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user image Arvind Swaroop Kushwaha - 27 May 2020 at 7:01 PM -

स्त्री और पुरुष

पोस्ट बडी़ है. धैर्य पूर्वक पढे़ (सत्य पर आधारित यह पोस्ट)

मैं यह समझा सकता हूँ कि क्यों लोग (प्रेमी जोड़े या पति-पत्नी) एक दूसरे को कुछ समय बाद छोड़ देते हैं!

क्योकि इंसान मौलिक रूप से पोलिगेमस होता है, वैसे 99% सभी जीव ऐसे ही होते ... हैं तो कुछ नया नहीं है। विवाह का अर्थ सेक्स होता है विज्ञान में और लोगों की राय में भी, तो पोलिगेमस को हिंदी में बहुविवाही कह सकते हैं।

दुनिया मे सबसे सम्भोग नहीं किया जा सकता लेकिन जितनों से भी कर लिया जाए, ये मानव का मूलभूत प्रयास रहता है। क्योंकि न तो हर एक सम्भोग में बच्चे हो सकते हैं और न ही हर जन्तु प्रजनन क्रिया करने में सफल ही हो पाता है।

(मानवों में तो यह इसलिए भी बेमौसम होता है क्योंकि एक महिला सिर्फ ४०० अंडे पैदा करने की क्षमता लेकर दुनिया में आती है और माह में केवल एक दिन ही प्रजनन योग्य स्थिति में होती है जो हर माह का 14वां दिन होता है (यदि महिला स्वस्थ है और उसका माहवारी चक्र 28 दिन पर टिका हो)। बच्चे होने के सम्भावित दिवस 14वें दिन से 3 दिन पहले और 3 दिन बाद तक के हो सकते हैं। लेकिन ovolution (अन्डोत्सर्ग) वाले दिन न सिर्फ 100% बच्चे होने की सम्भावना होती है बल्कि महिला इसी दिन सम्भोग के प्रति वास्तविक रूप से लालायित होती है। उसकी योनी में श्लेष्मा का स्राव अधिक होने से सम्भोग की इच्छा अपने आप जागृत हो जाती है। इस एक हफ्ते में यदि वीर्य योनी से गर्भाशय में पहुचता है तो निषेचन की प्रक्रिया होगी अन्यथा यह अंडा आत्महत्या कर लेगा। इसी अंडे की प्रतिमाह आत्महत्या को हम माहवारी कह कर सम्बोधित करते हैं। (है न रोचक जानकारी, अब मत कहना कभी कि मैं महिलाओं को समझ नहीं सकता)।

अब सवाल उठता है कि कैसे पता चले कि अन्डोत्सर्ग वाला दिन कौन सा है? यह पता नहीं लगाया जा सकता क्योंकि अब मानव कपड़े पहन कर रहते हैं। पहले माहवारी के रक्त को बहता देख कर माहवारी के दिन का पता चल जाता था उसके बाद दिनों की गिनती करके अन्डोत्सर्ग का समय पता लगाया जा सकता था लेकिन अब इसे गंदा-घिनौना बता कर छिपा लिया जाता है।

(इससे दाग न लग जाए, इसलिए लोग आज भी गंदा कपड़ा इस्तेमाल करना उचित समझते हैं। सेनेटरी पैड महंगा जो है। अरे हाँ २ रूपये वाला भी आ गया है। लेकिन सिर्फ फिल्म में। अब आ गया है pad man से बढ़ कर चमत्कारी menstrual cup man! (ही ही ही)। जी हाँ, 150 (सिफ़ारिश करता हूँ) रुपए से लेकर 2000 रुपए तक की प्रारम्भिक खर्च के बाद 5 से 10 वर्ष तक माहवारी और कपड़े, सेनेटरी पैड से छुट्टी। खरीदने के लिए सम्पर्क करें)।

इसलिए कुल मिला कर पुरुष जानता ही नहीं कि प्रजनन का दिवस कब है। परिणामस्वरूप पुरुष हर समय सम्भोग की इच्छा जताता रहता है।

ये मानव दिमाग मे भरा हुआ है (coded in gene) कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा किये जायें ताकि मानव जाति या कोई भी जाति (अन्य जीवों के मामले में) बची रहे। इस प्रावस्था को natalism कहते हैं।

प्रकृति में ये ऐसा इसलिये था क्योंकि जब विवाह नहीं था और विज्ञान नहीं था तो सभी मानव बहुत कम समय तक जी पाते थे (अन्य जंतुओं की तरह)।

ऐसे में सिर्फ वही प्रजाति जीवित बची रह सकी जो ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने में सफल हुई। Evolution (उद्विकास) के दौरान केवल वही मानव जीवित बचे जो सम्भोग करने में और अधिक बच्चे पैदा करने में ज्यादा सफल हुए।

इन मानवों में सम्भोग के प्रति बहुत तीव्र इच्छा थी और इसी कारण ये यहाँ तक पहुच सके। यही तीव्र इच्छा आज के मेडिकल साइंस के आ जाने के कारण जनसँख्या बढ़ाने की ज़िम्मेदार कहलाई क्योकि अब लोग चिकित्सा विज्ञान के कारण कम मरते हैं।

लेकिन इंसान की प्रवृत्ति (instinct) नहीं बदली। वह वैसी ही रह गई।

लोगों ने इस प्रवृत्ति को बदलने के लिये monogamy (एकल विवाह) को अनिवार्य बनाया ताकि समाज मे धन का विनिमय करने के लिये मजदूर मिल सकें और प्रति व्यक्ति परिवार के होने के कारण बच्चों का पालनपोषण सुनिश्चित हो सके। इस प्रकार जनसँख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी। समाज की अर्थव्यवस्था को चलाने के लिये मोनोगैमी काम आई और एक व्यक्ति से विवाह बहुत प्रसिद्ध हुआ।

लेकिन इसके दुष्परिणाम भी समय के साथ सामने आने लगे। एक समाज एक निश्चित स्थान पर स्थित परिवार के समान होता है। प्रायः समाज एक शहर, राज्य या एक देश तक सीमित होता है। संगठित रूप में यह एक समुदाय के रूप में होता है। इसकी एक निश्चित सीमा होती है, निश्चित संसाधन (resources) होते हैं और उनकी जीवटता उन्हीं पर निर्भर होती है। अर्थात यदि संसाधनों में कमी आयी तो समाज में समस्याएं आनी तय हैं।

उदाहरण 1: एक छोटे शहर में 50 घर हैं। वे लोग वर्तमान परिस्थितियों में 60 घरो का खर्च उठा सकें इतना ही कमाते हैं। यानी अभी इसमें 10 और घर बसाए जा सकते हैं। लेकिन जगह की कमी है। इसलिये वह संख्या 50 से आगे कभी नहीं बढ़ सकती। यह 10 घरों की अतिरिक्त राशि सभी परिवार आंशिक रूप से अपने भविष्य की विकट परिस्थितियों (आपातकाल) के लिये सुरक्षित रखते हैं।

लेकिन जनसँख्या समानुपातिक ढंग से बढ़ रही है। कारण है नेटालिस्टिक भावना और संस्कृति द्वारा इसके सन्दर्भ में बनाये गये विवाह और शीघ्र बच्चों को पैदा करने जैसे अनिवार्य व्यवहार/परम्पराएं।

नतीजा साफ है। अपराध जन्म ले चुका है। अतिरिक्त लोग सड़कों पर भिखारी, विकलांग, बेकार, बेरोजगार और गुंडे/चोर बनकर जीवन गुजारने लगे हैं। इससे उन 50 घरों को ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। उनका वह 10 घरों के बराबर का आंशिक जमा धन इनको पाल रहा है।

लोगों ने कानून बनाया लेकिन फिर भी भृष्टाचारी समाज उसका पालन नहीं कर सका। यही एक सामान्य समाज का आर्थिक ढांचा है। इस प्रकार लोग मरते और नए पैदा होते रहते हैं। लेकिन सिर्फ तभी तक जब तक मृत्युदर और जन्म दर -50 और +60 रहती है। +10 परिवारों की वह अतिरिक्त जनसँख्या है जो अपराध/छेड़छाड़/बलात्कार की जड़ है लेकिन घटिया/भृष्ट समाज में स्वीकार्य है।

उदाहरण 2: उपर्युक्त उदाहरण में एक नियमित समन्वय दिखाया गया है जब परिस्थिति नियंत्रण में है। अब आती है अनियंत्रित परिस्थिति (वर्तमान)। वर्तमान समय में चिकित्सा विज्ञान उत्तरोत्तर प्रगति कर चुका हैं। असाध्य रोग और समस्याएं सुलझाई जा रही हैं। जनसंख्या नियंत्रण खतरे में है। इंसान की औसत आयु 80 तक खिंच गई है। जो भविष्य में और ऊपर जा सकती है।

अब क्या होगा? सीमित जगह, सीमित संसाधन, सीमित स्थान लेकिन अधिक आबादी।

1. आपके बच्चे: मम्मी-पापा का कमरा खाली हो जाता तो उनके पोते-पोतियों को दूसरे शहर में ऋण लेकर नया घर न लेना पड़ता।

2. आपके पोते-पोती: ये बुड्ढे-बुढ़िया मरते क्यों नही? मुझे सम्पत्ति की ज़रूरत है और ये कुंडली मारे बैठे हैं।

3. बैंक: 100 साल तक ही पेंशन मिलेगी माता जी। उसके बाद भी जिंदा रहीं तो कुछ और जुगाड़ ढूंढ लो।

जब लोग ज्यादा और संसाधन कम होंगे तो क्या होगा? सब एक दूसरे का मुहँ ताकना शुरू।

अब क्या करें? फिर से मौत पीछे? फिर क्या फायदा जीकर जब जीने को साधन नहीं। फिर से आदिमकाल शुरू। फिर से संघर्ष? फिर से एक दूसरे से छीनने का दौर शुरू। हिंसात्मक दृश्य। सब लड़-भिड़ के पुनः समाप्ति की ओर। यह क्या? तो क्या करें? बच्चे न पैदा करें? नेटालिस्टिक प्रवृत्ति का लोप कर दें? तब anti-natalist समाज समाप्ति की ओर नहीं बढ़ जाएगा? मानव जाति समाप्त नहीं हो जाएगी?

चलिये देखते हैं। अभी हमने बात की थी कि पोलिगेमस मानव को सदियों से मोनोगेमस बनाये जाने का प्रयास किया गया। लेकिन फिर भी इसका उल्लंघन हुआ और आज भी विश्व के 80% परिवार अपने वंश को नहीं चला रहे हैं।

(असल में तो कोई भी नहीं चला रहा* लेकिन जो सोचते हैं कि वे चला रहे हैं तो उनके लिये बुरी खबर। विदेशों में कुछ वर्ष पूर्व एक सर्वे हुआ। जिसमें कई परिवारों के DNA जांच की गयी और समझिये विस्फोट सा हुआ। कोई भी बच्चा उनके माता-पिता का नहीं निकला। पड़ोसियों के निकले।

*वंश चलाने के लिये यह परम आवश्यक है कि सभी 28 गुणसूत्र एक ही वंश से आये हों। अर्थात आपके माता-पिता एक ही माता-पिता की सन्तानें होना परमावश्यक है। इसी सिद्धान्त पर मिस्र में सदियों तक वंश चले। यदि आपके माता-पिता एक ही परिवार के रक्त सम्बन्धी नहीं हैं तो आपके आधे गुणसूत्र आपके पिता के और आधे आपकी माता के वंश के होंगे। यानी अशुद्ध वंश)।

तो क्या सीखा? मतलब प्रवृत्ति पर पूरी तरह रोक लगाना असम्भव। इसलिये मोनोगैमी की तरह एन्टी नेटालिस्ट सोच लाइये। जनसँख्या को स्वेच्छा से रोकिये। गर्भनिरोधकों का जम कर उपयोग करें। सरकार का सहयोग लें। कंडोम, नसबंदी, मैथुन भंग, डायफ्राम, IUV (आधुनिक और सुरक्षित 3 से 5 वर्ष तक), copper T, फीमेल कंडोम (reusable), 72 घंटे, आई पिल, माला-डी, सहेली, डिम्पा इंजेक्शन इत्यादि का विकल्प चुनें। अनजान साथी से सम्भोग करते समय कंडोम प्रयोग करें या उसकी STD/HIV जांच अवश्य करवा लें।

कुछ लोग मेरी बात कभी नहीं मानेंगे और जो विवाह को त्यागेंगे वे live-in-relationship में बच्चे पैदा करेंगे ही और जनसँख्या संतुलित हो जाएगी।

अब बात आती है कि हम पोलिगेमस हैं तो यह प्यार किस चिड़िया का नाम है? क्यों एक के साथ चिपक जाता है यदि इंसान पोलिगेमस है असल में?

