हुए लिखा है कि मुअनजोदड़ो का स्तूप सिंधु घाटी सभ्यता के काल का है।

पुरातत्ववेत्ता द्वय ने कहा है कि सिंधु घाटी सभ्यता पर पुनर्विचार करने की जरूरत है क्योंकि यह स्तूप कुषाण काल का नहीं है।

इसीलिए मैं भी कहता हूँ कि सिंधु घाटी की सभ्यता मूलतः बौद्ध सभ्यता है।

जैसा कि भारत और सेंट्रल एशिया की सभ्यताओं के प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता प्रोफेसर जिओवान्नि वेरार्डी ने जाँचोपरांत बताया है कि मुअनजोदड़ो का स्तूप सिंधु घाटी की सभ्यता के समय का है। यह कुषाण कालीन नहीं है।

अब तक इतिहासकार इसे कुषाण कालीन मानते रहे हैं। कारण कि स्तूप के पूरबी बौद्ध मठ से कुषाण कालीन सिक्के मिले हैं।

प्रोफेसर जिओवान्नि वेरार्डी ने कहा है कि स्तूप के काल - निर्धारण में इन सिक्कों की कोई खास भूमिका नहीं है। स्तूप का अस्तित्व सिक्कों से अलग है।

स्तूप की निर्माण-सामग्री, अभिकल्पन, ईंटें, प्लेटफार्म - सब कुछ सिंधु घाटी सभ्यता के समकालीन हैं। ( चित्र - 3 )

चूँकि कुषाण काल बौद्धों के लिए सुनहरा काल था। बौद्धों को पता रहा होगा कि मुअनजोदड़ो का स्तूप किसी पूर्व बुद्ध का है।

शायद यहीं कारण था कि उनकी आवाजाही उस स्तूप तक थी और ऐसे में वहाँ कुषाण कालीन सिक्कों का मिलना असंभव नहीं है।

मोहनजोदड़ो की खुदाई में विशाल स्नानागार मिला है। स्नानागार के आँगन में जलाशय है। जलाशय के तीन ओर बरामदे और उनके पीछे कई कमरे थे।

इतिहासकार मैके ने बताया है कि कमरे वाला स्नानागार पुरोहितों के लिए था, जबकि विशाल स्नानागार सामान्य जनता के लिए था तथा इसका उपयोग धार्मिक समारोहों के अवसर पर किया जाता था।

डी. डी. कोसंबी ने लिखा है कि पूरे ऐतिहासिक युग में ऐसे कृत्रिम ताल बनाए गए हैं : पहले स्वतंत्र रूप में, बाद में मंदिरों के समीप।

सवाल उठता है कि सिंधु घाटी के लोग विशेष धार्मिक अवसरों पर विशाल स्नानागार में पुरोहितों के संग स्नान तथा शुद्धिकरण करके कहाँ जाते थे? मंदिर तो था नहीं। वहीं स्तूप में! स्नानागार के बगल के स्तूप में !!

उत्तरी बिहार के वैशाली में पुरातत्वविदों ने आनंद स्तूप के बगल में ठीक ऐसा ही विशाल स्नानागार खोज निकाला है, जैसा कि मोहनजोदड़ो में है।

1826 में मैसन ने पहली बार हड़प्पा में स्तूप ही देखा था, बर्नेस ( 1831 ) और कनिंघम ( 1853 ) ने भी स्तूप ही देखा था। सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई बाद में हुई।

राखालदास बंदोपाध्याय ने भी 1922 में मोहनजोदड़ो के बौद्ध स्तूप की खुदाई में ही सिंधु घाटी की सभ्यता की खोज की थी।

इसलिए; सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई में स्तूप नहीं मिला है बल्कि स्तूप की खुदाई में सिंधु घाटी की सभ्यता मिली है।

मगर इतिहासकारों को सिंधु घाटी की सभ्यता के इतिहास को ऐसे लिखने में जाने क्या परेशानी है, जबकि सच यही है।

मोहनजोदड़ो की खुदाई में सिर्फ स्तूप ही नहीं, बौद्ध विहार भी मिला था, जिसका विवरण स्वामी शंकरानंद ने " हिस्ट्री आफ मोहनजोदड़ो एण्ड हड़प्पा " में प्रस्तुत किया है। लिखा है कि राखालदास बंदोपाध्याय को 1922 - 23 के शरद मौसम में खुदाई करते एक बौद्ध विहार मिला। विहार का मुख पूरब की तरफ था। पूरबी भाग में दो बड़े सामान्य कक्ष, एक प्रवेश द्वार, गुफानुमा सुरंग, मूर्ति कक्ष एवं सीढ़ियाँ हैं। कुछ छोटे कक्षों का उपयोग भिक्खुओं के अवशेष रखने के लिए किया जाता है। कमरा सं. 22, 27 एवं 29 ऐसे ही कमरे हैं।
( संदर्भ: बौद्ध धर्म: हड़प्पा मोहनजोदड़ो नगरों का धर्म, पृ. 144 )

गुजरात स्थित धोलावीरा सिंधु घाटी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण नगर है। यहाँ स्तूप मिले हैं। उनमें से एक पंजाब स्थित संघोल के धम्म चक्र स्तूप से मेल खाता है। ऐसे स्तूपों में आरे ( वृत में तिल्ली ) बने होते हैं। ( चित्र- 4 )

स्तूप का नाम सुनते ही दिमाग में एक अर्द्ध गोलाकार संरचना की तस्वीर उभरती है।

मगर हर जगह का स्तूप अर्द्ध गोलाकार नहीं है।स्तूप धम्म चक्क के आकार के भी हैं, जिनमें आठ आरे बने हुए हैं। धम्म चक्क में भी 8 आरे हैं।

एक दूसरे स्तूप में आरों की संख्या क्रमशः 12, 24 और 32 है। 24 और 32 की संख्या अशोक - चक्र की याद दिलाती है। अशोक - चक्र में भी 32 और 24 आरे हैं।

ऐसे स्तूप पंजाब के जिला फतेहगढ़ साहिब के गाँव संघोल में मिले हैं। कभी संघोल में भिक्षु संघ था। इसीलिए इसका नाम संघोल है। ( चित्र - 5 )

स्तूप की खुदाई 1968 में हुई थी। स्तूप से एक सोप पत्थर की मंजूषा मिली है।

मंजूषा के ढक्कन पर खरोष्ठी लिपि में एक बौद्ध स्काॅलर का नाम लिखा है। वह स्काॅलर भद्रक थे। उन्हीं का अस्थि - भस्म उस मंजूषा में है।

धोलावीरा का स्तूप संघोल के स्तूप से मेल खाता है।

सिंध साम्राज्य के अनेक नगरों में स्तूप मिले हैं। हड़प्पा में स्तूप मिला है, मोहनजोदड़ो में स्तूप मिला है और फिर धोलावीरा में भी स्तूप मिला है।

जाने क्यों, इतिहासकार बताते हैं कि ये स्तूप कुषाण काल के हैं। भाई, कुषाण काल तो बुद्ध की मूर्तियों के लिए जाना जाता है। यदि सिंधु घाटी सभ्यता के ये स्तूप कुषाणों ने बनवाए तो वे सिर्फ स्तूप ही क्यों बनवाते?

वे तो सिंधु घाटी की गली - गली में ... हर चौक - चौराहे पर बुद्ध की मूर्तियाँ बनवाते। वे तो गांधार कला के आविष्कारक थे और बुद्ध की मूर्तियों के लिए तो कुषाण राजे इतिहास में जाने जाते हैं।

यदि सिंध साम्राज्य के ये स्तूप कुषाण काल के हैं तो कुषाणों से करीब डेढ हजार साल पहले तो आपके अनुसार आर्य आए थे, जो सिंध साम्राज्य पर कब्जा किए। फिर वे सिंधु घाटी के डगर - डगर में मंदिर, अवतारों की मूर्तियाँ क्यों नहीं बनवाए?

मान लीजिए कि 1500 ई. पू. में आर्यों का आक्रमण हुआ और हड़प्पा - मुअनजोदड़ो नेस्तनाबूद हो गए। सिंध साम्राज्य जीत लिया गया और आर्य साम्राज्य स्थापित हो गया तो क्या सिंध साम्राज्य के ऊपरी लेयर पर आर्य साम्राज्य के निशान मिलते हैं?

क्या मंदिर मिलते हैं ? ... क्या संस्कृत मिलती है ? ... कोई वैदिक देवी - देवता मिलते हैं? ...क्या इंद्र वंश का शासन आया?... क्या वरूण वंश का राज आया?... नहीं।

6.

इतिहासकार मौर्य साम्राज्य पर शुंगों के कब्जे को ही आर्य आक्रमण बताते हैं और उसे पीछे खींचकर 1500 ई. पू. में ले जाते हैं क्योंकि इसके बाद धीरे- धीरे आर्य- सभ्यता के तमाम निशान मिलने लगते हैं ... संस्कृत ... यज्ञ ... मंदिर आदि- आदि।

वैदिक साहित्य में लिखित " दास " कौन है?

