Home

Welcome!

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 15 May 2020 at 7:54 AM -

प्रश्न और उत्तर

सामान्य ज्ञान से जुड़े कुछ प्रश्न-

Q1. घडी के अन्दर रात मे चमकने वाला पदार्थ क्या है
Ans = बेरियम सल्फाइड।
Q2. थर्मामीटर मे चमकने वाला पदार्थ क्या है
Ans = पारा
Q3. कौन सी गैस सूंघने पर आदमी हँसने लगता है ?
Ans = नाइट्रस आक्साइड (N2O)
Q4. मनुष्य के ऑसू ... मे क्या पाया जाता है ?
Ans = सोडीयम क्लोराइड
Q5. पीने के पानी मे कौनसी गैस मिलाते है ?
Ans = क्लोरीन (Cl)
Q6. बिजली के हीटर मे किस धातु का तार होता है ?
Ans = नाइक्रोम का तार
Q7. पानी किन गैसों के रासायनिक मिलन से बनता है ?
Ans = हाइड्रोजन और आक्सीजन
Q8. किस ग्रह को इवनिंग स्टार (शाम का तारा ) कहते है ?
Ans = शुक्र ग्रह
Q9. किस ग्रह को रेड स्टार (लाल तारा) कहते है ?
Ans = मंगल ग्रह
Q10. पेड़ की पत्तियों का रंग हरा क्यो होता है ?
Ans = क्लोरोफिल के कारण
Q11. मनुष्य के शरीर मे कुल कितनी हड्डियां होती है ?
Ans = (206) और शिशुओं में ज्यादा होती हैं।
Q12. आग मे कौन सा पदार्थ नही जलता है ?
Ans = एसबेस्टस
Q13. सबसे कठोर पदार्थ (न कि धातु) है ?
Ans = हीरा
Q14. कौनसा पदार्थ पानी मे जलता है ?
Ans = सोडियम
Q15. सबसे जहरीला पदार्थ कौन सा होता है ?
Ans = पोटैशियम आइसो सायनाइड
Q16. किन-किन धातुओ को मिलाकर पीतल बनाते है ?
Ans = तांबा व जस्ता
Q17. किन - किन धातुओं को मिलाकर चुम्बक बनता है ?
Ans = अल्यूमिनियम, निकल व क्रोमियम।
Q18. कौनसी गैस बिना कष्ट के जान ले लेती है ?
Ans = कार्बन मोनोऑक्साइड?
Q19. वायुमण्डल मे कौनसी गैस नही है ?
Ans = क्लोरीन?
Q20. कौनसा खनिज हमारे देश मे सर्वाधिक पाया जाता है ?
Ans = अभ्रक
Q21. बर्फ पानी मे क्यों तैरता है ?
Ans = बर्फ का आपेक्षिक घनत्व पानी के आपेक्षिक घनत्व से कम होता है !!

user image Pramod Sharma - 13 May 2020 at 7:40 PM -

श्री दुर्गा सप्तशती संपूर्ण

श्री दुर्गा सप्तशती संपूर्ण
जनकर्ता स्नान करके, आसन शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके, शुद्ध आसन पर बैठ जाएं, साथ में शुद्ध जल, पूजन सामग्री और श्री दुर्गा सप्तशती की पुस्तक सामने रखें। इन्हें अपने सामने काष्ठ आदि के शुद्ध आसन पर विराजमान कर दें। माथे पर ... अपनी पसंद के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें, शिखा बांध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्व शुद्धि के लिए चार बार आचमन करें। इस समय निम्न मंत्रों को बोलें-

ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥

तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें, फिर 'पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ' इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें-

चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है, किन्तु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गई है।

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रहकृतराजकृतसर्व-विधपीडानिवृत्तिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायुः पुष्टिधनधान्यसमृद्ध्‌यर्थं श्री नवदुर्गाप्रसादेन सर्वापन्निवृत्तिसर्वाभीष्टफलावाप्तिधर्मार्थ- काममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थसिद्धिद्वारा श्रीमहाकाली-महालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थं शापोद्धारपुरस्परं कवचार्गलाकीलकपाठ- वेदतन्त्रोक्त रात्रिसूक्त पाठ देव्यथर्वशीर्ष पाठन्यास विधि सहित नवार्णजप सप्तशतीन्यास- धन्यानसहितचरित्रसम्बन्धिविनियोगन्यासध्यानपूर्वकं च 'मार्कण्डेय उवाच॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।' इत्याद्यारभ्य 'सावर्णिर्भविता मनुः' इत्यन्तं दुर्गासप्तशतीपाठं तदन्ते न्यासविधिसहितनवार्णमन्त्रजपं वेदतन्त्रोक्तदेवीसूक्तपाठं रहस्यत्रयपठनं शापोद्धारादिकं च किरष्ये/करिष्यामि।

इस प्रकार प्रतिज्ञा (संकल्प) करके देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार की विधि से पुस्तक की पूजा करें, योनिमुद्रा का प्रदर्शन करके भगवती को प्रणाम करें, फिर मूल नवार्ण मन्त्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें। इसके बाद शापोद्धार करना चाहिए। इसके अनेक प्रकार हैं।

'ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा'

इस मंत्र का आदि और अन्त में सात बार जप करें। यह शापोद्धार मंत्र कहलाता है। इसके अनन्तर उत्कीलन मन्त्र का जाप किया जाता है।

इसका जप आदि और अन्त में इक्कीस-इक्कीस बार होता है। यह मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।' इसके जप के पश्चात्‌ आदि और अन्त में सात-सात बार मृतसंजीवनी विद्या का जाप करना चाहिए, जो इस प्रकार है-

'ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।'

मारीचकल्प के अनुसार सप्तशती-शापविमोचन का मन्त्र यह है-

'ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।'

इस मन्त्र का आरंभ में ही एक सौ आठ बार जाप करना चाहिए, पाठ के अन्त में नहीं। अथवा रुद्रयामल महातन्त्र के अंतर्गत दुर्गाकल्प में कहे हुए चण्डिका शाप विमोचन मन्त्र का आरंभ में ही पाठ करना चाहिए। वे मन्त्र इस प्रकार हैं-

ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठ-नारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्री शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पितकार्यसिद्ध्‌यर्थे जपे विनियोगः।

ॐ (ह्रीं) रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥1॥
ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठ विश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥2॥
ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥3॥
ॐ क्षुं धुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥4॥
ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥5॥
ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥6॥
ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव॥7॥
ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥8॥
ॐ जां जातिस्वरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥9॥
ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥10॥
ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥11॥
ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफलदात्र्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥12॥
ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥13॥
ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमसहितायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥14॥
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥15॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥16॥
ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥17॥
ॐ ऐं ह्री क्लीं महाकालीमहालक्ष्मी-
महासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः॥18॥
इत्येवं हि महामन्त्रान्‌ पठित्वा परमेश्वर।
चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशयः॥19॥
एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति यः।
आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशयः॥20॥

इस प्रकार शापोद्धार करने के अनन्तर अन्तर्मातृका बहिर्मातृका आदि न्यास करें, फिर श्रीदेवी का ध्यान करके रहस्य में बताए अनुसार नौ कोष्ठों वाले यन्त्र में महालक्ष्मी आदि का पूजन करें, इसके बाद छ: अंगों सहित दुर्गासप्तशती का पाठ आरंभ किया जाता है।

कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य- ये ही सप्तशती के छ: अंग माने गए हैं। इनके क्रम में भी मतभेद हैं। चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है, किन्तु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गई है।

जिस प्रकार सब मंत्रों में पहले बीज का, फिर शक्ति का तथा अन्त में कीलक का उच्चारण होता है, उसी प्रकार यहाँ भी पहले कवच रूप बीज का, फिर अर्गला रूपा शक्ति का तथा अन्त में कीलक रूप कीलक का क्रमशः पाठ होना चाहिए। यहाँ इसी क्रम का अनुसरण किया गया है।

(इसके बाद देवी कवच का पाठ करना चाहिए।)

॥ अथ देव्याः कवचम्‌ ॥

विनियोग
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप्‌ छन्दः, चामुण्डा देवता, अंगन्यासोक्तमातरो बीजम्‌, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्‌, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोगः।

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै॥

मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्‌।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥

ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्‌।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥2॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्‌॥3॥
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्‌॥4॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥
अग्निता दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥
न तेषा जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥7॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमानरूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥11॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥12॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शंख चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्‌॥13॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शांर्गमायुधमुत्तमम्‌॥14॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वस॥15॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महावले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिन।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥17॥
दक्षिणेऽवतु वाराहीनैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥18॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेद्धस्ताद् वैष्णवी तथा ॥19॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया में चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥20॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥
मालाधारी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥22॥
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले च शांकरी॥23॥
नासिकायां सुगन्दा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥24॥
दन्तान्‌ रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥25॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमंगला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥26॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू में व्रजधारिणी॥27॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च।
नखांछूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥।
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥29॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥30॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जंघे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥32॥
नखान्‌ दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥34॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥35॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्‌।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान्‌ रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥41॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥42॥
पदमेकं न गच्छेतु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥43॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्‌।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्‌॥44॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्‌॥45॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्‌।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥46॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥47॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जंगमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्‌॥48॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥49॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥50॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥51॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्‌॥52॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥53॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्‌।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥54॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्‌।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥55॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥56॥


॥ इति देव्याः कवचं संपूर्णम्‌ ॥

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 12 May 2020 at 6:37 PM -

गरीब की हाय- मुंशी प्रेम चंद

 Hindi Kahani- हिंदी कहानी
Gareeb Ki Haay
Munshi Premchand

गरीब की हाय- मुंशी प्रेम चंद

मुंशी रामसेवक भौंहे चढ़ाए हुए घर से निकले और बोले- ‘इस जीने से तो मरना भला है।’ मृत्यु को प्रायः इस तरह के जितने निमंत्रण दिये जाते हैं, यदि वह सबको स्वीकार करती, ... तो आज सारा संसार उजाड़ दिखाई देता। 
मुंशी रामसेवक चांदपुर गाँव के एक बड़े रईस थे। रईसों के सभी गुण इनमें भरपूर थे। मानव चरित्र की दुर्बलताएँ उनके जीवन का आधार थीं। वह नित्य मुन्सिफी कचहरी के हाते में एक नीम के पेड़ के नीचे कागजों का बस्ता खोल एक टूटी-सी चौकी पर बैठे दिखाई देते थे। किसी ने कभी उन्हें किसी इजलास पर कानूनी बहस या मुकदमे की पैरवी करते नहीं देखा। परंतु उन्हें सब लोग मुख्तार साहब कहकर पुरकारते थे। चाहे तूफान आये, पानी बरसे, ओले गिरें पर मुख्तार साहब वहां से टस से मस न होते। जब वह कचहरी चलते तो देहातियों के झुण्ड-के-झुण्ड उनके साथ हो लेते। चारों ओर से उन पर विश्वास और आदर की दृष्टि पड़ती। सबमें प्रसिद्ध था कि उनकी जीभ पर सरस्वती विराजती हैं। इसे वकालत कहो या मुख्तारी, परन्तु यह केवल कुल-मर्यादा की प्रतिष्ठा का पालन था। आमदनी अधिक न होती थी। चाँदी के सिक्कों की तो चर्चा ही क्या, कभी-कभी ताँबे के सिक्के भी निर्भय उनके पास आने से हिचकते थे। 

मुंशीजी की कानूनदानी में कोई संदेह न था। परन्तु ‘पास’ के बखेड़े ने उन्हें विवश कर दिया था। खैर, जो हो, उनका यह पेशा केवल प्रतिष्ठा-पालन के निमित्त था; नहीं तो उनके निर्वाह का मुख्य साधन आस-पास की अनाथ, पर खाने-पीने में सुखी विधवाओं और भोले-भाले किन्तु धनी वृद्धों की श्रद्धा थी। विधवाएँ अपना रुपया उनके यहां अमानत रखतीं। बूढ़े अपने कपूतों के डर से अपना धन उन्हें सौंप देते। पर रुपया एक बार उनकी मुठ्ठी में जाकर फिर निकलना भूल जाता था। वह जरूरत पड़ने पर कभी-कभी कर्ज ले लेते थे। भला, बिना कर्ज लिए किसी का काम चल सकता है ? भोर को सांझ के करार पर रुपया लेते, पर वह साँझ कभी नहीं आती थी। सारांश मुंशीजी कर्ज लेकर देना सीखे नहीं थे। यह उनकी कुल-प्रथा थी। 
यही सब मामले बहुधा मुंशी जी के सुख-चैन में विघ्न डालते थे। कानून और अदालत से तो उन्हें कोई डर न था। इस मैदान में उसका सामना करना पानी में मगर से लड़ना था। परन्तु जब कोई दुष्ट उनसे भिड़ जाता, उनकी ईमानदारी पर संदेह करता और उनके मुँह पर बुरा-भला कहने पर उतारू हो जाता, तब मुंशीजी के हृदय पर बड़ी चोट लगती। इस प्रकार की दुर्घटनाएँ प्रायः होती थीं। हर जगह ऐसे ओछे लोग रहते हैं, जिन्हें दूसरों को नीचा दिखाने में ही आनंद आता है। ऐसे लोगों का सहारा पाकर कभी-कभी छोटे आदमी मुंशीजी के मुँह लग जाते थे। नहीं तो, एक कुँजड़िन की इतनी मजाल नहीं थी कि आँगन में जाकर उन्हें बुरा-भला कहे। मुंशीजी उसके पुराने गाहक थे; बरसों तक उससे साग-भाजी ली थी। यदि दाम न दिया जाय, तो कुँजड़िन को सन्तोष करना चाहिए था। दाम जल्दी या देर से मिल ही जाते। परन्तु वह मुँहफट कुँजड़िन दो ही बरसों में घबरा गई, और उसने कुछ आने पैसों के लिए एक प्रतिष्ठित आदमी का पानी उतार लिया। झुँझलाकर मुंशीजी अपने को मृत्यु का कलेवा बनाने पर उतारू हो गए, तो इसमें उनका कुछ दोष न था। 

इसी गाँव में मूँगा नाम की एक विधवा ब्राह्मणी रहती थी। उसका पति ब्रह्मा की काली पलटन में हवलदार था और लड़ाई में वहीं मारा गया। सरकार की ओर से उसके अच्छे कामों के बदले मूँगा को पाँच सौ रुपये मिले थे। विधवा स्त्री, जमाना नाजुक था, बेचारी ने सब रुपये मुंशी रामसेवक को सौंप दिए, और महीने-महीने थोड़ा-थोड़ा उसमें से माँगकर अपना निर्वाह करती रही। 
मुंशीजी ने यह कर्तव्य कई वर्ष तक तो बड़ी ईमानदारी के साथ पूरा किया पर जब बूढ़ होने पर भी मूँगा नहीं मरी और मुंशी जी को यह चिंता हुई कि शायद उसमें से आधी रकम भी स्वर्ग-यात्रा के लिए नहीं छोड़ना चाहती, तो एक दिन उन्होंने कहा—मूँगा! तुम्हें मरना है या नहीं ? साफ-साफ कह दो कि मैं अपने मरने की फिक्र करूं ? उस दिन मूँगा की आँखे खुलीं, उसकी नींद टूटी, बोली—मेरा हिसाब कर दो। हिसाब का चिट्ठा तैयार था। ‘अमानत’ में अब एक कौड़ी बाकी न थी। मूँगा ने बड़ी कड़ाई से मुंशीजी का हाथ पकड़ कर कहा—अभी मेरे ढाई सौ रुपये तुमने दबा रखे हैं। मैं एक कौड़ी भी न छोड़ूंगी। 
परन्तु अनाथों का क्रोध पटाखे की आवाज है, जिससे बच्चे डर जाते हैं और असर कुछ नहीं होता। अदालत में उसका कुछ जोर न था। न लिखा-पढ़ी थी, न हिसाब-किताब। हाँ, पंचायत से कुछ आसरा था। पंचायत बैठी, कई गाँव के लोग इकट्ठे हुए। मुंशीजी नीयत और मामले के साफ थे, उन्हें पंचों का क्या डर ! सभा में खड़े होकर पंचों से कहा— ‘भाइयों! आप लोग सत्यनारायण और कुलीन हैं। मैं आप सब साहबों का दास हूँ। आप सब साहबों की उदारता और कृपा से, दया और प्रेम से मेरा रोम-रोम कृतज्ञ है और आप लोग सोचते हैं कि इस अनाथिनी और विधवा स्त्री के रुपये हड़प कर गया हूं?’ 
पंचों ने एक स्वर से कहा—नहीं, नहीं ! आपसे ऐसा नहीं हो सकता। 
रामसेवक—यदि आप सब सज्जनों का विचार हो कि मैंने रुपये दबा लिये, तो मेरे लिए डूब मरने के सिवा और कोई उपाय नहीं। मैं धनाढ्य नहीं हूँ, न मुझे उदार होने का घमंड है, पर अपनी कलम की कृपा से, आप लोगों की कृपा से किसी का मोहताज नहीं हूँ क्या मैं ऐसा ओछा हो जाऊँगा कि एक अनाथिनी के रुपये पचा लूँ ? 
पंचों ने एक स्वर से फिर कहा—नहीं, नहीं ! आपसे ऐसा नहीं हो सकता। मुँह देखकर टीका काढ़ा जाता है। पंचों ने मुंशीजी को छोड़ दिया। पंचायत उठ गई। मूँगा ने आह भरकर संतोष किया और मन में कहा—अच्छा, अच्छा ! यहा न मिला तो न सही, वहाँ कहाँ जायेगा? 

