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user image Arvind Swaroop Kushwaha - 19 May 2020 at 7:45 AM -

उपवास fasting

इस भीषण गर्मी में दिन भर बिना पानी पिये रहना बहुत खतरनाक है। इस तरह से व्यक्ति मौसम के खिलाफ लड़ने के लिए खुद का अनुकूलन करने में सफल हो जाता है। जो नहीं सफल होता वो मर जाता है। जो नहीं मानता वो काफ़िर ... कहलाता है। एक तरह से यह सरवाइवल ऑफ थे फिटेस्ट की प्रक्रिया को और तेज करता है।
जब तक दिमाग के गहन प्रयोग की आवश्यकता नहीं थी तब तक यह चक्रीय मासिक उपवास बहुत अधिक उपयोगी था, किन्तु अब जबकि अच्छे डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और शिक्षकों का महत्व कुशल योद्धा से सैकड़ों गुना अधिक हो गया है यह उपवास अर्थात रोजा भयंकर व्यवधान का रूप ले चुका है।
जिनके गुर्दों या मूत्राशय में पथरी की शिकायत है उनके लिए यह रोजा(निर्जल उपवास) घातक भी हो सकता है।
पानी की कमी से दिमाग की नसें सूखने लगती हैं। लगातार 28 दिन और हर साल लगातार 28 दिन के ये उपवास दिमाग की क्षमता को आधे से भी कम कर देते हैं। हिंदुओं के 9 दिन के उपवास भी कुछ इसी तरह के नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 16 May 2020 at 7:58 PM -

श्वेत प्रदर

श्वेत प्रदर
योनि शिथिल होने के प्रकार

श्वेत प्रदर या सफेद पानी का योनि मार्ग से निकलना Leukorrhea(ल्यूकोरिया) कहलाता है। यह हमेशा रोग का लक्षण नहीं होता।

अधिकतर महिलाएं इस गलत फहमी में होती है कि सफेद पानी के जाने से शरीर में कमजोरी आती है, चक्कर आता ... है, बदन में दर्द होता है, शरिर से तेजस्विता चली जाती है आदि। ऐसी मान्यता भारत अौर पडोस के देश के कुछ प्रांतो मे पूर्वकाल से प्रचलित है। (culture bound dhat syndrome in females)

सफेद पानी का निकलना दो प्रमुख कारणों से होता है।
1 - स्वाभाविक, 2- बीमारी का लक्षण

1. स्वाभाविक
सफेद पानी निकलना प्राय: स्त्रियों में स्वाभाविक रूप से कुछ मात्रा में होता है।

विशेषत: माहवारी (मासिक धर्म) के पूर्व, माहवारी के बाद, अण्डोत्सर्ग (Ovulation)के समय और कामेच्छा उद्दीप्त होने पर स्वाभाविक है।

इसके लिए किसी उपचार की आवश्यकता नहीं होती| समुपदेशन अर्थात सही जानकारी देना ही पर्याप्त है।

2. बीमारी का लक्षण
श्वेत प्रदर या ल्यूकोरिआ या लिकोरिआ (Leukorrhea) या "सफेद पानी आना" स्त्रिओं का एक रोग भी है जिसमें स्त्री-योनि से असामान्य मात्रा में सफेद रंग का गाढा और बदबूदार पानी निकलता है और जिसके कारण वे बहुत क्षीण तथा दुर्बल हो जाती हैं। महिलाओं में श्वेत प्रदर रोग आम बात है। ये गुप्तांगों से पानी जैसा बहने वाला स्त्राव होता है। यह खुद कोई रोग नहीं होता परंतु अन्य कई रोगों के कारण होता है।

श्वेत प्रदर वास्तव में एक बीमारी नहीं है बल्कि किसी अन्य योनिगत या गर्भाशयगत व्याधि का लक्षण है; या सामान्यतः प्रजनन अंगों में सूजन का बोधक है।

अन्य लक्षण
योनि स्थल पर खुजली होना
कमर दर्द होना
चक्कर आना
कमजोरी बनी रहना
कारण
स्चाभाविक श्वेत प्रदर

सफेद पानी का निकलना निम्नन परिस्थिती में स्वाभाविक होता है:

नवजात बालिका
कामेच्छा होनेपर
रजो प्रवाह (मासिक) के कुछ दिन पूर्व
बिजोत्पत्ती के दिन
अज्ञान कारण से (idiopathic)
सफेद पानी का आविर्भाव अधिक मात्रा में काम उत्तेजना होने पर होता है। यह पानी चिकनाहट (lubrication) उत्पन्न करता है। कुदरत कि यह व्यवस्था संभोग के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह सफेद पानी जब भी कामुक उत्तजना मन में हो तब तब निकलता है चाहे आप विवाहित हो या अविवाहित| इसके निकलनेसे ना कमजोरी, ना दर्द, ना अन्य किसीभी प्रकार का स्वास्थ पर हानिकारक प्रभाव होता है। कामइच्छा होने पर सही मात्रा में यह उत्तपन्न ना हो तो मैथुन दर्द दायक हो सकता है। इसका इलाज करना पड़ता है।

श्वेत पानी मासिक स्राव (bleeding) के कुछ दिन पहले अधिक मात्रा में होता है। बिजोतपत्ती (ovulation) के समय इस्ट्रोजन (Estrogen) कि मात्रा बडने से सफेद पानी ज्यादा बह सकता है। गर्भावस्था में भी सफेद पानी का निकलना अधिक मात्रा में होता है। नवजात अर्भक बच्ची में भी माता के इस्ट्रोजन (Estrogen) कि वजह से सफेद पानी निकल सकता है।

अत्यधिक उपवास, उत्तेजक कल्पनाएं, अश्लील वार्तालाप, मुख मैथुन, सम्भोग में उल्टे आसनो का प्रयोग करना, सम्भोग काल में अत्यधिक घर्षण युक्त आघात, रोगग्रस्त पुरुष के साथ सहवास,दो तीन पुरूषों से एकसाथ अत्याधिक संभोग करना, सहवास के बाद योनि को स्वच्छ जल से न धोना व वैसे ही गन्दे बने रहना आदि इस रोग के प्रमुख कारण बनते हैं। बार-बार गर्भपात कराना भी सफेद पानी का एक प्रमुख कारण है। सफेद पानी (या श्वेत प्रदर) का एक और कारण प्रोटिस्ट हैं जो कि एक सूक्ष्म जीवों का समूह है।

बचाव एवं चिकित्सा
इसके लिये सबसे पहले जरूरी है साफ-सफाई - योनि को धोने के लिये सर्वोत्तम उपाय फिटकरी के जल से धोना है; फिटकरी एक श्रेष्ठ जीवाणु नाशक सस्ती औषधि है, सर्वसुलभ है। बोरिक एसिड के घोल का भी प्रयोग करा जा सकता है और यदि अंदरूनी सफ़ाई के लिये पिचकारी से धोना (डूश लेना) हो तो आयुर्वेद की अत्यंत प्रभावकारी औषधि “नारायण तेल” का प्रयोग सर्वोत्तम होता है।

मैथुन के पश्चात अवश्य ही साबुन से सफाई करना चाहिए।
प्रत्येक बार मल-मूत्र त्याग के पश्चात अच्छी तरह से संपूर्ण अंग को साबुन से धोना।
बार-बार गर्भपात कराना भी सफेद पानी का एक प्रमुख कारण है। अतः महिलाओं को अनचाहे गर्भ की स्थापना के प्रति सतर्क रहते हुए गर्भ निरोधक उपायों का प्रयोग (कंडोम, कापर टी, मुँह से खाने वाली गोलियाँ) अवश्य करना चाहिए। साथ ही एक या दो बच्चों के बाद अपना या अपने पति का नसबंदी आपरेशन कराना चाहिए।
शर्म त्यागकर इसके बारे में अपने पति एवं डाक्टर को बाताना चाहिये।
इस रोग की प्रमुख औषधियां अशोकरिष्ट, अशोक घनबटी, प्रदरांतक लौह, प्रदरहर रस आदि हैं।
योनि स्राव और उसके संकेत
योनि मार्ग से सफेद, चिपचिपा गाढ़ा स्राव होना आज मध्य उम्र की महिलाओं की एक सामान्य समस्या हो गई है। सामान्य भाषा में इसे सफेद पानी जाना कहते हैं। भारतीय महिलाओं में यह आम समस्या प्रायः बिना चिकित्सा के ही रह जाती है। सबसे बुरी बात यह है कि इसे महिलाएँ अत्यंत सामान्य रूप से लेकर ध्यान नहीं देती, छुपा लेती हैं श्वेत प्रदर में योनि की दीवारों से या गर्भाशय ग्रीवा से श्लेष्मा का स्राव होता है, जिसकी मात्रा, स्थिति और समयावधि अलग-अलग स्त्रियों में अलग-अलग होती है। यदि स्राव ज्यादा मात्रा में, पीला, हरा, नीला हो, खुजली पैदा करने वाला हो तो स्थिति असामान्य मानी जाएगी। इससे शरीर कमजोर होता है और कमजोरी से श्वेत प्रदर बढ़ता है। इसके प्रभाव से हाथ-पैरों में दर्द, कमर में दर्द, पिंडलियों में खिंचाव, शरीर भारी रहना, चिड़चिड़ापन रहता है। इस रोग में स्त्री के योनि मार्ग से सफेद, चिपचिपा, गाढ़ा, बदबूदार स्राव होता है, इसे वेजाइनल डिस्चार्ज कहते हैं। इस रोग के कारणों की जांच स्त्री रोग विशेषज्ञ, लेडी डॉक्टर से करा लेना चाहिए, ताकि उस कारण को दूर किया जा सके।

योनिक स्राव क्या होता है और कब उसे असामान्य कहा जाता है?
ग्रीवा से उत्पन्न श्लेष्मा (म्युकस) का बहाव योनिक स्राव कहलाता है। अगर स्राव का रंग, गन्ध या गाढ़ापन असामान्य हो अथवा मात्रा बहुत अधिक जान पड़े तो हो सकता है कि रोग हो। योनिक स्राव (Vaginal discharge) सामान्य प्रक्रिया है जो कि मासिक चक्र के अनुरूप परिवर्तित होती रहती है। दरअसल यह स्राव योनि को स्वच्छ तथा स्निग्ध रखने की प्राकृतिक प्रक्रिया है वहीं अण्डोत्सर्ग के दौरान यह स्राव इसलिये बढ़ जाता है ताकि अण्डाणु आसानी से तैर सके। अण्डोत्सर्ग के पहले काफी मात्रा में श्लेष्मा (mucous) बनता है। यह सफेद रंग का चिपचिपा पदार्थ होता है। लेकिन कई परिस्थितियों में जब इसका रंग बदल जाता है तथा इससे बुरी गंध आने लगती है तो यह रोग के लक्षण का रूप ले लेता है।

सफेद योनिक स्रावः मासिक चक्र के पहले और बाद में पतला और सफेद योनिक स्राव सामान्य है। सामान्यतः सफेद योनिक स्राव के साथ खुजलाहट या चुनमुनाहट नहीं होती है। यदि इसके साथ खुजली हो रही है तो यह खमीर संक्रमण (yeast infection) को प्रदर्शित करता है। साफ और फैला (Clear and stretchy) हुआः यह उर्वर (fertile) श्लेष्मा है। इसका आशय है कि आप अण्डोत्सर्ग के चक्र में हैं। साफ और पानी जैसाः यह स्राव महिलाओं में सामान्य तौर पर पूरे चक्र के दौरान अलग-अलग समय पर होता रहता है। यह भारी तब हो जाता है जब व्यायाम या मेहनत का काम किया जाता है।