तो दिल थाम कर इसका विश्व में प्रथम बार रहस्योद्घाटन देखिये शुभाँशु की कलम से।

इंसान खाली नहीं बैठ सकता। इसलिये उसे कोई न कोई काम चाहिए। कुछ नहीं तो मनोरंजन या गप शप करने के लिये ही सही, एक साथी। ये बात सिर्फ इंसान के लिये ही सही नहीं है। लगभग सभी जीव-जंतु ऐसा ही करते हैं। उनको भी कोई न कोई चाहिए ताकि अपना फालतू समय काट सकें। जिनको यह साथी नहीं मिल पाता वे या तो निर्जीव वस्तुओं से मनोरंजन करते हैं। जैसे खेल इत्यादि या वे सोते रहते हैं।

इस प्रकार जो आनन्द प्राप्त होता है, उससे सभी के मस्तिष्क से डोपामिन, सेरोटोनिन, ऑक्सीटोसिन तथा एंडोर्फिन्स हार्मोन निकलता है जो एडिक्टिव (जिसकी लत लग जाती है) होता है। इनके अतिरिक्त विशेष प्रकार के शरीर से जोड़ रखने वाले फेरोमोन भी होते हैं जो मानव की पसीने की ग्रन्थियों से स्रावित होते हैं। यह ऐसे गुण रखते हैं जो केवल नाक् के विशेष ग्राहियों (receptors) को ही महसूस होते हैं। जिनको आप पहचान नहीं सकते अर्थात गन्धहीन होते हैं। यह सीधे कामोत्तेजना पैदा कर सकते हैं। आपने इसी के कारण पहली ही मुलाकात में प्यार हो जाने वाला गुण पाया है। भाई-बहन-माता-पिता-पुत्री-पुत्र के फेरोमोन समान होने के कारण उनमें इनका प्रभाव हल्का होता है। लेकिन साफसफाई से रहने के कारण यह फेरोमोन अब बेकार हो गए। विपरीत फेरोमोन एक दूसरे को आकर्षित और समान प्रतिकर्षित करते हैं।

प्राचीन काल में पसीने की गंध सेक्स का turn on होती थी। लेकिन आज डिओडरेंट ने इसको एक बुराई में बदल दिया है। अब हम बैक्टीरिया जनित मल की गंध को साफ करने के चक्कर में असली फेरोमोन को भी ख़त्म कर रहे हैं।

इसी लत को प्यार/love/मोहब्बत/इश्क/प्रेम कहते हैं। ये किसी भी चीज से हो सकता है। जिससे भी आनन्द की प्राप्ति हो। परंतु संभोग की इच्छा ऑक्सीटोसिन और डोपामिन का मिला जुला प्रभाव होता है जिसमें ऑक्सीटोसिन love को बढाने वाला addictive हार्मोन कहा जाता है। इसके प्रभाव से यौनांगों का विकास शीघ्र हो जाता है। यह माता में दुग्ध उत्पादन में भी सहयोग करता है।

आवश्यकतानुसार इसमें भेद भी उत्पन्न हुए और जब मानव समाज रिश्ते बना रहा था तो उसने प्रेम को तरह-तरह के भेदों में बांट लिया।

माता-पिता का प्यार, भाई-बहन का प्यार, रिश्तेदारों का प्यार, दोस्तों का प्यार, शिक्षक और विद्यार्थियों का प्यार और सबसे महत्वपूर्ण, रोमांस वाला प्यार (विश्व प्रसिद्ध), आकर्षण का सुख, कामोत्तेजना का आनन्द, संभोग का आनंद।*

(*सम्भोग का आनंद एक ऐसा आनंद है जिसके कारण प्रजनन की भावना जीवित है। यह सभ्यता के साथ-साथ मनोरंजन में बदल गया। इसी के चलते पोलिगेमस स्वभाव फलाफूला। इसे आम भाषा में हवस (lust) कहते हैं। यह डोपामिन और ऑक्सीटोसिन का मिला जुला प्रभाव हैं। यह एक सम्पन्न समाज में एक अनिवार्य समझी जाने वाली बुराई* यानि वैश्यावृत्ति और पोर्न बन कर उभरा। पोलिगेमस पुरुषों ने सत्ता में आकर नगर वधु का चलन शुरू किया। नाम से ही स्पष्ट है कि सारे नगर की पत्नी। यह विधुरों (जिसकी पत्नी मर गई हो) के लिए शुरू की गई सेवा रही होगी लेकिन जल्द ही इसने पूरे नगर को अपनी चपेट में ले लिया। कारण वही, एक बार से दिल नहीं भरता, जाऊंगा मैं फिर दोबारा। क्यों? आखिर क्यों एक साथी से दिल नहीं भरता?

*बुराई इसलिए क्योंकि कुछ लोगों ने इनके चक्कर में अपनी पत्नी ही छोड़ दी।

प्रश्न: इन वैश्याओं के बच्चों का क्या होता है?

उत्तर: लड़की को रख लिया जाता है और लड़के को मार डाला जाता है। जी हाँ, आज भी)।

ऐसा पाया गया है कि एक ही साथी से सम्भोग करते-करते बोरियत हो जाती है। यानि कामोत्तेजना ही समाप्त हो जाती है। अब क्या करें? वियाग्रा/केलियास खाएं? अगर एक के साथ ही रहना है तो अवश्य खाइए लेकिन इसके दुष्परिणाम भी इन्टरनेट पर देखें। बहुत लोग मर गए इन दवाओं के प्रयोग से।

कमाल देखिये, नयी/नया साथी देखते ही ये बंद कलियाँ खिलने लगती हैं। जगह/स्थान/रोल बदलने से भी कुछ समय तक यही असर। फिर क्या कोई 1500-2000 रुपये की गोली लेगा या नया साथी? (अरे भई सेक्स गुरु नहीं हूँ। जानकारी रखता हूँ। अनुभव भी है कुछ।)

प्रारम्भ में केवल विपरीत लिंग के लोगों में ही रोमांस सम्भव माना जाता था परंतु कालांतर में इसके अन्य भेद भी सामने आए। जैसे LGBTQ*

(LGBTQ = Lesbian, Gay, Bisexual, Transgender, Questioned)।

इन सभी रोमांटिक प्रेमों के खिलाफ धर्म और कानूनों ने व्यापक मुहिम छेड़ दी।

खरबों जोड़ो को मार डाला गया, उनके ही, अपने घरवालों के द्वारा, या जो जोड़े नहीं मार पाए गए, उनको बाकायदा पापी घोषित करके धर्म के ठेकेदारों ने कत्ल कर दिया।

क्यों?

बहुत कड़वा जवाब है इस क्यों का। जानने से पहले खुद को मजबूत कर लो...

तो चलो कुछ सवालों का जवाब ढूंढते हैं पहले:

विवाह जो समर्थन प्राप्त संस्था है, उसकी सामान्य विधि क्या है?

1. अपनी ही जाति और स्टेटस वाले, सुदंर चेहरे वाले या उनसे ऊपर के खानदान से बात चलाई जाती है।

2. यदि बात नहीं बनती तो कम से कम में जो भी मानक पूरे करता हो उसके साथ रिश्ता पक्का किया जाता है।

3. धन का लेनदेन शुरू।

4. विवाह के उम्मीदवारों से या तो कुछ नहीं पूछा जाता है या कुछ लोग (जो खुद को आधुनिक कहते हैं) फ़ोटो दिखा कर या आमने-सामने बिठा कर परिचय करवा देते हैं। ज्यादा सम्पन्न हैं तो आपस में फोन पर बकलोली भी होती है।

5. फिर उचित समय निर्धारित करके, विवाह समारोह आयोजित किया जाता है जिसमे ज्यादा से ज्यादा लोगों को, अपना स्टेटस दिखाने और जान पहचान बढ़ाने के लिये, तथा नेग/उपहार रूपी धन की वापसी की उम्मीद में, बुलाया जाता है।

इनकी आव-भगत की जाती है, वर पक्ष और वधू पक्ष के तमाम लोग इस तमाशे में शामिल होते हैं। जिनको भोजन कराने, ठहराने, घुमाने, लाने और ले जाने की व्यवस्था मेजबान करता है। भारी धन हानि। सूट बूट में तोंद वाले लोग आकर गरिष्ठ और महंगा भोजन भकोसते हैं और भरी हुई प्लेट कूड़े के ढेर में फेंक देते हैं।

6. इस सब के बाद या पहले (परम्परानुसार) विवाह की रस्म होती है। जिसमे कोई धार्मिक पुजारी/काजी/मुल्ला/पादरी आकर वर और वधु को सैकडों लोगों की मौजूदगी में जीवन भर साथ रहने की शपथ दिलवाता है और ईश्वर का डर दिखाता है कि यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो बुरा होगा। सभी लोग इस agreement के गवाह बनते हैं और आज कल तो इसकी वीडियो रिकॉर्डिंग भी करा ली जाती है कि कहीं दोनों में से कोई भाग निकला तो पकड़ा जा सके।

7. सम्भोग रात्रि (सुहाग रात): दो अनजान लोग सीधे कुश्ती लड़ते हैं। समाज का कुंवारी कन्या को प्रथम सम्भोग में रक्त रंजित करके यह कहना कि उसकी इस रक्त पात में सहमति थी। कमाल का समाज है न?

(यह तथ्य है कि बिना foreplay के कुवारी कन्या कभी कौमार्य भंग करवाने की इच्छुक नहीं हो सकती। भारतवासी ये foreplay किस चिड़िया का नाम है यही पूछते रहते हैं, आप अब समझ गए होंगे कि बलात्कार संस्कृति कैसे बनता है। कानून भी संस्कृति से प्रेरित। मेरिटल रेप पहले दिन ही हुआ है तो सभी पति जेल में होंगे। इसलिए जज दुरूपयोग का बहाना बना कर इसे टाल देते हैं। कुछ ऐसा ही जैसे पुरुष का बलात्कार कानून में अपराध नहीं है। बस खाली कहने को सम्विधान में समानता का अधिकार है)।

इतनी बड़ी परियोजना केवल 2 लोगों के बच्चे पैदा करने के लिये? नहीं मित्रों, बहुत बड़ी साजिश है इसके पीछे।

ये सब इसलिये ताकि कोई भी अपनी मर्जी से विवाह न कर ले। एक विवाह एक व्यापारी के लिए विज्ञापन, एक कारपोरेट के लिये नए व्यापार के लिये रास्ते खोलने वाला और बड़े लोगो से सम्पर्क बनाना हो सकता है।

धर्म को क्या फायदा है? जितने ज्यादा कमाने वाले होंगे उतना ज्यादा दान। उतने ज्यादा नामकरण, यग्योपवीत संस्कार, मुंडन, इत्यादि 16 संस्कारों में धन कमाने का अवसर। और फिर खानदानी लॉयल्टी।

अब अगर उन माता-पिता के बच्चे खुद ही अपना जीवन साथी चुन लेंगे तो उनके इस प्लान का क्या होगा?

भारत के परिपेक्ष्य में:

वधू पक्ष: कितने निष्ठुर हैं न ये माता पिता? एक तो लड़की को घर से विदा कर दिया जबरन और फिर रोने का नाटक भी? ज़िन्दगी भर अपमान करवाने और ससुराल वालों के नखरे और फरमाइशों को पूरा करने का वादा भी कर लिया। उनकी तरफ के बच्चे का भी चरणस्पर्श। दान देने वाला बाप छोटा और लेने वाला बड़ा?

वर पक्ष: एक तो लड़की ले आये दूसरे की खा पी कर, साथ में पैसा भी ले आये, फिर भी dowry चाहिए? नहीं दें तो?

1. लड़की केरोसीन stove से जल मरी। दुर्घटना है।

2. लड़की ने जहर खा लिया। कायर है।

3. लड़की के फांसी लगा ली। चाय में चीनी डालने को कह दिया, इतनी सी बात पर नाराज हो गई थी।

4. नई शादी...

5. Repeat...

यदि दहेज की मांग पूरी करते रहे:

वधू पक्ष:

1. गरीबी में जीवन।

2. अपनी ही लड़की को कोसना।

3. किस्मत को कोसना।

4. अपने लड़के की शादी में 2 गुना दहेज माँगूँगा तब जा कर कुछ आराम मिलेगा।

उधर वर-वधु का जीवन:

पति:

1. तू लाई ही क्या थी? ये दो कौड़ी का सामान?

2. तेरे बाप ने तुझे यही सिखा पढ़ा के भेजा है कि तू हमसे जुबान लड़ाती है?

3. अब तेरे में वो पहले वाली बात नहीं रही, अब तेरे साथ मज़ा नहीं आता।

4. आफिस में अपनी जूनियर को पटाऊंगा। वो नया माल लगती है।

5. अब मस्त ज़िंदगी है, घरवाली और बाहरवाली दोनों होनी चाहिए।

सास:

1. अरे करमजली, फिर दूध जला दिया, यही सिखा कर भेजा है तेरी माँ ने?