अब कोई मूँगा का दुःख सुननेवाला और सहायक न था। दरिद्रता से जो कुछ दुःख भोगने पड़ते हैं, वह सब उसे झेलने पड़े। वह शरीर से पुष्ट थी, चाहती तो परिश्रम कर सकती थी; पर जिस दिन पंचायत पूरी हुई, उसी दिन उसने काम न करने की कसम खा ली। अब उसे रात-दिन रुपयों की रट लगी रहती। उठते-बैठते, सोते-जागते, उसे केवल एक काम था और वह मुंशी रामसेवक का भला मनाना। अपने झोपड़े के दरवाजे पर बैठी हुई वह रात-दिन उन्हें सच्चे मन से असीसा करती। बहुधा अपने असीस के वाक्यों में ऐसे कविता के वाक्य और उपमाओं का व्यवहार करती कि लोग सुनकर अचम्भे में आ जाते।
धीरे-धीरे मूँगा पगली हो चली। नंगे-सिर, नंगे शरीर, हाथ में एक कुल्हाड़ी लिये हुए सुनसान स्थानों में जा बैठती। 
झोपड़ी के बदले अब वह मरघट पर, नदी के किनारे खंडहरों में घूमती दिखाई देती। बिखरी हुई लटें, लाल-लाल आँखें, पागलों-सा चेहरा, सूखे हुए हाथ-पाँव। उसका यह स्वरूप देखकर लोग डर जाते थे। अब कोई उसे हँसी में भी नहीं छेड़ता। यदि वह कभी गाँव में निकल आती, तो स्त्रियाँ घरों के किवाड़ बंद कर लेतीं। पुरुष कतराकर इधर-उधर से निकल जाते और बच्चे चीख मारकर भागते। यदि कोई लड़का भागता न था, तो वह मुंशी रामसेवक का सुपुत्र रामगुलाम था। बाप में जो कुछ कोर-कसर रह गई थी, वह बेटे में पूरी हो गई थी ! लड़कों का उसके मारे नाक में दम था। गाँव के काने लँगड़े आदमी उसकी सूरत से चिढ़ते थे और गालियाँ खाने में तो शायद ससुराल में आनेवाले दमाद को भी इतना आनंद न आता हो ! वह मूँगा के पीछे तालियाँ बजाता, कुत्तों को साथ लिए हुए उस समय तक रहता, जब तक वह बेचारी तंग आकर गाँव से निकल न जाती। रुपया-पैसा, होश-हवास खोकर उसे पगली की पदवी मिली और अब वह सचमुच पगली थी। अकेली बैठी अपने-आप घण्टों बातें किया करती जिसमें रामसेवक के मांस, हड्डी, चमड़े, आँखें, कलेजा आदि को खाने, मसलने, नोचने, खसोटने की बड़ी उत्कट इच्छा प्रकट की जाती थी और जब उसकी यह इच्छा सीमा तक पहुंच जाती, तो वह रामसेवक के घर की ओर मुँह करके खूब चिल्लाकर और डरावने शब्दों में हाँक लगाती, तेरा लोहू पीऊँगी। 

प्रायः रात के सन्नाटे में यह गरजती हुई आवाज सुनकर स्त्रियाँ चौंक पड़ती थीं। परन्तु इस आवाज से भयानक उसका ठठाकर हँसना था ! मुंशीजी के लहू पीने की कल्पित खुशी में वह जोर से हँसा करती थी। इस, ठठाने से ऐसी आसुरिक उद्दण्डता, ऐसी पाशविक उग्रता टपकती थी कि रात को सुनकर लोगों का खून ठंडा हो जाता था। मालूम होता, मानो, सैकड़ों उल्लू एक साथ हँस रहे हैं। 
मुंशी रामसेवक बड़े हौसले और कलेजे के आदमी थे। न उन्हें दीवानी का डर था न फौजदारी का। परंतु मूंगा के इन डरावने शब्दों को सुनकर वह भी सहम जाते। हमें मनुष्य के न्याय का डर न हो, परंतु ईश्वर के न्याय का डर प्रत्येक मनुष्य के मन में कभी-कभी ऐसी ही भावना उत्पन्न कर देता—उनसे अधिक उनकी स्त्री के मन में। उनकी स्त्री बड़ी ही चतुर थी। वह उनको इन सब बातों में प्रायः सलाह दिया करती थी। उन लोगों की भूल थी, जो लोग कहते थे कि मुंशीजी की जीभ पर सरस्वती विराजती हैं। वह गुण तो उनकी स्त्री को प्राप्त था। बोलने में वह उतनी ही तेज थी, जितना मुंशीजी लिखने में थे और यह दोनों स्त्री-पुरुष प्रायः अपनी अवश दशा में सलाह करते कि अब क्या करना चाहिए? 

आधी रात का समय था। मुंशीजी नित्य नियम के अनुसार अपनी चिंता दूर करने के लिए शराब के दो-चार घूँट पीकर सो गए थे। यकायक मूँगा ने उनके दरवाजे पर आकर जोर से हाँक लगायी, ‘तेरा लहू पीऊँगी’ और खूब खिलखिलाकर हँसी। 
मुंशीजी यह भयावह ठहाका सुनकर चौंक पड़े। डर के मारे पैर थर-थर काँपने लगे। कलेजा धक-धक करने लगा दिल पर बहुत जोर डाल कर उन्होंने दरवाजा खोला, जाकर नागिन को जगाया। नागिन ने झुँझलाकर कहा—क्या है; क्या कहते हो ? 
मुंशीजी ने दबी आवाज से कहा—वह दरवाजे पर खड़ी है। नागिन उठ बैठी—क्या कहती है ? 
‘तुम्हारा सिर।’ 
‘क्या दरवाजे पर आ गई ?’ 
‘हाँ, आवाज नहीं सुनती हो।’ 
नागिन मूँगा से नहीं, परन्तु उसके ध्यान से बहुत डरती थी, तो भी उसे विश्वास था कि मैं बोलने में उसे जरूर नीचा दिखा सकती हूँ। सँभलकर बोली—कहो तो मैं उससे दो-दो बातें कर लूं ? परंतु मुंशीजी ने मना किया। 
दोनों आदमी पैर दबाए ड्योढ़ी में गये और दरवाजे से झाँककर देखा मूँगा की धुँधली मूरत धरती पर पड़ी थी और उसकी साँस तेजी से चलती हुई सुनाई देती थी। रामसेवक के लहू मांस की भूख में वह अपना लहू और मांस सुखा चुकी थी। एक बच्चा भी उसे गिरा सकता था। परंतु उससे सारा गाँव थर-थर काँपता था। हम जीते मनुष्य से नहीं डरते, पर मुर्दे से डरते हैं। रात गुजरी। दरवाजा बंद था, पर मुंशीजी और नागिन ने बैठकर रात काटी, मूँगा भीतर नहीं घुस सकती थी, पर उसकी आवाज को कौन रोक सकता था मूंगा से अधिक डरावनी उसकी आवाज थी। 
भोर को मुंशीजी बाहर निकले और मूँगा से बोले—यहाँ क्यों पड़ी है ? 
मूँगा बोली— तेरा लहू पीऊँगी। 
नागिन ने बल खाकर कहा—तेरा मुँह झुलस दूंगी। 
पर नागिन के विष ने मूँगा पर कुछ असर न किया। उसने जोर से ठहाका लगाया, नागिन खिसियानी-सी हो गई। हंसी के सामने मुँह बंद हो जाता है। मुंशीजी फिर बोले— यहां से उठ जा। 
‘न उठूँगी।’ 
‘कब तक पड़ी रहेगी ?’ 
‘तेरा लहू पीकर जाऊंगी।’ 
मुंशीजी की प्रखर लेखनी का यहाँ कुछ जोर न चला और नागिन की आग-भरी बातें यहाँ सर्द हो गईं। दोनों घर में जाकर सलाह करने लगे, यह बला कैसे टलेगी ? इस आपत्ति से कैसे छुटकारा होगा ? 

देवी आती है तो बकरे का खून पीकर चली जाती है, पर यह डाइन मनुष्य का खून पीने आयी है। वह खून, जिसका अगर एक बूँद भी कलम बनाने के समय निकल पड़ती थी, तो अठवारों और महीनों सारे कुनबे को अफसोस रहता और यह घटना गाँव में घर-घर फैल जाती। क्या वही लहू पीकर मूँगा का सूखा शरीर हरा हो जाएगा ? 
गाँव में यह चर्चा फैल गई, मूँगा मुंशीजी के दरवाजे पर धरना दिये बैठी है। मुंशीजी के आगमन में गाँववालों को बड़ा मजा आता था। देखते-देखते सैकड़ों आदमियों की भीड़ लग गई। इस दरवाजे पर कभी-कभी भीड़ लगी रहती थी। यह भीड़ रामगुलाम को पसंद न थी। मूँगा पर उसे ऐसा क्रोध आ रहा था कि यदि उसका वश चलता, तो वह इसे कुएँ में ढकेल देता। इस तरह का विचार उठते ही रामगुलाम के मन में गुदगुदी समा गई और वह बड़ी कठिनता से अपनी हँसी रोक सका। अहा ! वह कुएँ में गिरती तो क्या मजे की बात होती ! परन्तु यह चुड़ैल यहाँ से टलती ही नहीं क्या करूं ? 
मुंशीजी के घर में एक गाय थी, जिसे खाली, दाना और भूसा तो खूब खिलाया जाता, पर वह सब उसकी हड्डियों में मिल जाता, उसका ढांचा पुष्ट होता जाता था। रामगुलाम ने उसी गाय का गोबर एक हाँड़ी में घोला और सबका-सब बेचारी मूँगा पर उँड़ेल दिया। उसके थोड़े-बहुत छींटे दर्शकों पर भी डाल दिये। बेचारी मूँगा लदफद हो गई और लोग भाग खड़े हुए। कहने लगे, यह मुंशी रामगुलाम का दरवाजा है। यहाँ इसी प्रकार का शिष्टाचार किया जाता है। जल्द भाग चलो, नहीं तो अब इससे भी बढ़ कर खातिर की जायगी। इधर भीड़ कम हुई, उधर रामगुलाम घर में जाकर खूब हँसा और खूब तालियाँ बजायीं। मुंशीजी ने व्यर्थ की भीड़ को ऐसे सहज में और ऐसे सुन्दर रूप से हटा देने के उपाय पर अपने सुशील लड़के की पीठ ठोकी। सब लोग तो चम्पत हो गए, पर बेचारी मूँगा ज्यों-की-त्यों बैठी रह गई। 

दोपहर हुई। मूँगा ने कुछ नहीं खाया। साँझ हुई। हजार कहने-सुने से भी खाना नहीं खाया। गाँव के चौधरी ने बड़ी खुशामद की। यहाँ तक कि मुंशीजी ने हाथ तक जोड़े, पर देवी प्रसन्न न हुई। निदान मुंशीजी उठकर भीतर चले गए। वह कहते थे कि रूठने वाले को भूख आप ही मना लिया करती है। मूँगा ने यह रात भी बिना दाना-पानी के काट दी। लालाजी और ललाइन ने आज फिर जाग-जागकर भोर किया। आज मूँगा की गरज और हँसी बहुत कम सुनाई पड़ती थी। घरवालों ने समझा, बला टली, सबेरा होते ही जो दरवाजा खोलकर देखा, तो वह अचेत पड़ी थी, मुंह पर मक्खियाँ भिनभिना रही हैं और उसके प्राण-पखेरू उड़ चुके हैं। वह इस दरवाजे पर मरने ही आयी थी। जिसने उसके जीवन की जमा-पूंजी हर ली थी, उसी को अपनी जान भी सौंप दी। अपने शरीर की मिट्टी तक उसको भेंट कर दी। धन से मनुष्य को कितना प्रेम होता है ! धन अपनी जान से भी ज्यादा प्यारा होता है, विशेषकर बुढ़ापे में। ऋण चुकाने के दिन ज्यों-ज्यों पास आते जाते हैं, त्यों-त्यों उसका ब्याज बढ़ता जाता है। 

यह कहना यहाँ व्यर्थ है कि गांव में इस घटना से कैसी हलचल मची और मुंशी रामसेवक कैसे अपमानित हुए। एक छोटे-से गाँव में ऐसी असाधारण घटना होने पर जितनी हलचल हो सकती, उससे अधिक ही हुई। मुंशीजी का अपमान जितना होना चाहिए था, उससे बाल बराबर भी कम न हुआ। उनका बचा-खुचा पानी भी इस घटना से चला गया। अब गाँव का चमार भी उनके हाथ का पानी पीने का, उन्हें छूने का रवादार न था। यदि किसी घर से कोई गाय खूँटे पर मर जाती है, तो वह आदमी महीनों द्वार-द्वार भी माँगता फिरता है। न नाई उसकी हजामत बनावे, न कहार उसका पानी भरे, न कोई उसे छुए। यह गोहत्या का प्रयाश्चित था। ब्रह्महत्या का दंड तो इससे भी कड़ा है और इसमें अपमान भी बहुत है। मूंगा यह जानती थी और इसीलिए इस दरवाजे पर आकर मरी थी। वह जानती थी मैं जीते-जी तो कुछ नहीं कर सकती, मरकर उससे बहुत कुछ कर सकती हूँ। गोबर का उपला जब जल कर खाक हो जाता है,, तब साधु-संत उसे माथे पर चढ़ाते हैं; पत्थर का ढेला आग में जलाकर आग से अधिक तीखा और मारक होता है। 

मुंशी रामसेवक कानूनदाँ थे। कानून ने उन पर कोई दोष नहीं लगाया था। मूँगा किसी कानूनी दफा के अनुसार नहीं मरी थी। ताजीरात हिन्द में उसका कोई उदाहरण नहीं मिलता था। इसलिए जो लोग उनसे प्रायश्चित करवाना चाहते थे, उनकी भारी भूल थी। कुछ हर्ज नहीं, कहार पानी न भरे, न सही। वह पानी भर लेंगे। अपना काम आप करने में भला लाज ही क्या ? बला से नाई बाल न बनावेगा। हजामत बनाने का काम ही क्या है ? दाढ़ी बहुत सुन्दर वस्तु है। दाढ़ी मर्द की शोभा और सिंगार है और जो फिर बालों से ऐसी घिन होगी, तो एक-एक आने में तो अस्तुरे मिलते हैं। धोबी कपड़े न धोएगा, इसकी भी कुछ परवाह नहीं। साबुन तो गली-गली कौड़ियों के मोल आता है। एक बट्टी साबुन में दर्जनों कपड़े ऐसे साफ हो जाते हैं, जैसे बगुले के पर। धोबी क्या खाकर ऐसा साफ कपड़ा धोएगा ? पत्थर पर पटक-पटकर कपड़ों का लत्ता निकाल लेता है। आप पहने, दूसरों को भाड़े पर पहनाए, भट्टी में चढ़ाए, रेह में भिगोए ! कपड़ों की तो दुर्गति कर डालता है। जभी तो कुर्ते दो-तीन साल से अधिक नहीं चलते। नहीं तो दादा हर पाँचवें बरस दो-तीन अचकन और दो कुरते बनवाया करते थे। मुंशी रामसेवक और उनकी स्त्री ने दिन-भर तो यों ही कहकर अपने मन को समझाया। साँझ होते ही उनकी तर्कनाएं शिथिल हो गईं। 

अब उनके मन पर भय ने चढ़ाई की। जैसे-तैसे रात बीतती थी, भय भी बढ़ता जाता था। बाहर का दरवाजा भूल से खुला रह गया था, पर किसी की हिम्मत न पड़ती थी कि जाकर बन्द तो कर आये। निदान नागिन ने हाथ में दीया लिया। मुंशीजी ने कुल्हाड़ा, रामगुलाम ने गँड़ासा, इस ढंग से तीनों आदमी चौंकते-हिचकते दरवाजे पर आये। यहाँ मुंशीजी ने बहादुरी से काम लिया। उन्होंने निधड़क दरवाजे से बाहर निकलने की कोशिश की। काँपते हुए, पर ऊँची आवाज में नागिन से बोले—तुम व्यर्थ डरती हो, वह क्या यहाँ बैठी है ? पर उनकी प्यारी नागिन ने उन्हें अंदर खींच लिया और झुँझलाकर बोली—तुम्हारा यही लड़कपन तो अच्छा नहीं। यह दंगल जीतकर तीनों आदमी रसोई के कमरे में आये और खाना पकने लगा। 
परन्तु मूँगा उनकी आँखों में घुसी हुई थी। अपनी परछाई को देखकर मूँगा का भय होता था। अँधेरे कोने में मूँगा बैठी मालूम होती थी। वही हड्डियों का ढाँचा, वही बिखरे हुए बाल, वही पागलपन, वही डरावनी आँख, मूँगा का नखशिख दिखाई देता था। इसी कोठरी में आटे दाल के कई मटके रखे हुए थे, वहां कुछ पुराने चिथड़े भी पड़े हुए थे। एक चूहे को भूख ने बेचैन किया (मटकों ने कभी अनाज की सूरत न देखी थी; पर सारे गांव में मशहूर था कि इस घर के चूहे गजब के डाकू हैं), तो वह उन दानों की खोज में, जो मटकों से कभी नहीं गिरे थे, रेंगता हुआ इस चिथड़े के नीचे आ निकला। कपड़े में खड़खड़ाहट हुई। फैले हुए चिथड़े मूँगा की पतली टाँगे बन गईं, नागिन देखकर झिझकी और चीक उठी। मुंशीजी बदहवास होकर दरवाजे की ओर लपके, रामगुलाम दौड़कर उनकी टाँगे से लिपट गया। चूहा बाहर निकल आया। उसे देखकर इन लोगों के होश ठिकाने हुए। अब मुंशीजी साहस करके मटके की ओर चले। नागिन ने कहा—रहने भी दो, देख ली तुम्हारी मरदानगी। 
मुंशीजी अपनी प्रिया नागिन के इस अनादर पर बहुत बिगड़े—क्या तुम समझती हो, मैं डर गया ? भला, डर की क्या बात थी ! मूँगा मर गयी; क्या वह बैठी है ? मैं कल नहीं दरवाजे के बाहर निकल गया था। तुम रोकती रहीं मैं न माना। 
मुंशीजी की इस दलील ने नागिन को निरुत्तर कर दिया। कल दरवाजे के बाहर निकल जाना या निकलने की कोशिश करना साधारण काम न था। जिसके साहस का ऐसा प्रमाण मिल चुका हो, उसे डरपोक कौन कह सकता है ? यह नागिन की हठधर्मी थी। 
खाना खाकर तीनों आदमी सोने के कमरे में आये। परन्तु मूँगा ने यहाँ भी पीछा न छोड़ा। बातें करते थे, दिल को बहलाते थे, नागिन ने राजा हरदौल और रानी सारंधा की कहानियाँ कहीं, मुंशीजी ने फौजदारी के कई मुकदमों का हाल कह सुनाया। परन्तु तो भी, इन उपायों से भी मूँगा की मूर्ति उनकी आँखों के सामने से न हटती थी। जरा खटखटाहट होती तब तीनों चौंक पड़ते। उधर पत्तियों में सनसनाहट हुई कि इधर तीनों के रोंगटे खड़े हो गए। रह-हकर एक धीमी आवाज धरती के भीतर से उनके कानों में आती थी—‘तेरा लहू पीऊँगी’। 

आधी रात को नागिन नींद से चौंक पड़ी। वह इन दिनों गर्भवती थी लाल-लाल आँखोंवाली, तेज और नुकीले दाँतोंवाली मूँगा उसी की छाती पर बैठी हुई जान पड़ती थी। नागिन चीख उठी। बावली की तरह आँगन में भाग आयी और यकायक धरती पर चित्त गिर पड़ी। सारा शरीर पसीने-पसीने हो गया। मुंशीजी भी उसकी चीख सुनकर चौंके, पर डर के मारे आँखें न खुलीं। अंधों की तरह दरवाजा टटोलते रहे। बहुत देर के बाद उन्हें दरवाजा मिला। आँगन में आये नागिन जमीन पर पड़ी हाथ-पाँव पटक रही थी। उसे उठाकर भीतर लाये, पर रात-भर उसने आँखें न खोलीं। भोर को अकबक बकने लगी। थोड़ी देर में ज्वर हो आया। बदन लाल तवा-सा हो गया। साँज होते-होते सन्निपात हो आया और आधी रात के समय जब संसार में सन्नाटा छाया हुआ था, नागिन इस संसार से चल बसी। मूंगा के डर ने उसकी जान ली जब तक मूँगा जीती रही, वह नागिन की फुफकार से सदा डरती रही। पगली होने पर भी उसने कभी नागिन का सामना नहीं किया, पर अपनी जान देकर उसने आज नागिन की जान ली भय में बड़ी शक्ति है। मनुष्य हवा में एक गिरह भी नहीं लगा सकता, पर इसने हवा में एक संसार रच डाला है। 
रात बीत गयी। दिन चढ़ता आता था, पर गाँव का कोई आदमी नागिन की लाश उठाने को आता न दिखाई दिया। मुंशीजी घर-घर घूमे पर कोई न निकला। भला, हत्यारे के दरवाजे पर कौन जाए ? हत्यारे की लाश कौन उठाए ? इस समय मुंशीजी का रोबदाब, उनकी प्रबल लेखनी का भय और उनकी कानूनी प्रतिभा एक भी काम न आयी। चारों ओर से हारकर मुंशीजी फिर अपने घर आये। यहाँ उन्हें अंधकार-ही-अंधकार दीखता था, दरवाजे तक तो आये, पर भीतर पैर नहीं रखा जाता था। न बाहर ही खड़े रह सकते थे। बाहर मूंगा थी, भीतर नागिन। जी को कड़ा करके ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ करते हुए घर में घुसे। उस समय उनके मन पर जो बीतती थी, वही जानते थे। उनका अनुमान करना कठिन है। घर में लाश पड़ी हुई; न कोई आगे, न पीछे। दूसरा ब्याह तो हो सकता था। अभी इसी फागुन में तो पचासवाँ लगा है। पर ऐसी सुयोग्य और मीठी बोलीवाली स्त्री कहाँ मिलेगी ? अफसोस ! अब तगादा करने वालों से बहस कौन करेगा, कौन उन्हें निरुत्तर करेगा? लेन-देन का हिसाब-किताब कौन इतनी खूबी से करेगा ? किसकी कड़ी आवाज तीर की तरह तगादेदारों की छाती में चुभेगी ? यह नुकसान अब पूरा नहीं हो सकता। दूसरे दिन मुंशीजी लाश को एक ठेलेगाड़ी पर लादकर गंगाजी की तरफ चले। 