भारत और पश्चिम के अनेक इतिहासकारों ने " दास " की अनेक व्याख्याएँ की हैं। उस भूल - भुलैया में हमें नहीं पड़ना है।

दास मूल रूप से " बौद्ध " थे। साँची और भरहुत के स्तूपों पर अनेक दास तथा दासी उपाधिधारक बौद्धों के शिलालेख हैं, जिन्होंने स्तूप - निर्माण में मदद की थी।

अरहत दास थे ....अरहत दासी थीं ....यमी दास थे.... जख दासी थीं .....अनेक ...सभी के नाम लिखे हुए हैं।

साँची स्तूप पर थूप दास का वर्णन है। लिखा है - मोरगिरिह्मा थूपदासस दान थंभे। ( चित्र - 6 )

थूप दास मोरगिरि ( महाराष्ट्र ) के निवासी थे और भरहुत के एक स्तंभ - निर्माण में मदद की थी।

वैदिक साहित्य में वर्णित आर्यों का सांस्कृतिक संघर्ष इन्हीं बौद्ध दास - दासियों से हुआ था।

वैदिक साहित्य इन दास - दासियों के बारे में बताता है कि ये लोग यज्ञ नहीं करते और न ये इंद्र - वरुण की पूजा करते हैं...स्पष्ट है कि ये बौद्ध हैं।

प्राकृत भाषा में " दास " ( दसन ) का अर्थ द्रष्टा है। मगर आर्यों ने सांस्कृतिक दुश्मनी के कारण अपनी पुस्तकों में " दास " का अर्थ " गुलाम/ नौकर " कर लिए हैं।

दास और आर्यों का यह सांस्कृतिक संघर्ष 1500 ई.पू. में नहीं बल्कि मौर्य काल के बाद हुआ था।

सभी शिलालेख पढ़ जाइए। मौर्य काल तक किसी भी पुरुष और महिला के नाम में " दास / दासी " नहीं जुड़ा है।

दास/ दासी जुड़े नाम शिलालेखों में मौर्य काल के बाद दिखाई पड़ते हैं। साँची - भरहुत के स्तूपों पर पहली बार अनेक नाम दास / दासी से जुड़े दिखाई पड़ते हैं।

दास / दासी से जुड़े ये सभी नाम बौद्धों के हैं।

इन्हीं दास / दासियों से आर्यों का वैचारिक संघर्ष हुआ था, जो वेदों में लिखा हुआ है।

वेदों में लिखे आर्य - दास संघर्ष को हम कतई मौर्य काल से पहले नहीं ले जा सकते हैं। कारण कि मौर्य काल तक हमें दास/ दासी उपाधि धारक कोई नाम मिलता ही नहीं है।

वेद और वेदों में वर्णित यह सांस्कृतिक संघर्ष की गाथा मौर्य काल के बाद की है।

यहीं कारण है कि ऋग्वेद में भी स्तूपों के संदर्भ मिलते हैं और रामायण में चैत्यों के मिलते हैं।

यह तो बहुत बताया जाता है कि ऋग्वेद में गंगा का एक बार और यमुना का तीन बार वर्णन है, मगर यह बहुत कम बताया जाता है कि ऋग्वेद में स्तूप का वर्णन दो बार है।

संस्कृत का स्तूप मूल रूप से पालि थूप का बिगड़ा हुआ रूप है। पालि में थूप से अनेक शब्द बनते हैं जैसे थूप, थूपिका, थूपीकत, थूपारह आदि।

मगर संस्कृत में स्तूप से अनेक शब्द नहीं बनेंगे। कारण कि स्तूप संस्कृत के लिए बाहरी शब्द है। किसी भी भाषा में अमूमन बाहरी शब्द बाँझ होते हैं। उनमें शब्दों को जनने की क्षमता नहीं होती है।

संस्कृत के लिए स्तूप बाँझ शब्द है। इसीलिए संस्कृत का स्तूप पालि थूप का रूपांतरण है और वे भाष्यकार जो ऋग्वेद में प्राप्त स्तूप की व्याख्या किसी अन्य अर्थ में करते हैं, वे गलत हैं।

"स्तूप ....बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः"
अर्थात इसमें बुद्ध अन्तर्निहित हैं।

यह ऋग्वेद के प्रथम मंडल, सूक्त 24, छठवाँ अनुवाक का श्लोक संख्या 7 है। इसमें राजा वरुण को अबौद्ध (अबुध्ने) राजा भी कहा गया है। पूरा का पूरा अर्थ एक दूसरे से जुड़ा हुआ है।

सायण भाष्य में अर्थ कुछ भिन्न है।

"अबुध्ने राजा वरुणो वनस्योर्ध्वं स्तूपं ददते पूतदक्षः नीचीना स्थुरुपरि बुध्न एषामस्मे अन्तर्निहिताः केतवः स्युः॥७॥" ( चित्र - 7)

अर्थात पवित्र पराक्रम युक्त राजा वरुण (सबको आच्छादित करने वाले) दिव्य तेज पुञ्ज सूर्यदेव को आधाररहित आकाश में धारण करते हैं। इस तेज पुञ्ज सूर्यदेव का मुख नीचे की ओर और मूल ऊपर की ओर है। इससे मध्य में दिव्य किरणें विस्तीर्ण होती चलती हैं।

परन्तु यह अर्थ जो सायण भाष्य पर आधारित है, गलत है। लगभग सभी अनुवादकों ने ऐसा ही अर्थ किया है। अर्थ करते वक्त संदर्भ को देखना जरूरी होता है। जैसा कि उपरोक्त से स्वतः स्पष्ट है कि वरुण राजा की उपाधि अबुध्ने है। मतलब कि वरुण बौद्ध विरोधी राजा थे। आगे स्तूप को उलटने की बात है।

अशोक द्वारा 84000 स्तूप बनाए जाने का जिक्र फाहियान ने अपने यात्रा - विवरण के 27 वें खंड में किए हैं।

साँची एवं भरहुत स्तूपों का निर्माण मूल रूप से अशोक ने ही कराया था। ह्वेनसांग ने अशोक द्वारा निर्मित अनेक स्तूपों का उल्लेख किया है, जिन्हें उसने खुद देखा था।

सारनाथ तथा तक्षशिला स्थित धर्मराजिका स्तूप का निर्माण भी मूलतः अशोक के समय में ही कराया गया था। बाद के शासकों ने उन्हें परिवर्धित करवाए।

मीनाण्डर यवन थे। विदेशी थे। लेकिन धम्म की राह चुनी थी। बुतकारा स्तूप के पहले लेयर को अशोक ने बनवाए थे तो दूसरे को मीनाण्डर ने बनवाए थे। दूसरे लेयर से मीनाण्डर का सिक्का मिला है।

मीनाण्डर बड़े दार्शनिक थे...इंडो -यूनानी इतिहास में दूजा नहीं हुआ।

सो वे बड़े न्यायप्रिय थे। न्यायप्रियता ने इन्हें जनता में बड़ी शोहरत दिलाई थी।

एक दिन एक शिविर में अचानक इनकी मृत्यु हुई।

प्लूटार्क ने लिखा है कि मीनाण्डर के भस्म को लेकर जनता में झगड़े उठ खड़े हुए ....क्योंकि वे इतना जनप्रिय थे कि लोग उनके भस्म पर अलग - अलग स्तूप बनाना चाहते थे।

भारत के इतिहास में बुद्ध के बाद मीनाण्डर, मीनाण्डर के बाद कबीर और कबीर के बाद नानक का नाम आता है, जिनके मृत शरीर को भी अपनाने के लिए जनता व्याकुल थी।

क्षेमेन्द्र रचित अवदानकल्पलता से पता चलता है कि मीनाण्डर ने अनेक स्तूपों का निर्माण कराया था।

सम्राट अशोक के बाद पश्चिमोत्तर तथा उत्तरी भारत में सर्वाधिक स्तूप बनवाने का श्रेय कनिष्क को है।

उन्होंने विभिन्न स्थानों पर अनेक स्तूप बनवाए। पेशावर के निकट कनिष्क ने एक बड़ा स्तूप बनवाए थे, जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे गए थे। एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि इसे एक यूनानी इंजीनियर अगिलस ने बनाया था।

जाहिर है कि यूनानी अभियंताओं ने यूनानी तकनीक का प्रयोग किया। यहीं ग्रीको - बुद्धिस्ट कला है, जिससे स्तूप - निर्माण भी अछूता नहीं रहा।

गंधार क्षेत्र के स्तूपों का वास्तु - विन्यास मध्य भारतीय स्तूपों जैसा नहीं है। गंधार स्तूप काफी ऊँचे हैं, चढ़ने के लिए सीढ़ियाँ हैं और संपूर्ण स्तूप एक बुर्ज जैसा दिखाई देता है।

कनिष्क के पुरुषपुर स्थित 400 फीट ऊँचा स्तूप का विवरण फाहियान तथा ह्वेनसांग दोनों ने दिए हैं। फाहियान ने लिखा है कि उसने जितने भी स्तूप देखे थे, उनमें यह सर्वाधिक प्रभावशाली है।

तक्षशिला स्थित धर्मराजिका स्तूप का निर्माण अशोक के समय में हुआ, किंतु कनिष्क के समय में आकारवर्धन हुआ। ऊँचे चबूतरे पर निर्मित यह स्तूप गोलाकार है। चारों दिशाओं में चार सीढ़ियाँ हैं। ( चित्र - 8 )

कनिष्क के काल में बल्ख तथा खोतान तक अनेक स्तूप निर्मित करवाए गए थे। मनिक्याल क्षेत्र में कई स्तूप बने थे। मनिक्याल, रावलपिंडी से 20 मील की दूरी पर है। यहाँ से प्राप्त एक अभिलेख से पता चलता है कि कनिष्क के 18 वें वर्ष में इन स्तूपों को बनवाया गया था।

सिर्फ बुद्ध के अवशेषों पर ही नहीं बल्कि कनिष्क ने बौद्ध साहित्य की टीकाओं को भी ताम्रपत्र पर उत्कीर्ण करा कर विशेष रूप से निर्मित एक स्तूप में सुरक्षित रखवाया था। ह्वेनसांग ने इस पर विस्तार से लिखा है।

स्तूप- निर्माण की परंपरा अशोक और कनिष्क के बाद हर्षवर्धन के शासन-काल में सर्वाधिक समृद्ध हुई।

सम्राट हर्षवर्धन ने विक्रमादित्य की नहीं बल्कि शीलादित्य की उपाधि धारण की थी। शीलादित्य वह है, जिसे विक्रम ( बल ) से अधिक शील पसंद हो।

वहीं शील जिसे बुद्ध ने अपनी देशना में प्रमुख स्थान दिया था।

वो शिलादित्य ऐसे शीलवान निकले कि हर 5 वें वर्ष अपना संपूर्ण खजाना गरीबों- असहायों को दान कर देते थे।

ह्वेनसांग ने लिखा है कि उन्होंने गंगा के किनारों पर कई हजार स्तूप सौ - सौ फीट ऊँचे बनवाए।

सब स्थानों पर जहाँ - जहाँ गौतम बुद्ध के कुछ भी चिह्न थे, संघाराम स्थापित किए।

इतिहास से सवाल है कि आखिर शीलादित्य के बनवाए हजारों स्तूप और संघाराम कहाँ गए?