2. अरे नास पीटी, तुझ से कहा था कि मुझे नाश्ता टाइम पर चाहिए, अभी तेरे बाप को बुलाती हूँ ठहर जा।

3. अरे ये पोछे का पानी अब तक नहीं सूखा? अभी मैं गिर जाती तो? मार डालने का प्लान है।

4. फिर लड़की? लड़का कब देगी तू डायन?

ससुर:

1. बहू, ज़रा मेरा भी थोड़ा ध्यान रख लिया कर, तेरी सास तो कुछ करती नहीं है, तू आ गई तो लगा कि जीवन आराम से कट जाएगा, मेरे कपड़े, सामान वगेरह का ध्यान तुमको ही रखना है अब।

बहू:

1. एक आदमी से शादी की थी, ये तो पूरा कुटुंब ही पल्ले पड़ गया। क्या क्या कर लूँ अकेले मैं?

2. इज़्ज़त तो कोई है नहीं, नौकर बन कर जीना पड़ रहा है।

3. लड़का क्या पड़ोस से कर लूं? जो होगा वही तो मिलेगा? में क्या जानू पेट मे क्या पल रहा है?

4. मैं कहाँ फंस गई?

5. वो पी कर आते हैं, 1 मिनट से ज्यादा सम्भोग नहीं करते, में तड़पती रहती हूं।

6. देवर की नज़र मेरे ऊपर है, अब तक खुद को रोका लेकिन अब कहीं फिसल न जाऊं।

7. पड़ौस का लड़का बहुत लाइन मारता है, इधर मुझे ये खुश कर नहीं पाते, कहीं मन बहक न जाये।

8. अब क्या कर सकती हूं, ऐसे ही जीना है अब मुझको। चुप रहूंगी।

ऑफिस की जूनियर:

1. Sir ने मेरा रेप किया। किस से कहूं? सहेली से कहती हूँ।

2. पागल हो गई क्या? वो तेरे से मजे ले रहा है तो लेने दे, मैंने भी यही झेला है। कुछ कहेगी तो demotion करवा देगा या निकलवा देगा, कॉन्ट्रासेप्टिव लेती रहना। सब ठीक होगा। किसी से कहना मत, नहीं तो सब तुझे ही गलत कहेंगे। सोसायटी लड़कियों को जॉब करते नहीं देख सकती, उनके लिये तो हम हमेशा धंधे वाली ही रहेंगे। और तुझे करना क्या है? शादी ही न? कर देगा तेरा बाप।

परिणाम: विवाह सफल! बधाई हो। लड़का हुआ है।

गुलामी स्वीकार कर लो तो कोई दिक्कत नहीं है। लड़की समाज के पांव की जूती ही तो है। लड़की का तो नाम ही समर्पण है। बोले तो आत्मसमर्पण (surrender)।

विरोध किया तो? समस्या शुरू। यहीं से सब दिक्कत शुरू है। समाज कहता है कि विरोध मत करो।

तो मत करिए, यही चाहते हैं न आप सब भी? जो चलता है चलने दो न। शुभांशु जी काहे पंगा ले रहे हैं दुनिया से? उंगली न करें। अच्छा नहीं होगा। है न?

इस सब का विरोध शुरू से क्यों नहीं हुआ? क्योकि इसको चलाने में धर्म का बहुत बड़ा हाथ था जिसके डर से लोगों ने विरोध नहीं किया।

"लड़की की अब लाश ही वापस आएगी।"

"पति का घर ही अब उसका घर है।"

इसी तरह लोग अपनी वास्तविक पृवृत्ति को छुपा कर जीने लगे, अपने पोलिगेमस होने को दबाए रहे, लेकिन समय बदला और इसके बुरे परिणाम सामने आने लगे, क्योकि इंसान अपनी पृवृत्ति को नहीं बदल सकता और बलात्कार का आविष्कार हुआ।

विवाहेतर सम्बन्ध, बलात्कार और हत्या सब अवैध कहलाने के डर से चुप चाप होने लगीं।

समाज के ठेकेदारों ने इस पर सजा रख दी लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, बलात्कार के बाद सज़ा के डर से लड़की को मारा जाने लगा, यानी सज़ा से फायदे के स्थान पर नुकसान हो गया।

आज भी यही हो रहा है, दिल्ली रेप केस में ज्यादातर लड़के शादी शुदा थे। जो नाबालिग थे उनको शादीशुदा लोग भड़काते और उकसाते हैं। कहते हैं, नहीं करेगा? मर्द नही है साला।

शादी शुदा जीवन तो पत्नी का बलात्कार ही होता है 90%। कितनी पत्नियां होंगी जो खुद पति से आकर कहती हैं, "ऐ जी बहुत मन कर रहा है आज, चलो कमरे में।"

हमेशा पति ही अपनी इच्छा पूर्ति करता रहता है, महिला तो कह तक नहीं पाती। और यदि कहे तो? रंडी है, छिनाल है। पति भी कौन सा स्टैमिना वाला होता है, 1 या 2 मिनट में out। मौसम की तरह। जब मौसम का मजा आने लगता है तभी खत्म।

जो लोग बलात्कार नही कर सकते थे वो gf-bf खेलने लगे। वैसे इसमें भी पहले दिन बलात्कार होता ही है। इसे डेट रेप कहते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि ये बलात्कारी प्यार का वास्ता देकर मना लेता है, जबकि दूसरे बन्दूक दिखा कर या ब्लैकमेल करके।

और क्या आपको सबसे बढ़िया उपाय पता है बलात्कार के केस से बचने का? लड़की से समझौता करके शादी कर लो। वह केस अपने आप ही निरस्त हो जाएगा। फिर चाहे उसी दिन तलाक/divorce देकर मुक्त हो जाओ। कमाते हो तो गुजारा भत्ता देने का नुकसान होगा। साथ ही कभी-कभी माफी मांगने भी जा सकते हैं, रात भर माफी मांगिये फिर अपने रस्ते। लड़की तलाक न दे तो? घरेलू हिंसा है न। झक मार के देगी...तलाक।

जब मुझे ये सब पता है तो मैं प्यार का नाटक नहीं करता, जिसके साथ सेक्स का मन है उस से सेक्स करो और जिस से प्यार करना है उस से प्यार करो। दोनों को मिलाने से ही क्लेश और अपराध होते हैं। सेक्स लोयल्टी की निशानी नहीं होता, लेकिन प्यार होता है।

इतना गन्दा समाज, इतना घटिया सिस्टम, इतने घटिया लोग। फिर क्यों न मैं साथ दूँ लिव इन रिलेशनशिप का? कोई दखल नहीं दूसरे का। आज़ादी, दो लोगों का व्यक्तिगत सम्बन्ध। ये उनके लिए जो बच्चे चाहते हैं।

जिनके बच्चे नहीं और अलग/व्यस्त रहते हैं तो वे अपने माता-पिता की देखभाल के लिये नौकर रख लें और माता-पिता स्वीकार लें इस सम्बंध को। नौकर, जिसकी पुलिस पड़ताल हो चुकी हो।

जो Antinatalist Vegans* हैं, वे Freesex का concept पढ़ें और सेफ सेक्स और प्यार को कायदे से मैनेज करें।

*Vegan: बहुत हो गया और जानकारी फिर कभी! इतने में ही मेरे को मारने को ढूंढ रहे होंगे आप सब। सबकी पोल जो खोल के फैला दी है! (ही ही ही) फिर से पिटने के लिए जल्द ही आऊंगा। डंडों को तेल पिला कर लगे रहिये मेरी जासूसी में।

अस्वीकरण: मेरी व्यक्तिगत सोच, किसी को बाध्य नहीं किया गया है। वही करें जो दिल कहे। धन्यवाद।

Final Edited: 2018/02/16 17:55 IST, First written: 2017/06/16 06:51 IST

मौलिक लेख: ~ Shubhanshu Singh Chauhan.....

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 23 May 2020 at 8:30 AM -

उम्मीद

 Hindi Kahani- हिंदी कहानी
इस कहानी को एडिट करना है।
Kaptaan Sahib - Munshi Premchand
कप्तान साहब - मुंशी प्रेम चंद

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जगत सिंह को स्कूल जाना कुनैन की गोली खाने या मछली का तेल पीने से कम अप्रिय न लगता था। वह सैलानी, आवारा और घुमक्कड़ युवक था। ... वह कभी दरिया की सैर करता तो मल्लाहों की डोंगियों में बैठकर उस पार के देहातों में निकल जाता। कभी अमरूद के बागों की ओर निकल जाता तो अमरूदों के साथ साथ माली की गालियां भी बड़े मजे से खाता। । गालियां खाने में उसे विशेष आनंद आता था। गालियां खाने का कोई अवसर वह हाथ से जाने नहीं देता था। सवारी के घोड़े के पीछे ताली बजाना, इक्कों को पीछे से पकड़ कर अपनी ओर खींचना, बूढों की चाल की नकल करना, उसके मनोरंजन के प्रिय विषय थे। इस प्रकार का मनोरंजन करने में भी उसको बढ़िया बढ़िया किस्म की गालियां खाने को मिलती रहतीं। उसको आलसी कहना तो गलत होगा लेकिन कामचोर निसंदेह था। कामचोर काम तो नहीं करता; पर दुर्व्यसनों का दास होता है, और दुर्व्यसन धन के बिना पूरे नहीं होते। जगतसिंह को जब भी अवसर मिलता घर से रूपये उड़ा ले जाता। नकद न मिले, तो बरतन और कपड़े उठा ले जाने में भी उसे संकोच नहीं होता था। घर में जो भी शीशियां और बोतलें थीं, वह सब उसने एक-एक करके गुदड़ी बाजार पहुँचा दीं। पुराने दिनों की कितनी ही चीजें घर में पड़ी थीं, मगर उसके मारे एक भी न बची। वह इस कला में ऐसा दक्ष ओर निपुण था कि उसकी चतुराई और पटुता पर आश्चर्य होता था। एक बार बाहर ही बाहर, केवल कार्निसों के सहारे अपने दो-मंजिला मकान की छत पर चढ़ गया और ऊपर ही से पीतल की एक बड़ी थाली लेकर उतर आया। घर वालों को आहट तक न मिली। 
उसके पिता ठाकुर भगत सिहं अपने कस्बे के डाकखाने के मुंशी थे। अफसरों ने उन्हें शहर का डाकखाना बड़ी दौड़-धूप करने पर दिया था; किन्तु भगत सिंह जिन इरादों से यहाँ आये थे, उनमें से एक भी पूरा न हुआ। उलटी हानि यह हुई कि देहातो में जो भाजी-साग, उपले-ईधन मुफ्त मिल जाते थे, वे सब यहाँ बंद हो गये। यहाँ सबसे पुराना घराँव था। न किसी को दबा सकते थे, न सता सकते थे। इस दुरवस्था में जगतसिंह की हथलपकियॉँ बहुत अखरतीं। उन्होंने कितनी ही बार उसे बड़ी निर्दयता से पीटा। जगतसिंह भीमकाय होने पर भी चुपचाप मार खा लिया करता। अगर वह अपने पिता के दोनों हाथ पकड़ लेता, तो वह हिल भी न सकते; पर जगतसिंह इतना सीनाजोर न था। हाँ, मार-पीट, घुड़की-धमकी किसी का उस पर कोई असर न होता था। 
जगतसिंह ज्यों ही घर में कदम रखता; चारों ओर से कॉँव-कॉँव मच जाती, मॉँ दुर-दुर करके दौड़ती, बहने गालियॉँ देन लगती; मानो घर में कोई सॉँड़ घुस आया हो। घर के ताले उसकी सूरत से जलते थे। इन तिरस्कारों ने उसे निर्लज्ज बना दिया था। कष्टों के ज्ञान से वह निर्द्वन्द्व-सा हो गया था। जहाँ नींद आ जाती, वहीं पड़ रहता; जो कुछ मिल जाता, वही खा लेता। 
ज्यों-ज्यों घर वालें को उसकी चोर-कला के गुप्त साधनों का ज्ञान होता जाता था, वे उससे चौकन्ने होते जाते थे। यहाँ तक कि एक बार पूरे महीने-भर तक उसकी दाल न गली। चरस वाले के कई रूपये ऊपर चढ़ गये। गॉँजे वाले ने धुआँधार तकाजे करने शुरू किय। हलवाई कड़वी बातें सुनाने लगा। बेचारे जगत को निकलना मुश्किल हो गया। रात-दिन ताक-झॉँक में रहता; पर घात न मिलत थी। आखिर एक दिन बिल्ली के भागों छींका टूटा। भक्तसिंह दोपहर को डाकखानें से चले, जो एक बीमा-रजिस्ट्री जेब में डाल ली। कौन जाने कोई हरकारा या डाकिया शरारत कर जाए; किंतु घर आये तो लिफाफे को अचकन की जेब से निकालने की सुधि न रही। जगतसिंह तो ताक लगाये हुए था ही। पेसे के लोभ से जेब टटोली, तो लिफाफा मिल गया। उस पर कई आने के टिकट लगे थे। वह कई बार टिकट चुरा कर आधे दामों पर बेच चुका था। चट लिफाफा उड़ा दिया। यदि उसे मालूम होता कि उसमें नोट हें, तो कदाचित वह न छूता; लेकिन जब उसने लिफाफा फाड़ डाला और उसमें से नोट निक पड़े तो वह बड़े धर्मसंकट में पड़ गया। वह फटा हुआ लिफाफा गला-फाड़ कर उसके दुष्कृत्य को धिक्कारने लगा। उसकी दशा उस शिकारी की-सी हो गयी, जो चिड़ियों का शिकार करने जाए और अनजाने में किसी आदमी पर निशाना मार दे। उसके मन में पश्चाताप था, लज्जा थी, दु:ख था, पर उसमें भूल का दंड सहने की शक्ति न थी। उसने नोट लिफाफे में रख दिये और बाहर चला गया। 
गरमी के दिन थे। दोपहर को सारा घर सो रहा था; पर जगत की आँखों में नींद न थी। आज उसकी बुरी तरह कुटाई होगी- इसमें संदेह न था। उसका घर पर रहना ठीक नहीं, दस-पॉँच दिन के लिए उसे कहीं खिसक जाना चाहिए। तब तक लोगों का क्रोध शांत हो जाता। लेकिन कहीं दूर गये बिना काम न चलेगा। बस्ती में वह क्रोध दिन तक अज्ञातवास नहीं कर सकता। कोई न कोई जरूर ही उसका पता देगा ओर वह पकड़ लिया जायगा। दूर जाने केक लिए कुछ न कुछ खर्च तो पास होना ही चहिए। क्यों न वह लिफाफे में से एक नोट निकाल ले? यह तो मालूम ही हो जायगा कि उसी ने लिफाफा फाड़ा है, फिर एक नोट निकल लेने में क्या हानि है? दादा के पास रूपये तो हे ही, झक मार कर दे देंगे। यह सोचकर उसने दस रूपये का एक नोट उड़ा लिया; मगर उसी वक्त उसके मन में एक नयी कल्पना का प्रादुर्भाव हुआ। अगर ये सब रूपये लेकर किसी दूसरे शहर में कोई दूकान खोल ले, तो बड़ा मजा हो। फिर एक-एक पैसे के लिए उसे क्यों किसी की चोरी करनी पड़े! कुछ दिनों में वह बहुत-सा रूपया जमा करके घर आयेगा; तो लोग कितने चकित हो जाएेंगे! 
उसने लिफाफे को फिर निकाला। उसमें कुल दो सौ रूपए के नोट थे। दो सौ में दूध की दूकान खूब चल सकती है। आखिर मुरारी की दूकान में दो-चार कढ़ाव और दो-चार पीतल के थालों के सिवा और क्या है? लेकिन कितने ठाट से रहता हे! रूपयों की चरस उड़ा देता हे। एक-एक दॉँव पर दस-दस रूपए रख देता है, नफा न होता, तो वह ठाट कहाँ से निभाता? इस आननद-कल्पना में वह इतना मग्न हुआ कि उसका मन उसके काबू से बाहर हो गया, जैसे प्रवाह में किसी के पॉँव उखड़ जाएें ओर वह लहरों में बह जाए। 
उसी दिन शाम को वह बम्बई चल दिया। दूसरे ही दिन मुंशी भक्तसिंह पर गबन का मुकदमा दायर हो गया। 