पीला या हराः यह स्राव सामान्य नहीं माना जाता है तथा बीमारी का लक्षण है। यह यह दर्शता है कि योनि में या कहीं तीव्र संक्रमण है। विशेषकर जब यह पनीर की तरह और गंदी बदबू से युक्त हो तो तुरंत चिकित्सक के पास जाना चाहिये। भूराः यह स्राव अक्सर माहवारी के बाद देख ने को मिलता है। दरअसल यह “सफाई” की स्वाभाविक प्रक्रिया है। पुराने रक्त का रंग भूरा सा हो जाता है सामान्य प्रक्रिया के तहत श्लेष्मा के साथ बाहर आता है।

रक्तिम धब्बे/भूरा स्राव: यह स्राव अण्डोत्सर्ग/मध्य मासिक के दौरान हो सकता है। कई बार बार शुरूआती गर्भावस्था के दौरान भी यह स्राव देखने को मिलता है। इस आधार पर कई बार इसे गर्भधारण का संकेत भी माना जाता है।

किन परिस्थितियों के कारण सामान्य योनिक स्राव में वृद्धि होती है?
सामान्य योनिक स्राव की मात्रा में निम्नलिखित स्थितियों में वृद्ध हो सकती है- योनपरक उत्तेजना, भावात्मक दबाव और अण्डोत्सर्ग (माहवारी के मध्य में जब अण्डकोष से अण्डे का सर्जन और विसर्जन होता है)

असामान्य योनिक स्राव के क्या कारण होते हैं?
असामान्य योनिक स्राव के ये कारण हो सकते हैं- (1) योन सम्बन्धों से होने वाला संक्रमण (2) जिनके शरीर की रोधक्षमता कमजोर होती है या जिन्हें मधुमेह का रोग होता है उनकी योनि में सामान्यतः फंगल यीस्ट नामक संक्रामक रोग हो सकता है।

असामान्य योनिक स्राव से कैसे बचा जा सकता है?
योनिक स्राव से बचने के लिए –

(1) जननेन्द्रिय क्षेत्र को साफ और शुष्क रखना जरूरी है।

(2) योनि को बहुत भिगोना नहीं चाहिए (जननेन्द्रिय पर पानी मारना) बहुत सी महिलाएं सोचती हैं कि माहवारी या सम्भोग के बाद योनि को भरपूर भिगोने से वे साफ महसूस करेंगी वस्तुतः इससे योनिक स्राव और भी बिगड़ जाता है क्योंकि उससे योनि पर छाये स्वस्थ बैक्टीरिया मर जाते हैं जो कि वस्तुतः उसे संक्रामक रोगों से बचाते हैं

(3) दबाव से बचें।

(4) योन सम्बन्धों से लगने वाले रोगों से बचने और उन्हें फैलने से रोकने के लिए कंडोम का इस्तेमाल अवश्य करना चाहिए।

(5) मधुमेह का रोग हो तो रक्त की शर्करा को नियंत्रण में रखाना चाहिए।

असामान्य योनिक स्राव के लिए क्या डाक्टर से सम्पर्क करना चाहिए?
हां, शीघ्र ही डाक्टर से परामर्श लेना चाहिए। वे आपके लक्षणों की जानकारी लेंगे, जननेन्द्रिय का परीक्षण करेंगे और तदनुसार उपचार बतायेंगे

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 07 May 2020 at 6:38 PM -

पण्डित मोटेराम की डायरी

कहानी

पण्डित मोटेराम की डायरी 
प्रेमचंद 

क्या नाम कि कुछ समझ में नहीं आता कि डेरी और डेरी फार्म में क्या सम्बन्ध! डेरी तो कहते हैं उस छोटी-सी सादी सजिल्द पोथी को, जिस पर रोज-रोज का वृत्तान्त लिखा जाता है और जो प्राय: सभी महान् पुरुष लिखा करते ... हैं और डेरी फार्म उस स्थान को कहते हैं जहाँ गायें-भैंसें पाली जाती हैं और उनका दूध, मक्खन, घी तैयार किया जाता है। ऐसा मालूम होता है, डेरी फार्म इसलिए नाम पड़ा कि जैसे डेरी में नित्य-प्रति का समाचार लिखा जाता है, उस तरह नित्य-प्रति दूध-मक्खन बनता है। जो कुछ हो, मैंने अब डेरी लिखने का निश्चय कर लिया है। कई साल पहले एक बार एक पुस्तक वाले ने मुझे एक डेरी भेंट की थी। तब मैंने उस पर एक महीने तक अपना हाल लिखा; लेकिन मुझे उसमें लिखने को कुछ सूझता ही न था। रात को सोने से पहले घण्टों बैठा सोचता-क्या लिखूँ। लिखने लायक कोई बात भी हो? यह लिखना कि प्रात:काल उठा, मुँह-हाथ धोया, स्नान किया, तिलक-चन्दन लगाया, पूजन किया, यजमानों से मिला, कहीं साइत बाँचने गया; फिर लौटकर भोजन किया और सोया। तीसरे पहर फिर उठा, भंग छानी, फिर स्नान किया, फिर तिलक लगाया और कथा बाँचने चला गया; लौटकर फिर भोजन किया और सो रहा। यह सब लिखना मुझे अच्छा न लगता था। इसलिए उस डेरी पर मैंने धोबी के कपड़ों और आमदनी-खर्च लिखकर उसे पूरा किया। जब से वह डेरी समाप्त हुई, तब से खर्च-आमदनी का हिसाब लिखना छोड़ दिया और धोबी के कपड़ों का हिसाब पण्डिताइन के जिम्मे डाल दिया।

लेकिन अब से फिर डेरी लिखना आरम्भ कर रहा हूँ, इसका क्या कारण है? मैंने सुना है कि इससे आयु बढ़ती है, और चारों पदार्थ हाथ आ जाते हैं। इसलिए अब मैं फिर भगवान् का नाम लेकर, और गणेशजी के सामने शीश झुकाकर डेरी लिखना आरम्भ करता हूँ। ओम शान्ति: शान्ति: शान्ति:। क्या नाम कि आजकल साम्यवाद और समष्टिवाद की बड़ी चर्चा सुन रहा हूँ। साम्यवाद का अर्थ यह है कि सभी मनुष्य बराबर हों। तो मैं अपने साम्यवादी विद्वानों से जो इस विषय के आचार्य हैं, जैसे-श्री सम्पूर्णानन्द, आचार्य नरेन्द्रदेवजी और आचार्य श्रीप्रकाशजी से पूछना चाहता हूँ कि सब मनुष्य कैसे बराबर हो सकते हैं? आचार्य नरेन्द्रदेवजी मुझे क्षमा करें या न करें, मगर उनके जैसे तीन आचार्य मेरे पेट में समा सकते हैं, फिर यह कैसा साम्यवाद? इसका मतलब तो यही हो सकता है कि या मैं वामन रूप धारण कर लूँगा वह विराट् रूप धारण कर लें।

अच्छा, अब दूसरी बात लीजिए। धन तो आप सबका बराबर कर देना चाहते हैं; लेकिन कृपा करके यह बतलाइए कि आप सबके पेट कैसे बराबर कर देंगे? आचार्य नरेन्द्रदेवजी एक-दो फुलके और आध घूँट दूध पीकर रह सकते हैं; मगर मुझे तो पूजा करने के बाद, मध्याह्न, तीसरे पहर और रात को, चार बार तर माल चकाचक चाहिए, जिसमें लड्डू, हलवा, मलाई, बादाम, कलाकन्द आदि का प्राधान्य हो। अगर आपका साम्यवाद इसकी गारण्टी करे कि वह मुझे इच्छापूर्ण भोजन देगा तो मैं उस पर विचार कर सकता हूँ और अगर आप चाहते हों कि मैं भी दो फुलके और तोले भर दूध और दो तोले भाजी खाकर रहूँ तो ऐसे साम्यवाद को मेरा दूर ही से प्रणाम है। मैं धन नहीं माँगता; लेकिन भोजन आँतफाड़ चाहता हूँ, अगर इस तरह की गारण्टी दी गयी, तो वचन देता हूँ कि मैं और मेरे अनेक मित्र साम्यवादी बनने को तैयार हो जाएँगे।

लेकिन एक भोजन ही से तो काम नहीं चलता। कपड़ा ही ले लीजिए। आपको एक कुरता और एक टोपी चाहिए। कुरते में एक गज से अधिक खद्दर न लगेगा। मैं लम्बी अँगरखी पहनता हूँ, जिसमें सात गज से कम कपड़ा नहीं लगता। मैंने दरजी के सामने बैठकर खुद कटवाया है और इसका विश्वास दिलाता हूँ कि इससे कम में मेरी अँगरखी नहीं बन सकती। फिर बारह गज का साफा, ५ गज की चादर ऊपर से। साम्यवाद इसकी गारण्टी ले सकता है? धन लेकर मुझे क्या करना है, लेकिन भोजन और वस्त्र तो चाहिए ही।

आप कहेंगे, काम सबके बराबर करना पड़ेगा। मैं स्वीकार करता हूँ, अगर कोई सज्जन घड़ी भर पूजा करें, तो मैं दो घड़ी कर दूँगा; वह घड़ी भर स्नान करें तो मैं दो घड़ी पानी में रह सकता हूँ, वह एक घड़ी शास्त्रार्थ करें तो मैं भोजन-पूजन आदि को छोडक़र दिन भर शास्त्रार्थ कर सकता हूँ। इसमें मैं किसी से पीछे हटने वाला नहीं।

एक बात और। स्थान की मुझे परवाह नहीं; झोपड़ी भी हो तो मैं अपना निबाह कर सकता हूँ। लेकिन रेल यात्रा करते समय अगर मुझे सबके बराबर जगह मिली, तो उस पटरी पर बैठने वालों को छोडक़र भागना पड़ेगा; क्योंकि मैं एक पूरी पटरी से कम में समा नहीं सकता। दूसरी बात यह है कि मैं सन्नाटा मारकर नहीं सो सकता। निद्रा में एक विचित्र प्रकार का खर्राटा लेता हूँ। कभी कोई सज्जन मेरे समीप सोते हैं; तो उन्हें रात को उठकर भागना पड़ता है। इसलिए अपने हित के लिए नहीं, दूसरों के हित के लिए मैं यह चाहूँगा कि मुझे एक पूरी कोठरी सोने को मिले। अगर साम्यवाद इसमें मीनमेख निकाले तो मैं उसकी ओर आँख उठाकर भी न देखूँगा।

इतना लिख चुका था कि पण्डिताइन आकर खड़ी हो गयीं और पूछने लगीं-आज सबेरे-सबेरे यह क्या लिखने बैठ गये। सेठजी के लड़के की कुण्डली क्यों नहीं बना डालते? व्यर्थ शास्त्रार्थ करके अपना मूँड़ क्यों दुखवाते हो?