शव के साथ जाने वालों की संख्या कुछ भी न थी। एक स्वयं मुंशीजी, दूसरे उनके पुत्ररत्न रामगुलामजी ! इस बेइज्जती से मूँगा की लाश भी नहीं उठी थी। मूँगा ने नागिन की जान लेकर भी मुंशीजी का पिंड न छोड़ा। उनके मन में हर घडी मूंगा की मूर्ति विराजमान रहती थी। कहीं रहते, उनका ध्यान इसी ओर रहा करता था। यदि दिल-बहलाव का कोई उपाय होता, तो शायद वह इतने बेचैन न होते; पर गाँव का एक पुतली भी उनके दरवाजे की ओर न झाँकता था। बेचारे अपने हाथों पानी भरते, आप ही बरतन धोते। सोच और क्रोध, चिंता और भय, इतने शत्रुओं के सामने एक दिमाग कब तक ठहर सकता ? विशेषकर वह दिमाग, जो रोज,-रोज कानून की बहसों में खर्च हो जाता था। 
अकेले कैदी की तरह उनके दस-बारह दिन तो ज्यों-त्यों कर कटे। चौदहवें दिन मुंशीजी ने कपड़े बदले और बोरिया-बस्ता लिये हुए कचहरी चले। आज उनका चेहरा कुछ खिला हुआ था। जाते ही मेरे मुवक्किल मुझे घेर लेंगे। मेरी मातमपुर्सी करेंगे। मैं आँसुओं की दो-चार बूँदें गिरा दूंगा। फिर बैनामों, रेहनामों और सुलहनामों की भरमार हो जाएगी। मुट्ठी गरम होगी। शाम को जरा नशेपानी का रंग जम जाएगा, जिसके छूट जाने से जी और भी उचाट हो रहा था। इन्हीं विचारों में मग्न मुंशीजी कचहरी पहुँचे। 

पर वहां रेहनामों की भरमार और बैनामों की बाढ़ और मुवक्किलों की चहल-पहल के बदले निराशा की रेतीली भूमि नजर आयी। बस्ता खोले घंटो बैठे रहे, पर कोई नजदीक भी न आया। किसी ने इतना भी न पूछा कि आप कैसे हैं ? नए मुवक्किल तो खैर, बड़े-बड़े पुराने मुवक्किल, जिनका मुंशीजी से कई पीढ़ियों से सरोकार था, आज उनसे मुँह छिपाने लगे। वह नालायक और अनाड़ी रमजान, जिसकी मुंशीजी हँसी उड़ाते थे और जिसे शुद्ध लिखना भी न आता था, गोपियों में कन्हैया बना हुआ था। वाह रे भाग्य ! मुवक्किल यों मुँह फेरे चले जाते हैं, मानो कभी की जान-पहचान ही नहीं। दिन-भर कचहरी की खाक छानने के बाद मुंशीजी अपने घर चले। निराशा और चिन्ता में डूबे हुए ज्यों-ज्यों घर के निकट आते थे, मूँगा का चित्र सामने आता जाता था। यहाँ तक कि जब घर का द्वार खोला और दो कुत्ते, जिन्हें रामगुलाम ने बन्द कर रखा था, झटपट बाहर निकले, तो मुंशीजी के होश उड़ गए; एक चीख मारकर जमीन पर गिर पड़े। 

मनुष्य के मन और मस्तिष्क पर भय का जितना प्रभाव होता है, उतना और किसी शक्ति का नहीं ! प्रेम, चिन्ता, निराशा, हानि यह सब मन को अवश्य दुखित करते हैं; यह हवा के हलके झोंके हैं और भय प्रचंड आँधी है। मुंशीजी पर इसके बाद क्या बीती, मालूम नहीं। कई दिन तक लोगों ने उन्हें कचहरी जाते और वहाँ से मुरझाए हुए लौटते देखा। कचहरी जाना उनका कर्तव्य था और यद्यपि वहाँ मुवक्किलों का अकाल था, तो भी तगादेवालों से गला छुड़ाने और उनको भरोसा दिलाने के लिए अब यही एक लटका रह गया था। इसके बाद वह कई महीने तक दीख न पड़े। बद्रीनाथ चले गये। 
एक दिन गाँव में एक साधु आया, भभूत रमाए, लम्बी-लम्बी जटाएँ, हाथ में कमण्डल। इसका चेहरा मुंशी रामसेवक से बहुत मिलता-जुलता था। बोलचाल भी अधिक भेद न था। वह एक पेड़ के नीचे धूनी रमाए बैठा रहा। उसी रात को मुंशी रामसेवक के घर धुआँ उठा, फिर आग की ज्वाला दीखने लगी और आग भड़क उठी। गांव के सैकड़ों आदमी दौड़े, आग बुझाने के लिए नहीं, तमाशा देखने के लिए। एक गरीब की हाय में कितना प्रभाव है ! रामगुलाम मुंशीजी के गायब हो जाने पर अपने मामा के यहाँ चल गया और वहाँ कुछ दिनों रहा, पर वहाँ उसकी चाल-ढाल किसी को पसंद न आयी। 
एक दिन उसने किसी के खेत में मूली नोची। उसने दो-चार धौल लगाए। उस पर वह इस तरह बिगड़ा कि जब उसके चने खलिहान में आये, तो उसने आग लगा दी। सारा-का-सारा खलिहान जलकर खाक हो गया। हजारों रुपयों का नुकसान हुआ। पुलिस ने तहकीकातकी, रामगुलाम पकड़ा गया। इसी अपराध में वह चुनार के रिफार्मेटरी स्कूल में मौजूद है ।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 10 May 2020 at 4:50 PM -

मृतक भोज - मुंशी प्रेम चंद

Hindi Kahani- हिंदी कहानी
Mritak Bhoj - Munshi Premchand
मृतक भोज - मुंशी प्रेम चंद