ह्वेनसांग ने पूर्वी भारत में अशोक द्वारा निर्मित ताम्रलिप्ति, कर्णसुवर्ण, समतट और पुण्ड्रवर्धन में स्तूपों का उल्लेख किया है। महास्थानगढ़ अभिलेख से भी यह पुष्ट होता है। बाद के पाल शासकों ने पूर्वी भारत में बौद्ध धर्म का संरक्षण प्रदान किए।

पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में पाल कालीन अनेक स्तूपों के अवशेष मिलते हैं।

पाल वंश के बड़े राजाओं में देवपाल ( 810 - 850 ) शुमार हैं। उत्साही बौद्ध थे। 40 बरसों का शासन था। सुजाता स्तूप का आखिरी पुनर्निर्माण इन्होंने ने ही कराए थे। वहाँ के उत्खनन से प्राप्त एक अभिलेख से इसकी पुष्टि होती है। ( चित्र - 9 )

पश्चिमोत्तर और उत्तरी भारत में स्तूप - निर्माण की जो परंपरा सिंधु घाटी सभ्यता से चली थी, वह पाल कालीन पूर्वी भारत में 12 वीं सदी तक अनवरत चलती रही।

7.

बौद्ध सभ्यता के प्रचार - प्रसार का जो काम उत्तर के मौर्यों ने किया, वही काम दक्षिण में सातवाहनों ने किया।

अशोक के सभी अभिलेख प्राकृत में हैं तो सातवाहनों के भी सभी अभिलेख प्राकृत में हैं।

उत्तर में मौर्य काल तक संस्कृत के अभिलेख नहीं मिलते हैं तो दक्षिण में भी सातवाहन काल तक संस्कृत के अभिलेख नहीं मिलते हैं।

मौर्यों ने अनेक स्तूप, चैत्य और विहार बनवाए तो सातवाहनों ने भी अनेक स्तूप, चैत्य और विहार बनवाए।

अमरावती, गोली, जगय्यपेटा, घंटसाल, भट्टीप्रोलु, नागार्जुन कोंडा जैसे स्थानों के स्तूप इन्हीं सातवाहनों के हैं। ( चित्र- 10 )

बौद्ध स्थलों में से पूर्वोत्तर भारत स्थित बौद्ध स्मारकों का जिक्र कम होता है। हिंदी इतिहासों में इसका उल्लेख नगण्य है।

त्रिपुरा के सेपहीजाला जिले में बोक्सानगर है। बोक्सानगर का प्राचीन नाम अभिलेखों के आधार पर बिराक बताया जाता है। यह एक विराट बौद्ध स्थल है।

इस विराट बौद्ध स्थल को खुदाई से पहले मानसा का स्मारक कहा जाता था। मानसा सर्पों की देवी हैं। साल 1997 के जुलाई महीने में पुरातत्वविद डाॅ. जीतेन्द्र दास यहाँ आए। उन्हें यहाँ गौतम बुद्ध की मूर्ति मिली। वे अनुमान कर लिए कि बोक्सानगर बौद्ध स्थल है और इसकी सूचना उन्होंने पुरातत्व विभाग को दे दी।

पुरातत्व विभाग ने 2001 से 2004 तक बोक्सानगर की खुदाई की। खुदाई में विशाल बौद्ध स्तूप, चैत्यगृह, बौद्ध विहार, बुद्ध की कांस्य मूर्तियाँ, ब्राह्मी अभिलेखित सील तथा अन्य बौद्ध अवशेष मिले। ( चित्र - 11)

स्तूप विशाल और शानदार है। चैत्यगृह आयताकार और स्तूप के पूरब दिशा में है। चैत्यगृह से पूरब बौद्ध विहार है। बौद्ध विहार का गलियारा काफी लंबा है। गलियारा के दोनों ओर भिक्षुओं के लिए कमरे बने हैं।

दक्षिण त्रिपुरा में पिलक है। पिलक का प्राचीन नाम पिरोक बताया जाता है। पिलक की पहचान भी बौद्ध स्थल के रूप में हुई है। पिलक के उत्खनन से भी बौद्ध स्तूप और बुद्ध की अनेक मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

पूर्वोत्तर भारत कभी बौद्ध सभ्यता के प्रभाव में था।

न केवल संपूर्ण भारत में बल्कि भारत के बाहर भी स्तूप बनाए जाने की समृद्ध परंपरा रही है prof Dr Rajendra Prasad Singh

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 25 May 2020 at 9:02 PM -

कुम्भ

।।कुम्भ।।
-राजेश चन्द्रा-

मिथक व किंवदंतियों से परे वर्तमान में प्रचलित कुम्भ पर्व का अपना इतिहास भी है।

ईस्वी 636 में चीनी यात्री ह्वेनसांग भारत की यात्रा पर थे। वह महज़ यात्री भर नहीं थे बल्कि वे एक बौद्ध भिक्षु भी थे। विश्व के प्राचीनतम विश्वविद्यालय, नालन्दा विश्वविद्यालय, ... में रह कर उन्होंने बुद्ध धम्म का गहन अध्ययन किया था। चारो तरफ उनकी विद्वता की ख्याति थी। उन्होंने धम्म का बौद्धिक अध्ययन मात्र नहीं किया था बल्कि आध्यात्मिक साधनाओं का गहन अभ्यास भी किया था। उनकी प्रतिभा की चारो ओर चर्चा थी।

न केवल इतना, बल्कि महान भिक्खु ह्वेनसांग ने भगवान बुद्ध के चरण चिन्हों का अनुगमन भी किया था। जहाँ-जहाँ भगवान बुद्ध ने चारिका की थी, पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण चारों दिशाओं में, लगभग उन सारे स्थानों की पूज्य ह्वेनसांग ने श्रद्धापूर्वक यात्रा की थी। उन्होंने उन सारे स्थानों का विस्तृत विवरण लिपिबद्ध किया था। इस कारण बौद्धकालीन भारत के इतिहास का सबसे प्रमाणिक स्रोत ह्वेनसांग का यात्रा विवरण माना जाता है। आज भी उत्खनन में यदि कहीं बौद्ध अवशेष मिलते हैं तो उसकी पुष्टि ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से की जाती है। आज भूखण्ड पंजीकरण, खसरा-खतौनी, दाखिल-ख़ारिज में मापन की जो पद्यति अपनायी जाती है ह्वेनसांग ने बौद्ध स्थलों के चिन्हीकरण में उन सबका सटीक व बारीक इस्तेमाल किया है। यथा जब कोई भूखण्ड पंजीकृत किया जाता है तो चिन्हांकन के लिए भूखण्ड के पूर्व-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण दिशा में क्या-क्या है इस विवरण को सन्दर्भ बनाया जाता है जैसे कि, भूखण्ड के सामने सड़क है, पीछे मकान या भूखण्ड है, दाएं-बाएं अमुक भूखण्ड संख्या है। ह्वेनसांग ने इसी पद्धति से दो हजार साल पहले पूरे भारत को नाप लिया, हर बौद्ध तीर्थ का चिन्हांकन किया और इन्हीं चिन्हांकनों के आधार पर पुरातत्वविद धरातल से लुप्त हो चुके बौद्ध स्थलों का उद्धार कर सके।

ब्रिटिश काल में विलियम जोन्स तथा जनरल कनिंघम ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की थी। पुरातात्विक उत्खनन के स्थानों को चिन्हित करने में जनरल कनिंघम को सबसे अधिक मदद ह्वेनसांग के यात्रा विवरणों से मिली थी। आज भारत में जो भी बौद्ध स्थल जीवन्त दिख रहे हैं - बोधगया, श्रावस्ती, सारनाथ, संकिसा, कुशीनगर, सांची, नालन्दा विश्वविद्यालय के अवशेष इत्यादि- सबके उत्खनन में ह्वेनसांग के यात्रा विवरण जानकारी के मुख्य स्रोत रहे हैं।

भारत की यात्रा के दौरान ईस्वी 636 में वह कानपुर पहुँचे। उस काल में कानपुर को कान्यकुब्ज कहते थे और ह्वेनसांग ने अपने चीनी उच्चारण में इस समृद्ध नगर को 'कानुकुरो' लिखा है। उस काल में कानुकुरो वस्त्र उत्पादन का महत्वपूर्ण केन्द्र था। ब्रिटिश काल तक वस्त्र उत्पादन के क्षेत्र में कानपुर को भारत का मैनचेस्टर कहा जाता था।

ह्वेनसांग ने विवरण दिया है कि कानपुर में उस समय सौ बुद्ध विहार थे जिनमें दस हजार बौद्ध भिक्षु रहते थे।

ह्वेनसांग कानपुर से कन्नौज पहुँचे। उस समय कन्नौज साम्राज्य पर सम्राट हर्ष वर्धन का शासन था। जब भिक्खु ह्वेनसांग कन्नौज पहुँचे उस समय सम्राट हर्ष वर्धन एक विजय अभियान पर बंगाल में थे। ह्वेनसांग चारिका करते हुए असम पहुँच गये जहाँ सम्राट भास्कर वर्मन का शासन था। सम्राट ने महान भिक्षु ह्वेनसांग का भव्य स्वागत-सत्कार किया।

यह वह काल था जब भारतमें सर्वत्र बुद्ध धम्म व्याप्त था। सम्राट अशोक के समय से शुरू हुआ बुद्ध धम्म का स्वर्णिम काल अपने शिखर पर था। शासक और सम्राट तो हमेशा से प्रजा व जनता की भावनाओं के अनुरूप बर्ताव करते हैं। सम्राट भी बुद्धानुयायी व बुद्ध धम्म के पोषक थे।

कन्नौज वापस आकर सम्राट हर्षवर्धन को जब यह ज्ञात हुआ कि महान बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग उनके साम्राज्य में आकर चले गए हैं तो उन्हें बड़ा पछतावा हुआ। अपने दूतों के द्वारा उन्हें मालूम हुआ कि ह्वेनसांग अभी आसाम में है। उन्होंने तत्काल सम्राट भास्कर वर्मन के पास संदेश भेजा कि वह पूज्य ह्वेनसांग को स्वयं लेकर कन्नौज में पधारें। भास्कर वर्मन के साथ सम्राट हर्ष वर्धन के मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थे। पूज्य ह्वेनसांग को कन्नौज आमंत्रित करने के लिए उन्होंने अपने साम्राज्य में एक विशाल धम्म परिषद रखी जिसकी अध्यक्षता के लिए पूज्य ह्वेनसांग को आमंत्रित किया।