मैं स्त्रियों का अपमान नहीं करता। उन्हें घर की देवी समझता हूँ। वे घर की लक्ष्मी हैं; घर-गिरस्ती के सिवा उनसे किसी और बात में सलाह नहीं लेता! घर की लक्ष्मी को घर तक ही रखना चाहता हूँ। राजनीति, समाज, धर्म आदि के विषय से उन्हें क्या मतलब। स्त्रियों को सिर चढ़ाने की इन मुठ्ठी-भर पढ़े-लिखे बाबुओं को जो सनक सवार हुई है, मैं इसे पसन्द नहीं करता। पण्डिताइन भी एक दिन आधी बाँह की जम्पर पहने हुए निकलीं जिससे आधी छाती दिखाई दे रही थी, तो मैंने उसी दम वह जम्पर उतरवाकर छोड़ा। वह बहुत बिगड़ीं, लेकिन मैंने भी रौद्ररूप दिखाया। आखिरकार जब मैं डण्डा लेने दौड़ा; तो उन्होंने धीरे से जम्पर उतार दिया और मुँह फुला बैठीं। मैंने कहा-चाहे मुँह फुलाओ, चाहे गाल फुलाओ, चाहे सारी देह फुलाकर कुप्पा हो जाओ, लेकिन इस भेष में मैं तुम्हें घर से निकलने न दूँगा। खैर, जब उन्होंने आकर मुझे डाँट बतायी; तो मैंने कह दिया, ‘तुम यह बातें नहीं समझ सकती, जाकर अपना काम देखो।’

पण्डिताइन बोलीं-तुमने चार अक्षर पढ़ लिया तो बड़े समझदार हो गये? अभी एक जून चूल्हा न जलाऊँ तो सारी समझदारी निकल जाए

कितना बेतुका जवाब था। मारो घुटना; फूटे आँख! लेकिन मुझे आश्चर्य नहीं हुआ! उनसे मैं ऐसे जवाब सुनने का अभ्यस्त हो गया हूँ। मैंने जरा कड़ाई के साथ कहा-तुम्हारे मतलब की कोई बात नहीं है देवी, नहीं तो मैं तुम्हें सुना देता।

‘कोई कविताई करते होंगे। यही तो तुम्हें रोग है।’

‘कविता करने का रोग मुझे कब था? बे-बात-की बात करती हो। मैं कविताई से इतनी दूर हूँ, जितना पूरब पश्चिम से। यह वेश-भूषा, यह डीलडौल कवियों का है? तुम क्या जानो, कवि किसे कहते हैं? कवि वह है, जिसकी सूरत से कविता बरसती हो। बस, मैं कविताई नहीं कर रहा हूँ, एक सामाजिक प्रश्न पर कुछ शंकाएँ उपस्थित करने का सौभाग्य-सिन्दूर प्राप्त कर रहा हूँ।’

पण्डित के पाण्डित्यपूर्ण कथन से वह कुछ रोब में आ गयीं। लेकिन मैं थोड़ा सा बुद्घू भी हूँ। उसी वक्त मुझे हँसी आ गयी। बस, पण्डिताइन लौट पड़ीं और मेरे हाथ से लेख छीनकर बोलीं-मैं समझ गयी, किसी को प्रेमपत्र लिख रहे हो?

अब नहीं तो अब बनी। मैं गंगाजल लेकर शपथ खा सकता हूँ कि मैंने आज तक न जाना प्रेम किस चिडिय़ा का नाम है। मेरी प्रेमिका तर माल है। दूसरा प्रेम मेरी समझ में ही नहीं आता; लेकिन पण्डिताइन को न जाने क्यों मुझ पर सन्देह होता रहता है। प्रेमियों की दशा देखकर तो मुझे उन पर हँसी आती है। जब देखो, रो रहे हैं। ठण्डी साँसें खींच रहे हैं। न कुछ खाते हैं, न पीते हैं, खासे लकलक बने हुए हैं, फूँक दो तो उड़ जाएँ। इस तरह का प्रेम करके तो मैं तीसरे दिन संसार से विदा हो जाऊँ? लेकिन इस सन्देह का निवारण करना अब लाज़िम हो गया।

मैंने थोड़े से शब्दों में पण्डिताइन को साम्यवाद का तत्व समझाने की चेष्टा की। जब मैं अपना कथन समाप्त कर चुका, तो वह आँखें मटकाकर बोलीं-ऐ नौज तुम्हारा सामवाद! कुछ घास तो नहीं खा गये हो। जिसके बाल वंश न हों, वे सामवाद की बात सोचें। मुझे तो भगवान ने पाँच-पाँच पुत्र दिये हैं, और छठवाँ आने वाला है। मैं सामवाद के फेर में क्यों पड़ूँ? ‘मेरे बराबर हो पड़ोसन, गोदा-रोटी खाय’ अच्छा सामवाद है। मेरे लाल जीते जी रहेंगे, तो माँग खाएँगे।

वह और भी न जाने क्या-क्या अनाप-शनाप बकती रहीं; लेकिन उनकी बातों से मेरे मन में एक शंका उत्पन्न हो गयी। साम्यवाद में कहीं सन्तान-निग्रह का बन्धन तो नहीं है? क्योंकि इस तरह का कोई सम्बन्ध हुआ तो फिर मेरा उससे कोई सम्पर्क न रहेगा। मैं इस विषय में किसी से समझौता न करूँगा। पीछे से थुक्का-फजीहत करना मुझे पसन्द नहीं। आचार्य मुझे स्पष्ट बतला दें कि मुझे गृहस्थाश्रम का त्याग तो न करना पड़ेगा? मैं इसकी स्वाधीनता चाहता हूँ कि जितनी सन्तानें आवें उनका स्वागत करूँ; क्योंकि मैं जानता हूँ, जन्म देने वाले भगवान हैं और पालन करने वाले भी भगवान हैं। मैं तो निमित्त-मात्र हूँ।



क्या नाम है कि मैं पण्डित मोटेराम वल्द पण्डित छोटेराम स्वर्गवासी, साकिन विश्वनाथपुरी जो शंकर भगवान के तिरसूल पर बसी है, आज बम्बई में दनदना रहा हूँ। एक यजमान सेठजी ने तार भेजा, हम बड़े संकट में हैं, तुरन्त आओ। तार के साथ डबल तीसरे दरजे का किराया भी। इसलिए हमने चटपट बम्बई को प्रस्थान कर दिया! अपने यजमान पर संकट पड़े, तो हम कैसे रुक सकते थे। सेठजी एक बार काशी आये थे। वहाँ मैं भी निमन्त्रण में गया था। वहीं मेरी उनकी जान-पहचान हुई। बात करने में मैं पक्का फिकैत हूँ। बस यही समझ लो कि कोई मुझे निमन्त्रण भर दे दे, फिर मैं अपनी बातों से ज्ञान घोलता हूँ वेदों-शास्त्रों की ऐसी व्याख्या करता हूँ कि क्या मजाल जो यजमान उल्लू न हो जाए। योगासन, हस्तरेखा, सन्तानशास्त्र, वशीकरण आदि सभी विद्याएँ, जिन पर सेठ-महाजनों का पक्का विश्वास है, मेरी जिह्वा पर हैं। अगर पूछो कि क्यों पण्डित मोटेराम शास्त्री, आपने इन विद्याओं को पढ़ा भी है? तो मैं डंके की चोट पर कहता हूँ, मैंने कभी नहीं पढ़ा। इन विद्याओं का क्या रोना, हमने कुछ नहीं पढ़ा, पूरे लण्ठ हैं, निरक्षर महान : लेकिन फिर भी किसी बड़े-से-बड़े पुस्तकचाटू, शास्त्रघोंटू, पण्डित का सामना करा दो, चपेट न दूँ तो मोटेराम नहीं। जी हाँ, चपेट दूँ, ऐसा चपेटूँ, ऐसा रगेदूँ कि पण्डितजी को भागने का रास्ता न मिले! पाठक कहेंगे; यह असम्भव है, भला एक मूर्ख आदमी महान पण्डित कैसे रगेदेगा। मैं कहता हूँ प्रियवर, पुस्तक चाटने से कोई विद्वान नहीं हो जाता। जो विद्वान आज इस युग में श्राद्ध, पिण्डदान और वर्णाश्रम में विश्वास रखता हो, जो आज गोबर और गोमूत्र को पवित्र समझता हो, जो देवपूजा को मुक्ति का साधन समझता है, वह विद्वान कैसे हो सकता है? मैं खुद यजमानों में यह सब कृत्य कराता हूँ, नि:सन्देह जानता हूँ, हलवा और कलाकन्द किसी आत्मा के पेट में नहीं, मेरे पेट में जाता है, फिर भी यजमानों को मूड़ता हूँ, तो इसलिए कि मेरी यह जीविका है। जीविका नहीं छोड़ी जाती, और इसलिए यजमान खुद बेवकूफ बनना चाहता है, पाँच पैसे का गऊदान करके भवसागर पार उतरना चाहता है, तो मुझे क्या कुत्ते ने काटा है जो कहूँ कि यह सब मिथ्या है। सरासर आती हुई लक्ष्मी को कौन दुत्कारता है? लेकिन पण्डितों के बीच में दूसरी बात हो जाती है। वहाँ मुझे अपनी जीविका का डर नहीं रहता और मैं भिगो-भिगोकर लगाता हूँ, कभी दाहिने, कभी बायें, चौंधिया देता हूँ, साँस नहीं लेने देता। बस पण्डितों के पास इसके सिवा और जवाब नहीं रहता कि तुम नास्तिक हो।

मगर मैं अपने विषय से बहककर कहाँ जा पहुँचा। जब मैं बम्बई चलने को तैयार हुआ, तो पण्डिताइन रोने लगीं। कहने लगीं, बताओ कै दिन में आओगे। दो-तीन दिन में जरूर से लौट आना। मैं जो उस वक्त बता दूँ कि दो दिन पहुँचने में लग जाएँगे, तो फिर वह मेरा पिण्ड न छोड़तीं। इसलिए बड़े प्रेम भरे शब्दों में कहा-प्रिये, मेरा जी तुम्हीं में लगा रहेगा। खाऊँगा तो तुम्हारे करकमलों की गुदगुदी रोटियाँ और पतली दाल याद आएगी। पानी पिऊँगा तो तुम्हारे पपडिय़ाये हुए अधरों का ध्यान बना रहेगा। सोते-जागते, उठते-बैठते, बस तुम्हारे ही पास मन मँडराता रहेगा। इससे उन्हें कुछ ढाढ़स हुआ। लेकिन क्या नाम कि स्त्री का हृदय कुछ अटपटा होता है। एकाएक बोल उठीं-मुझे तुम्हारे ऊपर विश्वास नहीं आता। कौन जाने तुम वहाँ कैसे जाओ। कहीं तुम कुछ गड़बड़ न कर बैठो। मैंने तुरन्त समझाया-प्राणप्रिये, मुझे तुम्हारे प्रेम में पगे लगभग ४५ साल हुए। क्या तुम समझती हो कि इतने दिनों में जो रंग जमा है, वह दो-चार दिन में फीका पड़ जाएगा? कहाँ तुम्हारा खयाल है! बोली-क्या जाने भाई, तुम मरदों का हाल कौन जाने? यहाँ तो ऐसी मीठी-मीठी बातें करते हो, वहाँ जाकर क्या जाने क्या कर बैठो। मैं वहाँ थोड़ी बैठी रहूँगी कि तुम्हारी देखभाल करती रहूँ। मैं तो एक सरियत पर जाने दूँगी, कि तुम गंगाजल हाथ से लेकर कहो कि वहाँ कुछ गड़बड़-सड़बड़ न करूँगा। मैं मन में हँसा और गंगाजल लेकर कसम खायी। तब जाके पण्डिताइन का चित्त शान्त हुआ।

चलने को तो चला; लेकिन हृदय मेरा भी काँपता था। प्रयाग तक तो मेरा मन ठिकाने रहा; लेकिन जब फिर भी बम्बई का कहीं पता न चला, तो मुझे रोना आ गया। भगवान! यह तो कालापानी है। दिन भर चला, बम्बई नदारद। रात-भर चला, बम्बई नदारद। समझ गया कि काशी में मरना न बदा था। मजे से गंगास्नान करता था, विश्वनाथ के दर्शनों का पुन्न लूटता था और धेली बारह आने कहीं-न-कहीं से पीट ही लाता था और यहाँ गाड़ी में बैठे न जाने किस लोक को चले जा रहे हैं। इतनी दूर तो चन्द्रमा भी न होंगे। मुझे भ्रम हो गया कि यात्री और रेल कर्मचारी सब मुझे धोखा दे रहे हैं। बम्बई जरूर पीछे छूट गयी। बारे कोई दस बजे बम्बई का नाम सुना। जान आयी। देखा तो यजमान सेठजी मेरा स्वागत करने के लिए खड़े थे। उन्होंने पालागन किया; मगर असीस कौन देता है, यहाँ तो चोला भसम हो रहा था। मैंने ब्रह्म तेज से गरजकर कहा-तुमने मुझे लिखा क्यों नहीं कि बम्बई लंका के पास है? अभी तक जल नहीं ग्रहण किया। प्राण छटपटा के निकलने जा रहा था; बारे मैंने योगबल से रोक लिया। मैं झूठ बोल रहा था। मैं रास्ते भर फलाहारी खाता रहा और रेल से उतरकर पानी पीता चला आ रहा था; लेकिन ऐसे यजमानों के सामने अपने नेम का डंका बजा देना फलदायक होता है। सेठजी ने दौडक़र मेरी अधारी कन्धे पर रखी और लगे घिघियाने-महाराज, क्षमा किया जाय, मैं क्या जानता था कि महाराज को बम्बई .......