सेठ रामनाथ ने रोग-शय्या पर पड़े-पड़े निराशापूर्ण दृष्टि से अपनी स्त्री सुशीला की ओर देखकर कहा, 'मैं बड़ा अभागा हूँ, शीला। मेरे साथ तुम्हें सदैव ही दुख भोगना पड़ा। जब घर में कुछ ... न था, तो रात-दिन गृहस्थी के धन्धों और बच्चों के लिए मरती थीं। जब जरा कुछ सँभला और तुम्हारे आराम करने के दिन आये, तो यों छोड़े चला जा रहा हूँ। आज तक मुझे आशा थी, पर आज वह आशा टूट गयी। देखो शीला, रोओ मत। संसार में सभी मरते हैं, कोई दो साल आगे, कोई दो साल पीछे। अब गृहस्थी का भार तुम्हारे ऊपर है। मैंने रुपये नहीं छोड़े; लेकिन जो कुछ है, उससे तुम्हारा जीवन किसी तरह कट जायगा ... यह राजा क्यों रो रहा है ? सुशीला ने आँसू पोंछकर कहा, ज़िद्दी हो गया है और क्या। आज सबेरे से रट लगाये हुए है कि मैं मोटर लूँगा। 50 रु. से कम में आयेगी मोटर ? सेठजी को इधर कुछ दिनों से दोनों बालकों पर बहुत स्नेह हो गया था। बोले तो मँगा दो न एक। बेचारा कब से रो रहा है, क्या-क्या अरमान दिल में थे। सब धूल में मिल गये। रानी के लिए विलायती गुड़िया भी मँगा दो। दूसरों के खिलौने देखकर तरसती रहती है। जिस धन को प्राणों से भी प्रिय समझा, वह अन्त को डाक्टरों ने खाया। बच्चे मुझे क्या याद करेंगे कि बाप था। अभागे बाप ने तो धन को लड़के-लड़की से प्रिय समझा। कभी पैसे की चीज भी लाकर नहीं दी। ' 
अन्तिम समय जब संसार की असारता कठोर सत्य बनकर आँखों के सामने खड़ी हो जाती है, तो जो कुछ न किया, उसका खेद और जो कुछ किया, उस पर पश्चात्ताप, मन को उदार और निष्कपट बना देता है। सुशीला ने राजा को बुलाया और उसे छाती से लगाकर रोने लगी। वह मातृस्नेह, जो पति की कृपणता से भीतर-ही-भीतर तड़पकर रह जाता था, इस समय जैसे खौल उठा। लेकिन मोटर के लिए रुपये कहाँ थे ? सेठजी ने पूछा, 'मोटर लोगे बेटा; अपनी अम्माँ से रुपये लेकर भैया के साथ चले जाओ। खूब अच्छी मोटर लाना। ' 
राजा ने माता के आँसू और पिता का यह स्नेह देखा, तो उसका बालहठ जैसे पिघल गया। बोला, 'अभी नहीं लूँगा। ' 
सेठजी ने पूछा, 'क्यों ? ' 
'जब आप अच्छे हो जायँगे तब लूँगा।' सेठजी फूट-फूटकर रोने लगे। 
तीसरे दिन सेठ रामनाथ का देहान्त हो गया। धनी के जीने से दु:ख बहुतों को होता है, सुख थोड़ों को। उनके मरने से दु:ख थोड़ों को होता है, सुख बहुतों को। महाब्राह्मणों की मण्डली अलग सुखी है, पण्डितजी अलग खुश हैं, और शायद बिरादरी के लोग भी प्रसन्न हैं; इसलिए कि एक बराबर का आदमी कम हुआ। दिल से एक काँटा दूर हुआ। और पट्टीदारों का तो पूछना ही क्या। अब वह पुरानी कसर निकालेंगे। ह्रदय को शीतल करने का ऐसा अवसर बहुत दिनों के बाद मिला है। आज पाँचवाँ दिन है। वह विशाल भवन सूना पड़ा है। लड़के न रोते हैं, न हँसते हैं। मन मारे माँ के पास बैठे हैं और विधवा भविष्य की अपार चिन्ताओं के भार से दबी हुई निर्जीव-सी पड़ी है। घर में जो रुपये बच रहे थे, वे दाह-क्रिया की भेंट हो गये और अभी सारे संस्कार बाकी पड़े हैं। भगवान्, कैसे बेड़ा पार लगेगा। 
किसी ने द्वार पर आवाज दी। महरा ने आकर सेठ धनीराम के आने की सूचना दी। दोनों बालक बाहर दौड़े। सुशीला का मन भी एक क्षण के लिए हरा हो गया। सेठ धनीराम बिरादरी के सरपंच थे। अबला का क्षुब्ध 
ह्रदय सेठजी की इस कृपा से पुलकित हो उठा। आखिर बिरादरी के मुखिया हैं। ये लोग अनाथों की खोज-खबर न लें तो कौन ले। धन्य हैं ये पुण्यात्मा लोग जो मुसीबत में दीनों की रक्षा करते हैं। यह सोचती हुई सुशीला घूँघट निकाले बरोठे में आकर खड़ी हो गयी। देखा तो धनीरामजी के अतिरिक्त और भी कई सज्जन खड़े हैं। 
धनीराम बोले 'बहूजी, भाई रामनाथ की अकाल-मृत्यु से हम लोगों को जितना दु:ख हुआ है, वह हमारा दिल ही जानता है। अभी उनकी उम्र ही क्या थी; लेकिन भगवान् की इच्छा। अब तो हमारा यही धर्म है कि ईश्वर पर भरोसा रखें और आगे के लिए कोई राह निकालें। काम ऐसा करना चाहिए कि घर की आबरू भी बनी रहे और भाईजी की आत्मा संतुष्ट भी हो। ' कुबेरदास ने सुशीला को कनखियों से देखते हुए कहा, 'मर्यादा बड़ी चीज है। उसकी रक्षा करना हमारा धर्म है। लेकिन कमली के बाहर पाँव निकालना भी तो उचित नहीं। कितने रुपये हैं तेरे पास, बहू ? क्या कहा, कुछ नहीं ? ' 
सुशीला -'घर में रुपये कहाँ हैं, सेठजी। जो थोड़े-बहुत थे, वह बीमारी में उठ गये। ' 
धनीराम -'तो यह नयी समस्या खड़ी हुई। ऐसी दशा में हमें क्या करना चाहिए, कुबेरदासजी ? ' 
कुबेरदास -'ज़ैसे हो, भोज तो करना ही पड़ेगा। हाँ, अपनी सामर्थ्य देखकर काम करना चाहिए। मैं कर्ज लेने को न कहूँगा। हाँ, घर में जितने रुपयों का प्रबन्ध हो सके, उसमें हमें कोई कसर न छोड़नी चाहिए। मृत-जीव के 
साथ भी तो हमारा कुछ कर्तव्य है। अब तो वह फिर कभी न आयेगा, उससे सदैव के लिए नाता टूट रहा है। इसलिए सबकुछ हैसियत के मुताबिक होना चाहिए। ब्राह्मणों को तो भोज देना ही पड़ेगा जिससे कि मर्यादा का निर्वाह हो ! ' 
धनीराम -'तो क्या तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है, बहूजी ? दो-चार हजार भी नहीं ! ' 
सुशीला --'मैं आपसे सत्य कहती हूँ, मेरे पास कुछ नहीं है। ऐसे समय झूठ बोलूँगी। ' 
धनीराम ने कुबेरदास की ओर अर्ध-अविश्वास से देखकर कहा, 'तब तो यह मकान बेचना पड़ेगा। ' 
कुबेरदास -'इसके सिवा और क्या हो सकता है। नाक काटना तो अच्छा नहीं। रामनाथ का कितना नाम था, बिरादरी के स्तंभ थे। यही इस समय एक उपाय है। 10 हजार रु. मेरे आते हैं। सूद-बट्टा लगाकर कोई 15 हजार रु. मेरे हो जायँगे। बाकी भोज में खर्च हो जायेगा। अगर कुछ बच रहा, तो बाल-बच्चों के काम आ जायगा। '
धनीराम -'आपके यहाँ कितने पर बंधक रखा था ? ' 
कुबेरदास-' 10 हजार रुपये पर। रुपये सैकड़े सूद। ' 
धनीराम -'मैंने तो कुछ कम सुना है। ' 
कुबेरदास -'उसका तो रेहननामा रखा है। जबानी बातचीत थोड़े ही है। मैं दो-चार हजार के लिए झूठ नहीं बोलूँगा। ' 
धनीराम-' नहीं-नहीं, यह मैं कब कहता हूँ। तो तूने सुन लिया, बाई ! पंचों की सलाह है कि मकान बेच दिया जाय। ' 
सुशीला का छोटा भाई संतलाल भी इसी समय आ पहुँचा। यह अन्तिम वाक्य उसके कान में पड़ गया। बोल उठा, 'क़िसलिए मकान बेच दिया जाय ? बिरादरी के भोज के लिए ? बिरादरी तो खा-पीकर राह लेगी, इन अनाथों की रक्षा कैसे होगी ? इनके भविष्य के लिए भी तो कुछ सोचना चाहिए। ' 
धनीराम ने कोप-भरी आँखों से देखकर कहा, 'आपको इन मामलों में टाँग अड़ाने का कोई अधिकार नहीं। केवल भविष्य की चिन्ता करने से काम नहीं चलता। मृतक का पीछा भी किसी तरह सुधरना ही पड़ता है। आपका क्या बिगड़ेगा। हँसी तो हमारी होगी। संसार में मर्यादा से प्रिय कोई वस्तु नहीं ! मर्यादा के लिए प्राण तक दे देते हैं। जब मर्यादा ही न रही, तो क्या रहा। अगर हमारी सलाह पूछोगे, तो हम यही कहेंगे। आगे बाई का अखतियार है, जैसा चाहे करे; पर हमसे कोई सरोकार न रहेगा। चलिए कुबेरदासजी, चलें। ' 
सुशीला ने भयभीत होकर कहा, 'भैया की बातों का विचार न कीजिए,इनकी तो यह आदत है। मैंने तो आपकी बात नहीं टाली; आप मेरे बड़े हैं। घर का हाल आपको मालूम है। मैं अपने स्वामी की आत्मा को दुखी करना नहीं चाहती, लेकिन जब उनके बच्चे ठोकरें खायेंगे, तो क्या उनकी आत्मा दुखी न होगी ? बेटी का ब्याह करना ही है। लड़के को पढ़ाना-लिखाना है ही। ब्राह्मणों को खिला दीजिए; लेकिन बिरादरी करने की मुझमें सामर्थ नहीं है। ' 
दोनों महानुभावों को जैसे थप्पड़ लगी इतना बड़ा अधर्म। भला ऐसी बात भी जबान से निकाली जाती है। पंच लोग अपने मुँह में कालिख न लगने देंगे। दुनिया विधवा को न हँसेगी, हँसी होगी पंचों की। यह जग-हँसाई वे कैसे सह सकते हैं। ऐसे घर के द्वार पर झाँकना भी पाप है। सुशीला रोकर बोली, 'मैं अनाथ हूँ, नादान हूँ, मुझ पर क्रोध न कीजिए। आप लोग ही मुझे छोड़ देंगे, तो मेरा कैसे निर्वाह होगा। ' 
इतने में दो महाशय और आ बिराजे। एक बहुत मोटे और दूसरे बहुत दुबले। नाम भी गुणों के अनुसार ही भीमचन्द और दुर्बलदास। धनीराम ने संक्षेप में यह परिस्थिति उन्हें समझा दी। दुर्बलदास ने सह्रदयता से कहा, 'तो ऐसा क्यों नहीं करते कि हम लोग मिलकर कुछ रुपये दे दें। जब इसका लड़का सयाना हो जायगा, तो रुपये मिल ही जायेंगे। अगर न भी मिले तो एक मित्र के लिए कुछ बल खा जाना कोई बड़ी बात नहीं। ' 
संतलाल ने प्रसन्न होकर कहा, 'इतनी दया आप करेंगे, तो क्या पूछना। ' 
कुबेरदास त्योरी चढ़ाकर बोले, 'तुम तो बेसिर-पैर की बातें करने लगे दुर्बलदासजी ! इस बखत के बाजार में किसके पास फालतू रुपये रखे हुए हैं। ' 
भीमचन्द-' सो तो ठीक है, बाजार की ऐसी मंदी तो कभी देखी नहीं;पर निबाह तो करना चाहिए। ' 
कुबेरदास अकड़ गये। वह सुशीला के मकान पर दाँत लगाये हुए थे। ऐसी बातों से उनके स्वार्थ में बाधा पड़ती थी। वह अपने रुपये अब वसूल करके छोड़ेंगे। भीमचन्द ने उन्हें किसी तरह सचेत किया; 'लेकिन भोज तो देना ही पड़ेगा। उस कर्तव्य का पालन न करना समाज की नाक काटना है। ' 
सुशीला ने दुर्बलदास में सह्रदयता का आभास देखा। उनकी ओर दीन नेत्रों से देखकर बोली, 'मैं आप लोगों से बाहर थोड़े ही हूँ। आप लोग मालिक हैं, जैसा उचित समझें वैसा करें। ' 
दुर्बलदास -'तेरे पास कुछ थोड़े-बहुत गहने तो होंगे, बाई ? ' 
'हाँ गहने हैं। आधे तो बीमारी में बिक गये, आधे बचे हैं।' सुशीला ने सारे गहने लाकर पंचों के सामने रख दिये; 'पर यह तो मुश्किल से तीन हजार में उठेंगे।' दुर्बलदास ने पोटली को हाथ में तौलकर कहा, 'तीन हजार को कैसे जायँगे। मैं साढ़े तीन हजार दिला दूँगा। ' 
भीमचन्द ने फिर पोटली को तौलकर कहा, 'मेरी बोली, चार हजार की है। ' 
कुबेरदास को मकान की बिक्री का प्रश्न छेड़ने का अवसर फिर मिला, 'चार हजार ही में क्या हुआ जाता है। बिरादरी का भोज है या दोष मिटाना है। बिरादरी में कम-से-कम दस हजार का खरचा है। मकान तो निकालना ही पड़ेगा। ' 
सन्तलाल ने ओंठ चबाकर कहा, 'मैं कहता हूँ, आप लोग क्या इतने निर्दयी हैं ! आप लोगों को अनाथ बालकों पर भी दया नहीं आती ! क्या उन्हें रास्ते का भिखारी बनाकर छोड़ेंगे ? ' लेकिन सन्तलाल की फरियाद पर किसी ने ध्यान न दिया। मकान की बातचीत अब नहीं टाली जा सकती थी। बाजार मंदा है। 30 हजार से बेसी नहीं मिल सकते, 15 हजार तो कुबेरदास के हैं। पाँच हजार बचेंगे। चार हजार गहनों से आ जायँगे। इस तरह 9 हजार में बड़ी किफायत से ब्रह्मभोज और बिरादरी-भोज दोनों निपटा दिये जायँगे। सुशीला ने दोनों बालकों को सामने करके करबद्ध होकर कहा, 'पंचो, मेरे बच्चों का मुँह देखिए। मेरे घर में जो कुछ है; वह आप सब ले लीजिए; लेकिन मकान छोड़ दीजिए मुझे कहीं ठिकाना न मिलेगा। मैं आपके पैरों पड़ती हूँ मकान इस समय न बेचें। ' 
इस मूर्खता का क्या जवाब दिया जाय। पंच लोग तो खुद चाहते थे कि मकान न बेचना पड़े। उन्हें अनाथों से कोई दुश्मनी नहीं थी; किन्तु बिरादरी का भोज और किस तरह किया जाय। अगर विधवा कम-से-कम पाँच हजार रु. का जोगाड़ और कर दे, तो मकान बच सकता है, पर वह ऐसा नहीं कर सकती, तो मकान बेचने के सिवा और कोई उपाय नहीं। 
कुबेर ने अन्त में कहा, 'देख बाई, बाजार की दशा इस समय खराब है। रुपये किसी से उधार नहीं मिल सकते। बाल-बच्चों के भाग में लिखा होगा, तो भगवान् और किसी हीले से देगा। हीले रोजी, बहाने मौत। बाल-बच्चों की चिंता मत कर। भगवान् जिसको जन्म देते हैं, उसकी जीविका की जुगत पहले ही से कर देते हैं। हम तुझे समझाकर हार गये। अगर तू अब भी अपना हठ न छोड़ेगी, तो हम बात भी न पूछेंगे। फिर यहाँ तेरा रहना मुश्किल हो जायगा। शहरवाले तेरे पीछे पड़ जायँगे। ' 
विधवा सुशीला अब और क्या करती। पंचों से लड़कर वह कैसे रह सकती थी। पानी में रहकर मगर से कौन बैर कर सकता है। घर में जाने के लिए उठी पर वहीं मूर्छित होकर गिर पड़ी। अभी तक आशा सँभाले हुई थी। बच्चों के पालन-पोषण में वह अपना वैधव्य भूल सकती थी; पर अब तो अंधकार था, चारों ओर। सेठ रामनाथ के मित्रों का उनके घर पर पूरा अधिकार था। मित्रों का अधिकार न हो तो किसका हो। स्त्री कौन होती है। जब वह इतनी मोटी-सी बात नहीं समझती कि बिरादरी करना और धूम-धाम से दिल खोलकर करना लाजिमी बात है, तो उससे और कुछ कहना व्यर्थ है। गहने कौन खरीदे ? भीमचन्द चार हजार दाम लगा चुके थे, लेकिन अब उन्हें मालूम हुआ कि उनसे भूल हुई थी। दुर्बलदास ने तीन हजार लगाये थे। इसलिए सौदा इन्हीं के हाथ हुआ। इस बात पर दुर्बलदास और भीमचन्द में तकरार भी हो गयी; लेकिन भीमचन्द को मुँह की खानी पड़ी। न्याय दुर्बल के पक्ष में था। धनीराम ने कटाक्ष किया 'देखो दुर्बलदास, माल तो ले जाते हो; पर 
तीन हजार से बेसी का है। मैं नीति की हत्या न होने दूँगा।' 
कुबेरदास बोले, 'अजी, तो घर में ही तो है, कहीं बाहर तो नहीं गया। एक दिन मित्रों की दावत हो जायगी ! ' 
इस पर चारों महानुभाव हँसे। इस काम से फुरसत पाकर अब मकान का प्रश्न उठा। कुबेरदास 30 हजार देने पर तैयार थे; पर कानूनी कार्रवाई किये बिना संदेह की गुंजाइश थी। यह गुंजाइश क्योंकर रखी जाय। एक दलाल बुलाया गया। नाटा-सा आदमी था, पोपला मुँह, कोई 50 की अवस्था। नाम था चोखेलाल। 
कुबेरदास ने कहा, 'चोखेलालजी से हमारी तीस साल की दोस्ती है। आदमी क्या रत्न हैं।' 
भीमचन्द-'देखो चोखेलाल, हमें यह मकान बेचना है। इसके लिए कोई अच्छा ग्राहक लाओ। तुम्हारी दलाली पक्की।' 
कुबेरदास-' बाजार का हाल अच्छा नहीं है; लेकिन फिर भी हमें यह तो देखना पड़ेगा कि रामनाथ के बाल-बच्चों को टोटा न हो। (कान में) तीस से आगे न जाना।' 
भीमचन्द -'देखिए कुबेरदास, यह अच्छी बात नहीं है।' 
कुबेरदास -'तो मैं क्या कर रहा हूँ। मैं तो यही कह रहा था कि अच्छे दाम लगवाना।' 
चोखेलाल -'आप लोगों को मुझसे यह कहने की जरूरत नहीं। मैं अपना धर्म समझता हूँ। रामनाथजी मेरे भी मित्र थे। मुझे यह भी मालूम है कि इस मकान के बनवाने में एक लाख से कम एक पाई भी नहीं लगे, लेकिन बाजार का हाल क्या आप लोगों से छिपा है। इस समय इसके 25 हजार से बेसी नहीं मिल सकते। सुभीते से तो कोई ग्राहक से दस-पाँच हजार और मिल जायँगे; लेकिन इस समय तो कोई ग्राहक भी मुश्किल से मिलेंगे। लो दही और लाव दही की बात है।' 
धनीराम -'25 हजार रु. तो बहुत कम है भाई, और न सही 30 हजार रु. तो करा दो।' 
चोखेलाल -'30 क्या मैं तो 40 करा दूँ, पर कोई ग्राहक तो मिले। आप लोग कहते हैं तो मैं 30 हजार रु. की बातचीत करूँगा।' 
धनीराम -'ज़ब तीस हजार में ही देना है तो कुबेरदासजी ही क्यों न ले लें। इतना सस्ता माल दूसरों को क्यों दिया जाय।' 
कुबेरदास -'आप सब लोगों की राय हो, तो ऐसा ही कर लिया जाय। धनीराम ने 'हाँ, हाँ' कहकर हामी भरी। भीमचन्द मन में ऐंठकर रह गये। यह सौदा भी पक्का हो गया। आज ही वकील ने बैनामा लिखा। तुरन्त 
रजिस्ट्री भी हो गयी। सुशीला के सामने बैनामा लाया गया, तो उसने एक ठण्डी साँस ली और सजल नेत्रों से उस पर हस्ताक्षर कर दिये। अब उसे उसके सिवा और कहीं शरण नहीं है। बेवफा मित्र की भाँति यह घर भी सुख के दिनों में साथ देकर दु:ख के दिनों में उसका साथ छोड़ रहा है। 
पंच लोग सुशीला के आँगन में बैठे बिरादरी के रुक्के लिख रहे हैं और अनाथ विधवा ऊपर झरोखे पर बैठी भाग्य को रो रही है। इधर रुक्का तैयार हुआ, उधर विधवा की आँखों से आँसू की बूँदें निकलकर रुक्के पर गिर पड़ीं। धनीराम ने ऊपर देखकर कहा, 'पानी का छींटा कहाँ से आया ? '
सन्तलाल -'बाई बैठी रो रही है। उसने रुक्के पर अपने रक्त के आँसुओं की मुहर लगा दी है।' 
धनीराम (ऊँचे स्वर में) 'अरे, तो तू रो क्यों रही है, बाई ? यह रोने का समय नहीं है, तुझे तो प्रसन्न होना चाहिए कि पंच लोग तेरे घर में आज यह शुभ-कार्य करने के लिए जमा हैं। जिस पति के साथ तूने इतने दिनों भोग-विलास किया, उसी का पीछा सुधरने में तू दु:ख मानती है ? ' 
बिरादरी में रुक्का फिरा। इधर तीन-चार दिन पंचों ने भोज की तैयारियों में बिताये। घी धनीरामजी की आढ़त से आया। मैदा, चीनी की आढ़त भी उन्हीं की थी। पाँचवें दिन प्रात:काल ब्रह्म-भोज हुआ। संध्या-समय बिरादरी का ज्योनार। सुशीला के द्वार पर बग्घियों और मोटरों की कतारें खड़ी थीं। भीतर मेहमानों की पंगतें थीं। आँगन, बैठक, दालान, बरोठा, ऊपर की छत नीचे-ऊपर मेहमानों से भरा हुआ था। लोग भोजन करते थे और पंचों को सराहते थे। खर्च तो सभी करते हैं; पर इन्तजाम का सलीका चाहिए। ऐसे स्वादिष्ट पदार्थ बहुत कम खाने में आते हैं।
'सेठ चम्पाराम के भोज के बाद ऐसा भोज रामनाथजी का ही हुआ है।' 
'अमृतियाँ कैसी कुरकुरी हैं !' 
'रसगुल्ले मेवों से भरे हैं।' 
'सारा श्रेय पंचों को है।' 
धनीराम ने नम्रता से कहा, 'आप भाइयों की दया है जो ऐसा कहते हो। रामनाथ से भाई-चारे का व्यवहार था। हम न करते तो कौन करता। चार दिन से सोना नसीब नहीं हुआ।' 
'आप धन्य हैं ! मित्र हों तो ऐसे हों।' 
'क्या बात है ! आपने रामनाथजी का नाम रख लिया। बिरादरी यही खाना-खिलाना देखती है। रोकड़ देखने नहीं जाती।' 
मेहमान लोग बखान-बखान कर माल उड़ा रहे थे और उधर कोठरी में बैठी हुई सुशीला सोच रही थी संसार में ऐसे स्वार्थी लोग हैं ! सारा संसार स्वार्थमय हो गया है ! सब पेटों पर हाथ फेर-फेर कर भोजन कर रहे हैं। 
कोई इतना भी नहीं पूछता कि अनाथों के लिए कुछ बचा या नहीं। एक महीना गुजर गया। सुशीला को एक-एक पैसे की तंगी हो रही थी। नकद था ही नहीं, गहने निकल ही गये थे। अब थोड़े से बरतन बच रहे थे। उधर छोटे-छोटे बहुत-से बिल चुकाने थे। कुछ रुपये डाक्टर के, कुछ दरजी के, कुछ बनियों के। सुशीला को यह रकमें घर का बचा-खुचा सामान बेचकर चुकानी पड़ीं। और महीना पूरा होते-होते उसके पास कुछ न बचा। बेचारा सन्तलाल एक दूकान पर मुनीम था। कभी-कभी वह आकर एक-आधा रुपये दे देता। इधर खर्च का हाथ फैला हुआ था। लड़के अवस्था को समझते थे। माँ को छेड़ते न थे, पर मकान के सामने से कोई खोंचेवाला निकल जाता और वे दूसरे लड़कों को फल या मिठाई खाते देखते, तो उनके मुँह में पानी भरकर आँखों में भर जाता था। ऐसी ललचायी हुई आँखों से ताकते थे कि दया आती। वही बच्चे, जो थोड़े दिन पहले मेवे-मिठाई की ओर ताकते न थे अब एक-एक पैसे की चीज को तरसते थे। वही सज्जन, जिन्होंने बिरादरी का भोज करवाया था, अब घर के सामने से निकल जाते; पर कोई झाँकता न था। 