पूज्य ह्वेनसांग के विवरण के अनुसार ही कन्नौज की उस धम्म परिषद में उस काल में 20 देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हुए तथा पूरे भारत से 30000 बौद्ध भिक्षु एकत्रित हुए। यह परिषद 18 दिन चली। आज भी यह विवरण पढ़ कर गर्व होता है कि भारत की एक धम्म परिषद में 20 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए और तीस हजार भिक्खु सम्मिलित हुए। 18 दिन तक निरंतर चलने वाली इस धम्म परिषद में हजारों की संख्या में उपासक-उपासिकाओं ने धम्म सेवा की, भिक्खुओं को भोजन दान दिया, वस्त्र दान किया, औषधि दान किया, अष्ट परिष्कार दान किया। 30000 बौद्ध भिक्षुओं को कानपुर और कन्नौज के वस्त्र व्यापारियों ने चीवर दान किया क्योंकि कन्नौज और कानपुर उस समय वस्त्र उत्पादन का प्रमुख केंद्र था। जिन शद्धालु लोगों ने विशाल भिक्खु संघ को चीवर दान किया, उन्हें चीवर रंग कर दिया, श्रद्धा और भक्ति से पूज्य भिक्खु संघ को दान दिया, धम्म सेवा की, कन्नौज का वही समुदाय आज अपने को कन्नौजिया लिखता है। आज का कन्नौजिया समाज मौलिक रुप से बौद्ध उपासक समाज है।

कन्नौज की महान धम्म परिषद के उपरान्त महान भिक्षु ह्वेनसांग स्वदेश अर्थात चीन लौट जाने को तत्पर हुए तो सम्राट हर्ष वर्धन ने उनसे पुनः कुछ और दिन रुक जाने का आग्रह किया।

साधु को कोई रोटी और कपड़े के लिए न बुला सकता है, न रोक सकता है। साधु को सिर्फ धर्म के लिए बुलाया जा सकता है और सिर्फ धर्म के लिए रोका जा सकता है। जो रोटी और कपड़े के लिए बुलाने पर आ जाए और रोकने पर रुक जाए वह साधु ही नहीं है।

महान भिक्षु ह्वेनसांग को कुछ और दिन भारत में रोक लेने के लिए बौद्ध श्रद्धालु सम्राट शीलादित्य, जो इतिहास में हर्ष वर्धन के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं, ने अपने राज्यान्तर्गत प्रयाग के तट पर एक "महामोक्ष्य परिषद" का आयोजन किया, सन् 644 में, जिसमें पूज्य भिक्खु संघ को असदृशदान दिया गया जैसा असृदशदान राजा प्रसेनजित, राजा बिम्बिसार के द्वारा भगवान बुद्ध के समय में किया गया था। असृदशदान का वही महान पर्व आज "कुम्भ" कहलाता है तथा सम्राट हर्षवर्धन ने इसे प्रतिवर्ष दान पर्व और प्रत्येक बारह वर्ष पर महादान पर्व के रूप में स्थापित किया। कहते हैं कि एक अवसर पर उसने अपने वस्त्र तक दान कर दिये थे उसकी बहन ने उसे वस्त्र प्रदान किये। कुम्भ पर्व मौलिक रूप से एक बौद्ध पर्व है जो आज अपभ्रंशित स्वरूप में प्रचलन में दिखता है। यह पर्व मौलिक रूप से बौद्ध साधुओं को महादान देने का उत्सव था।

दान पर्व जब सम्राट आयोजित कर रहा हो तो पात्र से अधिक अपात्र इकठ्ठा होने लगते हैं। यह अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि खोटा सिक्का असली मुद्रा को चलन से बाहर कर देता है। अगर किसी की जेब में एक नकली और दूसरी असली मुद्रा हो तो मुद्राधारक का पहला प्रयास रहता है कि नकली मुद्रा चला दी जाए। इस सरल से सिद्धांत के कारण नकली मुद्रा असली मुद्रा को चलन के बाहर कर देती है। कुम्भ पर्व के साथ यही हुआ है। साधु से अधिक असाधु इकट्ठा होने लगे। श्रद्धा पर अंधश्रद्धा का प्रचार होने लगा। इतिहास पर मिथक हावी होने लगा। पराकाष्ठा यहाँ तक हो गयी कि कालान्तर में बौद्ध उपासक-उपासिकाओं तथा भिक्खुओं को बेदखल करने के लिए नग्न स्नान की परम्परा शुरू हुई, नतीजतन साधुओं की कुटियां 'अखाड़े' बन गये, इतिहास पर मिथक हावी हो गया। नग्न स्नान की परम्परा आज भी पूरी दुनिया में भारत का कितना अपमान कराती है कि हर भारत प्रेमी आहत महसूस करता है। नग्न स्नान की इस निर्लज्ज परम्परा ने एक महान आध्यात्मिक पर्व की आध्यात्मिकता और धार्मिकता को तार-तार कर दिया है और यह सब कुछ कथित धर्म के नाम पर हो रहा है, पूरे महिमामण्डन के साथ हो रहा है। किसी कथित धर्म प्रेमी में यह कहने का साहस नहीं है कि यह निर्लज्ज परम्परा कानूनन बन्द किया जाना चाहिए।

उज्जैन के कुम्भ की शुरुआत 18वीं शताब्दी में हुई। मराठा शासक रानोजी शिन्दे ने उज्जैन के एक स्थानीय उत्सव के लिए नासिक से साधुओं को आमंत्रित किया। सम्राट हर्षवर्धन का अनुकरण करते हुए रानोजी शिन्दे ने भी इस उत्सव को महादान का स्वरूप दिया।

मराठा शासक रानोजी शिन्दे की पहल के परिणामस्वरूप कालान्तर में नासिक और उज्जैन के साधुओं की परस्पर प्रतिस्पर्धा ने क्षिप्रा के तट पर उज्जैन में और गोदावरी के तट पर नासिक में कथित कुम्भ की शुरुआत हुई, वहाँ भी 'अमृत' बूंदें गिर गयीं। हरिद्वार के गंगा तट इसका विस्तार सम्राट हर्षवर्धन के समय ही हो चुका था और ब्रिटिश काल तक आते-आते यह एक स्थापित पर्व बन चुका था।

प्रसिद्ध इतिहासज्ञ डी. पी. दुबे का कथन है: "किसी भी हिन्दू ग्रन्थ में प्रयाग मेला कुम्भ मेला के रूप में दर्ज़ नहीं है।"
'कुम्भ मेला' का पहला लिखित विवरण इस्लामी इतिहास ग्रंथों 'खुलासत-उल-तवारीख'(सन् 1695) और 'चाहर गुलशन'(सन् 1759) में मिलता है।

आधुनिक काल में 'कुम्भ मेला' का सर्वप्रथम उल्लेख ब्रिटिश काल की एक आख्या, रिपोर्ट, में सन् 1868 में "Coomb fair" के रूप में मिलता है जो कि सन् 1870 में होना था। मैक्लियन के विवरणानुसार:" प्रयाग के प्रयागवाल ब्राह्मण ने सर्वप्रथम तीर्थ की महत्ता को महिमामण्डित करने के लिए माघ मेला को कुम्भ के रूप में आत्मसात किया।"

इन ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में देखें तो आज का वर्तमान कुम्भ मौलिक रूप से बौद्धों के द्वारा स्थापित महादान का एक महापर्व है- महामेक्ष्य परिषद। समय की मांग तो यह है कि इस पर्व को भारत पर्व बना दिया जाए जहाँ समता-स्वतंत्रता-बन्धुता-न्याय का उत्सव हो क्योंकि यह भी दुनिया में एक अनुपम मिसाल है जहाँ बिना निमंत्रण के लाखों की संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं, विविध भारत एक दिखता है। यह भारत की एकता का पर्व भी बनाया जा सकता है। इसकी पहल हर भारत प्रेमी को करना चाहिए। इसकी मौलिक आध्यात्मिकता व धार्मिकता को संरक्षित करना हर भारत प्रेमी का नैतिक कर्तव्य है। जिस दिन यह पर्व अपनी मौलिक आध्यात्मिकता को पुनः उपलब्ध होगा भारत फिर विश्व गुरू होगा।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 19 Apr 2020 at 3:31 PM -