बम्बई के किले के मैदान में बैंड़ बज रहा था और राजपूत रेजिमेंट के सजीले सुंदर जवान कवायद कर रहे थे, जिस प्रकार हवा बादलों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बना बिगाड़ रहा था। 
जब कवायद खतम हो गयी, तो एक छरहरे डील का युवक नायक के सामने आकर खड़ा हो गया। नायक ने पूछा-क्या नाम है? सैनिक ने फौजी सलाम करके कहा-जगतसिंह? 
'क्या चाहते हो।' 
'फौज में भरती कर लीजिए।' 
'मरने से तो नहीं डरते?' 
'बिलकुल नहीं-राजपूत हूँ।' 
'बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।' 
'इसका भी डर नहीं।' 
'अदन जाना पड़ेगा।' 
'खुशी से जाऊँगा।' 
कप्तान ने देखा, बला का हाजिर-जवाब, मनचला, हिम्मत का धनी जवान है, तुरंत फौज में भरती कर लिया। तीसरे दिन रेजिमेंट अदन को रवाना हुआ। मगर ज्यों-ज्यों जहाज आगे चलता था, जगत का दिल पीछे रह जाता था। जब तक जमीन का किनारा नजर आता रहा, वह जहाज के डेक पर खड़ा अनुरक्त नेत्रों से उसे देखता रहा। जब वह भूमि-तट जल में विलीन हो गया तो उसने एक ठंडी सॉँस ली और मुँह ढॉँप कर रोने लगा। आज जीवन में पहली बर उसे प्रियजानों की याद आयी। वह छोटा-सा कस्बा, वह गॉँजे की दूकान, वह सैर-सपाटे, वह सुहूद-मित्रों के जमघट आँखों में फिरने लगे। कौन जाने, फिर कभी उनसे भेंट होगी या नहीं। एक बार वह इतना बेचैन हुआ कि जी में आय, पानी में कूद पड़े। 


जगतसिंह को अदन में रहते तीन महीने गुजर गए। भॉँति-भॉँति की नवीनताओं ने कई दिन तक उसे मुग्ध किये रखा; लेकिन पुराने संस्कार फिर जाग्रत होने लगे। अब कभी-कभी उसे स्नेहमयी माता की याद आने लगी, जो पिता के क्रोध, बहनों के धिक्कार और स्वजनों के तिरस्कार में भी उसकी रक्षा करती थी। उसे वह दिन याद आया, जब एक बार वह बीमार पड़ा था। उसके बचने की कोई आशा न थी, पर न तो पिता को उसकी कुछ चिन्ता थी, न बहनों को। केवल माता थी, जो रात की रात उसके सिरहाने बैठी अपनी मधुर, स्नेहमयी बातों से उसकी पीड़ा शांत करती रही थी। उन दिनों कितनी बार उसने उस देवी को नीव रात्रि में रोते देखा था। वह स्वयं रोगों से जीर्झ हो रही थी; लेकिन उसकी सेवा-शुश्रूषा में वह अपनी व्यथा को ऐसी भूल गयी थी, मानो उसे कोई कष्ट ही नहीं। क्या उसे माता के दर्शन फिर होंगे? वह इसी क्षोभ ओर नेराश्य में समुद्र-तट पर चला जाता और घण्टों अनंत जल-प्रवाह को देखा करता। कई दिनों से उसे घर पर एक पत्र भेजने की इच्छा हो रही थी, किंतु लज्जा और ग्लानिक कके कारण वह टालता जाता था। आखिर एक दिन उससे न रहा गया। उसने पत्र लिखा और अपने अपराधों के लिए क्षमा मॉँग। पत्र आदि से अन्त तक भक्ति से भरा हुआ थां अंत में उसने इन शब्दों में अपनी माता को आश्वासन दिया था-माता जी, मैने बड़े-बड़े उत्पात किय हें, आप लेग मुझसे तंग आ गयी थी, मै उन सारी भूलों के लिए सच्चे हृदय से लज्जित हूँ और आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जीता रहा, तो कुछ न कुछ करके दिखाऊँगा। तब कदाचित आपको मुझे अपना पुत्र कहने में संकोच न होगा। मुझे आर्शीवाद दीजिए कि अपनी प्रतिज्ञा का पालन कर सकूँ।' 
यह पत्र लिखकर उसने डाकखाने में छोड़ा और उसी दिन से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा; किंतु एक महीना गुजर गया और कोई जवाब न आया। आसका जी घबड़ाने लगा। जवाब क्यों नहीं आता-कहीं माता जी बीमार तो नहीं हैं? शायद दादा ने क्रोध-वश जवाब न लिखा होगा? कोई और विपत्ति तो नहीं आ पड़ी? कैम्प में एक वृक्ष के नीचे कुछ सिपाहियों ने शालिग्राम की एक मूर्ति रख छोड़ी थी। कुछ श्रद्धालू सैनिक रोज उस प्रतिमा पर जल चढ़ाया करते थे। जगतसिंह उनकी हँसी उड़ाया करता; पर आप वह विक्षिप्तों की भॉँति प्रतिमा के सम्मुख जाकर बड़ी देर तक मस्तक झुकाये बेठा रहा। वह इसी ध्यानावस्था में बैठा था कि किसी ने उसका नाम लेकर पुकार, यह दफ्तर का चपरासी था और उसके नाम की चिट्ठी लेकर आया थां जगतसिंह ने पत्र हाथ में लिया, तो उसकी सारी देह कॉँप उठी। ईश्वर की स्तुति करके उसने लिफाफा खोला ओर पत्र पढ़ा। लिखा था-'तुम्हारे दादा को गबन के अभियोग में पॉँच वर्ष की सजा हो गई। तुम्हारी माता इस शोक में मरणासन्न है। छुट्टी मिले, तो घर चले आओ।' 
जगतसिंह ने उसी वक्त कप्तान के पास जाकर कह -'हुजूर, मेरी मॉँ बीमार है, मुझे छुट्टी दे दीजिए।' 
कप्तान ने कठोर आँखों से देखकर कहा-अभी छुट्टी नहीं मिल सकती। 
'तो मेरा इस्तीफा ले लीजिए।' 
'अभी इस्तीफा नहीं लिया जा सकता।' 'मै अब एक क्षण भी नहीं रह सकता।' 
'रहना पड़ेगा। तुम लोगों को बहुत जल्द लाभ पर जाना पड़ेगा।' 
'लड़ाई छिड़ गयी! आह, तब मैं घर नहीं जाऊँगा? हम लोग कब तक यहाँ से जाएंगे?' 
'बहुत जल्द, दो ही चार दिनों में।' 


चार वर्ष बीत गए। कैप्टन जगतसिंह का-सा योद्धा उस रेजीमेंट में नहीं हैं। कठिन अवस्थाओं में उसका साहस और भी उत्तेजित हो जाता है। जिस महिम में सबकी हिम्मते जवाब दे जाती है, उसे सर करना उसी का काम है। हल्ले और धावे में वह सदैव सबसे आगे रहता है, उसकी त्योरियों पर कभी मैल नहीं आता; उसके साथ ही वह इतना विनम्र, इतना गंभीर, इतना प्रसन्नचित है कि सारे अफसर ओर मातहत उसकी बड़ाई करते हैं, उसका पुनर्जीतन-सा हो गया। उस पर अफसरों को इतना विश्वास है कि अब वे प्रत्येक विषय में उससे परामर्श करते हें। जिससे पूछिए, वही वीर जगतसिंह की विरूदावली सुना देगा-कैसे उसने जर्मनों की मेगजीन में आग लगायी, कैसे अपने कप्तान को मशीनगनों की मार से निकाला, कैसे अपने एक मातहत सिपाही को कंधे पर लेकर निल आया। ऐसा जान पड़ता है, उसे अपने प्राणों का मोह नही, मानो वह काल को खोजता फिरता हो! 
लेकिन नित्य रात्रि के समय, जब जगतसिंह को अवकाश मिलता है, वह अपनी छोलदारी में अकेले बैठकर घरवालों की याद कर लिया करता है-दो-चार आँसू की बँदे अवश्य गिरा देता हे। वह प्रतिमास अपने वेतन का बड़ा भाग घर भेज देता है, और ऐसा कोई सप्ताह नहीं जाता जब कि वह माता को पत्र न लिखता हो। सबसे बड़ी चिंता उसे अपने पिता की है, जो आज उसी के दुष्कर्मो के कारण कारावास की यातना झेल रहे हैं। हाय! वह कौन दिन होगा, जब कि वह उनके चरणों पर सिर रखकर अपना अपराध क्षमा करायेगा, और वह उसके सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद देंगे? 