शाम हो गयी थी। सुशीला चूल्हा जलाये रोटियाँ सेंक रही थी और दोनों बालक चूल्हे के पास रोटियों को क्षुधित नेत्रों से देख रहे थे। चूल्हे के दूसरे ऐले पर दाल थी। दाल के पकने का इन्तजार था। लड़की ग्यारह साल की थी, लड़का आठ साल का। मोहन अधीर होकर बोला, अम्माँ, 'मुझे रूखी रोटियाँ ही दे दो। बड़ी भूख लगी है।' सुशीला -'अभी दाल कच्ची है भैया।' 
रेवती -'मेरे पास एक पैसा है। मैं उसका दही लिये आती हूँ।' 
सुशीला --'तूने पैसा कहाँ पाया ? ' 
रेवती -'मुझे कल अपनी गुड़ियों की पेटारी में मिल गया था।' 
सुशीला -'लेकिन जल्द आइयो।' 
रेवती दौड़कर बाहर गयी और थोड़ी देर में एक पत्ते पर जरा-सा दही ले आयी। माँ ने रोटी-सेंककर दे दी। दही से खाने लगा। आम लड़कों की भाँति वह भी स्वार्थी था। बहन से पूछा भी नहीं। सुशीला ने कड़ी आँखों से देखकर कहा, 'बहन को भी दे दे। अकेला ही खा जायगा।' 
मोहन लज्जित हो गया। उसकी आँखें डबडबा आयीं। रेवती बोली, 'नहीं अम्माँ, कितना मिला ही है। तुम खाओ मोहन, तुम्हें जल्दी नींद आ जाती है। मैं तो दाल पक जायगी तो खाऊँगी।' 
उसी वक्त दो आदमियों ने आवाज दी। रेवती ने बाहर जाकर पूछा, यह सेठ कुबेरदास के आदमी थे। मकान खाली कराने आये थे। क्रोध से सुशीला की आँखें लाल हो गयीं। बरोठे में आकर कहा, 'अभी मेरे पति को पीछे हुए महीना भी नहीं हुआ, मकान खाली कराने की धुन सवार हो गयी। मेरा 50 हजार का घर 30 हजार में ले लिया, पाँच हजार सूद के उड़ाये, फिर भी तस्कीन नहीं होती। कह दो, मैं अभी खाली नहीं करूँगी।' 
मुनीम ने नम्रता से कहा, 'बाई जी, मेरा क्या अख्तियार है। मैं तो केवल संदेसिया हूँ। जब चीज दूसरे की हो गयी, तो आपको छोड़नी ही पड़ेगी। झंझट करने से क्या मतलब।' 
सुशीला भी समझ गयी, 'ठीक ही कहता है। गाय हत्या के बल कै दिन खेत चरेगी। नर्म होकर बोली, 'सेठजी से कहो, मुझे दस-पाँच दिन की मुहलत दें। लेकिन नहीं, कुछ मत कहो। क्यों दस-पाँच दिन के लिए किसी का एहसान लूँ। मेरे भाग्य में इस घर में रहना लिखा होता, तो निकलता ही क्यों।' 
मुनीम ने पूछा, 'तो कल सबेरे तक खाली हो जायगा ? ' 
सुशीला-'हाँ, हाँ, कहती तो हूँ; लेकिन सबेरे तक क्यों, मैं अभी खाली किये देती हूँ। मेरे पास कौन-सा बड़ा सामान ही है। तुम्हारे सेठजी का रात-भर का किराया मारा जायगा। जाकर ताला-वाला लाओ या लाये हो ?' 
मुनीम -'ऐसी क्या जल्दी है, बाई। कल सावधानी से खाली कर दीजिएगा।' 
सुशीला -'क़ल का झगड़ा क्या रखूँ। मुनीमजी, आप जाइए, ताला लाकर डाल दीजिए। यह कहती हुई सुशीला अन्दर गयी, बच्चों को भोजन कराया, एक रोटी आप किसी तरह निगली, बरतन धोये, फिर एक एक्का मँगवाकर उस पर अपना मुख्तसर सामान लादा और भारी ह्रदय से उस घर से हमेशा के लिए विदा हो गयी। 
जिस वक्त यह घर बनवाया था, मन में कितनी उमंगें थीं। इसके प्रवेश में कई हजार ब्राह्मणों का भोज हुआ था। सुशीला को इतनी दौड़-धूप करनी पड़ी थी कि वह महीने भर बीमार रही थी। इसी घर में उसके दो लड़के मरे थे। यहीं उसका पति मरा था। मरनेवालों की स्मृतियों ने उसकी एक-एक ईंट को पवित्र कर दिया था। एक-एक पत्थर मानो उसके हर्ष से खुशी और उसके शोक से दुखी होता था। वह घर आज उससे छूटा जा रहा है। 
उसने रात एक पड़ोसी के घर में काटी और दूसरे दिन 10 रु. महीने पर एक गली में दूसरा मकान ले लिया। 
इस नये कमरे में इन अनाथों ने तीन महीने जिस कष्ट से काटे, वह समझनेवाले ही समझ सकते हैं। भला हो बेचारे सन्तलाल का। वह दस-पाँच रुपये से मदद कर दिया करता था। अगर सुशीला दरिद्र घर की होती, तो पिसाई करती, कपड़े सीती, किसी के घर में टहल करती; पर जिन कामों को बिरादरी नीचा समझती है, उनका सहारा कैसे लेती। नहीं तो लोग कहते, यह सेठ रामनाथ की स्त्री है ! उस नाम की भी तो लाज रखनी थी। समाज के चक्रव्यूह से किसी तरह तो छुटकारा नहीं होता। लड़की के दो-एक गहने बच रहे थे। वह भी बिक गये। जब रोटियों ही के लाले थे, तो घर का किराया कहाँ से आता। तीन महीने बाद घर का मालिक, जो उसी बिरादरी का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति था और जिसने मृतक-भोज में खूब बढ़-बढ़कर हाथ मारे थे, अधीर हो उठा। बेचारा कितना धैर्य रखता। 30 रु. का मामला है, रुपये-आठ-आने की बात नहीं है। इतनी बड़ी रकम नहीं छोड़ी जाती। आखिर एक दिन सेठजी ने आकर लाल-लाल आँखें करके कहा, 'अगर तू किराया नहीं दे सकती, तो घर खाली कर दे। मैंने बिरादरी के नाते इतनी मुरौवत की। अब किसी तरह काम नहीं चल सकता। 
सुशीला बोली, 'सेठजी, मेरे पास रुपये होते, तो पहले आपका किराया देकर तब पानी पीती। आपने इतनी मुरौवत की, इसके लिए मेरा सिर आपके चरणों पर है, लेकिन अभी मैं बिलकुल खाली-हाथ हूँ। यह समझ लीजिए कि एक भाई के बाल-बच्चों की परवरिश कर रहे हैं। और क्या कहूँ।' 
सेठ -'चल-चल, इस तरह की बातें बहुत सुन चुका। बिरादरी का आदमी है, तो उसे चूस लो। कोई मुसलमान होता, तो उसे चुपके से महीने-महीने दे देती, नहीं तो उसने निकाल बाहर किया होता, मैं बिरादरी का हूँ, इसलिए मुझे किराया देने की दरकार नहीं। मुझे माँगना ही नहीं चाहिए। यही तो बिरादरी के साथ करना चाहिए।' 
इसी समय रेवती भी आकर खड़ी हो गयी। सेठजी ने उसे सिर से पाँव तक देखा और तब किसी कारण से बोले 'अच्छा, यह लड़की तो सयानी हो गयी। कहीं इसकी सगाई की बातचीत नहीं की ? ' 
रेवती तुरंत भाग गयी। सुशीला ने इन शब्दों में आत्मीयता की झलक पाकर पुलकित कंठ से कहा, 'अभी तो कहीं बातचीत नहीं हुई, सेठजी। घर का किराया तक तो अदा नहीं कर सकती, सगाई क्या करूँगी; फिर अभी छोटी भी तो है।' 
सेठजी ने तुरंत शास्त्रों का आधार दिया। कन्याओं के विवाह की यही अवस्था है। धर्म को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। किराये की कोई बात नहीं है। हमें क्या मालूम था कि सेठ रामनाथ के परिवार की यह दशा है।' 
सुशीला -'तो आपकी निगाह में कोई अच्छा घर है ! यह तो आप जानते ही हैं, मेरे पास लेने-देने को कुछ नहीं है।' 
झाबरमल -'(इन सेठजी का यही नाम था) लेने-देने का कोई झगड़ा नहीं होगा; बाईजी। ऐसा घर है कि लड़की आजीवन सुखी रहेगी। लड़का भी उसके साथ रह सकता है। कुल का सच्चा; हर तरह से संपन्न परिवार है। हाँ, वह दोहाजू (दूजवर) है। ' 
सुशीला -'उम्र अच्छी होनी चाहिए, दोहाजू होने से क्या होता है।' 
झाबरमल -'उम्र भी कुछ ज्यादा नहीं, अभी चालीसवाँ ही साल है उसका, पर देखने में अच्छा ह्रष्ट-पुष्ट है। मर्द की उम्र उसका भोजन है। बस यह समझ लो कि परिवार का उद्धार हो जायगा।' 
सुशीला ने अनिच्छा के भाव से कहा, 'अच्छा, मैं सोचकर जवाब दूँगी।एक बार मुझे दिखा देना। 
झाबरमल-' दिखाने को कहीं नहीं जाना है, बाई। वह तो तेरे सामने ही खड़ा है।' 
सुशीला ने घृणापूर्ण नेत्रों से उसकी ओर देखा। इस पचास साल के बुङ्ढे की यह हबस ! छाती का मांस लटककर नाभी तक आ पहुँचा है, फिर भी विवाह की धुन सवार है। यह दुष्ट समझता है कि प्रलोभनों में पड़कर 
मैं अपनी लड़की उसके गले बाँध दूँगी। वह अपनी बेटी को आजीवन क्वॉरी रखेगी; पर ऐसे मृतक से विवाह करके उसका जीवन नष्ट न करेगी, पर उसने अपने क्रोध को शांत किया। समय का फेर है, नहीं तो ऐसों को उससे ऐसा प्रस्ताव करने का साहस ही क्यों होता। बोली, 'आपकी इस कृपा के लिए आपको धन्यवाद देती हूँ, सेठजी, पर मैं कन्या का विवाह आपसे नहीं कर सकती।' 
झाबरमल -'तो और क्या तू समझती है कि तेरी कन्या के लिए बिरादरी में कोई कुमार मिल जायगा ? ' 
सुशीला -'मेरी लड़की क्वॉरी रहेगी।' 
झाबरमल -'और रामनाथजी के नाम को कलंकित करेगी ? ' 
सुशीला -'तुम्हें मुझसे ऐसी बातें करते लाज नहीं आती ? नाम के लिए घर खोया, संपत्ति खोयी, पर कन्या कुएं में नहीं डुबा सकती।' 
झाबरमल-' तो मेरा केराया दे दे।' 
सुशीला -'अभी मेरे पास रुपये नहीं हैं।' 
झाबरमल ने भीतर घुसकर गृहस्थ की एक-एक वस्तु निकालकर गली में फेंक दी। घड़ा फूट गया, मटके टूट गये। संदूक के कपड़े बिखर गये। सुशीला तटस्थ खड़ी अपने अदिन की यह क्रूर क्रीड़ा देखती रही। घर का यों विध्वंस करके झाबरमल ने घर में ताला डाल दिया और अदालत से रुपये वसूल करने की धमकी देकर चले गये। बड़ों के पास धन होता है, छोटों के पास ह्रदय होता है। धन से बड़े-बड़े व्यापार होते हैं; बड़े-बड़े महल बनते हैं, नौकर-चाकर होते हैं, सवारी-शिकारी होती है; ह्रदय से समवेदना होती है, आँसू निकलते हैं। 
उसी मकान से मिली हुई एक साग-भाजी बेचनेवाली खटकिन की दूकान थी। वृद्धा, विधवा निपूती स्त्री थी, बाहर से आग, भीतर से पानी। झाबरमल को सैकड़ों सुनायीं और सुशीला की एक-एक चीज उठाकर अपने घर में ले गयी। 'मेरे घर में रहो बहू। मुरौवत में आ गयी, नहीं तो उसकी मूँछें उखाड़ लेती। मौत सिर पर नाच रही है, आगे नाथ, न पीछे पगहा ! और धन के पीछे मरा जाता है। जाने छाती पर लादकर ले जायगा। तुम चलो मेरे घर में रहो। मेरे यहाँ किसी बात का खटका नहीं बस मैं अकेली हूँ। एक टुकड़ा मुझे भी दे देना।' 
सुशीला ने डरते-डरते कहा, 'माता, मेरे पास सेर-भर आटे के सिवा और कुछ नहीं है। मैं तुम्हें केराया कहाँ से दूँगी।' 
बुढ़िया ने कहा, 'मैं झाबरमल नहीं हूँ बहू, न कुबेरदास हूँ। मैं तो समझती हूँ, जिन्दगी में सुख भी है, दुख भी है। सुख में इतराओ मत, दु:ख में घबड़ाओ मत। तुम्हीं से चार पैसे कमाकर अपना पेट पालती हूँ। तुम्हें उस दिन भी देखा था; जब तुम महल में रहती थीं और आज भी देख रही हूँ, जब तुम अनाथ हो। जो मिजाज तब था, वही अब है। मेरे धन्य भाग कि तुम मेरे घर में आओ। मेरी आँखें फूटी हैं, जो तुमसे केराया माँगने जाऊँगी।' इन सांत्वना से भरे हुए सरल शब्दों ने सुशीला के ह्रदय का बोझ हल्का कर दिया। उसने देखा, सच्ची सज्जनता भी दरिद्रों और नीचों ही के पास रहती है। बड़ों की दया भी होती है, अहंकार का दूसरा रूप ! 
इस खटकिन के साथ रहते हुए सुशीला को छ: महीने हो गये थे। सुशीला का उससे दिन-दिन स्नेह बढ़ता जाता था। वह जो कुछ पाती, लाकर सुशीला के हाथ में रख देती। दोनों बालक उसकी दो आँखें थीं। मजाल न थी कि पड़ोस का कोई आदमी उन्हें कड़ी आँखों से देख ले। बुढ़िया दुनिया सिर पर उठा लेती। सन्तलाल हर महीने कुछ-न-कुछ दे दिया करता था। इससे रोटी-दाल चली जाती थी। 
कातिक का महीना था ज्वर का प्रकोप हो रहा था। मोहन एक दिन खेलता-कूदता बीमार पड़ गया और तीन दिन तक अचेत पड़ा रहा। ज्वर इतने जोर का था कि पास खड़े रहने से लपट-सी निकलती थी। बुढ़िया ओझे-सयानों के पास दौड़ती फिरती थी; पर ज्वर उतरने का नाम न लेता था। सुशीला को भय हो रहा था, यह टाइफाइड है। इससे उसके प्राण सूख रहे थे। चौथे दिन उसने रेवती से कहा, 'बेटी, तूने बड़े पंचजी का घर तो देखा है। जाकर उनसे कह भैया बीमार है, कोई डाक्टर भेज दें।' 
रेवती को कहने भर की देरी थी। दौड़ती हुई सेठ कुबेरदास के पास गयी। कुबेरदास बोले ड़ाक्टर की फीस 16रू. है। तेरी माँ दे देगी ? ' 
रेवती ने निराश होकर कहा, 'अम्माँ के पास रुपये कहाँ हैं ? ' 
कुबेरदास -'तो फिर किस मुँह से मेरे डाक्टर को बुलाती है। तेरा मामा कहाँ है ? उनसे जाकर कह, सेवा समिति से कोई डाक्टर बुला ले जायँ, नहीं तो खैराती अस्पताल में क्यों नहीं लड़के को ले जाती ? या अभी वही पुरानी बू समाई हुई है। कैसी मूर्ख स्त्री है, घर में टका नहीं और डाक्टर का हुकुम लगा दिया। समझती होगी, फीस पंचजी दे देंगे। पंचजी क्यों फीस दें ? बिरादरी का धन धर्म-कार्य के लिए है, यों उड़ाने के लिए नहीं है।' 
रेवती माँ के पास लौटी; पर जो कुछ सुना था, वह उससे न कह सकी। घाव पर नमक क्यों छिड़के। बहाना कर दिया, बड़े पंचजी कहीं गये हैं। सुशीला तो मुनीम से क्यों नहीं कहा, ? यहाँ क्या कोई मिठाई खाये जाता था, जो दौड़ी चली आयी ? इसी वक्त सन्तलाल एक वैद्यजी को लेकर आ पहुँचा। वैद्य भी एक दिन आकर दूसरे दिन न लौटे। सेवा-समिति के डाक्टर भी दो दिन बड़ी मिन्नतों से आये। फिर उन्हें भी अवकाश न रहा और मोहन की दशा दिनोंदिन बिगड़ती जाती थी। महीना बीत गया; पर ज्वर ऐसा चढ़ा कि एक क्षण के लिए भी न उतरा। उसका चेहरा इतना सूख गया था कि देख कर दया आती थी। न कुछ बोलता, न कहता, यहाँ तक कि करवट भी न बदल सकता था। पड़े-पड़े देह की खाल फट गयी, सिर के बाल गिर गये। हाथ-पाँव लकड़ी हो गये। सन्तलाल काम से छुट्टी पाता तो आ जाता, पर इससे क्या होता; तीमारदारी दवा तो नहीं है। 
एक दिन सन्ध्या समय उसके हाथ ठण्डे हो गये। माता के प्राण पहले ही से सूखे हुए थे। यह हाल देखकर रोने-पीटने लगी। मिन्नतें तो बहुतेरी हो चुकी थीं। रोती हुई मोहन की खाट के सात फेरे करके हाथ बाँधकर 
बोली, 'भगवान् ! यही मेरे जन्म की कमाई है। अपना सर्वस्व खोकर भी मैं बालक को छाती से लगाए हुए सन्तुष्ट थी; लेकिन यह चोट न सही जायगी। तुम इसे अच्छा कर दो। इसके बदले मुझे उठा लो। बस, मैं यही दया चाहती हूँ, दयामय ? ' 
संसार के रहस्य को कौन समझ सकता है ! क्या हममें से बहुतों को यह अनुभव नहीं कि जिस दिन हमने बेईमानी करके कुछ रकम उड़ायी, उसी दिन उस रकम का दुगुना नुकसान हो गया। सुशीला को उसी दिन रात को ज्वर आ गया और उसी दिन मोहन का ज्वर उतर गया। बच्चे की सेवा-शुश्रूषा में आधी तो यों ही रह गयी थी, इस बीमारी ने ऐसा पकड़ा कि फिर न छोड़ा। मालूम नहीं, देवता बैठे सुन रहे थे या क्या, उसकी याचना अक्षरश: पूरी हुई। पन्द्रहवें दिन मोहन चारपाई से उठकर माँ के पास आया और उसकी छाती पर सिर रखकर रोने लगा। माता ने उसके गले में बाँहें डालकर उसे छाती से लगा लिया और बोली, 'क्यों रोते हो बेटा ! मैं अच्छी हो जाऊँगी। अब मुझे क्या चिंता। भगवान् पालनेवाले हैं। वही तुम्हारे रक्षक हैं। वही तुम्हारे पिता हैं। अब मैं सब तरफ से निश्चिंत हूँ। जल्द अच्छी हो जाऊँगी।' 
मोहन बोला, 'ज़िया तो कहती है, अम्माँ अब न अच्छी होंगी।' 
सुशीला ने बालक का चुम्बन लेकर कहा, 'ज़िया पगली है, उसे कहने दो। मैं तुम्हें छोड़कर कहीं न जाऊँगी। मैं सदा तुम्हारे साथ रहूँगी। हाँ, जिस दिन तुम कोई अपराध करोगे, किसी की कोई चीज उठा लोगे, उसी दिन 
मैं मर जाऊँगी ? ' 
मोहन ने प्रसन्न होकर कहा, 'तो तुम मेरे पास से कभी नहीं जाओगी माँ ? ' 
सुशीला ने कहा, 'क़भी नहीं बेटा, कभी नहीं।' 
उसी रात को दु:ख और विपत्ति की मारी हुई यह अनाथ विधवा दोनों अनाथ बालकों को भगवान् पर छोड़कर परलोक सिधार गयी। 
इस घटना को तीन साल हो गये हैं, मोहन और रेवती दोनों उसी वृद्धा के पास रहते हैं। बुढ़िया माँ तो नहीं है; लेकिन माँ से बढ़कर है। रोज मोहन को रात की रखी रोटियाँ खिलाकर गुरुजी की पाठशाला में पहुँचा आती है। 
छुट्टी के समय जाकर लिवा आती है। रेवती का अब चौदहवाँ साल है। वह घर का सारा काम पीसना-कूटना, चौका-बरतन, झाडू-बुहारू करती है। बुढ़िया सौदा बेचने चली जाती है, तो वह दूकान पर भी आ बैठती है। 
एक दिन बड़े पंच सेठ कुबेरदास ने उसे बुला भेजा और बोले, ' तुझे दूकान पर बैठते शर्म नहीं आती, सारी बिरादरी की नाक कटा रही है। खबरदार, जो कल से दूकान पर बैठी। मैंने तेरे पाणिग्रहण के लिए झाबरमल जी को पक्का कर लिया है।' 
सेठानी ने समर्थन किया, 'तू अब सयानी हुई बेटी, अब तेरा इस तरह बैठना अच्छा नहीं। लोग तरह-तरह की बातें करने लगते हैं। सेठ झाबरमल तो राजी ही न होते थे, हमने बहुत कह-सुनकर राजी किया है। बस, समझ ले कि रानी हो जायगी। लाखों की सम्पत्ति है, लाखों की। तेरे धन्य भाग कि ऐसा वर मिला। तेरा छोटा भाई है, उसको भी कोई दूकान करा दी जायगी। सेठ बिरादरी की कितनी बदनामी है ! सेठानी है ही।' 
रेवती ने लज्जित होकर कहा, 'मैं क्या जानूँ, आप मामा से कहें।' 
सेठ -' वह कौन होता है ! टके पर मुनीमी करता है। उससे मैं क्या पूछूँ। मैं बिरादरी का पंच हूँ। मुझे अधिकार है, जिस काम से बिरादरी का कल्याण देखूँ, वह करूँ। मैंने और पंचों से राय ले ली है। सब मुझसे सहमत हैं। अगर तू यों नहीं मानेगी, तो हम अदालती कार्रवाई करेंगे। तुझे खरच-बरच का काम होगा, यह लेती जा।' 
यह कहते हुए उन्होंने 20रू. के नोट रेवती की तरफ फेंक दिये। रेवती ने उठाकर वहीं पुरजे-पुरजे कर डाले और तमतमाये मुख से बोली, 'बिरादरी ने तब हम लोगों की बात न पूछी; जब हम रोटियों को मुहताज थे। मेरी माता मर गयी; कोई झाँकने तक न आया। मेरा भाई बीमार हुआ, किसी ने खबर तक न ली। ऐसी बिरादरी की मुझे परवाह नहीं है।' रेवती चली गयी, तो झाबरमल कोठरी से निकल आये। चेहरा उदास था।
सेठानी ने कहा, 'लड़की बड़ी घमंडिन है। आँख का पानी मर गया है।' 
झाबरमल -'बीस रुपये खराब हो गये। ऐसा फाड़ा है कि जुड़ भी नहीं सकते।' 
कुबेरदास--'तुम घबड़ाओ नहीं; मैं इसे अदालत से ठीक करूँगा। जाती कहाँ है।' 
झाबरमल -'अब तो आपका ही भरोसा है।' 
बिरादरी के बड़े पंच की बात कहीं मिथ्या हो सकती है ? रेवती नाबालिग थी। माता-पिता नहीं थे। ऐसी दशा में पंचों का उस पर पूरा अधिकार था। वह बिरादरी के दबाव में नहीं रहना चाहती है, न चाहे। कानून बिरादरी के अधिकार की उपेक्षा नहीं कर सकता। सन्तलाल ने यह माजरा सुना; तो दाँत पीसकर बोले न जाने इस 
बिरादरी का भगवान् कब अंत करेंगे। 
रेवती -'क्या बिरादरी मुझे जबरदस्ती अपने अधिकार में ले सकती है ? ' 
सन्तलाल-' हाँ बेटी, धानिकों के हाथ में तो कानून भी है।' 
रेवती -'मैं कह दूँगी कि मैं उनके पास नहीं रहना चाहती।' 
सन्तलाल -'तेरे कहने से क्या होगा। तेरे भाग्य में यही लिखा था, तो किसका बस है। मैं जाता हूँ बड़े पंच के पास। ' 
रेवती -'नहीं मामाजी, तुम कहीं न जाव। जब भाग्य ही का भरोसा है; तो जो कुछ भाग्य में लिखा होगा वह होगा।' 
रात तो रेवती ने घर में काटी। बार-बार निद्रा-मग्न भाई को गले लगाती। यह अनाथ अकेला कैसे रहेगा, यह सोचकर उसका मन कातर हो जाता; पर झाबरमल की सूरत याद करके उसका संकल्प दृढ़ हो जाता। प्रात:काल रेवती गंगा-स्नान करने गयी। यह इधर कई महीनों से उसका नित्य का नियम था। आज जरा अँधेरा था; पर यह कोई सन्देह की बात न थी। सन्देह तब हुआ, जब आठ बज गये और वह लौटकर न आयी। 
तीसरे पहर सारी बिरादरी में खबर फैल गई सेठ रामनाथ की कन्या गंगा में डूब गई। उसकी लाश पाई गई। 
कुबेरदास ने कहा, 'चलो, अच्छा हुआ; बिरादरी की बदनामी तो न होगी।' 
झाबरमल ने दुखी मन से कहा, 'मेरे लिए अब कोई और उपाय कीजिए।' 
उधर मोहन सिर पीट-पीटकर रो रहा था और बुढ़िया उसे गोद में लिये समझा रही थी बेटा, उस देवी के लिए क्यों रोते हो। जिन्दगी में उसके दुख-ही-दुख था। अब वह अपनी माँ की गोद में आराम कर रही है। 