राजेश चंद्रा

।। आर्य ।।
-राजेश चन्द्रा-

"आर्य भारत के बाहर से आए", यह वाक्य तकनीकी तौर पर त्रुटिपूर्ण है। बल्कि सही कथन यह होगा:" जो भारत के बाहर से आए उन्होंने स्वयं के लिए आर्य सम्बोधन प्रयोग करना शुरू किया और क्रमशः लोग उन्हें आर्य कहने लगे"।
इस स्थापना ... के लिए कुछ तथ्यों पर ध्यान देना होगा।
भगवान बुद्ध द्वारा उपदिष्ट प्रथम धम्मोपदेश में चार "आर्य" सत्य उद्घोषित किये गये हैं। बुद्धत्व के आठ अंगों को "आर्य" अष्टांग मार्ग कहा गया है। "आर्य" विनय, "आर्य" मौन, "आर्य" संघ इत्यादि शब्दों का भगवान के उपदेशों में बार-बार प्रयोग किया गया है। मूलतः पालि भाषा में 'अरिय' अथवा 'अरियो' शब्द है जिसे संस्कृत में "आर्य " उच्चारित किया गया, जैसे अरिय सच्चानि अर्थात आर्य सत्य; अरियोअट्ठंगिकोमग्गो अर्थात आर्य अष्टांग मार्ग, आदि।
"संस्कृत" शब्द का अर्थ ही होता है- संस्कारित किया हुआ। पालि और प्राकृत भाषा को कथित रूप से संस्कारित करके जिस नयी भाषा ने जन्म लिया उसका ही नाम संस्कृत है।
भाषा विज्ञानी जानते हैं कि प्रत्येक भाषा भाषा से पहले बोली होती है। व्याकरणबद्ध होने के बाद बोली भाषा बनती है। भगवान बुद्ध के समय तक यह एक बोली थी जिसे छांदस कहा जाता था। वेद भगवान के समय भी अस्तित्व में थे मगर सिर्फ तीन वेद अस्तित्वगत थे क्योंकि पालि ग्रंथों में तिवेदपारगू अर्थात तीन वेदों में पारंगत, यह शब्द कई-कई बार प्रयुक्त हुआ है। एक माणवक भगवान से निवेदन करता है कि वह बुद्ध वचनों को छांदस में रूपांतरित करना चाहता है जिसे भगवान ने इंकार कर दिया था। यह प्रसंग विनयपिटक में है। कालान्तर में आचार्य पाणिनि ने छांदस को व्याकरणबद्ध करके जिस भाषा को जन्म दिया उसका ही नाम संस्कृत है। वेदों की छांदस के लिए सायण भाष्य एवं व्याकरण का सहारा लिया जाता है न कि पाणिनि व्याकरण को। इसी क्रम में पालि व प्राकृत शब्दों को कथित तौर पर संस्कारित करके धम्म को धर्म, कम्म को कर्म, चक्क को चक्र, अरिय को आर्य, दिट्ठि को दृष्टि, सब्ब को सर्व, सम्मा को सम्यक, पवत्तन को प्रवर्तन, समञ्ञ को श्रमण, पिय को प्रिय इत्यादि बनाया गया। रोचक तथ्य यह है कि संस्कृत भाषा ने अपने उदयकाल में सर्वप्रथम बौद्ध ग्रंथों को ही संस्कृत में रूपांतरित किया। इसी से महायान का जन्म हुआ। सारे महायानी ग्रन्थ संस्कृत में हैं। संस्कृत के महाकाव्य इत्यादि बाद की रचनाएँ हैं। यहाँ तक कि संस्कृत साहित्य का मूल स्रोत बौद्ध ग्रन्थ हैं। अधिकांश मिथकीय कथानक जातक कथाओं से लिए गये हैं। यहाँ तक कि रामायण के कथानक का मूल स्रोत दशरथ जातक एवं महाभारत का स्रोत युधिष्ठिर जातक है। यक्षप्रश्न प्रसंग पूरा का पूरा खुद्दकनिकाय के धम्मपद अट्ठकथा का अनुवाद है। देव, इन्द्र, देवी, विश्वकर्मा, पूर्व जन्म- पुनर्जन्म, भाग्य, कर्म फल, ध्यान-साधना, ब्रम्हा इत्यादि समस्त धारणाएं मूलतः पालि ग्रंथों में हैं जिनका संस्कृत ग्रंथों में उपयोग करके नये मिथकीय कथानकों की रचना की गयी । इसी नाते पालि व संस्कृत ग्रंथों में समान पात्रों व शब्दों को देख कर विद्वज्जन प्रायः भ्रमित भी हो जाते हैं, वे निर्णय नहीं कर पाते कि किसने किसकी नकल की है। इसी भ्रम का लाभ- जिसे अंग्रेजी में 'बैनिफिट्स आफ डाउट' कहते हैं- संस्कृत साहित्य उठा ले जाते हैं। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन और डा. भदन्त आनन्द कौस्ल्यायन ने अपने ग्रंथों में संदर्भ सहित इस पर विस्तार से लिखा है। लेकिन संस्कृत ग्रंथों में वर्णव्यवस्था का समावेश संस्कृत साहित्यकारों की अपनी मौलिक रचना है, इसका आधार पालि ग्रंथ नहीं हैं।
सच यह है कि पहले से प्रचलित कथानकों को मिटाना मुश्किल है, उनकी लोकस्वीकार्यता होती है, लेकिन लेकिन प्रचलित कथानकों का स्वरूप परिवर्तन आसान है। जातक कथाएँ, बुद्ध कथानक पहले से प्रचलन में थे। लोग उन कथाओं को सुनते थे। संस्कृत साहित्यकारों ने उनको अपने दर्शन के अनुसार प्रस्तुत किया। उनमें वर्णव्यवस्था के क्षेपक जोड़े। यहाँ तक कि ऋग्वेद का दशम मण्डल भी क्षेपक है जहाँ से कथित ब्रम्ह पुरुष के शरीर से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्णों की उत्पत्ति की स्थापना की गयी है। आज जो संस्कृत का मिथक साहित्य प्रचलन में है मौलिक रूप से वह बौद्ध साहित्य का विकृत रूप है। यदि इन ग्रंथों से वर्णव्यवस्था के अंशों को हटा दिया जाए तो जो शेष बचेगा वह सिर्फ बुद्ध धम्म होगा। इस नज़रिये से भी संस्कृत साहित्य की विवेचना की आवश्यकता है।
बुद्ध धम्म में "अरिय" अर्थात "आर्य" शब्द श्रेष्ठ, अटल, उत्कृष्ट, सर्वोच्च इत्यादि के अर्थ में प्रयोग किया गया है। अंग्रेजी में इसे ही "नोबुल" कहा गया है, चार आर्य सत्य अर्थात फोर नोबुल ट्रुथ।
भारत में बाहर से आए लोगों ने इस शब्द की महिमा को देखते हुए इसे स्वयं के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। यह सहज मनोविज्ञान है कि हीनताग्रसित समुदाय अथवा श्रद्धालु मन श्रेष्ठ लोगों की नकल करता है जैसे बहुत-सी बातों में गुलाम भारत के नागरिकों ने अंग्रेजों की नकल की है- खानपान, चाल चलन, पहनावा इत्यादि में। छात्र अपने अध्यापकों की नकल करते हैं। ऐसे ही खानाबदोश विदेशियों ने "आर्य" शब्द आत्मसात करते हुए स्वयं के लिए "आर्य पुत्र", "आर्य पुत्री" सम्बोधन तथा अपने प्रवास के क्षेत्र को "आर्यावर्त" प्रयोग करना शुरू किया।
ज्यादातर "स्थापित" मान्यताएं मिथ्या हैं, न केवल इतिहास में बल्कि साहित्य और विज्ञान में भी। लेकिन स्थापित मान्यताओं से हट कर कहने-सुनने पर असहजता के भय से लोग प्रायः स्वीकारने से कतराते हैं।
जैसे "हिन्दू" धर्म एक स्थापित सम्बोधन प्रचलन में है जबकि कथित हिन्दू धर्मग्रंथों में "हिन्दू" शब्द है ही नहीं। यह शब्द मूलतः फारसी भाषा का है जिसके अर्थ बड़े नकारात्मक हैं जैसे चोर, डाकू, काला, गुलाम, काफिर इत्यादि। भारत में ही प्रकाशित फ़ारसी के शब्दकोश यथा "जवाहर-उल-लुगत", "लुगत-ए-किशोरी" तथा हिन्दी संस्थान उत्तर प्रदेश से प्रकाशित डा. राजबली पाण्डेय द्वारा सम्पादित "हिन्दू धर्म कोश" इन समस्त ग्रंथों में हिन्दू शब्द के वही अर्थ दिये हैं- चोर, डाकू, काला, गुलाम, काफिर इत्यादि। "हिन्दू" शब्द की "सिन्धु" शब्द से व्युत्पत्ति भी एक मिथ्या स्थापना है। मेरा मकसद किसी की आस्थाओं पर प्रहार करना नहीं है, सिर्फ शब्द विवेचना कर रहा हूँ और तथ्य प्रस्तुत कर रहा हूँ।
"आर्य" शब्द के साथ भी यही हाल है। यह शब्द शुद्ध रूप से बुद्ध धम्म का है जिसे विदेशिओं ने आत्मसात किया।
यह सुनना बड़ा रोचक होगा कि सम्बोधि लाभ के उपरान्त भगवान को शहद का मिष्ठान्न अर्पित करने करने वाले दो श्रद्धालु-तपस्सु और भल्लिक-कम्बोज के व्यापारी थे। कम्बोज ही आज का ईरान है। ईरान आर्यान का अपभ्रंश रूप है। आज भी ईरान का सर्वोच्च राजकीय सम्मान आर्यमेहर है और ईरान का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय आर्यमेहर युनिवर्सिटी है। भगवान ने उन श्रद्धालु बन्धुओं को उपहार में अपनी जटाओं से निकाल कर आठ बाल दिये थे। दोनों व्यापारी बन्धुओं ने वह पावन उपहार ब्रम्हदेश के सम्राट को दिया जिस पर यंगाॅन का प्रसिद्ध स्तूप बना। यह धरती का एकमात्र स्तूप है जो भगवान बुद्ध के रहते-रहते बना, शेष सभी स्तूप भगवान के महापरिनिर्वाण के उपरान्त बने हैं। कहने का तात्पर्य यह कि भगवान बुद्ध के समय से ही दूर देश के लोगों के इस देश में आने के प्रमाण मिलते हैं। कालान्तर में व्यापारी भल्लिक ने भगवान से दीक्षा ले कर बुद्ध धम्म स्वीकार लिया था। द्वीशरण की दीक्षा का यह पहला उदाहरण है। द्वीशरण अर्थात सिर्फ दो शरण- बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि- क्योंकि जब उन श्रद्धालु व्यापारियों ने भगवान के दर्शन किये तब संघ बना ही नहीं था। पालि त्रिपिटक में बाकायदा एक सुत्त भी है- भल्लिक सुत्त, जिसमें व्यापारी भल्लिक के बुद्ध भक्त बन जाने का विवरण है।
भारत देश अपनी समृद्धि के कारण हमेशा से दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। समृद्धि यानी सब प्रकार की समृद्धि, न केवल आर्थिक समृद्धि, प्राकृतिक समृद्धि, बौद्धिक, ज्ञान-विज्ञान की समृद्धि बल्कि आध्यात्मिक समृद्धि भी। भारत की समृद्धि ने हमेशा से दुनिया को आकर्षित किया। आज भी भारत का अवचेतन जिस "सोने की चिड़िया" काल का गर्व करता है वह बुद्ध का एवं कालान्तर का बौद्धकाल ही है। भारत में एक अनूठी समृद्धि और भी रही है- आत्मसातीकरण की समृद्धि। इस देश में खानाबदोश भी आए, व्यापारी भी आए, लुटेरे भी आए, अध्यात्म पिपासु भी आए, यात्री-पर्यटक भी आए, इसने सबको आत्मसात कर लिया।
भारत के बाहर से आए अधिकांश लोगों ने इस देश की मूल मैत्रीपूर्ण संस्कृति को, अमन और मुहब्बत की तहजीब को, प्यार से आत्मसात कर लिया तो कुछ लोगों ने उसके साथ 'छेड़छाड़' भी की। भारत की सामाजिक समस्याओं का मुख्य कारण यही 'छेड़छाड़' है।
सर्वाधिक रोचक बात यह है कि जिन्हें कथित तौर पर आज "आर्य" कहा जा रहा है उन्होंने इस देश की संस्कृति को सर्वाधिक आत्मसात किया है, इस कद्र कि, वे इस पर एकाधिकार का दावा तो दूर अपने को इसका प्रणेता सिद्ध करने की सीमा तक भी जाते हैं। न केवल धर्म व संस्कृति बल्कि संसाधनों को भी उन्होंने आत्मसात कर लिया- उन्होंने भारत की नदियों-सागरों-पर्वतों-वनों को भी तीर्थ बना कर पूजनीय बना दिया। क्या गंगा, क्या यमुना, क्या गोदावरी, क्या कृष्णा, क्या रामेश्वरम, क्या कन्याकुमारी, क्या हिमालय, क्या विन्धयाचल, क्या वृन्दावन, क्या दण्डकारण्य सब पर उनकी दावेदारी, सब पर उनका अधिकार है। इन कथित "आर्यों" ने पूरी की पूरी एक ऋषि संस्कृति को जन्म दिया, उसका महिमामण्डन किया। इस पूरे महिमामण्डन से सिर्फ "वर्णव्यवस्था" की "छेड़छाड़" को हटा दीजिए तो भारत बुद्ध की मैत्री के सिवा कुछ नहीं है, विश्व की आध्यात्मिक धुरी के सिवा कुछ नहीं है। इन कथित "आर्यों" ने ही बुद्ध का धम्म पूरी दुनिया में फैलाया। इतिहास उठा कर देखिये तो कौण्डिण्य, वप्प, भद्दिय, अस्सजी, महानाम, सारिपुत्र, मोदगल्यायन, महाकाश्यप, महाकात्यायन से लेकर अश्वघोष, वसुबन्धु, बोधिधम्म, पद्मसंभव, विनीतारुचि, असंग, नागार्जुन और आधुनिक युग में आचार्य धम्मानन्द कोसाम्बी, महापण्डित राहुल सांकृत्यायन, प्रो. जगन्नाथ उपाध्याय तक सबके सब कथित "आर्य" ही तो हैं। सवाल किसी को देशी-विदेशी सिद्ध करना भर नहीं है बस इतनी-सी बात है कि जिसे अमन और मुहब्बत स्वीकार है, जिसे बुद्ध की मैत्री स्वीकार है, वह देशी हैं बाकी सब विदेशी हैं, क्योंकि बुद्ध की मैत्री एकमात्र देशी है, नफ़रत विदेशी है, घृणा परदेसी है। मैं कोई काव्यात्मक अलंकरण नहीं कर रहा हूँ बल्कि सच में पांच हजार साल के ज्ञात-अज्ञात इतिहास-प्राइतिहास के आलोक में कह रहा हूँ कि आज तक भारत ने किसी देश पर आक्रमण नहीं किया, किसी को जबरन अपने अधीन नहीं किया लेकिन भगवान बुद्ध की मैत्री से सम्पूर्ण एशिया को जीत लिया, बुद्ध का अनुयायी बना दिया। यूनान के सम्राट कनिष्क और मीनाण्डर ने भारत को जीता लेकिन बुद्ध के धम्म ने इन सम्राटों को जीत लिया। वे भारत के हो कर रह गये। कनिष्क ने चौथी संगीति आयोजित की और मीनाण्डर मिलिन्द बन गया। भारत आज भी दुनिया में पूजनीय है तो बुद्ध के कारण पूजनीय है और अगर निन्दनीय तो उसी 'छेड़छाड़' के कारण निन्दनीय है जिसके लिए देश का बुद्धानुयायी न केवल चिंतित है बल्कि समता-स्वतंत्रता-बन्धुता-न्याय की स्थापना के लिए सतत प्रयासरत भी है। जो इस अभियान में साथ हैं वे सब सच में भारतीय हैं। जिन्हें ये दर्शन स्वीकार नहीं बस वो ही विदेशी हैं। भगवान बुद्ध के वचन हैं- मैत्री सम्पूर्ण धम्म है।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 19 Apr 2020 at 3:20 PM -