सवा चार वर्ष बीत गए। संध्या का समय है। नैनी जेल के द्वार पर भीड़ लगी हुई है। कितने ही कैदियों की मियाद पूरी हो गयी है। उन्हें लिवा जाने के लिए उनके घरवाले आये हुए है; किन्तु बूढ़ा भक्तसिंह अपनी अँधेरी कोठरी में सिर झुकाये उदास बैठा हुआ है। उसकी कमर झुक कर कमान हो गयी है। देह अस्थि-पंजर-मात्र रह गयी हे। ऐसा जान पड़ता हें, किसी चतुर शिल्पी ने एक अकाल- पीड़ित मनुष्य की मूर्ति बनाकर रख दी है। उसकी भी मीयाद पूरी हो गयी है; लेकिन उसके घर से कोई नहीं आया। आये कौन? आने वाल था ही कौन? 
एक बूढ़ किन्तु हृष्ट-पुष्ट कैदी ने आकर उसक कंधा हिलाया और बोला-कहो भगत, कोई घर से आया? 
भक्तसिंह ने कंपित कंठ-स्वर से कहा-घर पर है ही कौन? 
'घर तो चलोगे ही?' 
'मेरे घर कहाँ है?' 
'तो क्या यही पड़े रहोंगे?' 
'अगर ये लोग निकाल न देंगे, तो यहीं पड़ा रहूँगा।' 
आज चार साल के बाद भगतसिंह को अपने प्रताड़ित, निर्वासित पुत्र की याद आ रही थी। जिसके कारण जीतन का सर्वनाश हो गया; आबरू मिट गयी; घर बरबाद हो गया, उसकी स्मृति भी असहय थी; किन्तु आज नैराश्य ओर दु:ख के अथाह सागर में डूबते हुए उन्होंने उसी तिनके का सहार लियां न-जाने उस बेचारे की क्या दख्शा हुई। लाख बुरा है, तो भी अपना लड़का हे। खानदान की निशानी तो हे। मरूँगा तो चार आँसू तो बहायेगा; दो चिल्लू पानी तो देगा। हाय! मैने उसके साथ कभी प्रेम का व्यवहार नहीं कियां जरा भी शरारत करता, तो यमदूत की भॉँति उसकी गर्दन पर सवार हो जाता। एक बार रसोई में बिना पैर धोये चले जाने के दंड में मेने उसे उलटा लटका दिया था। कितनी बार केवल जोर से बोलने पर मैंने उस वमाचे लगाये थे। पुत्र-सा रत्न पाकर मैंने उसका आदर न कियां उसी का दंड है। जहाँ प्रेम का बन्धन शिथिल हो, वहाँ परिवार की रक्षा कैसे हो सकती है? 


सबेरा हुआ। आशा की सूर्य निकला। आज उसकी रश्मियॉँ कितनी कोमल और मधुर थीं, वायु कितनी सुखद, आकाश कितना मनोहर, वृक्ष कितने हरे-भरे, पक्षियों का कलरव कितना मीठा! सारी प्रकृति आश के रंग में रंगी हुई थी; पर भक्तसिंह के लिए चारों ओर धरे अंधकार था। 
जेल का अफसर आया। कैदी एक पंक्ति में खड़े हुए। अफसर एक-एक का नाम लेकर रिहाई का परवाना देने लगा। कैदियों के चेहरे आशा से प्रफुलित थे। जिसका नाम आता, वह खुश-खुश अफसर के पास जात, परवाना लेता, झुककर सलाम करता और तब अपने विपत्तिकाल के संगियों से गले मिलकर बाहर निकल जाता। उसके घरवाले दौड़कर उससे लिपट जाते। कोई पैसे लुटा रहा था, कहीं मिठाइयॉँ बॉँटी जा रही थीं, कहीं जेल के कर्मचारियों को इनाम दिया जा रहा था। आज नरक के पुतले विनम्रता के देवता बने हुए थे। 
अन्त में भक्तसिंह का नाम आया। वह सिर झुकाये आहिस्ता-आहिस्ता जेलर के पास गये और उदासीन भाव से परवाना लेकर जेल के द्वार की ओर चले, मानो सामने कोई समुद्र लहरें मार रहा है। द्वार से बाहर निकल कर वह जमीन पर बैठ गये। कहाँ जाएँ? 
सहसा उन्होंने एक सैनिक अफसर को घोड़े पर सवार, जेल की ओर आते देखा। उसकी देह पर खाकी वरदी थी, सिर पर कारचोबी साफा। अजीब शान से घोड़े पर बैठा हुआ था। उसके पीछे-पीछे एक फिटन आ रही थी। जेल के सिपाहियों ने अफसर को देखते ही बन्दूकें सँभाली और लाइन में खड़े हाकर सलाम किया। 
भक्तससिंह ने मन में कहा-एक भाग्यवान वह है, जिसके लिए फिटन आ रही है; ओर एक अभागा मै हूँ, जिसका कहीं ठिकाना नहीं। 
फौजी अफसर ने इधर-उधर देखा और घोड़े से उतर कर सीधे भक्तसिंह के सामने आकर खड़ा हो गया। 
भक्तसिंह ने उसे ध्यान से देखा और तब चौंककर उठ खड़े हुए और बोले-अरे! बेटा जगतसिंह! 
जगतसिंह रोता हुआ उनके पैरों पर गिर पड़ा। 

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 23 May 2020 at 8:30 AM -

Kaptaan Sahib - Munshi Premchand


कप्तान साहब - मुंशी प्रेम चंद

1
जगत सिंह को स्कूल जान कुनैन खाने या मछली का तेल पीने से कम अप्रिय न था। वह सैलानी, आवारा, घुमक्कड़ युवक थां कभी अमरूद के बागों की ओर निकल जाता और अमरूदों के साथ माली की गालियॉँ बड़े शौक ... से खाता। कभी दरिया की सैर करता और मल्लाहों को डोंगियों में बैठकर उस पार के देहातों में निकल जाता। गालियॉँ खाने में उसे मजा आता था। गालियॉँ खाने का कोई अवसर वह हाथ से न जाने देता। सवार के घोड़े के पीछे ताली बजाना, एक्को को पीछे से पकड़ कर अपनी ओर खींचना, बूढों की चाल की नकल करना, उसके मनोरंजन के विषय थे। आलसी काम तो नहीं करता; पर दुर्व्यसनों का दास होता है, और दुर्व्यसन धन के बिना पूरे नहीं होते। जगतसिंह को जब अवसर मिलता घर से रूपये उड़ा ले जात। नकद न मिले, तो बरतन और कपड़े उठा ले जाने में भी उसे संकोच न होता था। घर में शीशियॉँ और बोतलें थीं, वह सब उसने एक-एक करके गुदड़ी बाजार पहुँचा दी। पुराने दिनों की कितनी चीजें घर में पड़ी थीं, उसके मारे एक भी न बची। इस कला में ऐसा दक्ष ओर निपुण था कि उसकी चतुराई और पटुता पर आश्चर्य होता था। एक बार बाहर ही बाहर, केवल कार्निसों के सहारे अपने दो-मंजिला मकान की छत पर चढ़ गया और ऊपर ही से पीतल की एक बड़ी थाली लेकर उतर आया। घर वालें को आहट तक न मिली। 
उसके पिता ठाकुर भक्त सिहं अपने कस्बे के डाकखाने के मुंशी थे। अफसरों ने उन्हें शहर का डाकखाना बड़ी दौड़-धूप करने पर दिया था; किन्तु भक्त सिंह जिन इरादों से यहाँ आये थे, उनमें से एक भी पूरा न हुआ। उलटी हानि यह हुई कि देहातो में जो भाजी-साग, उपले-ईधन मुफ्त मिल जाते थे, वे सब यहाँ बंद हो गये। यहाँ सबसे पुराना घराँव थां न किसी को दबा सकते थे, न सता सकते थे। इस दुरवस्था में जगतसिंह की हथलपकियॉँ बहुत अखरतीं। अन्होंने कितनी ही बार उसे बड़ी निर्दयता से पीटा। जगतसिंह भीमकाय होने पर भी चुपके में मार खा लिया करता थां अगर वह अपने पिता के हाथ पकड़ लेता, तो वह हल भी न सकते; पर जगतसिंह इतना सीनाजोर न था। हाँ, मार-पीट, घुड़की-धमकी किसी का भी उस पर असर न होता था। 
जगतसिंह ज्यों ही घर में कदम रखता; चारों ओर से कॉँव-कॉँव मच जाती, मॉँ दुर-दुर करके दौड़ती, बहने गालियॉँ देन लगती; मानो घर में कोई सॉँड़ घुस आया हो। घर ताले उसकी सूरत से जलते थे। इन तिरस्कारों ने उसे निर्लज्ज बना दिया थां कष्टों के ज्ञान से वह निर्द्वन्द्व-सा हो गया था। जहाँ नींद आ जाती, वहीं पड़ रहता; जो कुछ मिल जात, वही खा लेता। 
ज्यों-ज्यों घर वालें को उसकी चोर-कला के गुप्त साधनों का ज्ञान होता जाता था, वे उससे चौकन्ने होते जाते थे। यहाँ तक कि एक बार पूरे महीने-भर तक उसकी दाल न गली। चरस वाले के कई रूपये ऊपर चढ़ गये। गॉँजे वाले ने धुआँधार तकाजे करने शुरू किय। हलवाई कड़वी बातें सुनाने लगा। बेचारे जगत को निकलना मुश्किल हो गया। रात-दिन ताक-झॉँक में रहता; पर घात न मिलत थी। आखिर एक दिन बिल्ली के भागों छींका टूटा। भक्तसिंह दोपहर को डाकखानें से चले, जो एक बीमा-रजिस्ट्री जेब में डाल ली। कौन जाने कोई हरकारा या डाकिया शरारत कर जाए; किंतु घर आये तो लिफाफे को अचकन की जेब से निकालने की सुधि न रही। जगतसिंह तो ताक लगाये हुए था ही। पेसे के लोभ से जेब टटोली, तो लिफाफा मिल गया। उस पर कई आने के टिकट लगे थे। वह कई बार टिकट चुरा कर आधे दामों पर बेच चुका था। चट लिफाफा उड़ा दिया। यदि उसे मालूम होता कि उसमें नोट हें, तो कदाचित वह न छूता; लेकिन जब उसने लिफाफा फाड़ डाला और उसमें से नोट निक पड़े तो वह बड़े संकट में पड़ गया। वह फटा हुआ लिफाफा गला-फाड़ कर उसके दुष्कृत्य को धिक्कारने लगा। उसकी दशा उस शिकारी की-सी हो गयी, जो चिड़ियों का शिकार करने जाए और अनजान में किसी आदमी पर निशाना मार दे। उसके मन में पश्चाताप था, लज्जा थी, दु:ख था, पर उसे भूल का दंड सहने की शक्ति न थी। उसने नोट लिफाफे में रख दिये और बाहर चला गया। 
गरमी के दिन थे। दोपहर को सारा घर सो रहा था; पर जगत की आँखें में नींद न थी। आज उसकी बुरी तरह कुंदी होगी- इसमें संदेह न था। उसका घर पर रहना ठीक नहीं, दस-पॉँच दिन के लिए उसे कहीं खिसक जाना चाहिए। तब तक लोगों का क्रोध शांत हो जाता। लेकिन कहीं दूर गये बिना काम न चलेगा। बस्ती में वह क्रोध दिन तक अज्ञातवास नहीं कर सकता। कोई न कोई जरूर ही उसका पता देगा ओर वह पकड़ लिया जायगा। दूर जाने केक लिए कुछ न कुछ खर्च तो पास होना ही चहिए। क्यों न वह लिफाफे में से एक नोट निकाल ले? यह तो मालूम ही हो जायगा कि उसी ने लिफाफा फाड़ा है, फिर एक नोट निकल लेने में क्या हानि है? दादा के पास रूपये तो हे ही, झक मार कर दे देंगे। यह सोचकर उसने दस रूपये का एक नोट उड़ा लिया; मगर उसी वक्त उसके मन में एक नयी कल्पना का प्रादुर्भाव हुआ। अगर ये सब रूपये लेकर किसी दूसरे शहर में कोई दूकान खोल ले, तो बड़ा मजा हो। फिर एक-एक पैसे के लिए उसे क्यों किसी की चोरी करनी पड़े! कुछ दिनों में वह बहुत-सा रूपया जमा करके घर आयेगा; तो लोग कितने चकित हो जाएेंगे! 
उसने लिफाफे को फिर निकाला। उसमें कुल दो सौ रूपए के नोट थे। दो सौ में दूध की दूकान खूब चल सकती है। आखिर मुरारी की दूकान में दो-चार कढ़ाव और दो-चार पीतल के थालों के सिवा और क्या है? लेकिन कितने ठाट से रहता हे! रूपयों की चरस उड़ा देता हे। एक-एक दॉँव पर दस-दस रूपए रख देता है, नफा न होता, तो वह ठाट कहाँ से निभाता? इस आननद-कल्पना में वह इतना मग्न हुआ कि उसका मन उसके काबू से बाहर हो गया, जैसे प्रवाह में किसी के पॉँव उखड़ जाएें ओर वह लहरों में बह जाए। 
उसी दिन शाम को वह बम्बई चल दिया। दूसरे ही दिन मुंशी भक्तसिंह पर गबन का मुकदमा दायर हो गया। 