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 10 May 2020 at 5:43 AM -

corona

वैज्ञानिक जब दुनिया को चेतावनी देते हैं , तब लोग ( और सरकारें भी ) उन्हें अनसुना कर देते हैं। बाद में जब अप्रिय घटनाएँ सचमच हो जाती हैं , तब पुराने बयानों में कॉन्स्पिरेसियाँ दिखने लगती हैं।

क्लॉडियो नून आल्व्ज़ सन् 2016 में सुख्यात ... जर्नल 'नेचर' में लिख रहे हैं : "अगला सार्स ( नेक्स्ट सार्स ) ?" उस समय तक दुनिया में दो कोरोनावायरस सार्स-सीओवी और मर्स-सीओवी चमगादड़ों से मनुष्यों में आकर व्यापक रूप से गम्भीर बीमारी फैला चुके हैं। सार्स सन् 2002 में मनुष्यों में फैलना आरम्भ हुआ था और मर्स सन् 2012 में। लेकिन ये दोनों ही कोरोनावायरस पैंडेमिक के स्तर से पहले ही रोक लिये गये। यही वजह है कि दुनिया ने इनसे वैसे सबक नहीं लिये , जैसे उन्हें लेने चाहिए थे। तैयारियों में ढीलापन रहा , शिथिलता के साथ यह मान लिया गया कि हर बार यही सफलता पा ली जाएगी। सार्स को रोक लिया गया , मर्स को भी। अगले को भी रोक ही लेंगे। यही सोचना सबसे बड़ी गलती साबित हुआ।

सन् 1921। जर्मन पशु-चिकित्सकों के सामने एक बिल्ली लायी जाती है , जिसे बुखार है और जिसका पेट अत्यधिक फूला हुआ है। यह सम्भवतः कोरोनावायरस-संक्रमण का पहला पुष्ट गम्भीर मामला है। उस समय माइक्रोबायलॉजी आज की तरह नहीं थी : वैज्ञानिक नहीं जानते थे कि कोरोनाविषाणु मुर्गियों में न्यूमोनिया करते हैं और सूअरों में आँतों का संक्रमण। स्थिति सन् 1960 के दशक से खुलकर बेहतर समझ आने लगी : बीमार जानवरों में अनेक ऐसे विषाणु पाये गये , जिनकी सतहों पर काँटेनुमा स्पाइक प्रोटीन मौजूद होते हैं। एलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से इन्हें देखा गया और सूर्य वह उसके आभामण्डल की तरह दिखने के कारण इन्हें कोरोनाविषाणु नाम दिया गया।

किसी बच्चे को ड्रॉइंग करते तब देखिए , जब वह सूरज की आकृति बनाता है। वह एक गोला बनाता है और उससे लम्बी-लम्बी लकीरें लम्बवत बाहर की ओर निकाल देता है। ये लकीरें उसके अनुसार सूरज की किरणें हैं। कोरोनाविषाणु को देखने पर भी ऐसे ही नन्हे-नन्हे सूरज नज़र आते हैं , जिनसे लम्बी-लम्बी किरणें फूटती जान पड़ती हैं। ये किरणें दरअसल इन विषाणुओं की सतही स्पाइक प्रोटीनें होती हैं। जैसे किरणों के कारण सूर्य का आभामण्डल यानी कोरोना नज़र आता है , वैसे ही इन सतही प्रोटीनों के कारण ये विषाणु कोरोनावायरस कहलाते हैं।

कोरोनाविषाणु ढेरों-ढेर हैं। केवल आदमियों में ही संक्रमण नहीं करते , जानवरों को भी बीमार करते हैं। सूअरों में भी , चूहों में भी। गायों में भी , चमगादड़ों में भी। कुत्तों में भी , बिल्लियों में भी। जब-जब जहाँ-जहाँ जितना अधिक जानवरों के परस्पर व मनुष्यों के संग संसर्ग होता है , उतना इन कोरोनाविषाणुओं के एक प्रजाति से दूसरे में जाने की आशंका बढ़ती जाती है। यह स्पीशीज़-जम्प या वायरल-स्पिल-ओवर है। ये विषाणु अपने आतिथेय जानवर के प्रति वफ़ादार नहीं हैं , ये नये जानवर के जिस्म के अनुसार स्वयं को ढालने की कोशिश करते हैं। कई बार ढल भी जाते हैं। वृद्धि के प्रति इनका यह लचीलापन ही हमारे लिए खतरनाक हो जाता है। न जाने कौन-सा कोरोनाविषाणु किसी और जानवर से हम-तक आ जाए !

अक्सर लोग एक सवाल पूछते हैं। सार्स-सीओवी ( 2002 वाला ) और वर्तमान सार्स-सीओवी 2 तो दोनों कोरोनावायरस हैं। भाई-भाई जैसे। हमने 2002-2003 में सार्स-सीओवी को रोक लिया , तो इस सार्स-सीओवी 2 को क्यों नहीं रोक पाये ? ऐसी क्या चूक हो गयी ? पॉलिसी-स्तर पर ( चीन व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ) कहाँ-कहाँ चूकें हुईं , इसपर अनेक बातें कही जा सकती हैं। पर कुछ बातें यहाँ विषाणु-स्तर पर जाननी भी ज़रूरी हैं।

सार्स-सीओवी का पसन्दीदा वृद्धि-स्थान फेफड़े हैं। यह वहाँ की कोशिकाओं में घुस कर अपनी प्रतियाँ बनाता है। इस क्रम में फेफड़ों की कोशिकाएँ नष्ट होती हैं। प्रतिरक्षा-तन्त्र इन विषाणु-संक्रमित कोशिकाओं को नष्ट करने पहुँचता है। इस लड़ाई के कारण फेफड़ों में न्यूमोनिया की स्थिति पैदा हो जाती है।

सार्स-सीओवी 2 के पसन्दीदा वृद्धिस्थान गला और फेफड़े , दोनों हैं। कुछ लोगों में सूखी खाँसी और सूँघने व स्वाद की क्षमता का ह्रास-जैसे लक्षण पैदा होते हैं। ये लक्षण उनमें होते हैं , जिनमें यह विषाणु गले ( या ऊपरी श्वसन-तन्त्र ) की कोशिकाओं को संक्रमित करता है। अन्य कुछ लोगों में साँस फूलने जैसे लक्षण पैदा हो जाते हैं। ऐसा उन लोगों में होता है , जिनमें यह विषाणु फेफड़ों की कोशिकाओं को संक्रमित कर रहा होता है।

यानी सार्स-सीओवी 2 में ऊपरी श्वसन-तन्त्र ( गला ) और निचले श्वसन-तन्त्र ( फेफड़े ) दोनों को संक्रमित करने की क्षमता है। दोनों के संक्रमित होने से लक्षण पैदा हो सकते हैं। पिछला सार्स-सीओवी ( सन् 2002 वाला ) गले को संक्रमित नहीं करता था। वह केवल फेफड़ों के संक्रमित करता था। इसीलिए उससे संक्रमित रोगियों को पहचानना भी आसान था। जिसे न्यूमोनिया होगा , वह अमूमन घर नहीं बैठ सकेगा। वह डॉक्टर के पास लाया जाएगा : इस तरह से उसकी पहचान चिह्नित हो जाएगी। किन्तु सार्स-सीओवी 2 संक्रमित रोगी फेफड़ों के संक्रमण से नहीं जूझ रहे। बहुसंख्य को तो केवल बुख़ार और सूखी खाँसी जैसे लक्षण हैं अथवा लक्षण ही नहीं हैं। ऐसे लोग डॉक्टरों के पास बहुधा नहीं आते। वे घर-बैठे स्वयं उपचार कर लेते हैं और सरकारें व समाज जान ही नहीं पाते कि उन्हें कोरोनाविषाणु का संक्रमण भी है।

न्यूमोनिया पैदा करने के बाद जो विषाणु फैलेगा , वह उतना नहीं फैल सकेगा। न्यूमोनिया-ग्रस्त रोगी में भरपूर लक्षण होंगे और उसे अस्पताल ले ही जाया जाएगा। गले में खराश या सूखी खाँसी पैदा करने वाला विषाणु उतना महत्त्वपूर्ण जान पड़ेगा ही नहीं। लोग उसे लेकर इतने गम्भीर होंगे ही नहीं। नतीजन एक व्यक्ति जिसे सार्स-सीओवी 2 के कारण मात्र सूखी खाँसी होगी , वह लक्षणों को पर्याप्त तवज्जो न देते हुए लापरवाही कर सकता है। इसके कारण सार्स-सीओवी 2 विषाणु इस मामूली लक्षणों वाले व्यक्ति से किसी ऐसे दूसरे में फैल सकता है , जिसमें यही विषाणु न्यूमोनिया पैदा कर सकता है। यानी पिछले व्यक्ति में एकदम मामूली लक्षण और इस नये व्यक्ति के लिए जान का संकट ! लक्षणों की यही विषमता ( मामूली भी , गम्भीर भी ) वर्तमान सार्स-सीओवी 2 की पहचान बनी हुई है।

लक्षणों के प्रकट होने से पहले भी सार्स-सीओवी 2 दूसरे व्यक्ति में जा सकता है। कारण कि गले के लक्षण इतने मामूली और न-के-बराबर हो सकते हैं , कि रोगी को पता ही न चले ! किन्तु सन् 2002 वाला सार्स अमूमन ऐसा नहीं कर सकता था। क्या न्यूमोनिया पैदा करने वाले विषाणु के मरीज़ लक्षणहीन रह सकते हैं ? नहीं। क्या न्यूमोनिया लक्षणहीन हो सकता है ? नहीं।

क्या विषाणु-डोज़ के आधार पर हम यह जान सकते हैं कि किसे सार्स-सीओवी 2 के कारण गले-मात्र में मामूली संक्रमण होगा और किसे न्यूमोनिया ? अभी स्थिति कच्ची है। कदाचित् कम विषाणु-कण हम-तक पहुँचें , तो वे गले-मात्र को ही संक्रमित करें। अधिक पहुँचें , तो वे नीचे फेफड़ों तक पहुँच जाएँ। लेकिन फिर कम विषाणु-डोज़ के कारण संक्रमित हुए व्यक्ति के भीतर अपनी प्रतियाँ बनाते हुए यह विषाणु नीचे फेफड़ों को संक्रमित कर सकता है। और फिर किस व्यक्ति में विषाणु कितनी तेज़ी से प्रतियाँ बनाएगा , यह उस व्यक्ति के शरीर पर भी निर्भर हो सकता है।

ढेरों विशेषज्ञ यह बता रहे हैं कि सार्स-सीओवी 2 की मृत्युदर 1-3 % के आसपास है। यह सच है क्योंकि ढेर सारे लोगों में विषाणु गले को ही संक्रमित कर रहा है और फेफड़ों को बख़्श दे रहा है। पुराने सन् 2002 वाले सार्स-सीओवी की मृत्यु-दर 10 % के आसपास थी। पर यह भी ध्यान रखिए कि वह विषाणु बहुधा केवल फेफड़ों को ही संक्रमित करता था। ऐसे में अगर सार्स-सीओवी 2 के फेफड़ा-संक्रमित रोगियों और सार्स-सीओवी के रोगियों में मृत्यु-दर देखी जाए , तो क्या तब भी हम यही कहेंगे कि सार्स-सीओवी 2 सार्स-सीओवी की तुलना में कम मारक है ?

शायद नहीं।

इसलिए बचाव के सारे उपाय यथासम्भव करते रहिए।

--- स्कन्द।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 08 May 2020 at 7:39 PM -

कफ़न - मुंशी प्रेम चंद

Hindi Kahani हिंदी कहानी
Kafan - Munshi Premchand
कफ़न - मुंशी प्रेम चंद
1
झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ... ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अन्धकार में लय हो गया था।
घीसू ने कहा-मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।
माधव चिढक़र बोला-मरना ही तो है जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?
'तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफाई!'
'तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।'
चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना काम-चोर था कि आध घण्टे काम करता तो घण्टे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मजदूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की कसम थी। जब दो-चार फाके हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढक़र लकडिय़ाँ तोड़ लाता और माधव बाजार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी सन्तोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनो साधु होते, तो उन्हें सन्तोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल जरूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई सम्पत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिये जाते थे। संसार की चिन्ताओं से मुक्त कर्ज से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई गम नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ कर्ज दे देते थे। मटर, आलू की फसल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाये थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहान्त हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आयी थी, उसने इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-गैरतों का दोजख भरती रहती थी। जब से वह आयी, यह दोनों और भी आरामतलब हो गये थे। बल्कि कुछ अकडऩे भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निब्र्याज भाव से दुगुनी मजदूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इन्तजार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोयें।
घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा-जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!
माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ कर देगा। बोला-मुझे वहाँ जाते डर लगता है।
'डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।'
'तो तुम्हीं जाकर देखो न?'
'मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं; और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!'
'मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हुआ, तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!'
'सब कुछ आ जाएगा। भगवान् दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपये देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था; मगर भगवान् ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।'
जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज्यादा विचारवान् था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मण्डली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाजों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मण्डली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीं उठाते! दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठण्डा हो जाने दें। कई बार दोनों की जबानें जल गयीं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा जबान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज्यादा खैरियत इसी में थी कि वह अन्दर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठण्डा करने के लिए काफी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।
घीसू को उस वक्त ठाकुर की बरात याद आयी, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक बात थी, और आज भी उसकी याद ताजी थी, बोला-वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लडक़ी वालों ने सबको भर पेट पूडिय़ाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूडिय़ाँ खायीं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला, कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज चाहो, माँगो, जितना चाहो, खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौडिय़ाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिये जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कम्बल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!
माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मजा लेते हुए कहा-अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।
'अब कोई क्या खिलाएगा? वह जमाना दूसरा था। अब तो सबको किफायत सूझती है। सादी-ब्याह में मत खर्च करो, क्रिया-कर्म में मत खर्च करो। पूछो, गरीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, खर्च में किफायत सूझती है!'
'तुमने एक बीस पूरियाँ खायी होंगी?'
'बीस से ज्यादा खायी थीं!'
'मैं पचास खा जाता!'
'पचास से कम मैंने न खायी होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।'
आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलिया मारे पड़े हों।
और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

2
सबेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठण्डी हो गयी थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।
माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों जोर-जोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आये और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।
मगर ज्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फिक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह गायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस?
बाप-बेटे रोते हुए गाँव के जमींदार के पास गये। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा-क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।
घीसू ने जमीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा-सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुजर गयी। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दगा दे गयी। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गये। घर उजड़ गया। आपका गुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।
जमींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कम्बल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यों तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब गरज पड़ी तो आकर खुशामद कर रहा है। हरामखोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दण्ड देने का अवसर न था। जी में कुढ़ते हुए दो रुपये निकालकर फेंक दिए। मगर सान्त्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो।
जब जमींदार साहब ने दो रुपये दिये, तो गाँव के बनिये-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू जमींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना जानता था। किसी ने दो आने दिये, किसी ने चारे आने। एक घण्टे में घीसू के पास पाँच रुपये की अच्छी रकम जमा हो गयी। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे।
गाँव की नर्मदिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं।

बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला-लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गयी है, क्यों माधव!
माधव बोला-हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।
'तो चलो, कोई हलका-सा कफ़न ले लें।'
'हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?'
'कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।'
'कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।'
'और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।'
दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाजार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बजाज की दूकान पर गये, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गयी। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अन्दर चले गये। वहाँ जरा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा-साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।
उसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आयी और दोनों बरामदे में बैठकर शान्तिपूर्वक पीने लगे।
कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गये।
घीसू बोला-कफ़न लगाने से क्या मिलता? आखिर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।
माधव आसमान की तरफ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो-दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बाँभनों को हजारों रुपये क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!
'बड़े आदमियों के पास धन है, फ़ूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?'
'लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?'
घीसू हँसा-अबे, कह देंगे कि रुपये कमर से खिसक गये। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपये देंगे।
माधव भी हँसा-इस अनपेक्षित सौभाग्य पर। बोला-बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो खूब खिला-पिलाकर!
आधी बोतल से ज्यादा उड़ गयी। घीसू ने दो सेर पूडिय़ाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबखाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया खर्च हो गया। सिर्फ थोड़े से पैसे बच रहे।
दोनों इस वक्त इस शान में बैठे पूडिय़ाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का खौफ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन सब भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था।
घीसू दार्शनिक भाव से बोला-हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?
माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की-जरूर-से-जरूर होगा। भगवान्, तुम अन्तर्यामी हो। उसे बैकुण्ठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।
एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला-क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?
घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनन्द में बाधा न डालना चाहता था।
'जो वहाँ हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?'
'कहेंगे तुम्हारा सिर!'
'पूछेगी तो जरूर!'
'तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!'
माधव को विश्वास न आया। बोला-कौन देगा? रुपये तो तुमने चट कर दिये। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।
'कौन देगा, बताते क्यों नहीं?'
'वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपये हमारे हाथ न आएँगे।'
'ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाये देता था।
वहाँ के वातावरण में सरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।
और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मजे ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है।
भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूडिय़ों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनन्द और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।
घीसू ने कहा-ले जा, खूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गयी। मगर तेरा आशीर्वाद उसे जरूर पहुँचेगा। रोयें-रोयें से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!
माधव ने फिर आसमान की तरफ देखकर कहा-वह बैकुण्ठ में जाएगी दादा, बैकुण्ठ की रानी बनेगी।
घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला-हाँ, बेटा बैकुण्ठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी जिन्दगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गयी। वह न बैकुण्ठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मन्दिरों में जल चढ़ाते हैं?
श्रद्धालुता का यह रंग तुरन्त ही बदल गया। अस्थिरता नशे की खासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ।
माधव बोला-मगर दादा, बेचारी ने जिन्दगी में बड़ा दु:ख भोगा। कितना दु:ख झेलकर मरी!
वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर।
घीसू ने समझाया-क्यों रोता है बेटा, खुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गयी, जंजाल से छूट गयी। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बन्धन तोड़ दिये।
और दोनों खड़े होकर गाने लगे-
'ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी।
पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाये जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बताये, अभिनय भी किये। और आखिर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 06 May 2020 at 8:22 AM -

vikramshila university

■ विक्रमशिला विश्वविद्यालय बिहार राज्य के भागलपुर जिले में स्थित था। इस विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के राजा धर्मपाल ने ७७५-८०० ई० में की। इस विश्वविद्यालय ने अपनी स्थापना के तुरन्त बाद ही अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व प्राप्त कर लिया था। विक्रमशिला विश्वविद्यालय के प्रख्यात विद्वानों ... की एक लम्बी सूची है। तिब्बत के साथ इस शिक्षा केन्द्र का प्रारम्भ से ही विशेष सम्बंध रहा है।
■ विक्रमशिला विश्वविद्यालय में विद्याध्ययन के लिए आने वाले तिब्बत के विद्वानों के लिए अलग से एक अतिथिशाला थी। विक्रमशिला से अनेक विद्वान तिब्बत गए थे तथा वहाँ उन्होंने कई ग्रन्थों का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया। इन विद्वानों में सबसे अधिक प्रसिद्ध दीपंकर श्रीज्ञान थे जो उपाध्याय अतीश के नाम से विख्यात हैं। विक्रमशिला का पुस्तकालय बहुत समृद्ध था। विक्रमशिला विश्वविद्यालय में बारहवीं शताब्दी में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों की संख्या ३००० थी। विश्वविद्यालय के कुलपति ६ भिक्षुओं के एक मण्डल की सहायता से प्रबंध तथा व्यवस्था करते थे।
■ इस विश्वविद्यालय में व्याकरण, न्याय, दर्शन और तंत्र के अध्ययन की विशेष व्यवस्था थी। इस विश्वविद्यालय की व्यवस्था अत्यधिक सुसंगठित थी। बंगाल के शासक शिक्षा की समाप्ति पर विद्यार्थियों को उपाधि देते थे। सन १२०३ ई० में बख्तियार खिलजी ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया।