मैंने फिर डाँटा-महाराज को बम्बई से क्या सम्बन्ध? अपने लोग तीर्थ स्थानों में रहते हैं कि राक्षसों के देश में? यहाँ वह रहे, जो धन का लोभी हो। हम ब्राह्मणों को अपना धर्म प्यारा है।

इस डाँट से सेठजी की नानी मर गयी। बाहर आये तो मोटर खड़ी थी। बैठकर यजमान के घर चले। वाह रे बम्बई! वहाँ तो आदमी पागल हो जाए। सडक़ें न जाने क्यों इतनी चौड़ी बनायी हैं। हमारी चौखम्भेवाली कितनी गुलजार गली है कि वाह! यहाँ की सडक़ें हैं कि बालेमियाँ का मैदान है। मगर बम्बई का हाल फिर लिखेंगे। इस वक्त तो सेठजी के संकट की कथा कहनी है, जिसके लिए हम इतनी दूर से बुलाये गये हैं। संकट यह कि सेठजी ने सट्टा खेला है और चाहते हैं; मैं कोई ऐसा अनुष्ठान करूँ कि सेठजी के पौ-बारह हो जाएँ। मामला गहरा है, कोई डेढ़ लाख का। मैंने यह वृत्तान्त सुनकर ऐसा गम्भीर मुँह बनाया, मानों सब कुछ मेरे हाथ में है। फिर बोला-सेठजी, आप जो हैं सो मेरे यजमान हैं और मुझे जो कुछ विद्या आती है, उसमें कुछ उठा न रखूँगा। और यह आप जानते हैं कि मुझे किसी बात से ममता नहीं रही। ब्राह्मण को धन से क्या प्रयोजन? धन चाहता तो अब तक लाखों बटोर लेता। कितने यजमान मेरे अनुष्ठानों से करोड़पति हो गये, लखपतियों की तो गिनती ही नहीं। मैं वही ब्राह्मण का ब्राह्मण बना हूँ। तो बात क्या है? हम ममता को पास नहीं आने देते। साढ़े सात सौ कोस से ही ललकारते हैं, खबरदार जो इधर मुँह किया! हाँ, बात इतनी है कि अनुष्ठानों में पैसे खरच होते हैं। अगर यही अनुष्ठान विधिपूर्वक करूँ तो डेढ़-दो सौ से कम न खर्च होंगे। यह समझ लीजिए।

लेकिन मैं इस ६५ साल की अवस्था में भी पोंगा ही रहा। मैंने डेढ़-दो सौ अपनी समझ में बहुत कहे थे। इससे ऊँचे जाने की मुझे हिम्मत ही न पड़ी। कभी इतना बड़ा शिकार तो फँसा नहीं था उसके दाँव-घात क्या समझता? सेठजी का मुँह लटक गया। उन्होंने दस-बारह हजार का अनुमान किया था। डेढ़-दो सौ सुनकर मेरी सारी प्रतिष्ठा उनके हृदय से निकल भागी। क्या स्वर्ण संयोग दिया था भगवान् विश्वनाथ ने, लेकिन तकदीर खोटी है तो उनका क्या बस? दस हजार कह देता तो जन्म भर के लिए अयाच्य हो जाता। बोलते-बोलते बोला क्या? डेढ़-दो सौ! धत् तेरे पोंगापन का सत्यानाश हो! अब तो यही जी चाहता है कि जाकर समुद्र में कूद पड़ूँ। उसी दिन एक दूसरे घोंघानाथ शास्त्री के नाम तार गया। अब यह पठ्ठा आकर इन सेठजी को मूँड़ेगा। २० हज़ार से कम न लेगा; लेकिन अब पछताने से क्या होता है। फिर भी मैंने सोचा, बला से मैं नहीं पा रहा हूँ। कोई दूसरा क्यों ले जावे? मेरा क्या? यह धर्म नहीं है कि अपने यजमान की इन लुटेरों से रक्षा करूँ? बोला मैंने केवल सामग्री का मूल्य दिया। दक्षिणा मैं लेता नहीं। एक हजार रुपये विप्रों की दक्षिणा भी समझ लीजिए।

सेठ बोले-उससे कोई मतलब नहीं, वह तो यहाँ से अलग दिया जाएगा। आपकी सामग्री तो कुल २००) की होगी?

मैंने कहा-बस, इससे अधिक नहीं। हाँ, ऐसे लोगों को भी जानता हूँ, जो इसी अनुष्ठान के लिए १० हज़ार, १५ हज़ार तक ले लेंगे। लगेगा तो ढाई-तीन सौ, शेष अपने पेट में ठूँस लेंगे। इसलिए ऐसे धूर्तों से सचेत रहिएगा।

लेकिन सेठ के कण्ठ तले से यह बात न धँसी। बोला-यह आप क्या कहते हो शास्त्रीजी? गुड़ जितना ही डालो उतना ही मीठा पकवान होगा। आपका अनुष्ठान २००) का है। आप कीजिए। लेकिन बिना बड़े अनुष्ठान के मेरा काम न चलेगा।

अब भी मुझे अपना उल्लू फाँसने का मौका था। कह सकता था, सेठजी, आपका काम तो छोटे अनुष्ठान से ही निकल सकता है, लेकिन आपकी इच्छा है तो मैं महा-महा-महा मृत्युञ्जय-पाठ और ब्रह्म-प्रवीक्षक क्रिया भी कर सकता हूँ। हाँ, उसमें कोई साढ़े तेरह हज़ार का खर्च है; मगर यह तो अब सूझ रही है। उस वक्त अक्ल पर पत्थर पड़ गया था। मेरी भी विचित्र खोपड़ी है। जब सूझती है, अवसर निकल जाने पर। हाँ, मैंने यह निश्चय कर लिया कि पण्डित घोंघानाथ को बिना दस-पाँच घिस्से दिये न छोड़ूँगा। या तो बेटा से आधा रखा लूँगा, या फिर यहीं बम्बई के मैदान में हमारी उनकी ठनेगी। वह विद्वान् होंगे। यहाँ सारी जवानी अखाड़े में कटी है। भुरकुस निकाल दूँगा।

अपनी इस पिछिल-सूझता पर पछता रहा था कि डाकिया एक तिकोना सा बैरंग लिफाफा लाकर मुझे दे गया। समझ गया, पण्डिताइन की कृपा है। आज यह पत्र हाथ में लेकर मुझे सचमुच उनकी याद आ गयी। बेचारी ने मेरे साथ ४५ साल काट दिये, और मैं बराबर उसे बातों में टालता रहा। आँखें सजल हो गयीं। पत्र खोला। लिखा था। स्वस्ति श्री सर्व उपमा योग ... सो तुम जाय के बम्बई में बैठि रह्यौ, कान में तेल डारिकै। हमका रोज सपना दिखात है। डरन के मारे नींद नहीं आवति है। कतों तुम कुछ गड़बडि़ न करि बैठो, यही चिन्ता में हमार परान सूखा जात है। तुम कहिहौ हम ६५ साल के होए गयेन, अबका जन्म भर गड़बड़े करत रहिबे। मुला सुनित है, बैदन सब अइस-अइस बिरवा निकारेन हैं कि ओहिका खायके मनई बौराय जात है। एक बैद झाँसी माँ है, एक और कतों है। तुमार हाथ जोरित है, तुम कौनो औखद न खायो। तुम गंगाजल उठाय के जौन परन किह्यौ ओहिका निबाह करै का परी। हम तुमका साँड़ न बनै देब।

लीजिए साहब, अब मैं साँड़ हो गया। कमर सीधी होती नहीं, डेढ़ सेर मलाई भी नहीं पचाये पचती, और वहाँ पण्डिताइन मुझे साँड़ बना रही हैं। सो यहाँ भी अपनी ही भूल है। मैं पण्डिताइन के सामने अपनी जवाँमरदी और पुरुषार्थ की डींग मारा करता हूँ। वह गऊ क्या जाने, यह लबाडिय़ा है। मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे ब्रह्मवाक्य समझ बैठती हैं और उसका यह फल है। इस यात्रा से संभवत: मेरी दृष्टि कुछ सूक्ष्म हो रही है।



क्या नाम कि जब मैंने देखा कि अब तो मुझसे भूल हो ही गयी और बहुत खींचतान करने पर भी दो से बेशी न मिलेंगे, तो मैंने सोचा, लाओ और कुछ न सही तो इसके सौ पचास रुपये भोजनों में ही बिगाड़ दो। यह भी क्या समझेगा कि किसी से पाला पड़ा था। बस, मैंने शंकर भगवान् का सुमिरन किया और विनती की-हे उमापति, अब तुम्हीं मेरी रक्षा करो, मैं तो अब प्राणों से हाथ धोकर भोजन पर जुटता हूँ। नाश्ता आया तो मैंने कह दिया-मुझे आपके महाराज के हाथ की बनी चीजों में कोई स्वाद नहीं आता, मुझे तो आप सामग्री दे दीजिए, मैं अपना भोजन आप पका लूँगा। भण्डारी ने कहा-जैसी आपकी इच्छा, जो आज्ञा हो वह हाजिर करूँ। मैंने नाश्ते का नुसखा बताया-सवा सेर ताजा मक्खन, आध सेर बादाम, आध सेर पिश्ते, आध तोले केसर, सेर भर सूजी और सेर भर शक्कर। भण्डारी मेरा मुँह ताकने लगा। मैंने कहा-मुँह क्या ताकते हो, क्या बाँधकर ले जाने को माँगता हूूँ। जाकर चटपट लाओ। बस मैंने घोटी भंग और चढ़ाया गोला और विश्वनाथ का नाम लेकर हलवा बनाने बैठ गया। शंकर की दया से ऐसा स्वादिष्ट पदार्थ बना कि क्या कहूँ। पलथी मारके जो बैठा, तो आध घण्टे में साफ। मक्खी के लिए भी न बचा। भण्डारी के होश उड़ गये। दोपहर को फिर मैंने पूरियाँ पकायीं। आधोआध मोयन देकर। रात को कुछ खाने की इच्छा न होने पर भी मैंने सवा सेर मलाई चढ़ा ली।

लेकिन अब वह जवानी तो है नहीं कि ईंट-पत्थर जो पेट में पहुँच जाए, वह सब भस्म। तीसरे ही दिन मुझे उदर-विकार के लक्षण दिखे। मैंने सोचा-यहाँ किसी से कहता हूँ, तो सब यही कहेंगे कि ब्राह्मण की जात, खाने के पीछे प्राण दे रहा है। इसलिए मुहल्ले ही में एक डाक्टर के पास कोई पाचक-बटी लेने चला गया। बड़ा भारी मकान, मोटर, फोन। मैंने अपना परिचय दिया तो डाक्टर ने मुझे गौर से देखा और बोले-काशी से आता है?