राजेश चंद्रा

।।बुद्ध और उनका धम्म।।
-राजेश चन्द्रा-

14 अक्टूबर'1956 को भारत में, नागपुर में, महान धम्म दीक्षा के उपरान्त बोधिसत्व बाबा साहेब श्रीलंका की यात्रा पर गये थे, विश्वभ्रातृत्व बौद्ध सम्मेलन में प्रतिभाग करने। इतनी महान धम्म क्रान्ति करके बाबा साहेब ने बौद्ध जगत के समस्त देशों सहित ... पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट कर लिया था। श्रीलंका में वहाँ महापण्डित राहुल सांकृत्यायन से भी उनका आमना-सामना हुआ था, प्रसंगवशात उन्होंने कहा: "यदि मैं दस साल और रह गया तो भारत को बुद्धमय बना दूँगा।"

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने वक्तव्य दिया: " डा. अम्बेडकर ने भारत में बुद्ध धम्म का ऐसा स्तम्भ गाड़ दिया है कि अब उसे कोई उखाड़ नहीं सकता।"

बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के बौद्ध अनुयायी भी बाबा साहेब के संकल्प को प्रायः दोहराते हैं कि भारत को बुद्धमय बनाना है!

प्रश्न है कि भारत बुद्धमय होगा कैसे? क्या कुछेक जाति-बिरादरियों के बुद्धधम्मोन्मुख हो जाने से भारत बुद्धमय हो जाएगा? क्या सिर्फ कथित दलितों के बौद्ध हो जाने से भारत बुद्धमय हो जाएगा? भारत को बुद्धमय बनाने की कार्य योजना क्या है? इस विषय में बाबा साहेब का क्या दिशानिर्देश है?

बाबा साहेब के पास भारत को बुद्धमय बनाने की पूरी कार्य योजना थी। इस कार्य योजना का सुव्यवस्थित क्रमबद्ध मानचित्र बाबा साहेब के कई-कई आलेखों में मिलता है, जिनमें सर्वाधिक मार्गदर्शक आलेख उन्होंने सन् 1950 में लिखा था जो महाबोधि सोसाइटी की पत्रिका में बुद्ध पूर्णिमा के अंक में छपा था- बुद्धा एण्ड द फ्यूचर ऑफ हिज़ रिलीजन- नाम से, अंग्रेजी में। "बुद्ध और उनके धम्म का भविष्य" पांच खण्डों में लिखा गया यह एक विस्तृत आलेख है। डा. अम्बेडकर राइटिंग एण्ड स्पीचेस में खण्ड 17 में यह आलेख है। वैसे गूगल पर भी उपलब्ध है।

इस विस्तृत आलेख में भारत को बुद्धमय बनाने की दिशा में सारांश रूप में तीन महत्वपूर्ण बिन्दु हैं:

1. बौद्धों की एक हस्तपुस्तिका होना
2. भिक्खु संघ के उद्देश्य व लक्ष्यों में परिवर्तन करना
3. एक विश्व बौद्ध मिशन तैयार करना

फिर इन तीनों बिन्दुओं को उन्होंने क्रमिक रूप से विस्तार दिया है। मैं यहाँ उन सारे विस्तार के विस्तार में न जा कर सिर्फ पहले बिन्दु का उद्देश्य विशेष से सारांश देना चाहूँगा।

"1. बौद्धों की एक हस्तपुस्तिका होना", इस बिन्दु की व्याख्या में बोधिसत्व बाबा साहेब तुलनात्मक रूप से कहते हैं कि ईसाइयों के पास एक सुविधाजनक बात यह है कि उनका एक धर्मग्रन्थ है बाइबिल, जिसे आसानी से हाथ में लेकर जाया जा सकता है यानी ग्रन्थ हैण्डी है। यही बात इस्लाम के साथ भी है कि उनके पास एक धर्मग्रन्थ क़ुरआन है, सिक्खों के पास गुरुग्रन्थ साहेब है...

यह सारी तुलानाएं करके बाबा साहेब निष्कर्ष देते हैं कि बौद्धों के पास धर्मग्रन्थ के नाम पर कोई एक पुस्तक न होकर विशाल त्रिपिटक है जिस समन्दर को पार पाना सबके बस की बात नहीं है। वह सुझाव देते हैं हस्तपुस्तिका, हैण्डबुक, जैसी बौद्धों की एक पुस्तक भी होनी चाहिए जिसमें बुद्ध का जीवन परिचय और उनकी मूलभूत शिक्षाएं दी हों जिनका उपासकगण नित्य पाठ कर सकें। उसमें पूजापाठ, जन्मदिन, विवाह, मृतक संस्कार आदि का भी परिशिष्ट हो।

"2. भिक्खु संघ के उद्देश्य व लक्ष्यों में परिवर्तन करना", इस दूसरे बिन्दु के विस्तार में वर्तमान भिक्खु संघ की वह विवेचना करते हैं और धम्म प्रचार के लिए वे उनको बिल्कुल अनुपयुक्त करार देते हैं। बड़े कठोर शब्दों में वर्तमान भिक्खु संघ को वे निकम्मों की फौज, आइडलर्स आर्मी, तक कहते हैं। कुल मिलाकर उनका सारांश यह है कि भारत को बुद्धमय बनाने के लिए धम्म ज्ञान से सम्पन्न नये क़िस्म का आधुनिक विज्ञान व शिक्षा से भी सुपरिचित धम्म प्रचारक चाहिए, जिसमें नालन्दा विश्वविद्यालय की प्राचीन परम्परा वाली सेवा भावना भी हो। बाबा साहेब सवाल करते हैं कि जब भी मानवता पर कोई संकट आता है तो लोग सेवा के लिए रामकृष्ण मिशन को याद करते हैं। भिक्खु संघ को कोई याद नहीं करता। सेवा किसका धर्म होना चाहिए? रामकृष्ण मिशन का या भिक्खु संघ का? बाबा साहेब जेसुइट पादरियों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि पूरे एशिया में इसाइयत शिक्षा, सेवा और चिकित्सा के ज़रिये फैली है। बाबा साहेब के कहने का तात्पर्य यह है कि भारत को बुद्धमय बनाने के लिए धम्म प्रचारकों को शिक्षा, सेवा, चिकित्सा का रास्ता अपनाना चाहिए, धम्म साहित्य वितरित करना चाहिए तथा धम्म प्रचारक उच्च शिक्षित होना चाहिए।

"3. एक विश्व बौद्ध मिशन तैयार करना", इस तीसरे बिन्दु की व्याख्या में वे कहते हैं कि एक विश्व बौद्ध मिशन तैयार करना चाहिए जिसके अन्तर्गत भारत के बौद्धों का विश्व के बौद्धों से सम्पर्क व मैत्री हो ताकि भारतीय बौद्धों को यह गौरवमय अनुभूति हो कि वे एक विश्व समाज का अंग हैं।

इस मार्गदर्शक आलेख का समापन उन्होंने इस प्रेरक वचन के साथ किया है:

"बुद्ध धम्म का प्रचार-प्रसार करना सच्ची मानव सेवा है।"