■ यहाँ बौद्ध धर्म और दर्शन के अतिरिक्त न्याय, तत्त्वज्ञान, व्याकरण आदि की भी शिक्षा दी जाती थी। विद्यार्थियों की सुविधा के लिए पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती थीं तथा उनकी जिज्ञासाओं का समाधान विद्वान आचार्यों द्वारा किया जाता था। यहाँ देश से ही नहीं विदेशों से भी विद्याध्ययन के लिए छात्र आते थे। शिक्षा समाप्ति के बाद विद्यार्थी को उपाधि प्राप्त होती थी जो उसके विषय की दक्षता का प्रमाण मानी जाती थी। पूर्व मध्ययुग में विक्रमशिला विश्वविद्यालय के अतिरिक्त कोई शिक्षा केन्द्र इतना महत्त्वपूर्ण नहीं था जहां सुदूर प्रान्तों के विद्यार्थी विद्या अध्ययन के लिए जाते रहे हों। इसीलिए यहाँ छात्रों की संख्या बहुत अधिक थी। यहाँ के अध्यापकों की संख्या ही ३००० के लगभग थी अतः विद्यार्थियों का उनसे तीन गुना होना तो सर्वथा स्वाभाविक ही था। इस विश्वविद्यालय के अनेक विद्वानों ने विभिन्न ग्रंथों की रचना की, जिनका बौद्ध साहित्य और इतिहास में नाम है। इन विद्वानों में कुछ प्रसिद्ध नाम हैं- रक्षित, विरोचन, ज्ञानपाद, बुद्ध, जेतारि रत्नाकर शान्ति, रत्नवज्र और अभयंकर। दीपंकर नामक विद्वान ने लगभग २०० ग्रंथों की रचना की थी। वह इस शिक्षाकेन्द्र के महान प्रतिभाशाली विद्वानों में से एक थे। अब इस विश्वविद्यालय के केवल खण्डहर ही अवशेष हैं।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 05 May 2020 at 10:29 AM -

विज्ञान

नजाने नक्षत्रों से कौन ,
निमन्त्रण देता मुझको मौन।
--- सुमित्रानन्दन पन्त।

नक्षत्र-निमन्त्रण हमें सहस्राब्दियों से मिले , लेकिन हम उसे स्वीकार कर प्रस्थान पिछले पचास-साठ सालों में ही कर पाये। अन्तरिक्ष में क़दम रखने का साहस कोई मामूली बात नहीं। लेकिन असीम अन्धकार में ... पग धरे बिना मनुष्य को अपनी क्षुद्रता और अप्रासंगिकता का भली-भाँति भान भी नहीं होता।

पायनियर-10 सन् 1972 में हमने छोड़ा था। 'हम' का अर्थ भारतीय न समझिएगा , 'हम' का मतलब मनुष्य जानिएगा। अन्तरिक्ष की जब बात होती है या परमाणु की , तो भारत-पाकिस्तान-अमेरिका-जर्मनी बहुत पीछे और बाहर छूट जाते हैं। खगोल का संज्ञान पाने हम राष्ट्र-ध्वज लेकर नहीं चलते , मानव-केतन लेकर आगे बढ़ते हैं। ( यद्यपि सियासत पट्टियों-सितारों वाला ध्वज चाँद पर गाड़ कर विज्ञान के बहाने भी शीतयुद्ध जीतना चाहती है ! ) अगर किसी दूसरे ग्रह के वासी से सामना होगा , तो परिचय भारतीयता का नहीं , पार्थिवता का दिया जाएगा।

पायनियर-10 पहला ऐसा यान था , जिसने पृथ्वी से उठकर पहले मंगल को पार किया और फिर क्षुद्र ग्रहों की पट्टी को। तदुपरान्त वह बृहस्पति के समीप पहुँचा और उसके पहले विस्तृत-विशद चित्र भेजे। उसके बाद वह घूम कर आगे निकला और आज हमसे पन्द्रह बिलियन किलोमीटर दूर सौरमण्डल से बाहर निकल गया है।

पायनियर-10 का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है , क्योंकि इसमें नासा-वैज्ञानिकों से एक स्वर्णिम ऑक्साइड लेप-लगी एल्युमिनियम की पट्टिका रखी है। एक ऐसी पट्टिका जिसपर हमारी पहचान इंगित है। उस पर हाइड्रोजन के एक परमाणु का चित्र है। हाइड्रोजन जो ब्रह्माण्ड का सबसे प्रचुर पदार्थ है। हाइड्रोजन जो तारों की भट्टी का ईंधन है। हाइड्रोजन जिसके कारण हमारा प्रकाश है , जिसके कारण हमारा पानी। हाइड्रोजन जो अगर न हो , तो जीवन नष्ट हो जाए।

इसी स्वर्णिम पट्टिका पर सूर्य की स्थिति चौदह पल्सर तारों के सापेक्ष इंगित है। पल्सर तारे वे जो घूर्णन करते हैं , जिनकी ज्योति कम-ज़्यादा होती रहती है। वे हमारे ब्रह्माण्ड के आकाशदीप यानी लाइट-हाउस हैं। उनके साथ सूर्य को इसलिए चित्रित किया गया ताकि असीम आकाश में सूर्य की सही स्थिति जानी जा सके। फिर इसी पट्टिका पर सौर-मण्डल के सभी ग्रह सूर्य समेत दर्शाये गये हैं। पायनियर का यात्रा-पथ भी प्रदर्शित किया गया है।

सबसे दिलचस्प चित्रण एक स्त्री और पुरुष के जोड़े का। पुरुष का दाहिना हाथ अभिवादन-मुद्रा में ऊपर उठा है। स्त्री अपनी दाहिनी टाँग बाहर को करके उसके बगल में खड़ी है। दोनों के शरीर के स्थूल अंग-लक्षण स्पष्ट हैं। दोनों की मुद्राओं में विभेद इसलिए रखा गया है , ताकि यह बताया जा सके कि हम मित्रता चाहने वाले लोग हैं और हमारी देहें और मन लचीले हैं।
कहने को सन् 2003 से हमारा पायनियर-10 से सम्पर्क टूट चुका है। लेकिन सम्पर्क के लिए जो स्पर्श हमने अन्धकार में बढ़ाया है , वह कभी टूटने-छूटने वाला नहीं। हमारा यह यान अपनी पट्टिका के साथ लाखों-करोड़ों वर्षों तक अन्तरिक्ष में आगे बढ़ता निकल जाएगा। अभी यह वृषभ तारामण्डल के लाल तारे अल्डबरान ( रोहिणी ) की ओर बढ़ रहा है। इसकी किसी पिण्ड से टक्कर न हुई , तो यह बीस लाख सालों में इस तारे तक जा पहुँचेगा। बीस लाख साल ! तब तक हम सब मिट जाएँगे। या शायद मानवता और उसके द्वारा निर्मित जीवन की नयी परिभाषाएँ पृथ्वी से निकलकर कई जगहों पर बस चुकी हों। लेकिन हमारी यह पुकार आसमान में तब भी आगे बढ़ती जाएगी। कि हम हाथ हिला रहे हैं। कि हम पास बुला रहे हैं। कि हम मित्र हैं। कि हम जुड़ना चाहते हैं।

पायनियर का अर्थ प्राथमिक पथिक होता है। वह जो पैरों से सबसे आगे चलता है , वह जो पथ पर चलने वाला पहला होता। जो प्रथम है , वही पायनियर है। पायनियर के साथ हम उन पहचानों को लिए निकले हैं , जो नितान्त मौलिक हैं , प्राथमिक हैं। पायनियर-पट्टिका में किसी नेता का चित्र नहीं है , किसी कलाकार या वैज्ञानिक का भी नहीं है। पायनियर पर केवल तात्त्विकता-स्थिति-मनुष्यता अंकित हैं। हाइड्रोजन के ईंधन से ऊर्जा पाते एक सूर्य नामक तारे के पृथ्वी नामक ग्रह पर रहने वाले नर-मादा की दो पहचानों के साथ रहने वाले हम मनुष्य नामक जीव हैं। बस !

असुरक्षाओं और असहजताओं में हम कितने अच्छे बन जाते हैं ! वही हम जो यहाँ देश-धर्म-जाति-नस्ल-अर्थ के नाम पर लड़ते हैं , क़िस्म-क़िस्म की गन्दी राजनीति करते हैं। क्या हम तभी मैत्री सीख सकेंगे , जब हमसे अधिक शक्तिशाली कोई हमें असहज-असुरक्षित करेगा ?

( चित्रों में पायनियर 10। उसकी आज की सुदूर स्थिति , उसपर मौजूद एल्युमिनियम-पट्टिका जिसपर हमारी पहचानें हैं। बृहस्पति के पास पायनियर 10 जिसने हमें पहली बार इस विशाल ग्रह के बारे में कई जानकारियाँ दीं। सूर्य के सापेक्ष अल्डबरान ( रोहिणी ) तारे का आकार और रंग , जिसकी ओर पायनियर बढ़ता जा रहा है। )

साभार डॉ स्कंद शुक्ल(Skand Shukla)

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 28 Apr 2020 at 7:12 AM -

मलेरिया

25 अप्रैल को मनाया जाता है विश्व मलेरिया दिवस

मण्डला 25 अप्रैल 2020
जिला मलेरिया अधिकारी रामशंकर साहू ने बताया कि 25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस के रूप में मनाया जाता है। संपूर्ण विश्व आज कोरोना महामारी से ग्रसित होकर उसके संक्रमण एवं नियंत्रण में ... व्यस्त है किन्तु हमें मलेरिया बीमारी के बारे में भी ध्यान देने की आवश्यकता है। आगामी समय में मलेरिया रोग का संक्रमण काल शुरू होने वाला है जोकि वर्षाकाल / मानसून जून से प्रकोप धीरे-धीरे बढ़ता जाता है जो वर्ष के नवम्बर तक अधिक रहता है तथा दिसम्बर के अंत से धीरे-धीरे कम होने लगता है। लॉकडाऊन के दौरान भी हम सभी अपने घरों में सोने के लिए मच्छरदानी का उपयोग करें, घरों में मच्छर निरोधक जालियों, मच्छर निरोधक क्रीम, ऑईल तथा रेपेलेंट का उपयोग करें। अपने घरों में मच्छर निरोधक पौधे जैसे लेमनग्रास, लहसुन, लेवेन्डर, गेंदा, तुलसी, सिट्रोनेला आदि लगायें, घरों के आसपास सफाई रखें, अनावश्यक पानी जमा न होने दें। घरों की छतों पर रखे अनुपयोगी वस्तुओं की सफाई कर उनमें जमा होने वाले पानी को खाली करें, टंकी तथा पानी के बर्तन को ढककर रखें। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष मंडला में 59.3 प्रतिशत मलेरिया के मामलों में कमी आई है। जिला मलेरिया अधिकारी ने बुखार आने पर तुरंत खून की जांच करने की समझाईश दी है। मलेरिया पॉजीटिव पाये जाने पर डॉक्टर, स्वास्थ्य कार्यकर्ता या आशा द्वारा दिये जाने वाले उपचार को अपनाने की सलाह दी है।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 19 Apr 2020 at 3:31 PM -

राजेश चंद्रा

।। आर्य ।।
-राजेश चन्द्रा-

"आर्य भारत के बाहर से आए", यह वाक्य तकनीकी तौर पर त्रुटिपूर्ण है। बल्कि सही कथन यह होगा:" जो भारत के बाहर से आए उन्होंने स्वयं के लिए आर्य सम्बोधन प्रयोग करना शुरू किया और क्रमशः लोग उन्हें आर्य कहने लगे"।
इस स्थापना ... के लिए कुछ तथ्यों पर ध्यान देना होगा।
भगवान बुद्ध द्वारा उपदिष्ट प्रथम धम्मोपदेश में चार "आर्य" सत्य उद्घोषित किये गये हैं। बुद्धत्व के आठ अंगों को "आर्य" अष्टांग मार्ग कहा गया है। "आर्य" विनय, "आर्य" मौन, "आर्य" संघ इत्यादि शब्दों का भगवान के उपदेशों में बार-बार प्रयोग किया गया है। मूलतः पालि भाषा में 'अरिय' अथवा 'अरियो' शब्द है जिसे संस्कृत में "आर्य " उच्चारित किया गया, जैसे अरिय सच्चानि अर्थात आर्य सत्य; अरियोअट्ठंगिकोमग्गो अर्थात आर्य अष्टांग मार्ग, आदि।
"संस्कृत" शब्द का अर्थ ही होता है- संस्कारित किया हुआ। पालि और प्राकृत भाषा को कथित रूप से संस्कारित करके जिस नयी भाषा ने जन्म लिया उसका ही नाम संस्कृत है।
भाषा विज्ञानी जानते हैं कि प्रत्येक भाषा भाषा से पहले बोली होती है। व्याकरणबद्ध होने के बाद बोली भाषा बनती है। भगवान बुद्ध के समय तक यह एक बोली थी जिसे छांदस कहा जाता था। वेद भगवान के समय भी अस्तित्व में थे मगर सिर्फ तीन वेद अस्तित्वगत थे क्योंकि पालि ग्रंथों में तिवेदपारगू अर्थात तीन वेदों में पारंगत, यह शब्द कई-कई बार प्रयुक्त हुआ है। एक माणवक भगवान से निवेदन करता है कि वह बुद्ध वचनों को छांदस में रूपांतरित करना चाहता है जिसे भगवान ने इंकार कर दिया था। यह प्रसंग विनयपिटक में है। कालान्तर में आचार्य पाणिनि ने छांदस को व्याकरणबद्ध करके जिस भाषा को जन्म दिया उसका ही नाम संस्कृत है। वेदों की छांदस के लिए सायण भाष्य एवं व्याकरण का सहारा लिया जाता है न कि पाणिनि व्याकरण को। इसी क्रम में पालि व प्राकृत शब्दों को कथित तौर पर संस्कारित करके धम्म को धर्म, कम्म को कर्म, चक्क को चक्र, अरिय को आर्य, दिट्ठि को दृष्टि, सब्ब को सर्व, सम्मा को सम्यक, पवत्तन को प्रवर्तन, समञ्ञ को श्रमण, पिय को प्रिय इत्यादि बनाया गया। रोचक तथ्य यह है कि संस्कृत भाषा ने अपने उदयकाल में सर्वप्रथम बौद्ध ग्रंथों को ही संस्कृत में रूपांतरित किया। इसी से महायान का जन्म हुआ। सारे महायानी ग्रन्थ संस्कृत में हैं। संस्कृत के महाकाव्य इत्यादि बाद की रचनाएँ हैं। यहाँ तक कि संस्कृत साहित्य का मूल स्रोत बौद्ध ग्रन्थ हैं। अधिकांश मिथकीय कथानक जातक कथाओं से लिए गये हैं। यहाँ तक कि रामायण के कथानक का मूल स्रोत दशरथ जातक एवं महाभारत का स्रोत युधिष्ठिर जातक है। यक्षप्रश्न प्रसंग पूरा का पूरा खुद्दकनिकाय के धम्मपद अट्ठकथा का अनुवाद है। देव, इन्द्र, देवी, विश्वकर्मा, पूर्व जन्म- पुनर्जन्म, भाग्य, कर्म फल, ध्यान-साधना, ब्रम्हा इत्यादि समस्त धारणाएं मूलतः पालि ग्रंथों में हैं जिनका संस्कृत ग्रंथों में उपयोग करके नये मिथकीय कथानकों की रचना की गयी । इसी नाते पालि व संस्कृत ग्रंथों में समान पात्रों व शब्दों को देख कर विद्वज्जन प्रायः भ्रमित भी हो जाते हैं, वे निर्णय नहीं कर पाते कि किसने किसकी नकल की है। इसी भ्रम का लाभ- जिसे अंग्रेजी में 'बैनिफिट्स आफ डाउट' कहते हैं- संस्कृत साहित्य उठा ले जाते हैं। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन और डा. भदन्त आनन्द कौस्ल्यायन ने अपने ग्रंथों में संदर्भ सहित इस पर विस्तार से लिखा है। लेकिन संस्कृत ग्रंथों में वर्णव्यवस्था का समावेश संस्कृत साहित्यकारों की अपनी मौलिक रचना है, इसका आधार पालि ग्रंथ नहीं हैं।
सच यह है कि पहले से प्रचलित कथानकों को मिटाना मुश्किल है, उनकी लोकस्वीकार्यता होती है, लेकिन लेकिन प्रचलित कथानकों का स्वरूप परिवर्तन आसान है। जातक कथाएँ, बुद्ध कथानक पहले से प्रचलन में थे। लोग उन कथाओं को सुनते थे। संस्कृत साहित्यकारों ने उनको अपने दर्शन के अनुसार प्रस्तुत किया। उनमें वर्णव्यवस्था के क्षेपक जोड़े। यहाँ तक कि ऋग्वेद का दशम मण्डल भी क्षेपक है जहाँ से कथित ब्रम्ह पुरुष के शरीर से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्णों की उत्पत्ति की स्थापना की गयी है। आज जो संस्कृत का मिथक साहित्य प्रचलन में है मौलिक रूप से वह बौद्ध साहित्य का विकृत रूप है। यदि इन ग्रंथों से वर्णव्यवस्था के अंशों को हटा दिया जाए तो जो शेष बचेगा वह सिर्फ बुद्ध धम्म होगा। इस नज़रिये से भी संस्कृत साहित्य की विवेचना की आवश्यकता है।
बुद्ध धम्म में "अरिय" अर्थात "आर्य" शब्द श्रेष्ठ, अटल, उत्कृष्ट, सर्वोच्च इत्यादि के अर्थ में प्रयोग किया गया है। अंग्रेजी में इसे ही "नोबुल" कहा गया है, चार आर्य सत्य अर्थात फोर नोबुल ट्रुथ।
भारत में बाहर से आए लोगों ने इस शब्द की महिमा को देखते हुए इसे स्वयं के लिए प्रयोग करना शुरू कर दिया। यह सहज मनोविज्ञान है कि हीनताग्रसित समुदाय अथवा श्रद्धालु मन श्रेष्ठ लोगों की नकल करता है जैसे बहुत-सी बातों में गुलाम भारत के नागरिकों ने अंग्रेजों की नकल की है- खानपान, चाल चलन, पहनावा इत्यादि में। छात्र अपने अध्यापकों की नकल करते हैं। ऐसे ही खानाबदोश विदेशियों ने "आर्य" शब्द आत्मसात करते हुए स्वयं के लिए "आर्य पुत्र", "आर्य पुत्री" सम्बोधन तथा अपने प्रवास के क्षेत्र को "आर्यावर्त" प्रयोग करना शुरू किया।
ज्यादातर "स्थापित" मान्यताएं मिथ्या हैं, न केवल इतिहास में बल्कि साहित्य और विज्ञान में भी। लेकिन स्थापित मान्यताओं से हट कर कहने-सुनने पर असहजता के भय से लोग प्रायः स्वीकारने से कतराते हैं।
जैसे "हिन्दू" धर्म एक स्थापित सम्बोधन प्रचलन में है जबकि कथित हिन्दू धर्मग्रंथों में "हिन्दू" शब्द है ही नहीं। यह शब्द मूलतः फारसी भाषा का है जिसके अर्थ बड़े नकारात्मक हैं जैसे चोर, डाकू, काला, गुलाम, काफिर इत्यादि। भारत में ही प्रकाशित फ़ारसी के शब्दकोश यथा "जवाहर-उल-लुगत", "लुगत-ए-किशोरी" तथा हिन्दी संस्थान उत्तर प्रदेश से प्रकाशित डा. राजबली पाण्डेय द्वारा सम्पादित "हिन्दू धर्म कोश" इन समस्त ग्रंथों में हिन्दू शब्द के वही अर्थ दिये हैं- चोर, डाकू, काला, गुलाम, काफिर इत्यादि। "हिन्दू" शब्द की "सिन्धु" शब्द से व्युत्पत्ति भी एक मिथ्या स्थापना है। मेरा मकसद किसी की आस्थाओं पर प्रहार करना नहीं है, सिर्फ शब्द विवेचना कर रहा हूँ और तथ्य प्रस्तुत कर रहा हूँ।
"आर्य" शब्द के साथ भी यही हाल है। यह शब्द शुद्ध रूप से बुद्ध धम्म का है जिसे विदेशिओं ने आत्मसात किया।
यह सुनना बड़ा रोचक होगा कि सम्बोधि लाभ के उपरान्त भगवान को शहद का मिष्ठान्न अर्पित करने करने वाले दो श्रद्धालु-तपस्सु और भल्लिक-कम्बोज के व्यापारी थे। कम्बोज ही आज का ईरान है। ईरान आर्यान का अपभ्रंश रूप है। आज भी ईरान का सर्वोच्च राजकीय सम्मान आर्यमेहर है और ईरान का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय आर्यमेहर युनिवर्सिटी है। भगवान ने उन श्रद्धालु बन्धुओं को उपहार में अपनी जटाओं से निकाल कर आठ बाल दिये थे। दोनों व्यापारी बन्धुओं ने वह पावन उपहार ब्रम्हदेश के सम्राट को दिया जिस पर यंगाॅन का प्रसिद्ध स्तूप बना। यह धरती का एकमात्र स्तूप है जो भगवान बुद्ध के रहते-रहते बना, शेष सभी स्तूप भगवान के महापरिनिर्वाण के उपरान्त बने हैं। कहने का तात्पर्य यह कि भगवान बुद्ध के समय से ही दूर देश के लोगों के इस देश में आने के प्रमाण मिलते हैं। कालान्तर में व्यापारी भल्लिक ने भगवान से दीक्षा ले कर बुद्ध धम्म स्वीकार लिया था। द्वीशरण की दीक्षा का यह पहला उदाहरण है। द्वीशरण अर्थात सिर्फ दो शरण- बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि- क्योंकि जब उन श्रद्धालु व्यापारियों ने भगवान के दर्शन किये तब संघ बना ही नहीं था। पालि त्रिपिटक में बाकायदा एक सुत्त भी है- भल्लिक सुत्त, जिसमें व्यापारी भल्लिक के बुद्ध भक्त बन जाने का विवरण है।
भारत देश अपनी समृद्धि के कारण हमेशा से दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। समृद्धि यानी सब प्रकार की समृद्धि, न केवल आर्थिक समृद्धि, प्राकृतिक समृद्धि, बौद्धिक, ज्ञान-विज्ञान की समृद्धि बल्कि आध्यात्मिक समृद्धि भी। भारत की समृद्धि ने हमेशा से दुनिया को आकर्षित किया। आज भी भारत का अवचेतन जिस "सोने की चिड़िया" काल का गर्व करता है वह बुद्ध का एवं कालान्तर का बौद्धकाल ही है। भारत में एक अनूठी समृद्धि और भी रही है- आत्मसातीकरण की समृद्धि। इस देश में खानाबदोश भी आए, व्यापारी भी आए, लुटेरे भी आए, अध्यात्म पिपासु भी आए, यात्री-पर्यटक भी आए, इसने सबको आत्मसात कर लिया।
भारत के बाहर से आए अधिकांश लोगों ने इस देश की मूल मैत्रीपूर्ण संस्कृति को, अमन और मुहब्बत की तहजीब को, प्यार से आत्मसात कर लिया तो कुछ लोगों ने उसके साथ 'छेड़छाड़' भी की। भारत की सामाजिक समस्याओं का मुख्य कारण यही 'छेड़छाड़' है।
सर्वाधिक रोचक बात यह है कि जिन्हें कथित तौर पर आज "आर्य" कहा जा रहा है उन्होंने इस देश की संस्कृति को सर्वाधिक आत्मसात किया है, इस कद्र कि, वे इस पर एकाधिकार का दावा तो दूर अपने को इसका प्रणेता सिद्ध करने की सीमा तक भी जाते हैं। न केवल धर्म व संस्कृति बल्कि संसाधनों को भी उन्होंने आत्मसात कर लिया- उन्होंने भारत की नदियों-सागरों-पर्वतों-वनों को भी तीर्थ बना कर पूजनीय बना दिया। क्या गंगा, क्या यमुना, क्या गोदावरी, क्या कृष्णा, क्या रामेश्वरम, क्या कन्याकुमारी, क्या हिमालय, क्या विन्धयाचल, क्या वृन्दावन, क्या दण्डकारण्य सब पर उनकी दावेदारी, सब पर उनका अधिकार है। इन कथित "आर्यों" ने पूरी की पूरी एक ऋषि संस्कृति को जन्म दिया, उसका महिमामण्डन किया। इस पूरे महिमामण्डन से सिर्फ "वर्णव्यवस्था" की "छेड़छाड़" को हटा दीजिए तो भारत बुद्ध की मैत्री के सिवा कुछ नहीं है, विश्व की आध्यात्मिक धुरी के सिवा कुछ नहीं है। इन कथित "आर्यों" ने ही बुद्ध का धम्म पूरी दुनिया में फैलाया। इतिहास उठा कर देखिये तो कौण्डिण्य, वप्प, भद्दिय, अस्सजी, महानाम, सारिपुत्र, मोदगल्यायन, महाकाश्यप, महाकात्यायन से लेकर अश्वघोष, वसुबन्धु, बोधिधम्म, पद्मसंभव, विनीतारुचि, असंग, नागार्जुन और आधुनिक युग में आचार्य धम्मानन्द कोसाम्बी, महापण्डित राहुल सांकृत्यायन, प्रो. जगन्नाथ उपाध्याय तक सबके सब कथित "आर्य" ही तो हैं। सवाल किसी को देशी-विदेशी सिद्ध करना भर नहीं है बस इतनी-सी बात है कि जिसे अमन और मुहब्बत स्वीकार है, जिसे बुद्ध की मैत्री स्वीकार है, वह देशी हैं बाकी सब विदेशी हैं, क्योंकि बुद्ध की मैत्री एकमात्र देशी है, नफ़रत विदेशी है, घृणा परदेसी है। मैं कोई काव्यात्मक अलंकरण नहीं कर रहा हूँ बल्कि सच में पांच हजार साल के ज्ञात-अज्ञात इतिहास-प्राइतिहास के आलोक में कह रहा हूँ कि आज तक भारत ने किसी देश पर आक्रमण नहीं किया, किसी को जबरन अपने अधीन नहीं किया लेकिन भगवान बुद्ध की मैत्री से सम्पूर्ण एशिया को जीत लिया, बुद्ध का अनुयायी बना दिया। यूनान के सम्राट कनिष्क और मीनाण्डर ने भारत को जीता लेकिन बुद्ध के धम्म ने इन सम्राटों को जीत लिया। वे भारत के हो कर रह गये। कनिष्क ने चौथी संगीति आयोजित की और मीनाण्डर मिलिन्द बन गया। भारत आज भी दुनिया में पूजनीय है तो बुद्ध के कारण पूजनीय है और अगर निन्दनीय तो उसी 'छेड़छाड़' के कारण निन्दनीय है जिसके लिए देश का बुद्धानुयायी न केवल चिंतित है बल्कि समता-स्वतंत्रता-बन्धुता-न्याय की स्थापना के लिए सतत प्रयासरत भी है। जो इस अभियान में साथ हैं वे सब सच में भारतीय हैं। जिन्हें ये दर्शन स्वीकार नहीं बस वो ही विदेशी हैं। भगवान बुद्ध के वचन हैं- मैत्री सम्पूर्ण धम्म है।