मैंने कहा-हाँ साहब, विश्वनाथजी आपको प्रसन्न रखें, यहाँ कुछ भोजन प्रकृति के अनुकूल न मिलने के कारण पाचन दूषित हो गया है। कोई औषधि प्रदान कीजिए।

डाक्टर मुझे एक अलग कमरे में ले गया और एक मेज पर लेटाकर मेरा पेट टटोलने लगा। फिर सीने की परीक्षा की; पीठ ठोंकी आँखें देखीं, जीभ निकलवाकर परीक्षा ली। इस तरह कोई आध घण्टे तक मेरी दलेल करने के बाद बोला-वेल पण्डितजी, आपको कुछ टी०बी० के आसार मालूम देता है। आपको उसका दवाई करने होगा। हम टी०बी० का इसपिसलिस्ट है। आपको अच्छा कर सकता है; पर आपको अभी एक दूसरा डाक्टर के पास अपने खून का मुलाहजा कराना होगा। बिना खून देखे हम कुछ नहीं कर सकता। हम आपको चिठ्ठी देता है। आप डाक्टर सूबेदार के पास जाएँ। वह चौपाटी में रहता है। हम चिठ्ठी देता है। आपके ब्लड का मुलाहजा करके हमको लिखेगा।

मेरे होश फ़ाखता हो गये। पण्डिताइन की याद आयी। भगवान्, क्या बम्बई में मेरी मिट्टी की दुर्दशा करोगे। आया था कि कुछ कमाकर जाऊँगा; सो यहाँ जान पर बीता चाहती है। अभी काशी से चला हूँ तो कोई बात न थी। खासा साठा-पाठा बना हुआ था कि बम्बई का पानी है, और कुछ नहीं। दुबे विजयानन्द ने कहा था, बम्बई का पानी खराब है, जरा सँभलकर रहना। लेकिन यह क्या जानता था कि दस-पाँच दिन में ही सिल धरे लेता है; लेकिन अब पछताये क्या होता है। चलो, लहू भी दिखा लो, और फिर डर किस बात का है। मर ही तो जाएँगे। यहाँ अमर कौन है। जरा कच्ची गिरस्ती है; यही चिन्ता है। अगर जानता कि अन्त इतना निकट है तो पिछले दो लड़के क्यों होते और तीसरा गर्भ में क्यों रहता। लेकिन हरि की इच्छा। तुलसीदासजी ने कहा भी तो है-

सुत बनितादि जानि स्वारथरत न करु नेह सबही ते,

अन्तहुँ तोहि तजेंगे पामर, तू न तजे अबही ते।

मैं यहाँ से चला तो दिल बहुत छोटा हो गया था; लेकिन डाक्टर साहब ने तुरन्त टोका-हमारा फीस ३२ रुपया हुआ। सेठजी के पास बिल भेज देगा न?

अगर अभी तक यमराज न आये थे, तो अब आ गये, ३२ रुपया फीस! जो उमर में कभी नहीं दी! बैद, डाक्टर को अमीर लोग पैसा देते हैं? हम शंकर के उपासक तो केवल आशीर्वाद से काम निकालते हैं। काशी में जब कभी काम पड़ता था, डाक्टर चौधरी, डाक्टर बनर्जी, डॉ० सेठ आदि जिसके पास चला गया दवाई ले आया, ऊपर से रुपये-आठ आने बिदाई झटक आया। और यहाँ जरा-सी परीक्षा की तो ३२ रुपया फीस। आँखों तले अँधेरा छा गया; लेकिन फिर सोचा अब तो मर ही रहे हो, रुपये-पैसे के माया मोह में क्या पड़े हो। ३२ रुपया खर्च हुए तो हुए, मालूम तो हो गया कि तपेदिक हो गया है। नहीं यों ही एक दिन चल देते, किसी को पता न चलता। दवा दारू करने की नौबत ही न आती। भला, दवा करने का अवसर मिल गया। और आदमी कमाता ही किसलिए है। लेकिन यह पूछ लेना आवश्यक मालूम हुआ कि डॉ० सूबेदार को तो कुछ न देना पड़ेगा। अतएव मैंने इस विषय का प्रश्न किया।

डॉ० साहब जोर से हँसे। बोले-तुम काशी का विद्वान लोग बड़ा मजाक करता है। काशी के एक पण्डित को दक्षना देने से सब पण्डित तो नहीं परसन हो जाएगा। बोले?

हमने कलेजा थामकर पूछा-तो उनकी क्या फीस होगी?

‘उसका फीस केवल १० रुपया है।’

मैंने मन से कहा-चलो मन यह १० रुपया भी गम खाओ। बम्बई में जो कमाना है, वह सब देकर भी प्राण बचे तो समझना चाहिए, नया जीवन पाया। नहीं यहीं बैठे-बैठे टें हो जाएँगे, कोई रोने वाला भी न मिलेगा। उस वक्त ऐसा वैराग्य सवार हुआ कि सब छोड़-छाडक़र निकल भागूँ, कबीर का वह पद याद आया जिसे पढक़र मैं कभी-कभी हँसा करता था। धूर्तताई में जीवन कट गया। अब इस काया की क्या दुरदसा होगी भगवान-

दिवाने मन भजन दुख पैहो।

पहिला जनम भूत का पैहो, सात जनम पछतैहो;

कीरा पर के पानी पैहो, प्यासन ही मरि जैहो।

दूजा जनम सुवा का पैहो, बाग बसेरा लैहो;

टूटे पंख बाज मँडराने अधफड़ प्रान गँवैहो।

बाजीगर के बानर होइहौ, लकडिऩ नाच नचैहो;

ऊँच-नीच के हाथ पसरिहौ, माँगे भीख न पैहो।

तेलिन के घर बैला होइहौ, आँखिन ढाँप ढैपैहो;

कोस पचास घरै माँ चलिहो, बाहर होन न पैहो।

पाँचवाँ जनम ऊँट का पैहो, बिन तोले बो लदैहो;

बैठे तो उठन न पैहो, घुरच-घुरच मरि जैहो।

धोबी घाट के गदहा होइहौ, कटी घास न पैहो,

लादी लादि आपु चढ़ बैठे लैके घाट पहुँचैहो।

आखिर यही कहना पड़ा कि हाँ सेठजी के पास बिल भेज देना। फिर वहाँ का पता पूछता हुआ डाक्टर सूबेदार के पास पहुँचा। कोई दस बज गये थे, पेट में मीठा-मीठा दर्द होने लगा था; लेकिन सोचा इस झमेले से निबट लो, फिर विश्वनाथजी की जैसी इच्छा होगी, वह तो होगा ही।

डॉ० सूबेदार युवक-से लगते, कोट-पैण्ट से लैस। मैंने पत्र जो दिया, आपने ले जाकर भीतर के कमरे में लेटा दिया और ऐसे जोर से मेरी बाँह में सुई चुभो दिया कि मैं ऐंठकर रह गया। बाँह में से रक्त निकल पड़ा। उसने एक शीशे से नलकी में ले लिया और मेरी बाँह में कुछ पोतकर एक तीसरी कोठरी में जाकर न जाने क्या करता रहा। फिर आकर बोला-वेल पण्डितजी, आपके ब्लड में टी०बी० का जर्म दिखाई देता है। आपको किसी पहाड़ पर जाना होगा और वहाँ आराम से रहना होगा। आपको पढऩा-लिखना बन्द करना होगा, लेकिन अभी हम कुछ ठीक-ठीक नहीं कह सकता, आप डॉ० घोड़ेपुरकर के पास जाए, वह आपका यूरीन देखेगा। उसका रिपोर्ट लेकर तब हम अपना रिपोर्ट देगा। तब आप डाक्टर लम्पट के पास जाएगा। फिर वह कुछ कहेगा, वह आपको करना होगा।

मेरे बदन में आग लग गयी। जी में तो आया, मारूँ गोली इन डॉक्टरों को और चलकर दो पैसे की हरड़ मँगवाकर उसकी फंकी फाँक लूँ। मरना ही बदा है, तो सारी दुनिया के डाक्टर भी तो नहीं जिला सकते; लेकिन जान का लोभ बड़ा बलवान होता है। उनकी चिठ्ठी लेकर पता पूछता हुआ चला डाक्टर घोड़ेपुरकर के पास। इसने मुझसे एक चोंगे में लघुशंका करवायी और बड़ी देर तक न जाने क्या करता रहा। फिर मुझे रिपोर्ट लिखकर दी और कहा-डॉ० सूबेदार के पास जाइए। सूबेदार के पास फिर पहुँचा, तो तीन बज गये थे। आपने अपनी रिपोर्ट दी, तो आया डॉ० लम्पट के पास। डाक्टर लम्पट ने दोनों रिपोर्टों को बड़े ध्यान से देखा और बोले-मेरा अनुमान ठीक था पण्डितजी, आपको टी०बी० हो गया है।

मैंने सजल-नेत्र होकर पूछा-तो मैं मर जाऊँगा?

‘नहीं-नहीं, हम आपको मरने नहीं देगा। आपको पहाड़ पर रहना होगा। अच्छा भोजन करने से आप बच सकता है। आपको अण्डों का सेवन करना होगा।’

मैंने कानों पर हाथ रखकर कहा-क्या कहा, अण्डों का? मैं अण्डे हाथ से नहीं छू सकता, खाने की कौन कहे!

‘ओह! यह सब आरथोडाक्सी यहाँ नहीं चलेगा। तुमको अण्डे खाना होगा।’

‘अण्डे मैं किसी तरह नहीं खा सकता।’

‘तुम मर जाएगा।’

‘कोई चिन्ता नहीं।

‘हम दवाई देता है, इसे तो पी सकता है।’

‘ना! अब न कोई दवा खाऊँगा; न किसी डाक्टर के पास जाऊँगा।’

यह कहकर मैं सेठजी की कोठी पर लौट आया। दिन-भर जो कुछ भोजन न किया था, तो भूख चमचमा उठी थी। बूटी छानी, शौच गया और फिर खूब डटकर भोजन किया।

सहसा सेठजी घबड़ाये हुए आये और बोले-पण्डितजी, क्या आपका मुलाहजा किया था लम्पट साहब ने! आपको तो टी०बी० बताते हैं।

मैंने कहा-वह आपके घर आने का पुरसकार है, और क्या?

‘आप आज ही काशी चले जाइए।’

‘मैं बिना अनुष्ठान पूरा किये नहीं जा सकता।’

‘नहीं, नहीं, कोई दरकार नहीं, आप इसी नौ बजे की गाड़ी से चले जाएँ।’

मैंने उसकी घबराहट देखी तो समझ गया, वह ब्रह्महत्या से डर रहा है। बस, फिर क्या था। मेरी लह गयी।

मैंने कहा-बिना अनुष्ठान पूरा किये लौट जाने में प्राणों का भय है। इसका उपचार करने में कम-से-कम एक हज़ार का खरच है। मैं वह कहाँ से लाऊँगा। फिर मरने से क्या डरना! यहीं मर जाऊँगा तो क्या चिन्ता।

सेठजी काँपते हुए बोले-नहीं पण्डितजी, आपका जो कुछ खर्च पड़े, वह लीजिए और आज ही चल दीजिए।

बस मुनीमजी बुलाए गये और फिर सौ-सौ के दस नोट मेरे चरणों पर रख दिये। मैंने विश्वनाथजी को धन्यवाद दिया, नोट गाँठ में किये और टी०बी० को ऐसा भूला कि वह भी मुझे भूल गया।



क्या नाम कि मैं जहाँ जाता हूँ, वहीं कुछ-न-कुछ लोग मेरे पीछे पड़ जाते हैं, और आ-आकर मुझे दिक करते हैं। बम्बई में भी भले आदमियों से गला न छूटा। यह तो होता नहीं कि आकर एक मोहर मेरे चरणों पर रखें और तब अपनी कथा सुनायें। बस आकर लगते हैं अपनी कथा सुनाने और चाहते हैं कि मैं सेंत-मेंत में उन्हें अनुष्ठान बता दूँ। तो यहाँ ऐसे उल्लू नहीं हैं। सुनने को सुन लेते हैं, लेकिन अनुष्ठान बताने के लिए पचासों बार दौड़ते हैं, ऐसा पदाते हैं कि वह भाग खड़ा होता है। जब कोई डाक्टर सेंत-मेंत में किसी रोगी को नहीं देखता, कोई वकील सेंत में कोई मिसिल नहीं छूता तो मैं क्यों सेंत में अपनी विद्या लुटाता फिरूँ? वह विद्या क्या है, यह मैं जानता हूँ, उसी तरह जैसे वकील और डाक्टर अपनी विद्या को जानते हैं; लेकिन भाई, एक-दूसरे का पर्दा क्यों खोलो। संसार उसका है, जो उसे बेवकूफ बनाये, जिसे यह कला नहीं आती, वह कौड़ी का तीन है।

कल भंग-बूटी से निपटकर मलाई पर हाथ साफ कर रहा था कि एक सज्जन आकर बैठ गये। कोट, पैण्ट, कालर, बूट, हैट, खासे साहब बहादुर थे। चेहरा लटका हुआ, मानो पत्नी मर गयी हो, बोले-आपका नाम पण्डित मोटेराम शास्त्री है?