बाबा साहेब के द्वारा मार्गनिर्देशित किये गये तीनों बिन्दु भारत को बुद्धमय बनाने का मानचित्र है, जिसमें पहला बिन्दु बाबा साहेब ने स्वयं अपने जीवनकाल में पूरा कर दिया। "बुद्ध और उनका धम्म", यही वह महान ग्रन्थ है जिसका संकेत उन्होंने अपने आलेख में किया था। यह ग्रन्थ सम्पूर्ण त्रिपिटक का सार है। इसे उस हर बौद्ध को कई-कई बार पढ़ना, मनन करना चाहिए जो मन के किसी कोने में भारत को बुद्धमय बनाने का सपना देखते हैं। इस ग्रन्थ का अध्ययन करने मात्र से भारत बुद्धमय नहीं हो जाएगा लेकिन कम से कम आपका जीवन तो बुद्धमय होगा। ऐसे एक-एक व्यक्ति रूपान्तरित होगा तो एक दिन पूरा भारत बुद्धमय होगा।

इस लाॅकडाउन अवधि का सदुपयोग कीजिए। इस ग्रन्थ का अध्ययन कर लीजिये, चिन्तन, मनन कर लीजिये।

धम्म प्रचार के लिए नये क़िस्म का भिक्खु संघ तो भिक्खु संघ ही बनाएगा, जो कि अभी तक नहीं बन सका है, लेकिन हम नये किस्म का उपासक संघ तो बना सकते हैं। प्रकारान्तर से देखिये तो यह युग उपासकों का है। आधुनिक भारत में विराट धम्म क्रान्ति महान उपासक बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने की। भगवान की विपस्सना विद्या को पुनर्स्थापित करने का महान कार्य एक उपासक श्री सत्यनारायण गोयनका जी ने किया। श्रावस्ती में महान स्वर्णिम स्तूप तथा उपासिका संघ का निर्माण महान उपासिका डा. ब्रान्कट सिथिपोल , थाई माता, ने किया है तथा भारत में अन्तरराष्ट्रीय त्रिपिटक संगायन का नेतृत्व एक महोपासिका श्रीमती वांगमो डिक्सी कर रही हैं। भारत के किसी भी जनपद में देख लीजिए, अधिकांश स्थानों पर धम्म गतिविधियों का नेतृत्व उपासकगण कर रहे हैं।

भारत में विगत 15 वर्षो से आयोजित हो रहा अन्तरराष्ट्रीय त्रिपिटक संगायन एक ऐसा आयोजन है जिससे सक्रियता से जुड़ कर भारतीय बौद्ध बाबा साहेब द्वारा संकेतित तीसरे बिन्दु को भी साकार रूप दे सकते हैं।

"बुद्ध और उनका धम्म" ग्रन्थ पढ़ने के लिए आपको इतना जोर देकर आग्रह क्यों किया जा रहा है? ताकि आप बाबा साहेब की परिकल्पित परियोजना का अंग बन सकें, कुछ अपना भी योगदान दे सकें।

सरकारी तौर पर लाॅकडाउन अवधि 3 मई'2020 तक बढ़ा दी गयी है। परिस्थितियों को देखते हुए यह भी अनुमान लगाया जा सकता है कि बाबा साहेब की जयंती की तरह ही बुद्ध जयंती, बुद्ध पूर्णिमा भी सार्वजनिक रूप से न मना कर घरेलू स्तर पर ही मनायी जाएगी। सभी जन प्रयास करें कि इस पावन ग्रन्थ तथा धम्मपद का सम्पूर्ण पाठ यथासम्भव 3 मई'2020 तक पूर्ण हो जाए अन्यथा बुद्ध पूर्णिमा 7 मई'2020 तक तो अनिवार्यतः हो जाए।

धम्म ग्रन्थ का पाठ पूरा होने पर उत्सव मनाने की धार्मिक परम्परा है- परिजनों के साथ सामूहिक रूप से पूजा करना, दीप जलाना, गन्ध अर्पण करना, मिष्ठान्न अर्पित करना और परिजनों के साथ यथा सामर्थ्य प्रीति भोज करना और अनिवार्य रूप से दान अवश्य करना। बुद्ध पूर्णिमा के दिन पारिवारिक स्तर पर ऐसी ही योजना बनाइये। अपने आसपास देखिये कि लाॅकडाउन के कारण कोई भूखा तो नहीं सो रहा है। सोशल डिस्टैंसिंग का अनुपालन करते हुए भोजन भण्डारे का आयोजन कर सकते हैं तो प्रशासन की अनुमति से वह भी करें।

कोरोना महामारी तथा उसके कारण लागू लाॅकडाउन अवधि का सदुपयोग कीजिए- स्वयं अपने जीवन को, परिजनों के जीवन को, घर को तथा संसार को धम्म की तरंगों से आन्दोलित कीजिए। पूरे संसार को मैत्री की तरंगें प्रेषित कीजिए- सब का मंगल हो, सब का कल्याण हो, सब स्वस्थ रहें, निरोगी हों, दीर्घजीवी हों...

आप यूँ भी सूक्ष्म रूप से स्वयं अपना और संसार का हित कर सकते हैं।

पुनश्च:

1. "बोधिसत्व से बुद्ध की ओर" अभियान में लगे उपासक-उपासिकाओं ने श्रद्धा-भावना से कई बड़े प्यारे अनुभव साझा किये हैं। ऐसे अनुभवों से लोगों को प्रेरणा मिलती है। कृपया शेष लोग भी अपने अनुभव साझा करें।

2. इसी श्रंखला के पूर्व आलेख "बोधिसत्व से बुद्ध की ओर" कृपया 10 अप्रैल'2020 का आलेख सन्दर्भित करें : https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3407000802663052&id=100000594960974

3. उपरोक्त विषयक किसी जिज्ञासा की स्थिति में कृपया श्री महेश सत्यार्थी जी (08004906369) से सम्पर्क करें।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 20 Oct 2019 at 9:42 PM -

राम

बुद्ध जहां विश्राम करते थे उस स्थान का जो भी नाम होता था उसके आगे आराम जोड़ दिया गया। यथा
संघ+आराम=संघाराम
सास+आराम=सासाराम
पूर्व+आराम=पूर्वाराम
पूरे भारत में सैकड़ों स्थानों के नाम के आगे आराम लिख गया और अंतिम अक्षर की मात्रा बढ़कर आगे राम जुड़ गया। बुद्ध की मृत्यु के ... पश्चात ऐसे स्थानों पर उनकी मूर्तियां रख दी गईं और उनको मंदिर कहा जाने लगा। इस प्रकार ये भगवान बुद्ध के आराम मंदिर बन गए और अनपढ़ उपासक इनको भगवान बुद्ध के राम मंदिर बोलने लगे। लगता है कालांतर में शब्द 'राम' भगवान का पर्यायवाची हो गया।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 08 Oct 2019 at 8:48 AM -

अष्टांग मार्ग

द्रसंवकाव्यसमर्स

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 29 Oct 2018 at 2:31 PM -

श्रावस्ती का इतिहास

आइये आज एक नये नगर के इतिहास के बारे में कुछ जानकारी शेयर की जाय❗️ श्रावस्ती कोशल का एक प्रमुख नगर था❗️ तथागत गौतम बुद्ध जी के जीवन काल में यह कोशल देश की राजधानी थी❗️ बुद्धकालीन भारत के 6 महानगरों मे श्रावस्ती भी था,लगभग ... 500 ई.पूर्व❗️

भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गोंडा-बहराइच जिलों की सीमा पर यह बौद्ध विहार स्थान है❗️ गोंडा-बलरामपुर से 12 मील पश्चिम में आधुनिक सहेत-महेत गांव ही श्रावस्ती है❗️ पहले यह कौशल देश की दूसरी राजधानी थी, श्रावस्ती बौद्ध का विहार स्थान है, तथागत श्रावस्ती में रहे थे, यहाँ के श्रेष्ठी अनाथपिण्डिक ने तथागत बुद्ध जी के लिये जेतवन बिहार बनवाया था, यहाँ बौद्ध मठ और विहार है❗️
श्रावस्ती कोशल का एक प्रमुख नगर था❗️ तथागत बुद्ध जी के जीवन काल में यह कोशल देश की राजधानी थी❗️ बुद्धकालीन भारत के 6 महानगरों मे श्रावस्ती भी था❗️लगभग 500 ई.पूर्व❗️

यह बुद्धकालीन नगर था, जिसके भग्नावशेष उत्तर प्रदेश राज्य के, बहराइच एवं गोंडा जिले की सीमा पर, राप्ती नदी के दक्षिणी किनारे पर फैले हुए हैं❗️

इन भग्नावशेषों की जाँच सन्‌ 1862-63 में जेननरल कनिंघम ने की और सन्‌ 1884-85 में इसकी पूर्ण खुदाई डॉ॰ डब्लू. हुई (Dr. W. Hoey) ने की❗️ इन भग्नावशेषों में दो स्तूप हैं जिनमें से बड़ा महेत तथा छोटा सहेत नाम से विख्यात है❗️ इन स्तूपों के अतिरिक्त अनेक विहार और भवनों के भग्नावशेष भी मिले हैं❗️ खुूदाई के दौरान अनेक उत्कीर्ण मूर्तियाँ और पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जो नमूने के रूप में प्रदेशीय संग्रहालय (लखनऊ) में रखी गई हैं❗️ यहाँ संवत्‌ 1176 या 1276 (1119 या 1219 ई.) का शिलालेख मिला है, जिससे पता चलता है कि बौद्ध धम्म् इस काल में प्रचलित था❗️ बौद्ध काल के साहित्य में श्रावस्ति का वर्णन अनेक बार आया है और तथागत बुद्ध ने यहाँ के जेतवन में अनेक चातुर्मांस व्यतीत किए