बम्बई के किले के मैदान में बैंड़ बज रहा था और राजपूत रेजिमेंट के सजीले सुंदर जवान कवायद कर रहे थे, जिस प्रकार हवा बादलों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बना बिगाड़ रहा था। 
जब कवायद खतम हो गयी, तो एक छरहरे डील का युवक नायक के सामने आकर खड़ा हो गया। नायक ने पूछा-क्या नाम है? सैनिक ने फौजी सलाम करके कहा-जगतसिंह? 
'क्या चाहते हो।' 
'फौज में भरती कर लीजिए।' 
'मरने से तो नहीं डरते?' 
'बिलकुल नहीं-राजपूत हूँ।' 
'बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।' 
'इसका भी डर नहीं।' 
'अदन जाना पड़ेगा।' 
'खुशी से जाऊँगा।' 
कप्तान ने देखा, बला का हाजिर-जवाब, मनचला, हिम्मत का धनी जवान है, तुरंत फौज में भरती कर लिया। तीसरे दिन रेजिमेंट अदन को रवाना हुआ। मगर ज्यों-ज्यों जहाज आगे चलता था, जगत का दिल पीछे रह जाता था। जब तक जमीन का किनारा नजर आता रहा, वह जहाज के डेक पर खड़ा अनुरक्त नेत्रों से उसे देखता रहा। जब वह भूमि-तट जल में विलीन हो गया तो उसने एक ठंडी सॉँस ली और मुँह ढॉँप कर रोने लगा। आज जीवन में पहली बर उसे प्रियजानों की याद आयी। वह छोटा-सा कस्बा, वह गॉँजे की दूकान, वह सैर-सपाटे, वह सुहूद-मित्रों के जमघट आँखों में फिरने लगे। कौन जाने, फिर कभी उनसे भेंट होगी या नहीं। एक बार वह इतना बेचैन हुआ कि जी में आय, पानी में कूद पड़े। 


जगतसिंह को अदन में रहते तीन महीने गुजर गए। भॉँति-भॉँति की नवीनताओं ने कई दिन तक उसे मुग्ध किये रखा; लेकिन पुराने संस्कार फिर जाग्रत होने लगे। अब कभी-कभी उसे स्नेहमयी माता की याद आने लगी, जो पिता के क्रोध, बहनों के धिक्कार और स्वजनों के तिरस्कार में भी उसकी रक्षा करती थी। उसे वह दिन याद आया, जब एक बार वह बीमार पड़ा था। उसके बचने की कोई आशा न थी, पर न तो पिता को उसकी कुछ चिन्ता थी, न बहनों को। केवल माता थी, जो रात की रात उसके सिरहाने बैठी अपनी मधुर, स्नेहमयी बातों से उसकी पीड़ा शांत करती रही थी। उन दिनों कितनी बार उसने उस देवी को नीव रात्रि में रोते देखा था। वह स्वयं रोगों से जीर्झ हो रही थी; लेकिन उसकी सेवा-शुश्रूषा में वह अपनी व्यथा को ऐसी भूल गयी थी, मानो उसे कोई कष्ट ही नहीं। क्या उसे माता के दर्शन फिर होंगे? वह इसी क्षोभ ओर नेराश्य में समुद्र-तट पर चला जाता और घण्टों अनंत जल-प्रवाह को देखा करता। कई दिनों से उसे घर पर एक पत्र भेजने की इच्छा हो रही थी, किंतु लज्जा और ग्लानिक कके कारण वह टालता जाता था। आखिर एक दिन उससे न रहा गया। उसने पत्र लिखा और अपने अपराधों के लिए क्षमा मॉँग। पत्र आदि से अन्त तक भक्ति से भरा हुआ थां अंत में उसने इन शब्दों में अपनी माता को आश्वासन दिया था-माता जी, मैने बड़े-बड़े उत्पात किय हें, आप लेग मुझसे तंग आ गयी थी, मै उन सारी भूलों के लिए सच्चे हृदय से लज्जित हूँ और आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जीता रहा, तो कुछ न कुछ करके दिखाऊँगा। तब कदाचित आपको मुझे अपना पुत्र कहने में संकोच न होगा। मुझे आर्शीवाद दीजिए कि अपनी प्रतिज्ञा का पालन कर सकूँ।' 
यह पत्र लिखकर उसने डाकखाने में छोड़ा और उसी दिन से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा; किंतु एक महीना गुजर गया और कोई जवाब न आया। आसका जी घबड़ाने लगा। जवाब क्यों नहीं आता-कहीं माता जी बीमार तो नहीं हैं? शायद दादा ने क्रोध-वश जवाब न लिखा होगा? कोई और विपत्ति तो नहीं आ पड़ी? कैम्प में एक वृक्ष के नीचे कुछ सिपाहियों ने शालिग्राम की एक मूर्ति रख छोड़ी थी। कुछ श्रद्धालू सैनिक रोज उस प्रतिमा पर जल चढ़ाया करते थे। जगतसिंह उनकी हँसी उड़ाया करता; पर आप वह विक्षिप्तों की भॉँति प्रतिमा के सम्मुख जाकर बड़ी देर तक मस्तक झुकाये बेठा रहा। वह इसी ध्यानावस्था में बैठा था कि किसी ने उसका नाम लेकर पुकार, यह दफ्तर का चपरासी था और उसके नाम की चिट्ठी लेकर आया थां जगतसिंह ने पत्र हाथ में लिया, तो उसकी सारी देह कॉँप उठी। ईश्वर की स्तुति करके उसने लिफाफा खोला ओर पत्र पढ़ा। लिखा था-'तुम्हारे दादा को गबन के अभियोग में पॉँच वर्ष की सजा हो गई। तुम्हारी माता इस शोक में मरणासन्न है। छुट्टी मिले, तो घर चले आओ।' 
जगतसिंह ने उसी वक्त कप्तान के पास जाकर कह -'हुजूर, मेरी मॉँ बीमार है, मुझे छुट्टी दे दीजिए।' 
कप्तान ने कठोर आँखों से देखकर कहा-अभी छुट्टी नहीं मिल सकती। 
'तो मेरा इस्तीफा ले लीजिए।' 
'अभी इस्तीफा नहीं लिया जा सकता।' 'मै अब एक क्षण भी नहीं रह सकता।' 
'रहना पड़ेगा। तुम लोगों को बहुत जल्द लाभ पर जाना पड़ेगा।' 
'लड़ाई छिड़ गयी! आह, तब मैं घर नहीं जाऊँगा? हम लोग कब तक यहाँ से जाएंगे?' 
'बहुत जल्द, दो ही चार दिनों में।' 


चार वर्ष बीत गए। कैप्टन जगतसिंह का-सा योद्धा उस रेजीमेंट में नहीं हैं। कठिन अवस्थाओं में उसका साहस और भी उत्तेजित हो जाता है। जिस महिम में सबकी हिम्मते जवाब दे जाती है, उसे सर करना उसी का काम है। हल्ले और धावे में वह सदैव सबसे आगे रहता है, उसकी त्योरियों पर कभी मैल नहीं आता; उसके साथ ही वह इतना विनम्र, इतना गंभीर, इतना प्रसन्नचित है कि सारे अफसर ओर मातहत उसकी बड़ाई करते हैं, उसका पुनर्जीतन-सा हो गया। उस पर अफसरों को इतना विश्वास है कि अब वे प्रत्येक विषय में उससे परामर्श करते हें। जिससे पूछिए, वही वीर जगतसिंह की विरूदावली सुना देगा-कैसे उसने जर्मनों की मेगजीन में आग लगायी, कैसे अपने कप्तान को मशीनगनों की मार से निकाला, कैसे अपने एक मातहत सिपाही को कंधे पर लेकर निल आया। ऐसा जान पड़ता है, उसे अपने प्राणों का मोह नही, मानो वह काल को खोजता फिरता हो! 
लेकिन नित्य रात्रि के समय, जब जगतसिंह को अवकाश मिलता है, वह अपनी छोलदारी में अकेले बैठकर घरवालों की याद कर लिया करता है-दो-चार आँसू की बँदे अवश्य गिरा देता हे। वह प्रतिमास अपने वेतन का बड़ा भाग घर भेज देता है, और ऐसा कोई सप्ताह नहीं जाता जब कि वह माता को पत्र न लिखता हो। सबसे बड़ी चिंता उसे अपने पिता की है, जो आज उसी के दुष्कर्मो के कारण कारावास की यातना झेल रहे हैं। हाय! वह कौन दिन होगा, जब कि वह उनके चरणों पर सिर रखकर अपना अपराध क्षमा करायेगा, और वह उसके सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद देंगे? 


सवा चार वर्ष बीत गए। संध्या का समय है। नैनी जेल के द्वार पर भीड़ लगी हुई है। कितने ही कैदियों की मियाद पूरी हो गयी है। उन्हें लिवा जाने के लिए उनके घरवाले आये हुए है; किन्तु बूढ़ा भक्तसिंह अपनी अँधेरी कोठरी में सिर झुकाये उदास बैठा हुआ है। उसकी कमर झुक कर कमान हो गयी है। देह अस्थि-पंजर-मात्र रह गयी हे। ऐसा जान पड़ता हें, किसी चतुर शिल्पी ने एक अकाल- पीड़ित मनुष्य की मूर्ति बनाकर रख दी है। उसकी भी मीयाद पूरी हो गयी है; लेकिन उसके घर से कोई नहीं आया। आये कौन? आने वाल था ही कौन? 
एक बूढ़ किन्तु हृष्ट-पुष्ट कैदी ने आकर उसक कंधा हिलाया और बोला-कहो भगत, कोई घर से आया? 
भक्तसिंह ने कंपित कंठ-स्वर से कहा-घर पर है ही कौन? 
'घर तो चलोगे ही?' 
'मेरे घर कहाँ है?' 
'तो क्या यही पड़े रहोंगे?' 
'अगर ये लोग निकाल न देंगे, तो यहीं पड़ा रहूँगा।' 
आज चार साल के बाद भगतसिंह को अपने प्रताड़ित, निर्वासित पुत्र की याद आ रही थी। जिसके कारण जीतन का सर्वनाश हो गया; आबरू मिट गयी; घर बरबाद हो गया, उसकी स्मृति भी असहय थी; किन्तु आज नैराश्य ओर दु:ख के अथाह सागर में डूबते हुए उन्होंने उसी तिनके का सहार लियां न-जाने उस बेचारे की क्या दख्शा हुई। लाख बुरा है, तो भी अपना लड़का हे। खानदान की निशानी तो हे। मरूँगा तो चार आँसू तो बहायेगा; दो चिल्लू पानी तो देगा। हाय! मैने उसके साथ कभी प्रेम का व्यवहार नहीं कियां जरा भी शरारत करता, तो यमदूत की भॉँति उसकी गर्दन पर सवार हो जाता। एक बार रसोई में बिना पैर धोये चले जाने के दंड में मेने उसे उलटा लटका दिया था। कितनी बार केवल जोर से बोलने पर मैंने उस वमाचे लगाये थे। पुत्र-सा रत्न पाकर मैंने उसका आदर न कियां उसी का दंड है। जहाँ प्रेम का बन्धन शिथिल हो, वहाँ परिवार की रक्षा कैसे हो सकती है? 