मैंने कहा-हाँ, मेरा ही नाम है। कहिए, आपकी क्या सेवा करूँ!

साहब बहादुर ने जेब से रूमाल निकाला और सिर का पसीना पोंछते हुए कहा-मैं बड़े संकट में पड़ गया हूँ महाशय! कुछ अक्ल काम नहीं करती। अब आप ही बेड़ा पार लगाइए तो लगे।

मेरे हृदय में गुदगुदी हुई। यह तो कोई शिकार मालूम होता है।

बोला-भगवान की दया से सारी बाधाएँ दूर हो जाएँगी, कुछ चिन्ता मत कीजिए।

‘क्या कहूँ महोदय, कहते संकोच हो रहा है।’

‘संकोच की कोई बात नहीं, सन्तान तो मेरी मुठ्ठी में है। कहिए तो बालकों से आपका घर भर दूँ। बस एक अनुष्ठान .....’

‘जी नहीं, बालकों से तो मुझे प्रेम नहीं। मैं सन्तान विरोधी हूँ।’

‘अच्छा तो क्या धन की इच्छा है?’

‘धन की इच्छा किसे न होगी; लेकिन इस वक्त मैं इस हेतु से आपकी सेवा में नहीं आया था।’

‘तो कहो न? पौष्टिक अनुष्ठानों की भी मेरे पास कमी नहीं। चूर्ण, अवलेह, गोली, भस्म, आसव, क्वाथ, किसी चीज के सेवन करने की आवश्यकता नहीं, बस पाँच बार उस मन्त्र की जप करके सो जाइए, फिर उसकी करामात देखिए।’

‘मैं इस समय एक दूसरे ही काम से सेवा में आया था।’

मुझे कुछ निराशा होने लगी। हत्थे पर चढऩे वाला नहीं जान पड़ता। फिर भी मैंने दिलासा दिया-जो इच्छा हो वह निस्संकोच कहो।

उसने पूछा-आप उसमें अपना अपमान तो न समझेंगे?

अब मेरे कान खड़े हुए, उत्सुकता और बढ़ी।

‘अपमान की बात होगी, तो अवश्य अपमान समझूँगा।’

‘बात यह है कि कल सन्ध्या समय मेरे माता-पिता देश से आ गये हैं।’

‘बहुत अच्छी बात है तुम्हें उनका आदर-सत्कार करना चाहिए।’

‘लेकिन करूँ कैसे यह समझ में नहीं आता। कल से उन्होंने भोजन नहीं किया!’

‘भोजन नहीं किया! यह तो बड़ा अनर्थ है। कुछ उदर विकार हो गया है। मैं आयुर्वेद भी जानता हूँ।’

‘नहीं-नहीं शास्त्रीजी, वह तो आपसे भी भारी डीलडौल के हैं।’

‘भारी डीलडौल के लोग क्या बीमार नहीं पड़ते?’

‘पड़ते होंगे; पर फादर कभी बीमार नहीं पड़ते और मदर के सिर में तो कभी दर्द भी नहीं हुआ।’

‘तो वह और आप दोनों भाग्यवान् हैं।’

‘समस्या यह है कि वे दोनों ही बड़े नेम से रहते हैं।’

‘बड़े हर्ष की बात है। आप वास्तव में भाग्यशाली हैं।’

‘लेकिन वह मेरे खानसामा के हाथ का भोजन तो नहीं कर सकते!’

‘तो एक-दो दिन तुम्हारी स्त्री ही भोजन पका लेगी तो क्या छोटी हो जाएगी? सास-ससुर की सेवा करना ही स्त्री का परम धर्म है।’

‘मैं इसे नहीं स्वीकार करता, महोदय। बुरा न मानिएगा। आप सौ बरस की पुरानी बात कह रहे हैं। सास-ससुर को ऐसी जरा-जरा की बातों के लिए पुत्र और पुत्रवधू को संकट में न डालना चाहिए। समय बहुत आगे बढ़ गया है। अब ऐसे माता-पिता के लिए स्थान नहीं रहा।’

‘यह आप बहुत ठीक कह रहे हैं; लेकिन जब माता-पिता दो-ही चार दिन के लिए आये हैं, तो स्त्री को थोड़ा-सा कष्ट भी तो सह लेना चाहिए।’ इस पर सज्जन ने कुछ भौंवे सिकोडक़र कहा-लेकिन भोजन पकाने का उन्हें अभ्यास नहीं है, श्रीमान! जब कभी खानसामा बैठ रहता है, तो हम लोग होटल में खा लेते हैं। एक बार घर में रुपये न थे, और होटल में नगद दाम देना पड़ता है; इसलिए स्त्री ने सोचा, कुछ पका लें, तो साहब, आटा ऐसा हो गया जैसे गाढ़ा दूध और चावल जलकर कोयला हो गया। उस पर तीन दिन श्रीमतीजी के सिर में दर्द होता रहा। हारकर हमें फाँका करना पड़ा। तो साहब, फिर वह विपत्ति नहीं मोल लेना चाहता। न जाने क्यों होटल में खाना खाते इन लोगों की नानी मरती है। मैं इसे उनकी कोरी जिद समझता हूँ। माँ-बाप हैं, क्या कहूँ। क्या आप इतनी कृपा न करेंगे कि एक-दो दिन जब तक वह लोग यहाँ रहें, उनका भोजन पका दें। आपको कष्ट तो होगा, लेकिन आप ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण को परोपकार के लिए अपने कष्ट की परवाह नहीं होती।

मेरा खून खौल उठा। जी में आया, उठा के पटक दूँ, लेकिन मैंने सब्र किया। क्या कदर की है आपने ब्राह्मण की! और मज़ा यह है कि इस मूर्ख को मुझसे ऐसी बात कहते संकोच भी न हुआ। मुझे चुप देखकर उसने कहा-क्या बुरा मान गये?

मैंने कहा-नहीं, बुरा क्या मानूँगा, लेकिन आपने इस काम के लिए किसी पानी-पाँड़े को पकड़ा होता, मुझे आप शायद नहीं जानते?

उसने कहा-मैं आपको खूब जानता हूँ, आप काशी के शास्त्री हैं। जब मैं होस्टल में था, तो एक काशी के शास्त्री मेरे सहपाठी थे। वह बराबर अपना भोजन आप पकाया करते थे, और जब कभी हमारे मेस का रसोइयादार बीमार पड़ जाता या भाग जाता तो वह मेरा भोजन पका देते थे और आग्रह करके खिलाते थे। इसीलिए मैंने आपसे यह प्रार्थना की।

मेरे पास इसका क्या जवाब था। पुरखों ने जो कुछ किया है, उसका तावान तो देना ही पड़ेगा।

मैंने कहा-आपकी इच्छा है तो मैं चलकर भोजन बना दूँगा। लेकिन एक शर्त है, अगर आप उसे स्वीकार करें।

‘कहिए, कहिए, आप जो कुछ कहेंगे वह मुझे स्वीकार है। आपने आज मेरी लाज रख ली।’

‘मैं रसोई में बैठकर बताता जाऊँगा, काम श्रीमतीजी को करना पड़ेगा।’

‘लेकिन उनके सिर में दर्द हुआ तब?’

‘उसकी मेरे पास दवा है। सिर में चक्कर आ जाए, आँखों के सामने अँधेरा छा जाए, मैं बात-की-बात में अच्छा कर सकता हूँ।’

‘और जो उन्हें गर्मी लगे?’

‘आप खड़े पंखा झलते रहिएगा।’

‘और उन्होंने क्रोध में आकर आपको कुछ कह दिया?’

‘तो मुझे भी क्रोध आ जाएगा और क्रोध में मैं लाट साहब को भी कुछ नहीं समझता। हाँ, इतना कह सकता हूँ कि इसके बाद उन्हें फिर क्रोध न आएगा।’

‘और जो उन्होंने बहस शुरू कर दी? उनकी दलीलों का आप जवाब दे सकते हैं?’

‘वाह! और मैंने उम्र भर किया क्या है? पहले तो दलील का जवाब दलील से देता हूँ। जब इससे काम नहीं चलता तो हाथ-पाँव से भी काम लेता हूँ। कितने ही शास्त्रार्थों में सम्मिलित हुआ हूँ और कभी परास्त होकर नहीं आया। बड़े-बड़े महामहोपाध्यायों को गुड़-हल्दी पिलाकर छोड़ दिया।

सज्जन ने एक क्षण तक विचार किया और फिर आने का वादा करके चले गये। तब से अब तक सूरत नहीं दिखाई।


       

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user image Arvind Swaroop Kushwaha - 28 Apr 2020 at 7:20 PM -

bcg का टीका

"यह बचाएगा कोविड-19 से भारत को ... और दुनिया को भी ! यह !" मदन भाई अपनी टीशर्ट का आधा बाज़ू ऊपर मोड़ते हुए उल्लास-भरे स्वर में कहते हैं। उनकी उँगली का इशारा बायीं भुजा की सतह पर बने उस निशान की ओर है , ... जिसे संसार बीसीजी के नाम से जानता है।

"बैसिलस कैलमेट गीरैन। आपको इससे इतनी उम्मीद क्यों हैं ?" मैं उनके समाचारीय सुख को टटोलता हूँ।

"अख़बारों में , टीवी-चैनलों में हर जगह छाया हुआ है यह बीसीजी का टीका। जहाँ इसे जनता लगवाती रही है , वहाँ कोविड-मामले भी कम हैं और मृत्यु-दर भी। तुम्हें नहीं लगता ? कुछ दम तो है इसमें !"

"अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी पुख़्ता तौर पर। किन्तु चलिए इसी बात पर बीसीजी की कहानी कही-सुनी जाए। सुनेंगे आप ?"

मदन भाई की उत्साही भौहें खिंच जाती हैं।

"निन्यानवे साल पुराना टीका है बीसीजी। यानी बैसिलस कैलमेट गीरैन। इस टीके में एक ख़ास माइकोबैक्टीरियम बोविस नाम का जीवाणु है , जिसे क्षीण यानी एटेनुएट किया गया है। यह जीवाणु गायों में टीबी-रोग पैदा करता है।"

"गायों में टीबी करता है ! पर यह जीवाणु टीबी से हमें कैसे बचाता है ? बीसीजी तो टीबी में काम करता है --- ऐसा सुना था !" मदन भाई का प्रश्न है।

"जी। टीबी-रोग मायोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस से होता है। किन्तु बीसीजी में एक दूसरा मायकोबैक्टीरियम बोविस है। ये कई मामलों में मिलते-जुलते हैं। अलबर्ट कैलमेट और कैमिल गीरैन से इस टीका का निर्माण किया। मनुष्यों में इसका पहला प्रयोग सन् 1921 में किया गया। तबसे न जाने कितने ही शिशुओं और नवजातों को यह लगाया जा चुका है। इसका मुख्य उद्देश्य : ट्यूबरकुलर मेनिन्जायटिस व डिस्सेमिनेटेड टीबी से व्यक्ति की रक्षा।"

"ये दोनों अजीब-ओ-ग़रीब नाम ऐसे हैं ?"