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 29 Oct 2018 at 8:22 AM -

तथागत बुद्ध से जुड़ी 50 बातें

इस पोस्ट में यदि गलतियां हैं तो उनको ठीक करने हेतु कमेंट करें प्लीज़-
तथागत बुद्ध से जुड़ी 50 बातें।
1. बौद्ध धर्म के संस्थापक कौन थे ? - गौतम बुद्ध
2. गौतम बुद्ध का जन्म कब हुआ था ? - 563 ई०पू०
3. गौतम बुद्ध के जन्म ... स्थान का नाम क्या है ? - कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी नामक स्थान।
4. किसे Light of Asia के नाम से जाना जाता है ? - महात्मा बुद्ध
5. गौतम बुद्ध के बचपन का नाम क्या था ? - सिद्धार्थ
6. गौतम बुद्ध के पिता का नाम क्या था ? - शुद्धोधन
7. इनकी मा का नाम था ? - महामाया
8. महात्मा बुद्ध की सौतेली मा का नाम क्या था ? - प्रजापति गौतमी
9. महात्मा बुद्ध की पत्नी का नाम क्या था ? - यशोधरा
10. गौतम बुद्ध के पुत्र का नाम क्या था ? - राहुल
11. गौतम बुद्ध के सारथी का नाम क्या था ? - चन्ना
12. गौतम बुद्ध कितने वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर सत्य की खोज में निकल पड़े ? - 29 वर्ष
13. सिद्धार्थ के गृह त्याग की घटना को बौद्ध धर्म में क्या कहा जाता है ? - महाभिनिष्क्रमण
14. बुद्ध ने अपना प्रथम गुरु किसे बनाया था ? - आलारकालाम
15. बुद्ध ने अपने प्रथम गुरु से कौन सी शिक्षा प्राप्त की ? - सांख्य दर्शन
16. गौतम बुद्ध के दूसरे गुरु का नाम क्या था ? - रुद्रक
17. उरुवेला में कितने ब्राह्मण बुद्ध के शिष्य बने ? - पांच
18. बुद्ध के पांचों शिष्यों के नाम क्या थे ? - कौण्डिन्य, वप्पा, भादिया, अस्सागी और महानामा
19. 35 वर्ष की आयु में बिना अन्न-जल ग्रहण किए आधुनिक बोधगया में निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर, पीपल वृक्ष के नीचे कितने वर्ष की कठिन तपस्या के बाद बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई ? - 6 वर्ष
20. ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ को क्या कहा गया ? - गौतम बुद्ध और तथागत
21. सिद्धार्थ का गोत्र क्या था ? - गौतम
22. गौतम बुद्ध को किस दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई ? - वैशाखी पूर्णिमा
23. गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश कहाँ दिया था ? - वाराणसी के निकट सारनाथ
24. उपदेश देने की इस घटना को क्या कहा जाता है ? - धम्मचक्रप्रवर्तन
25. महात्मा बुद्ध की देशनाएँ किस भाषा में थीं? - पाली
26. बौद्ध धर्म के कौन-कौन से त्रिरत्न हैं? - बुद्ध, धम्म और संघ
27. बौद्ध धर्म में प्रविष्टि को क्या कहा जाता था ? - उपसम्पदा
28. बुद्ध के अनुसार देवतागण भी किस सिद्धान्त के अंतर्गत आते है ? - कर्म फल सिद्धान्त
29. बुद्ध ने तृष्णा समाप्ति की घटना को क्या कहा है ? - निर्वाण
30. बुद्ध के अनुयायी कितने भागों में बंटे थे ? - दो भिक्षुक और उपासक
31. जिस स्थान पर बुद्ध ने ज्ञान की प्राप्ति की थी, वह स्थान क्या कहलाया ? - बोधगया
32. महात्मा बुद्ध की मृत्यु कब और कहाँ हुई थी ? - 483 ई०पू० में कुशीनगर उत्तर प्रदेश
33. महात्मा बुद्ध की मृत्यु की घटना को बौद्ध धर्म में क्या कहा गया है ? - महापरिनिर्वाण
34. महात्मा बुद्ध द्वारा दिया गया अंतिम उपदेश क्या था ? - “सभी वस्तुए क्षरणशील होती है अतः मनुष्य को अपना पथ-प्रदर्शक स्वयं होना चाहिए
35. प्रथम बौद्ध संगीति किसके शासन काल में हुई थी? - अजातशत्रु
36. तृतीय बौद्ध संगीति कहाँ हुई थी?- पाटलिपुत्र
37. गौतम बुद्ध के सबसे प्रिय और आत्मीय शिष्य कौन थे ? - आनंद
38. बौद्ध धर्म को अपनाने वाली प्रथम महिला कौन थी ? - बुद्ध की माँ प्रजापति गौतमी
39. भारत से बाहर बौद्ध धर्म को फैलाने का श्रेय किस राजा को जाता है ? - सम्राट अशोक
40. बुद्ध के प्रथम दो अनुयायी कौन कौन थे ? - काल्लिक, तपासु
41. बुद्ध की प्रथम मूर्ति कहाँ बनी थी? - मथुरा
42. सबसे अधिक संख्या में बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण किस शैली में किया गया था ? - गांधार शैली
43. बौद्ध का परम धर्म लक्ष्य है - निर्वाण
44. धार्मिक जुलूस की शुरुआत सबसे पहले किस धर्म से शुरू की गयी थी ? - बौद्धधर्म
45. बौद्धों का सर्वाधिक पवित्र त्योहार क्या है ? - वैशाख पूर्णिमा
46. वैशाख पूर्णिमा किस नाम से विख्यात है ? - बुद्ध पूर्णिमा
47. अनीश्वरवाद को मानने वाले कौन-कौन से धर्म है ? - बौद्धधर्म एवं जैनधर्म
48. बुद्ध ने किसकी प्रमाणिकता को स्पस्टतः नकार दिया था ? - वेदों की
49. सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म में किसने दीक्षित किया था ? - मोगलीपुत्त तिस्स
50. चतुर्थ बौद्ध संगीति कहाँ हुई थी? - कुण्डलवन कश्मीर

Copied..

user image Aneeeh Swaroop

Very useful information

Monday, October 29, 2018
user image Jigyasa Editor

अच्छी जानकारी

Friday, October 26, 2018
user image S K Maurya - 29 Oct 2018 at 7:08 AM -

अनागारिक_धम्मपाल (धर्मपाल)

भारत में बौद्ध धर्म को पुनर्जीवन प्रदान करने वाले अनागारिक धम्मपाल (धर्मपाल) का जीवन परिचय-

जन्म 17-09-1864
महाप्रयाण 29-04-1933
*बचपन का नाम* - डेविड
*पिता* - डान केरोलिस
*माता* - मल्लिका धर्मागुनवर्धने

बालक डेविड का जन्म एक धनी व्यापारी परिवार में हुआ था. इनके शुरूआती जीवन में मेडम ब्लावास्त्सकी और कर्नल ... ओलकोट्टहाद का बहुत बड़ा योगदान है. सन् 1875 के दौरान मेडम ब्लावास्त्सकी और कर्नल ओलकोट्टहाद ने अमेरिका के न्यूयार्क में थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना की थी. इन दोनों ने बौद्ध धर्म का काफी अध्ययन किया था मगर 1880 में ये श्रीलंका आये तो इन्होने वहां न सिर्फ स्वयं को बुद्धिष्ट घोषित किया बल्कि भिक्षु का वेश धारण किया. इन्होने श्रीलंका में 300 के ऊपर स्कूल खोले और बौद्ध धर्म की शिक्षा पर भारी काम किया. डेविड इनसे काफी प्रभावित हुए. बालक डेविड को पालि सीखने की प्रेरणा इन्हीं से मिली. यह वह समय था जब डेविड ने अपना नाम बदल कर *"अनागारिक धम्मपाल"* कर लिया था.

1891 में अनागारिक धम्मपाल ने भारत स्थित बौद्ध गया के महाबोधि महाविहार की यात्रा की.यह वही जगह है जहाँ सिद्धार्थ गोतम को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी.वे देखकर हैरान रह गए की किस प्रकार से पुरोहित वर्ग ने बुद्ध की मूर्तियों को हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों में बदल दिया है. *इन विषमतावादियों ने तब बुद्ध महाविहार में बौद्धो को प्रवेश करने से भी निषेध कर रखा था*

भारत में बौद्ध धम्म और बौद्ध तीर्थ-स्थलों की दुर्दशा देखकर अनागारिक धम्मपाल को बेहद दुख हुआ. *बौद्ध धर्म स्थलों की बेहतरी के लिए इन्होने विश्व के कई बौद्ध देशों को पत्र लिखा.इन्होने इसके लिए सन् 1891 में महाबोधि सोसायटी की स्थापना की.* तब इसका हेड आफिस कोलंबो था. किंतु शीध्र ही इसे कोलकाता स्थानांतरित किया गया. महाबोधि सोसायटी की ओर से अनागारिक धम्मपाल ने एक सिविल सूट दायर किया जिसमें मांग की गई थी कि महाबोधि विहार और दूसरे तीन प्रसिद्ध बौद्ध स्थलों को बौद्धों को हस्तांतरित किया जाये. *इसी रिट का ही परिणाम था कि आज महाबोधि विहार में बौद्ध जा सकते हैं.* परंतु तब भी वहां तथाकथित हिन्दुओं का कब्जा आज भी है..

*यह अनागारिक धम्मपाल का ही प्रयास था कि कुशीनगर, जहाँ तथागत का महापरिनिर्वाण हुआ था फिर से बौद्ध जगत में दर्शनीय स्थल बन गया।

अनागारिक धम्मपाल ने अपने जीवन के 40 वर्षों में भारत, श्रीलंका और विश्व के कई देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के बहुत से उपाय किये. इन्होने कई स्कूलों और अस्पतालों का निर्माण कराया. कई जगह इन्होने बौद्ध विहारों का निर्माण कराया. *सारनाथ का प्रसिद्ध महाविहार आपने ही बनवाया था.*

13 जुलाई 1931 को अनागरिक धम्मपाल बाकायदा बौद्ध भिक्षु बन गये इन्होने प्रव्रज्या ली.16 जनवरी 1933 को इनकी प्रव्रज्या पूर्ण हुई और इन्होने उपसंपदा ग्रहण की.. और फिर नाम पड़ा भिक्षु देवमित धर्मपाल. भारतीय भूमि में बौद्ध धर्म के इतने बड़े पुनरुद्धारक की 29 अप्रैल 1933 को 69 वर्ष की अवस्था में इस दुनिया से विदाई हो गयी..अर्थात इनका महाप्रयाण हो गया.

इनकी अस्थियां पत्थर के एक छोटे से स्तूप में मूलगंध कुटी विहार में पाशर्व में रखी गयी हैं।

अनागारिक धम्मपाल बौद्ध जगत के एक ख्याति प्राप्त व्यक्तित्व हैं..

बौद्ध धर्म के पुनर्उद्धारक..भारत में बौद्ध धर्म के पतन के हजारों साल बाद अनागारिक धम्मपाल ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने न सिर्फ इस देश में बौद्ध धर्म का पुन: झंडा फहराया बल्कि एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में इसके प्रचार-प्रसार के लिए अथक प्रयास किया.