सबेरा हुआ। आशा की सूर्य निकला। आज उसकी रश्मियॉँ कितनी कोमल और मधुर थीं, वायु कितनी सुखद, आकाश कितना मनोहर, वृक्ष कितने हरे-भरे, पक्षियों का कलरव कितना मीठा! सारी प्रकृति आश के रंग में रंगी हुई थी; पर भक्तसिंह के लिए चारों ओर धरे अंधकार था। 
जेल का अफसर आया। कैदी एक पंक्ति में खड़े हुए। अफसर एक-एक का नाम लेकर रिहाई का परवाना देने लगा। कैदियों के चेहरे आशा से प्रफुलित थे। जिसका नाम आता, वह खुश-खुश अफसर के पास जात, परवाना लेता, झुककर सलाम करता और तब अपने विपत्तिकाल के संगियों से गले मिलकर बाहर निकल जाता। उसके घरवाले दौड़कर उससे लिपट जाते। कोई पैसे लुटा रहा था, कहीं मिठाइयॉँ बॉँटी जा रही थीं, कहीं जेल के कर्मचारियों को इनाम दिया जा रहा था। आज नरक के पुतले विनम्रता के देवता बने हुए थे। 
अन्त में भक्तसिंह का नाम आया। वह सिर झुकाये आहिस्ता-आहिस्ता जेलर के पास गये और उदासीन भाव से परवाना लेकर जेल के द्वार की ओर चले, मानो सामने कोई समुद्र लहरें मार रहा है। द्वार से बाहर निकल कर वह जमीन पर बैठ गये। कहाँ जाएँ? 
सहसा उन्होंने एक सैनिक अफसर को घोड़े पर सवार, जेल की ओर आते देखा। उसकी देह पर खाकी वरदी थी, सिर पर कारचोबी साफा। अजीब शान से घोड़े पर बैठा हुआ था। उसके पीछे-पीछे एक फिटन आ रही थी। जेल के सिपाहियों ने अफसर को देखते ही बन्दूकें सँभाली और लाइन में खड़े हाकर सलाम किया। 
भक्तससिंह ने मन में कहा-एक भाग्यवान वह है, जिसके लिए फिटन आ रही है; ओर एक अभागा मै हूँ, जिसका कहीं ठिकाना नहीं। 
फौजी अफसर ने इधर-उधर देखा और घोड़े से उतर कर सीधे भक्तसिंह के सामने आकर खड़ा हो गया। 
भक्तसिंह ने उसे ध्यान से देखा और तब चौंककर उठ खड़े हुए और बोले-अरे! बेटा जगतसिंह! 
जगतसिंह रोता हुआ उनके पैरों पर गिर पड़ा। 

user image Pramod Sharma - 13 May 2020 at 7:40 PM -

श्री दुर्गा सप्तशती संपूर्ण

श्री दुर्गा सप्तशती संपूर्ण
जनकर्ता स्नान करके, आसन शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके, शुद्ध आसन पर बैठ जाएं, साथ में शुद्ध जल, पूजन सामग्री और श्री दुर्गा सप्तशती की पुस्तक सामने रखें। इन्हें अपने सामने काष्ठ आदि के शुद्ध आसन पर विराजमान कर दें। माथे पर ... अपनी पसंद के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें, शिखा बांध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्व शुद्धि के लिए चार बार आचमन करें। इस समय निम्न मंत्रों को बोलें-

ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥

तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें, फिर 'पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ' इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें-

चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है, किन्तु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गई है।

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रहकृतराजकृतसर्व-विधपीडानिवृत्तिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायुः पुष्टिधनधान्यसमृद्ध्‌यर्थं श्री नवदुर्गाप्रसादेन सर्वापन्निवृत्तिसर्वाभीष्टफलावाप्तिधर्मार्थ- काममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थसिद्धिद्वारा श्रीमहाकाली-महालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थं शापोद्धारपुरस्परं कवचार्गलाकीलकपाठ- वेदतन्त्रोक्त रात्रिसूक्त पाठ देव्यथर्वशीर्ष पाठन्यास विधि सहित नवार्णजप सप्तशतीन्यास- धन्यानसहितचरित्रसम्बन्धिविनियोगन्यासध्यानपूर्वकं च 'मार्कण्डेय उवाच॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।' इत्याद्यारभ्य 'सावर्णिर्भविता मनुः' इत्यन्तं दुर्गासप्तशतीपाठं तदन्ते न्यासविधिसहितनवार्णमन्त्रजपं वेदतन्त्रोक्तदेवीसूक्तपाठं रहस्यत्रयपठनं शापोद्धारादिकं च किरष्ये/करिष्यामि।

इस प्रकार प्रतिज्ञा (संकल्प) करके देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार की विधि से पुस्तक की पूजा करें, योनिमुद्रा का प्रदर्शन करके भगवती को प्रणाम करें, फिर मूल नवार्ण मन्त्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें। इसके बाद शापोद्धार करना चाहिए। इसके अनेक प्रकार हैं।

'ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा'

इस मंत्र का आदि और अन्त में सात बार जप करें। यह शापोद्धार मंत्र कहलाता है। इसके अनन्तर उत्कीलन मन्त्र का जाप किया जाता है।

इसका जप आदि और अन्त में इक्कीस-इक्कीस बार होता है। यह मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।' इसके जप के पश्चात्‌ आदि और अन्त में सात-सात बार मृतसंजीवनी विद्या का जाप करना चाहिए, जो इस प्रकार है-

'ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।'

मारीचकल्प के अनुसार सप्तशती-शापविमोचन का मन्त्र यह है-

'ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।'

इस मन्त्र का आरंभ में ही एक सौ आठ बार जाप करना चाहिए, पाठ के अन्त में नहीं। अथवा रुद्रयामल महातन्त्र के अंतर्गत दुर्गाकल्प में कहे हुए चण्डिका शाप विमोचन मन्त्र का आरंभ में ही पाठ करना चाहिए। वे मन्त्र इस प्रकार हैं-

ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठ-नारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्री शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पितकार्यसिद्ध्‌यर्थे जपे विनियोगः।

ॐ (ह्रीं) रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥1॥
ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठ विश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥2॥
ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥3॥
ॐ क्षुं धुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥4॥
ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥5॥
ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥6॥
ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव॥7॥
ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥8॥
ॐ जां जातिस्वरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥9॥
ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥10॥
ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥11॥
ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफलदात्र्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥12॥
ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥13॥
ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमसहितायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥14॥
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥15॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥16॥
ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥17॥
ॐ ऐं ह्री क्लीं महाकालीमहालक्ष्मी-
महासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः॥18॥
इत्येवं हि महामन्त्रान्‌ पठित्वा परमेश्वर।
चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशयः॥19॥
एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति यः।
आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशयः॥20॥

इस प्रकार शापोद्धार करने के अनन्तर अन्तर्मातृका बहिर्मातृका आदि न्यास करें, फिर श्रीदेवी का ध्यान करके रहस्य में बताए अनुसार नौ कोष्ठों वाले यन्त्र में महालक्ष्मी आदि का पूजन करें, इसके बाद छ: अंगों सहित दुर्गासप्तशती का पाठ आरंभ किया जाता है।

कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य- ये ही सप्तशती के छ: अंग माने गए हैं। इनके क्रम में भी मतभेद हैं। चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है, किन्तु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गई है।

जिस प्रकार सब मंत्रों में पहले बीज का, फिर शक्ति का तथा अन्त में कीलक का उच्चारण होता है, उसी प्रकार यहाँ भी पहले कवच रूप बीज का, फिर अर्गला रूपा शक्ति का तथा अन्त में कीलक रूप कीलक का क्रमशः पाठ होना चाहिए। यहाँ इसी क्रम का अनुसरण किया गया है।

(इसके बाद देवी कवच का पाठ करना चाहिए।)

॥ अथ देव्याः कवचम्‌ ॥

विनियोग
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप्‌ छन्दः, चामुण्डा देवता, अंगन्यासोक्तमातरो बीजम्‌, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्‌, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोगः।

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै॥

मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्‌।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥

ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्‌।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥2॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्‌॥3॥
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्‌॥4॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥
अग्निता दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥
न तेषा जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥7॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमानरूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥11॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥12॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शंख चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्‌॥13॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शांर्गमायुधमुत्तमम्‌॥14॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वस॥15॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महावले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिन।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥17॥
दक्षिणेऽवतु वाराहीनैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥18॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेद्धस्ताद् वैष्णवी तथा ॥19॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया में चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥20॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥
मालाधारी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥22॥
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले च शांकरी॥23॥
नासिकायां सुगन्दा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥24॥
दन्तान्‌ रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥25॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमंगला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥26॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू में व्रजधारिणी॥27॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च।
नखांछूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥।
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥29॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥30॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जंघे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥32॥
नखान्‌ दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥34॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥35॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्‌।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान्‌ रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥41॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥42॥
पदमेकं न गच्छेतु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥43॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्‌।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्‌॥44॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्‌॥45॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्‌।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥46॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥47॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जंगमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्‌॥48॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥49॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥50॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥51॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्‌॥52॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥53॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्‌।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥54॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्‌।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥55॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥56॥


॥ इति देव्याः कवचं संपूर्णम्‌ ॥

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 29 Apr 2020 at 11:11 PM -

दशहरा और दीपावली का महीना चैत्र

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अनुसार-

न तो आश्विन माह में रावण का वध हुआ और

न ही कार्तिक अमावस्या को राम अयोध्या लौटे दे।

अंधभक्त वाल्मीकीय रामायण का बुद्धि पूर्वक अध्ययन नहीं करते।

आश्विन मास में रावण को मार कर लोग ऋषि वाल्मीकि के साथ ... विश्वास घात करते हैं, जो नहीं किया जाना चाहिए।

वाल्मीकि रामायण में दसरथ पुत्र रामचन्द्र का राज्याभिषेक चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी छठी को होना था,

किन्तु राम का राज्याभिषेक तो दूर उन्ह कैकेई के दुराग्रह के कारण १४ वर्ष के लिए वनवास पर जाना पड़ा।

चैत्र श्रीमानयं मासः पुण्यः पुष्पित काननः,
यौवराज्याय रामस्य सर्वमेवोपकल्यताम् ।।
(अयोध्या काण्ड सर्ग ३ श्लोक 4)
अर्थ -
यह चैत्रमास बड़ा सुन्दर और पवित्र है , इसमें सारे वन -उपवन खिल उठे हैं, अतः इस समय श्रीराम का युवराज पद पर अभिषेक करने के लिए आप लोग सब सामग्री एकत्र कराइए।
श्व एव पुष्यो भविता श्वोभिषेच्यस्तु मे सुतः,
रामो राजीवपत्राक्षो युवराज इति प्रभुः ।।
(अयोध्या काण्ड सर्ग 4, श्लोक २)
अर्थ -
दसरथ ने मंत्रियों के साथ सलाह करके यह निश्चय किया कि कल ही पुष्य नक्षत्र होगा, अतः कल ही मुझे अपने पुत्र राम का युवराज के पद पर अभिषेक कर देना चाहिए।
अघ चन्द्रोम्युपगमत् पुष्यात् पूर्व पुनर्वसुम्,
श्वः पुष्ययोग नियत वक्ष्यन्ते दैव चिन्तकाः।
(अयोध्या काण्ड सर्ग 4 , श्लोक 21 )
अर्थ -
आज चन्द्रमा पुष्य से एक नक्षत्र पहले पुनर्वसु पर विराजमान है, अतः निश्चय ही कल वे पुष्य नक्षत्र पर रहेंगे, ऐसा ज्योतिषी लोगों का कहना है।

"योग्य पाठको! वाल्मीकीय रामायण के अनुसार राम का राज्याभिषेक चैत्र मास में ऐसी तिथि को होना था, जिस दिन पुष्य नक्षत्र पड़ रहा था।

सभी जानते हैं कि राम को अगले दिन राज्याभिषेक के स्थान पर १४ साल के लिए वन को जाना पड़ा।

भरत राम को लौटाने गये ,लेकिन राम लौटने को तैयार नहीं थे, तो भरत ने राम के समक्ष ही भीषण प्रतिज्ञा की -
चतुदर्शे हि सम्पूर्णे वर्षेऽहनि रघुत्तम,
न द्रक्ष्यामि यदि त्वां तु प्रवेच्क्षयामि हुताशनम् ।।
(अयोध्या काण्ड सर्ग ११२ श्लोक २५)
अर्थ -
हे राम! यदि चौदहवां वर्ष पूर्ण होने पर नूतन वर्ष के प्रथम दिन ही मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा तो मैं जलती हुई ज्वाला आग में प्रवेश कर जाऊंगा।

"भरत की यह प्रतिज्ञा राम हमेशा याद रखते थे। राम तेरह वर्ष तक तो सही सलामत रहे। चौदहवां वर्ष लगते ही उनके सामने परेशानियां आने लगीं। चौदहवें वर्ष में रावण द्वारा सीता का अपहरण किया गया। राम-लक्ष्मण सीता को खोजते - खोजते जब सुग्रीव के यहां पहुंचे उस समय वर्षा प्रारंभ हो चुकी थी।

बाली का वध करने के बाद वे चार महीने सुग्रीव के राज्य में ही रहे।

किष्किंधा काण्ड के सर्ग ३० श्लोक ६४ में राम कहते हैं-
चत्वारो वार्षिका मासा गता वर्षशतोपमाः,
मम शोकाभितप्तस्य तथा सीतायपश्यतः।
अर्थात- मैं सीता को न देखने के कारण शोक से संतप्त हो रहा हूं , अतः ये वर्षा के चार महीने मेरे लिए सौ वर्षो के समान बीते हैं।"

इसी सर्ग के श्लोक 68 में वे कहते हैं -
वर्षा समयकालं तु प्रतिज्ञाय हरीश्वरः,
व्यतीतांश्चतुरो मासान् विरहन् नावबुध्यते।
अर्थात- "सुग्रीव ने यह प्रतिज्ञा की थी कि वर्षा का अंत होते ही सीता की खोज आरंभ कर दी जाएगी किन्तु वह क्रीड़ा विहार में इतना तन्मय हो गया है कि इन बीते हुए चार महीनों का उसे पता ही नही है।"
सुग्रीव अंगद हनुमान को दक्षिण में भेजते हैं। अंगद व हनुमान आश्विन मास के बीतते बीतते दक्षिण की ओर गए थे। एक महीना व्यतीत हो गया लेकिन वे सीता की खोज नहीं कर पाए। अंगद हनुमान कहने लगे -
शासनात् कपिराज्यस्य वयं सर्वे विनिर्गताः,
मासः पूर्णो बिलस्थानां हरयः किं न बुध्यते।
वयमाश्वयुजे मासि कालसंख्याव्यवस्थिताः,
प्रस्थिताः सोऽपि चातीतः किमतः कार्यमुत्तरम् ।
(किष्किन्धा काण्ड सर्ग 53 श्लोक - 8 व 9।
की निश्चित अवधि स्वीकार वह एक मास उस मास निर्धारित हुआ अंगद हनुमान सीता के पास जब पहुंचते हैं, तो सीता सुन्दर काण्ड सर्ग 37 श्लोक 8 में हनुमान से कहती हैं-
वर्तते दशमो मासो द्वौ तु शेषौ प्लवङ्गम्,
रावणेन नृशंसेन समयो यः कृति मम।
अर्थात- वानर! यह दसवां महीना चल रहा है। अब वर्ष पूरा होने में दो मास शेष हैं। निर्दयी रावण ने मेरे जीवन के लिए जो अवधि निश्चित की है, उसमें इतना ही समय बाकी रह गया है।