"ये टीबी-रोग के दो गम्भीर स्वरूप हैं। ट्यूबरकुलर मेनिन्जायटिस मस्तिष्क की मेनिंजेज़ नामक बाहरी झिल्लियों को प्रभावित करने वाला रोग है और डिस्सेमिनेटेड टीबी उस स्थिति को कहा जाता है , जब टीबी पूरे शरीर में फैल जाती है।"

"अरे ! तब तो ये बड़ी घातक बीमारियाँ हुईं ! एक दिमाग़ पर असर डाल रही है , दूसरी समूचे जिस्म पर !"

"यक़ीनन। तो इन्हीं को रोकने के लिए बीसीजी का इस्तेमाल किया जाने लगा। कामयाबी भी काफ़ी मिली , हालांकि टीबी इ अन्य स्वरूपों में इसकी सफलता विवादास्पद रही।"

"इनके अलावा भी कहीं यह टीका इस्तेमाल हुआ ?"

"जी। मूत्राशय के कैंसर में। वहाँ भी इसके प्रयोग से यूरोलॉजिस्टों-ऑन्कोसर्जनों ने रोगियों में लाभ होता पाया। लेकिन बीसीजी बड़ी दिलचस्प वैक्सीन रही दूसरे मायनों में।"

"कैसे ?"

"बीसीजी का टीका जब नवजातों को लगने लगा , तब ओवरऑल शिशु-मृत्यु-दर में भी कमी पायी जाने लगी। केवल टीबी से ही बच्चे कम मर रहे हों , ऐसा नहीं था। बीसीजी का टीका लगने से बच्चों में फेफड़ों के संक्रमण और सेप्सिस जैसे गम्भीर भी घटते पाये गये।"

"अरे वाह ! यह तो कमाल हो गया ! आम-के-आम-गुठलियों-के दाम !"

"हाँ , पर विज्ञान तो मुहावरों के आधार बना कर उत्सव मनाता नहीं। उसकी उल्लासधर्मिता को तो प्रमाण चाहिए पहले। सो दुनिया-भर के इम्यूनोलॉजिस्ट जुटे बीसीजी का अध्ययन करने के लिए कि ये एक-से-अधिक लाभ मिल क्यों और कैसे रहे हैं ? जानते हैं उन्हें क्या मिला ?"

"अब थोड़ी इम्यूनोलॉजी की जटिल भाषा को सरल करके समझाने का प्रयास करता हूँ। मोटी बात यह समझिए कि वैज्ञानिकों ने पाया कि बीसीजी का टीका शरीर में अन्य संक्रमणों से बचाने के लिए तीन स्तर पर काम करता है। मान लीजिए किसी बच्चे को बीसीजी का टीका लगा। टीके में एक जीवाणु है , जिसका नाम आप जान चुके हैं। शरीर के भीतर जो प्रतिरक्षक लिम्फोसाइट-कोशिकाएँ हैं ( दो प्रकार की : टी-लिम्फोसाइट व बी-लिम्फोसाइट ) उन्हें इस बीसीजी के जीवाणु का प्रयोग करके टीबी से लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है। यानी शरीर के सैनिकों को ट्रेनिंग देने वाली कोशिकाएँ बीसीजी के टुकड़े ( यानी एंटीजन ) इन लिम्फोसाइट-सैनिकों के सामने प्रस्तुत करते हुए कहती हैं कि , "इसे देख रहे हो ? बाहर जो टीबी की बीमारी पैदा करने वाला दुश्मन है न , वह इसी से मिलता-जुलता है। इससे लड़ने का अभ्यास करो। इससे लड़ना सीख लोगे , तो उससे लड़ने में भी आसानी होगी।" इस तरह से शरीर की टी-लिम्फोसाइट व बी-लिम्फोसाइट बीसीजी के टीके से ट्रेनिंग लेकर टीबी-रोग से लड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं। फिर ये शरीर में ट्रेनिंग की स्मृति लेकर चुपचाप पड़ी रहती हैं कि कब टीबी का जीवाणु भीतर दाखिल हो और कब वे इससे लड़ें। किन्तु जब टीबी के जीवाणु की जगह दूसरे श्वसन-रोग पैदा करने वाले विषाणु शरीर में घुसते हैं , तब ये स्मृतियुक्त लिम्फोसाइट इन विषाणुओं और बीसीजी-जीवाणु के टुकड़ों ( यानी एंटीजनों ) कुछ समानता पाते हैं और इन विषाणुओं पर हमला कर देते हैं।"

"यानी ट्रेनिंग बीसीजी से ली थी , टीबी के लिए ली थी और हमला करके मार दिये वायरस ! गज्जब भाई ! कमाल !"

"हाँ मदन भाई। आण्विक स्तर पर बीसीजी और विषाणुओं को एक-सा दिखना मॉलीक्यूलर मिमिक्री कहलाता है और इस मिमिक्री के कारण विषाणुओं का सफाया हो जाता है। यह बीसीजी-टीके का टीबी के अतिरिक्त अन्य संक्रामक रोगों में काम करने का पहला ढंग हुआ।"

"दूसरा ढंग क्या है ?"

"बीसीजी एक-दूसरे ढंग से सीधे प्रतिरक्षा-तन्त्र की इन बी व टी-लिम्फोसाइटों को विषाणुओं के खिलाफ़ सक्रिय कर सकता है। इस तरीक़े को हेटेरोलॉगस इम्यूनिटी कहा जाता है। इसमें बीसीजी और विषाणुओं के मिलते-जुलते एंटीजन ज़िम्मेदार नहीं होते , यह सीधे काम के लिए उन्हें तैयार करता है। यानी बीसीजी का टीका लगा तो केवल टीबी-रोग से लड़ने वाले सैनिक नहीं तैयार हुए , विषाणु से लड़ने वाले सैनिक भी तैयार हो गये।"

"और तीसरा ढंग क्या है ?"

"तीसरा ढंग अन्तिम और सर्वाधिक शोध का विषय बना हुआ है। इसे ख़ास नाम दिया गया है : ट्रेंड इम्यूनिटी। मोनोसाइट-मैक्रोफेजों जैसी प्रतिरक्षक कोशिकाओं के भीतर जीनों के ख़ास प्रमोटर नामके स्विचों को ऑन-ऑफ़ करके उनके भीतर प्रतिरक्षक रसायनों का निर्माण और स्राव कराया जाता है। यह रासायनिक निर्माण और स्राव भी बीसीजी कराता है। अब जब विषाणु शरीर में दाखिल होते हैं , तब बीसीजी के आधार पर मिली ट्रेनिंग के कारण ये मोनोसाइट-मैक्रोफेज उन्हीं रसायनों का उत्पादन और स्राव शुरू कर देते हैं , जिनकी ट्रेनिंग पहले बीसीजी ने उन्हें दी थी। इस रसायनों के तरह-तरह के प्रयोगों से विषाणु मारे जाते हैं।"

"यानी इन तीन तरीक़ों से बीसीजी विषाणुओं के खिलाफ़ इम्यूनिटी देता है। वाह ! तब तो कोविड-19 में इससे मिलने वाली प्रतिरक्षा की बात में दम है ! है न !"

"जैसा कि मैंने कहा कि विज्ञान उल्लास से पहले प्रमाण जुटाता है। बीसीजी काम करता है , इसके कुछ प्रमाण हैं। अवश्य हैं। पर यह काम करता है , तो क्या इतना जानने-भर से काम चल जाएगा ? यह सच है कि इटली और अमेरिका जैसे देशों में , जहाँ इस टीके का प्रयोग व्यापक रूप में नहीं है , वहाँ अधिक मौतें हुई हैं और दक्षिणी कोरिया , जापान और भारत जैसे देशों में कम , जहाँ इस टीके का ख़ूब इस्तेमाल होता रहा है। लेकिन यह प्रमाण परिवेश-जन्य भी हो सकता है और अनेक दूसरे कारण भी मौत के आँकड़ों में अन्तर के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं। अभी कई शोध चल रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया , नीदरलैंड्स व अमेरिका में बीसीजी का टीका स्वास्थ्य-कर्मियों को लगाया जा रहा है ताकि यह देखा जा सके कि क्या यह उनकी कोविड-19 से रक्षा करता है अथवा नहीं। फिर बुज़ुर्गों में इस टीके को लगाकर गम्भीर कोविड-संक्रमण की रोकथाम पर भी शोध चल रहे हैं। जर्मनी भी बीसीजी से मिलते-जुलते टीके को बुज़ुर्गों अथवा स्वास्थ्य-कर्मियों को लगाकर शोध में लगा हुआ है।"

"चलो यार ! बस नतीजे पॉज़िटिव आएँ !"

"केवल नतीजों के पॉज़िटिव आने से प्रश्न समाप्त नहीं होते मदन भाई। लोग पूछेंगे कि टीका लगने से कितने दिन-महीने-साल की सुरक्षा मिलेगी इस कोरोनाविषाणु से ? दूसरे देशों की जनता यह भी पूछेगी कि टीका लगवाने की सही उम्र क्या है ? कितनी बार ? क्या बचपन में लगा बीसीजी और जवानी या बुढ़ापे में लगा बीसीजी एक-सा काम करेंगे ?"

"सवाल तो लाज़िमी हैं ये सारे।"

"इसीलिए विज्ञान त्वरित उत्सवधर्मिता में कंजूसी दिखाता है। पहले वह यह सिद्ध करने में लगा है कि सचमुच बीसीजी कोविड-19 में काम करता है अथवा नहीं। फिर यह सिद्ध करने में की किस तरह। फिर बीसीजी-टीका देने-सम्बन्धी पॉलिसी के गठन के बारे में। इतना सब जानने के बाद ही वह उल्लसित हो सकता है।"

"तब तक हम आम लोग तो लॉकडाउन में ख़ुश हो ही सकते हैं न भाई ! टीका हम-हिन्दुस्तानियों को जन्म के तुरन्त बाद लगाया जाता है और सम्भावना जगा रहा है। इस बुरे दौर में उम्मीद पर इतना खुश होना तो बनता है न !" कहते हुए वे भुजा के उस बीसीजी के निशान को चूम लेते हैं।

"अन्वेषकों ने जनता को उम्मीद रखने से कहाँ रोका है ! वे तो बस इतना कह रहे हैं कि आसमान ताकते हुए ज़मीन पर जमे रहना है , गिरना नहीं। बीसीजी की इस नयी कहानी के सुखद अन्त की हम-सबको प्रतीक्षा है।"

--- स्कन्द।

#skandshukla
चिकित्सक-मित्र नेचर-रिव्यूज़-यूरोलॉजी

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 02 Apr 2020 at 9:02 PM -

कोरोना

कोरोना संक्रमितों की संख्या की दृष्टि से दुनिया के देशों की सूची में चीन का नाम दिन ब दिन नीचे आ रहा है और भारत का नाम ऊपर जा रहा है।

जब चीन में यह भड़का तो भारत के कुछ लोग बोले कि हर जीव जंतु ... को खाने के कारण यह मुसीबत आयी है।
जब यह इटली और ईरान जैसे देशों में कहर बरपाने लगा तो हम बोले कि मांसाहारियों को पकड़ता है।

जब पहला मरीज केरल में मिला तब भी हम यही कहते रहे कि यह मांसाहारियों को पकड़ता है।

दस दिन पहले तक हम गोमूत्र को इसकी कारगर दवा बता रहे थे।

पांच दिन पहले तक हम शाकाहार को इस दृष्टि से बेहतर बता रहे थे।

दो दिन पहले तक हम लोग भारतीयों की इम्युनिटी को जबरदस्त बता रहे थे, साथ ही यह भी चाह रहे थे कि अप्रवासी मजदूरों को गांव में न आने दिया जाए।

जब चीन ने कंट्रोल कर लिया तो हम बोले कि चीन ने ही इसको फैलाया है। यह चीन की साजिश है।