user image Jigyasa Admin - 27 Jan 2019 at 11:51 PM -

आरक्षण में रोस्टर आखिर है क्या,जिसे लेकर मचा हुआ है देश में हंगामा
-अरविन्द कुमार

रोस्टर एक विधि है, जिसके जरिये नौकरियों में आरक्षण लागू किया जाता है. लेकिन अगर इसे लागू न किया जाए या लागू करने में बेईमानी हो तो आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों की ... धज्जियां उड़ जाती हैं.

संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 16(4) के तहत पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्ग) का पर्य़ाप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान किया है. लेकिन आरक्षण को कैसे लागू किया जाये, इसको लेकर देशभर के विश्वविद्यालय सत्तापक्ष की मिलीभगत से अड़ंगेबाजी करते रहे. इसका परिणाम रहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों का रिज़र्वेशन विश्वविद्यालयों में महज कागज की शोभा बनकर रह गया. यही हाल मण्डल कमीशन की संस्तुतियों के आधार पर लागू हुए ओबीसी रिज़र्वेशन का रहा.

विश्वविद्यालय लंबे समय तक अपनी स्वायत्तता का हवाला देकर आरक्षण लागू करने से ही मना करते रहे, लेकिन जब सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी दबाव बनने लगा तो उन्होंने आरक्षण लागू करने की हामी तो भरी, लेकिन इसमें तमाम ऐसे चालबाजी कर दी, जिससे कि यह प्रभावी ढंग से लागू ही न हो पाये. इस चालबाजी में प्रमुख हैं-

– विभाग को आरक्षण लागू करने के लिए यूनिट बनाना
– एक एक पद के लिए विशेष योग्यता जोड़ना, ताकि कैंडीडेट ही न मिले,
– विभागों को छोटा-छोटा करना, ताकि आरक्षित वर्ग के लिए कभी सीट ही नहीं आए

इन चालबाजियों का परिणाम रहा कि विश्वविद्यालयों में आरक्षण ऐसे लागू हुआ, जिससे कि आरक्षित वर्ग को न्यूनतम सीटें मिलें. इस तरह की नीतियों का ही परिणाम है कि आज भी विश्वविद्यलयों में आरक्षित समुदाय के प्रोफेसरों, एसोसिएट प्रोफेसरों और असिस्टेंट प्रोफेसरों का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है. अभी हाल ही में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देशभर के विश्वविद्यालयों में आरक्षण लागू होने के बावजूद भी आरक्षित समुदाय के प्राध्यापकों का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है.

रोस्टर का जन्म:-

2006 में उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के दौरान विश्वविद्यालय में नियुक्तयों का मामला केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार के सामने आया. चूंकि इस बार आरक्षण उस सरकार के समय में लागू हो रहा था, जिसमें आरजेडी, डीएमके, पीएमके, जेएमएम जैसे पार्टियां शामिल थीं, जो कि सामाजिक न्याय की पक्षधर रहीं हैं, इसलिए पुराने खेल की गुंजाइश काफी कम हो गयी थी. अतः केंद्र सरकार के डीओपीटी मंत्रालय ने यूजीसी को दिसंबर 2005 में एक पत्र भेजकर विश्वविद्यालयों में आरक्षण लागू करेने में आ रही विसंगतियों को दूर करने के लिए कहा. उस पत्र के अनुपालन में यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन प्रोफेसर वीएन राजशेखरन पिल्लई ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर रावसाहब काले जो कि आगे चलकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति भी बनाए गए थे, की अध्यक्षता में आरक्षण लागू करने के लिए एक फॉर्मूला बनाने हेतु एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया था, जिसमें कानूनविद प्रोफेसर जोश वर्गीज़ और यूजीसी के तत्कालीन सचिव डॉ आरके चौहान सदस्य थे.

प्रोफेसर काले कमेटी ने भारत सरकार के डीओपीटी मंत्रालय की 02 जुलाई 1997 की गाइडलाइन जो कि सुप्रीम कोर्ट के सब्बरवाल जजमेंट के आधार पर बनी है, को ही आधार बनाकर 200 पॉइंट का रोस्टर बनाया. इस रोस्टर में किसी विश्वविद्यालय के सभी विभाग में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर का तीन स्तर पर कैडर बनाने की सिफारिश की गयी. इस कमेटी ने विभाग के बजाय, विश्वविद्यालय/कालेज को यूनिट मानकर आरक्षण लागू करने की सिफारिश की, क्योंकि उक्त पदों पर नियुक्तियां विश्वविद्यालय करता है, न कि उसका विभाग. अलग-अलग विभागों में नियुक्त प्रोफेसरों की सैलरी और सेवा शर्तें भी एक ही होती हैं, इसलिए भी कमेटी ने उनको एक कैडर मानने की सिफारिश की थी.

रोस्टर 200 पॉइंट का क्यों, 100 पॉइंट का क्यों नहीं?

काले कमेटी ने रोस्टर को 100 पॉइंट पर न बनाकर 200 पॉइंट पर बनाया, क्योंकि अनुसूचित जातियों को 7.5 प्रतिशत ही आरक्षण है. अगर यह रोस्टर 100 पॉइंट पर बनता है तो अनुसूचित जातियों को किसी विश्वविद्यालय में विज्ञापित होने वाले 100 पदों में से 7.5 पद देने होते, जो कि संभव नहीं है.

अतः कमेटी ने अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और ओबीसी को 100 प्रतिशत में दिये गए क्रमशः 7.5, 15, 27 प्रतिशत आरक्षण को दो से गुणा कर दिया, जिससे यह निकलकर आया कि 200 प्रतिशत में अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और ओबीसी को क्रमश: 15, 30, 54 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा. यानि अगर एक विश्वविद्यालय में 200 सीट हैं, तो उसमें अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, और ओबीसी को क्रमशः 15, 30, और 54 सीटें मिलेंगी, जो कि उनके 7.5, 15, 27 प्रतिशत आरक्षण के अनुसार हैं.

सीटों की संख्या का गणित सुलझाने के बाद कमेटी के सामने यह समस्या आई की यह कैसे निर्धारित किया जाये कि कौन सी सीट किस समुदाय को जाएगी? इस पहेली को सुलझाने के लिए कमेटी ने हर सीट पर चारों वर्गों की हिस्सेदारी देखने का फॉर्मूला अपनाया. मसलन, अगर किसी संस्थान में केवल एक सीट है, तो उसमें अनारक्षित वर्ग की हस्सेदारी 50.5 प्रतिशत होगी, ओबीसी की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत होगी, एससी की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत होगी, और एसटी की हिस्सेदारी 7.5 प्रतिशत होगी. चूंकि इस विभाजन में सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है, इसलिए पहली सीट अनारक्षित रखी जाती है.

पहली सीट के अनारक्षित रखने का एक और लॉजिक यह है कि यह सीट सैद्धांतिक रूप से सभी वर्ग के उम्मीदवारों के लिए खुली होगी. यह अलग बात है कि धीरे-धीरे यह माना जाने लगा है कि अनारक्षित सीट का मतलब सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण. इस फॉर्मूले के आधार पर कमेटी ने सीट की स्थिति का निर्धारण करने के लिए 200 नंबर का एक चार्ट बना दिया, जिसको कि 200 पॉइंट का रोस्टर कहते हैं. इस रोस्टर के अनुसार अगर किसी विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कुल 200 पद हैं, तो उनका वितरण निम्न प्रकार होगा.

अनारक्षितः 01,02,03,05,06,09 वां……समेत बाकी सभी पद जो कि ओबीसी, एससी, एसटी मे नहीं सम्मिलित हैं.

ओबीसीः 04, 08, 12, 16, 19, 23, 26, 30,34, 38, 42, 45,49,52, 56,60,63, 67,71,75, 78,82,86, 89,93,97, 100, 104, 109,112, 115, 119,123,126, 130,134, 138, 141,145,149, 152,156, 161,163, 167,171,176, 178, 182, 186, 189,193,197,200 वां पद

एससी: 7,15,20,27,35,41,47,54,61,68,74,81,87,94,99,107,114,121,127,135, 140,147,154,162,168,174,180,187,195,199 वां पद

एसटी: 14,28,40,55,69,80,95,108,120,136,148,160,175,188,198वां पद

विवाद की वजह:-

प्रो. काले कमेटी द्वारा बनाए गए इस रोस्टर ने विश्वविद्यालों द्वारा निकाली जा रही नियुक्तियों में आरक्षित वर्ग की सीटों की चोरी को लगभग नामुमकिन बना दिया, क्योंकि इसने यह तक तय कर दिया कि आने वाला पद किस समुदाय के कोटे से भरा जाना है. इस वजह से बीएचयू, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, शांति निकेतन विश्वविद्यालय समेत कई विश्वविद्यालय इस रोस्टर के खिलाफ हो गए थे.

ऐसा इसलिए हुए, क्योंकि यह रोस्टर तब से लागू माना जाना था, जब से उस विश्वविद्यालय ने अपने यहां आरक्षण लागू किया था. मान लीजिए कि किसी विश्वविद्यालय ने 2005 से अपने यहां आरक्षण लागू किया, लेकिन उसने अपने यहां उसके बाद भी किसी एसटी, एससी, ओबीसी को नियुक्त नहीं किया. ऐसी सूरत में उस विश्वविद्यालय में 2005 के बाद नियुक्त हुए सभी असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसरों की सीनियरिटी के अनुसार तीन अलग-अलग लिस्ट बनेगी. अब मान लीजिये कि अगर उस विश्वविद्यालय ने असिस्टेंट प्रोफेसर पर अब तक 43 लोगों को नियुक्त कर चुका है, जिसमें कोई भी एससी, एसटी और ओबीसी नहीं है, तो रोस्टर के अनुसार उस विश्वविद्यालय में अगले 11 असिस्टेंट प्रोफेसरों को सिर्फ ओबीसी उम्मीदवार से, 06 को एसटी, और 03 को एसटी उम्मीदवारों से भरे बिना, उक्त विश्वविद्यालय कोई भी असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर अनारक्षित वर्ग की नियुक्ति नहीं कर सकता.

चूंकि ज़्यादातर विश्वविद्यालयों ने अपने यहां आरक्षण सिर्फ कागज पर ही लागू किया था, इसलिए इस रोस्टर के आने के बाद वो फंस गए. चूंकि वो नया पद अनारक्षित वर्ग के लिए तब तक नहीं निकाल सकते थे, जब तक कि पुराना बैकलॉग भर न जाय. ऐसे में इलाहाबाद विश्वविद्यालय, बीएचयू, डीयू, और शांति निकेतन समेत तमाम विश्वविद्यालयों ने इस रोस्टर को विश्वविद्यालय स्तर पर लागू किए जाने का विरोध करने लगे. उन्होंने विभाग स्तर पर ही रोस्टर लागू करने की मांग की. इन विश्वविद्यालयों ने 200 पॉइंट रोस्टर को जब लागू करने से मना कर दिया, तो यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन प्रोफेसर सुखदेव थोराट ने प्रो. राव साहब काले की ही अध्यक्षता में इनमें से कुछ विश्वविद्यालयों के खिलाफ जांच कमेटी बैठा दी तो दिल्ली विश्वविद्यालय का फंड तक रोक दिया था. दिल्ली विश्वविद्यालय का फंड तब प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप से ही रिलीज हो पाया था. चूंकि उन दिनों केंद्र की यूपीए सरकार के तमाम घटक दलों में क्षेत्रीय पार्टियां थीं, इसलिए तब इन विश्वविद्यालयों में विरोध परवान नहीं चढ़ पाया था.
Jitendra Narayan

user image Arvind Swaroop Kushwaha

फेसबुक की तरह फ़ास्ट बनाने की कोशिश जारी है।

Friday, February 1, 2019
user image Arvind Swaroop Kushwaha

जी यह अभी बेबी एप्प है।

Friday, February 1, 2019
user image Bal Krishna Kushwaha

Yah aap slow chalta hai

Wednesday, January 30, 2019