अगर यह भारत में फैल गया तो हम अपनी इम्युनिटी का गुणगान भूल जाएंगे।

गोमूत्र की शक्ति को भूलने ही लगे हैं।
देवताओं की शक्ति को भी भूलने लगे हैं।
अगर शाकाहारी भी समान रूप से चपेट में आये तो पहले तो हम मुल्लों को दोषी ठहराएंगे।
और
फिर एक दो दिन में शाकाहार का गुणगान भी बन्द कर देंगे।

भारत में बुजुर्गों की संख्या कम ही है इसलिए मरने वालों का प्रतिशत कम होना चाहिए जो फिलहाल दिख नहीं रहा।

भारत का ताप बढ़ रहा है जिसके कारण संक्रमण का फैलाव सीधे संपर्क से तो जारी रहेगा लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से फैलाव में कमी आएगी।

गर्मी बढ़ने पर कोरोना संक्रमितों में से मरने वालों का प्रतिशत भी घटेगा।

अगले चार महीने में अगर हम यह जंग जीत गए तो ठीक है, और यदि न जीते तो रुकी हुई अर्थव्यवस्था भी हमें मारने लगेगी।

फिर कभी न कभी तो टीका भी बन ही जायेगा और फिर हम इससे भयमुक्त हो जाएंगे।

टीका न भी बनेगा तो भी हम भयमुक्त हो जाएंगे क्योंकि यह हमारा अनुवांशिक गुण है।

इसके बाद फिर से धर्म खतरे में पड़ जायेगा।
फिर से गोमूत्र हमारी इम्युनिटी बढ़ाने लगेगा।
फिर से हमारे पीर बाबा बीमारियां दूर करने लगेंगे।
फिर से हनुमान जी का "नाशै रोग हरै सब पीरा" वाला गाना गाया जाने लगेगा।

और इस तरह से दुनिया को मानसिक गुलामी से आजादी दिलाने वाली इस जंग का पटाक्षेप हो जाएगा।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 21 Aug 2019 at 6:52 PM -

अशोक के आयुर्वेदिक उपयोग

अशोक की छाल से आयुर्वेद की उत्कृष्ट दवा ‘ अशोकारिष्ट ‘ बनाई जाती है। यह स्त्री रोगों , श्वेत प्रदर , रक्त प्रदर , गर्भाशय की कमजोरी, हार्मोन के असंतुलन , गर्भाशय में गांठ , माहवारी के समय दर्द और अधिक रक्तस्राव आदि में काम ... आती है। गर्भाशय को मजबूत करने के लिए टॉनिक बनाने में इसका उपयोग किया जाता है।

अशोक की छाल रक्तपित्त , खुनी बवासीर तथा मूत्र रोगों की दवा बनाने में काम आती है।


अशोक की छाल डिसेंट्री , वात के कारण शरीर में दर्द , स्किन की एलर्जी आदि के उपचार में काम आती है।

यह त्वचा का रंग उजला बनाती है , सूजन दूर करती है तथा रक्त विकार दूर करती है।

बिच्छू के डंक मारने पर अशोक की छाल लगाई जाती है , जो दर्द कम करती है।

इसके उपयोग से अशोक धृत भी बनाया जाता है। जो टॉनिक के रूप में दिया जाता है।

योनि की शिथिलता दूर करके योनि को टाइट करने के लिए अशोक की छाल का उपयोग किया जाता है।

अशोक के सूखे फूल का पाउडर डायबिटीज में लाभदायक होता है।

अशोक के बीज गुर्दे की पथरी और पेशाब सम्बन्धी बीमारी में काम आते हैं।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 30 Nov 2018 at 6:40 AM -

विटामिन ‘बी’ काम्पलेक्स की कमी से उत्पन्न होने वाले रोग

हाथ पैरो की अंगुलियों मे सनसनाहट होना
मस्तिष्क की स्नायु मे सूजन व दोष होना
पैर ठंडे व गीले होना
सिर के पिछले भाग मे स्नायु दोष हो जाना
मांस पेशियो का कमजोर होना
हाथ पैरो के जोड़ अकड़ना
शरीर का वजन घट जाना
नींद कम आना
मूत्राशय मे दोष आना
माहवारी की गड़बड़ी ... होना
शरीर पर लाल चकती निकलना
दिल कमजोर होना
शरीर मे सूजन आना
सिर चकराना
नजर कमजोर हो जाना
पाचन क्रिया कमजोर हो जाना

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 26 Oct 2018 at 2:39 PM -

अलसी या तीसी के औषधीय गुण

अलसी के औषधीय गुण तथा विभिन्न बीमारियों में उपयोग व फायदे-(अधिकांशतः सुनी हुई बातें हैं)-

अनेक जटिल समस्याओं के लिए अचूक औषधि है अलसी। अलसी का मराठी नाम जवस है। इसे उत्तर भारत में तीसी के नाम से भी जाना जाता है। अलसी असरकारी ऊर्जा, स्फूर्ति ... व जीवटता प्रदान करता है। अलसी, तीसी, अतसी, कॉमन फ्लेक्स और वानस्पतिक लिनभयूसिटेटिसिमनम नाम से विख्यात तिलहन अलसी के पौधे बागों और खेतों में खरपतवार के रूप में तो उगते ही हैं, इसकी खेती भी की जाती है। इसका पौधा दो से चार फुट तक ऊंचा, जड़ चार से आठ इंच तक लंबी, पत्ते एक से तीन इंच लंबे, फूल नीले रंग के गोल, आधा से एक इंच व्यास के होते हैं। इसके बीज और बीजों का तेल औषधि के रूप में उपयोगी है। अलसी रस में मधुर, पाक में कटु, पित्तनाशक, वीर्यवर्धक, वात एवं कफ नाशक व खांसी मिटाने वाली है। इसके बीज चिकनाई व मृदुता उत्पादक, बलवर्घक, शूल शामक और मूत्रल हैं। इसका तेल विरेचक (दस्तावर) और व्रण पूरक होता है।

अलसी की पुल्टिस का प्रयोग गले एवं छाती के दर्द, सूजन तथा निमोनिया और पसलियों के दर्द में लगाकर किया जाता है। इसके साथ यह चोट, मोच, जोड़ों की सूजन, शरीर में कहीं गांठ या फोड़ा उठने पर लगाने से शीघ्र लाभ पहुंचाती है। एंटी फ्लोजेस्टिन नामक इसका प्लास्टर डॉक्टर भी उपयोग में लेते हैं। चरक संहिता में इसे जीवाणु नाशक माना गया है। यह श्वास नलियों और फेफड़ों में जमे कफ को निकाल कर दमा और खांसी में राहत देती है।

इसकी बड़ी मात्रा विरेचक तथा छोटी मात्रा गुर्दो को उत्तेजना प्रदान कर मूत्र निष्कासक है। यह पथरी, मूत्र शर्करा और कष्ट से मूत्र आने पर गुणकारी है। अलसी के तेल का धुआं सूंघने से नाक में जमा कफ निकल आता है और पुराने जुकाम में लाभ होता है। यह धुआं हिस्टीरिया रोग में भी गुणकारी है। अलसी के काढ़े से एनिमा देकर मलाशय की शुद्धि की जाती है। उदर रोगों में इसका तेल पिलाया जाता हैं।

तनाव के क्षणों में शांत व स्थिर बनाए रखने में सहायक है। कैंसर रोधी है तथा हार्मोन्स की सक्रियता बढ़ाता है। अलसी इस धरती का सबसे शक्तिशाली पौधा है। कुछ शोध से ये बात सामने आई कि इससे दिल की बीमारी, कैंसर, स्ट्रोक और मधुमेह का खतरा कम हो जाता है। इस छोटे से बीज से होने वाले फायदों की फेहरिस्त काफी लंबी है,​​ जिसका इस्तेमाल सदियों से लोग करते आए हैं। इसके रेशे पाचन को सुगम बनाते हैं, इस कारण वजन नियंत्रण करने में अलसी सहायक है। रक्त में शर्करा तथा कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करता है। जोड़ों का कड़ापन कम करता है। प्राकृतिक रेचक गुण होने से पेट साफ रखता है। हृदय संबंधी रोगों के खतरे को कम करता है। उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करता है। त्वचा को स्वस्थ रखता है एवं सूखापन दूर कर एग्जिमा आदि से बचाता है। बालों व नाखून की वृद्धि कर उन्हें स्वस्थ व चमकदार बनाता है। इसका नियमित सेवन रजोनिवृत्ति संबंधी परेशानियों से राहत प्रदान करता है। मासिक धर्म के दौरान ऐंठन को कम कर गर्भाशय को स्वस्थ रखता है। अलसी का सेवन त्वचा पर बढ़ती उम्र के असर को कम करता है। अलसी का सेवन भोजन के पहले या भोजन के साथ करने से पेट भरने का एहसास होकर भूख कम लगती है। प्राकृतिक रेचक गुण होने से पेट साफ रख कब्ज से मुक्ति दिलाता है।
अलसी कैसे काम करती है
अलसी के चमत्कार को दुनिया ने माना है, आधुनिक युग में स्त्रियों की यौन-इच्छा, कामोत्तेजना, चरम-आनंद विकार, बांझपन, गर्भपात, दुग्धअल्पता की महान औषधि है। स्त्रियों की सभी लैंगिक समस्याओं के सारे उपचारों हेतु सर्वश्रेष्ठ और सुरक्षित है अलसी।

सबसे पहले तो अलसी आप और आपके जीवनसाथी की त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनायेगी। आपके केश काले, घने, मजबूत, चमकदार और रेशमी हो जायेंगे। अलसी आपकी देह को ऊर्जावान और मांसल बना देगी। शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी रहेगी, न क्रोध आयेगा और न कभी थकावट होगी। मन शांत, सकारात्मक और दिव्य हो जायेगा। अलसी में ओमेगा-3 फैट, आर्जिनीन, लिगनेन, सेलेनियम, जिंक और मेगनीशियम होते हैं जो स्त्री हार्मोन्स, टेस्टोस्टिरोन और फेरोमोन्स (आकर्षण के हार्मोन) के निर्माण के मूलभूत घटक हैं। टेस्टोस्टिरोन आपकी कामेच्छा को चरम स्तर पर रखता है।

अलसी में विद्यमान ओमेगा-3 फैट और लिगनेन जननेन्द्रियों में रक्त के प्रवाह को बढ़ाती हैं, जिससे कामोत्तेजना बढ़ती है। इसके अलावा ये शिथिल पड़ी क्षतिग्रस्त नाड़ियों का कायाकल्प करती हैं जिससे मस्तिष्क और जननेन्द्रियों के बीच सूचनाओं एवं संवेदनाओं का प्रवाह दुरुस्त हो जाता है। नाड़ियों को स्वस्थ रखने में अलसी में विद्यमान लेसीथिन, विटामिन बी ग्रुप, बीटा केरोटीन, फोलेट, कॉपर आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अलसी से, देह के सारे चक्र खुल जाते हैं।
अलसी के बीज के चमत्कारों का हाल ही में खुलासा हुआ है कि इनमें 27 प्रकार के कैंसररोधी तत्व खोजे जा चुके हैं। अलसी में पाए जाने वाले ये तत्व कैंसररोधी हार्मोन्स को प्रभावी बनाते हैं, विशेषकर पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर व महिलाओं में स्तन कैंसर की रोकथाम में अलसी का सेवन कारगर है। दूसरा महत्वपूर्ण खुलासा यह है कि अलसी के बीज सेवन से महिलाओं में सेक्स रोगों यथा गोनोरिया, नेफ्राइटिस, अस्थमा, सिस्टाइटिस, कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह, कब्ज, बवासीर, एक्जिमा आदि के उपचार में भी उपयोगी है।

user image Jigyasa Editor

उत्कृष्ट जानकारी

Friday, October 26, 2018
user image Aneeeh Swaroop

Nice information!!!! Thank you for this...

Friday, October 26, 2018