सीता हनुमान के माध्यम से राम के लिए एक संदेश भेजना चाहती है। सुन्दर काण्ड सर्ग 40 श्लोक 10 में सीता कहती हैं-
धारयिष्यामि मासं तु जीवितः शत्रुसूदन,
मासादूर्ध्वं न जीविष्ये त्वया हीना नृपात्मज।
अर्थात- "राजकुमार! मैं आपकी प्रतीक्षा में किसी तरह एक मास तक जीवित नहीं रह सकूंगी।"

इसके बाद राम रावण पर आक्रमण करते हैं। मेघनाद का वध होता है। मेघनाद के वध से दुखी होकर रावण सीता का वध करना चाहता है। रावण को रोकते हुए सुपाश्र्व कहता है -
कथं नाम दशग्रीव साक्षाद्वैश्रवणानुज,
हन्तुमिच्छसि वैदेहीं क्रोघादधर्ममपास्य चः।
(युद्ध काण्ड सर्ग 92 ,श्लोक 63)
अर्थ -
महाराज रावण ! तुम तो साक्षात कुबेर के भाई हो, फिर क्रोध के कारण धर्म को तिलांजलि देकर (छोड़कर) सीता के वध की इच्छा कैसे करते हो?
वेदविद्यावतस्नातः स्वकर्मनिरस्तथा ।
स्त्रियः कस्सा बवं बीर मन्यसे राक्षसेश्वर ।।
(युद्ध काण्ड सर्ग 92 श्लोक 64)
अर्थ -
वीर राक्षस राज! तुम विधिपूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेद विद्या का अध्ययन पूरा करके गुरुकुल से स्नातक होकर निकले थे और तब से सदा अपने कर्तव्य के पालन में लगे रहे तो भी आज अपने हाथ से एक स्त्री का वध करना तुम कैसे ठीक समझाते हो ?
अभ्युत्थान त्वमव कृष्णपक्ष चतुर्दशी ।
कृत्वा नियढमावस्यां विजयाय बलैबृत ।।
(युद्ध काण्ड सर्ग 92 श्लोक 66)
अर्थ -
आज कृष्णपक्ष की चतुर्दशी (चौदस) है। अतः आज ही युद्ध की तैयारी कर कल अमावस्या के दिन सेना के साथ विजय के लिए प्रस्थान करो ।
नैब रात्रि न दिवस न मुहुर्त न च क्षणम् ।
रामारावणयो युद्ध विरामधुपगच्छाति ।।
(युद्ध काण्ड सर्ग 107 श्लोक 66)
अर्थ -
राम और रावण का वह युद्ध न रात में बन्द होता था और न दिन में। दो घड़ी अथवा एक क्षण के लिए भी उसका विराम नहीं हुआ और अमावस्या के दिन मातलि द्वारा याद दिलाए जाने पर ही मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अगस्त्य ऋषि द्वारा प्रदत्त बाण के प्रहार से वध कर दिया।
स शरो रावणं हत्वा रुधिराद्रकृतच्छविः।
कृतवर्मा निभृतवत् स तूणीं पूनराविशत् ॥
(युद्ध काण्ड सर्ग 108 श्लोक 20)

अर्थ -
इस प्रकार रावण का वध करके खून से रंगा हुआ, वह शोभाशाली बाण अपना काम पूरा करने के बाद पुनःविनीत सेवक की भांति रामचन्द्र के तरकश में लौट आया।

विद्वान पाठकगण! जरा सोचिए कि रावण राम की पत्नी सीता का वध करना चाहता है, उस दिन चैत्र मासी चौदस थी लेकिन सुपाश्र्व के समझाने पर अगले दिन चैत्र मास की अमावस्या को रावण राम से लड़ने जाता है और रात दिन के संघर्ष में रावण राम के द्वारा ऋषि अगस्त्य द्वारा प्रदत बाण से मारा जाता है।
राम के ऐसे कहने पर विभीषण ने उत्तर दिया -
एवमुक्तषस्तु काकुत्स्थं प्रत्युवाच विभीषणः,
अह्ना त्वां प्रापयिष्यामि तां पुरीं पार्थिवात्मज।
"राज कुमार! आप इसके लिए चिन्तित न हों। मैं एक ही दिन में आपको उस पुरी (नगर )में पहुंचा दूंगा।" (सर्ग 121, श्लोक 8) ।
पुष्पकं
"मेरे यहां मेरे बड़े
"चैत्र मास की सुन्दरता का दृष्य (नजारा) दिखाते हुए राम चैत्र शुक्ल पक्ष पंचमी के दिन भारद्वाज मुनि के आश्रम में उतर कर उन्हें प्रणाम करते हैं -
पूर्ण चतुर्दशे वर्षे पंचम्यां लक्ष्मणाग्रजः ।
भरद्वाजाश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम् ॥
(युद्ध काण्ड सर्ग 124 श्लोक 1)
अर्थ -
रामचन्द्र ने चौदह वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को भारद्वाज आश्रम में पहुंचकर मन को वश में रखते हुए मुनि को वंदन (प्रणाम) किया।
"चैत्र शुक्ल पक्ष पंचमी को आश्रम में उतर कर राम ने विचार किया कि आज ही चौदह वर्ष का अंतिम दिन है। भरत के संकल्प को याद करके उन्होंने
सोचा कि यदि आज भरत को मेरे आगमन की सूचना नहीं मिली तो वह आत्मदाह कर लेगा। अतः उन्होंने युद्ध काण्ड सर्ग 125 श्लोक 3 में हनुमान से कहा -
अयोध्यां त्वरितो गत्वा शीघ्रं प्लवगसत्तमं,
जानी कच्चित् कुशली जनो नृपतिमन्दिरे।
"कपिश्रेष्ठ! तुम शीघ्र ही अयोध्या जाकर पता कर लो कि राज भवन में सब लोग सकुशल तो हैं न।" और कहना-
पञ्चमीमद्य रजनीमुष्तिवा वचनानुनेः,
भरद्वाजाभ्यनुज्ञातं द्रक्ष्यस्यत्रैव राघवम्।
"वे (राम) प्रयाग में हैं और भारद्वाज मुनि के कहने से उन्हीं के आश्रम में आज पंचमी की रात बिताकर कल उनकी आज्ञा से वहां से चलेंगे। तुम्हें यहीं राम का दर्शन होगा।" (सर्ग 125, श्लोक 24)।

हनुमान उसी समय उड़े और भरत के पास जा पहुंचे। वाल्मीकि रामायण युद्ध काण्ड सर्ग १२६ श्लोक ५४ में हनुमान भरत से कहते हैं-
तां गंगां पुनरासाद्य वसन्तं मुनिसंनिधौ,
अविघ्नं पुष्ययोगेन श्वो रामं द्रष्टुमहर्सि।
"हे भरत! किष्किंधा से गंगा तट पर आकर वे प्रयाग में भारद्वाज मुनि के समीप ठहरे हुए हैं। कल पुष्य नक्षत्र के योग में आप किसी विघ्न बाधा के राम का दर्शन करेंगे।

विद्वान पाठको! जरा सोचिए कि राम वन को कौन से मास में गये ? उत्तर है -चैत्र मास में ,उनका राज्याभिषेक कौन से नक्षत्र में होना था, उत्तर है- पुष्य नक्षत्र में। उनको चौदह वर्ष कब पूर्ण होंगे? उत्तर है चैत्र मास में ही ,रावण की मृत्यु कौन से महीने में हुई? उत्तर है चैत्र की अमावस्या को। रावण वध के बाद प्रयाग में राम कौन सी तिथि को आये? उत्तर है -चैत्र शुक्ल पक्ष पंचमी को। राम भरत से कौन सी तिथि तथा कौन से नक्षत्र में मिले? उत्तर है-चैत्र शुक्ल पक्ष की छठ और पुष्य नक्षत्र में। अतः रावण का वध चैत्र मास की अमावस्या का होना चाहिए, न कि आश्विन शुक्ल पक्ष दसवीं को, तो फिर हिन्दू लोग विजयादशमी और दीपावली का संबंध राम से क्यों मानते हैं?

*हिन्दुओं को जो रामायण/ राम में आस्था रखते हों,उन्हें राम की रावण पर विजय के बाद अयोध्या आगमन पर प्रकाश उत्सव पर्व चैत के महीने में मनाना चाहिए। दशहरा चैत्र की अमावस्या को व उन्हें दीवाली चैत्र शुक्ल की छठ को राम - रावण कथानक के मद्देनजर मनाना चाहिए।*

user image Rahul Singh Bauddha - 29 Feb 2020 at 2:36 PM -

राम का इतिहास तथा दिपावली में महत्व


*राम का इतिहास तथा दिपावली में महत्व*

राम जब रावण नाम के मूल निवासियों के हितैषी राजा का वध कर के वापिस अयोध्या पहुंचा था तब अयोध्या यूरेशियन आर्यों ने रात्रि में दीपक जलाकर मूल निवासियों के हितैषी राजा रावन की मृत्यु का जश्न बनाया था। ... राम कितनी मर्यादा का पालन करता था ये बात आप लोगों को सची रामायण पढ़ कर पता चल जाएगी। अब आप लोग बोलोगे कि हम सची रामायण को क्यों माने? तो आप लोगों की जानकारी के लिए बता दें, सच्ची रामायण नामक पुस्तक को सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने मान्यता दी है। जब सुप्रीम कोर्ट सच्ची रामायण को मान्यता दे सकता है तो मूल निवासी सच्ची रामायण को क्यों मान्यता नहीं देते। रामायण के अनुसार राम का जन्म एक यज्ञ के कारण हुआ था। जिसको पुत्रेष्टि यज्ञ कहा गया है, वैदिक काल में यज्ञ का मतलब होता था भोग विलास और सोमरस पान। उस समय के यज्ञ को आप आज की “फुल मून पार्टी” कह सकते हो। जहा पर नशा और सम्भोग का खुला नंगा नाच होता था। उसे यज्ञ कहा जाता था। दशरथ ने भी ऐसे ही एक यज्ञ का आयोजन किया, पुरे भारत से बहुत से ब्राह्मणों को बुलाया गया। दशरथ ने सभी ब्राह्मणों में से तीन ब्राह्मण चुने और अपनी तीनों रानियों को उन ब्राह्मणों को सम्भोग कर के बच्चे अपीडा करने के लिए दिया। दशरथ खुद 60 साल का बुढा था और बच्चे पैदा करने कि क्षमता खो चूका था। इस प्रकार कई दिनों तक उन ब्राह्मणों ने यज्ञ के नाम पर कौशल्या, सुमित्रा और कैकई के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये और इसके परिणाम स्वरूप राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और भरत पैदा हुए। रामायण को अगर ध्यान से पढ़ा जाये तो पता चलता है कि राम एक बहुत ही नीच आदमी था। राम अपने बाकि भाइयों से बहुत नफरत और इर्ष्या करता था। राम ने अपने पिता दशरथ के साथ मिल कर भरत को जानबूझ कर उसके नाना के घर भेज दिया था। ताकि राम खुद अयोध्या का राजा बन सके। कैकई जो की एक सच्ची और ईमानदार औरत थी उसको रामायण में बहुत ही नीच औरत बताया गया है। आखिर अपना हक मांगना कौन सी नीचता है? दशरथ ने वचन दिया था कि कैकई कि संतान को राजा बनाएगा। परन्तु दशरथ अपना वचन पूरा नहीं करना चाहता था। अयोध्या काण्ड में इस बात का प्रमाण मौजूद है। राम के मन की स्थिति का भी यहाँ से पता चलता है कि राम भी राजा बनाना चाहता था। इस लिए वो दशरथ का विरोध नहीं करता है। दूसरी तरफ सीता की बात की जाये, तो सीता भी कोई अच्छे चरित्र कि नारी नहीं थी। सीता जमीन से पैदा नहीं हुई थी, क्योकि वैज्ञानिक दृष्टि से किसी भी मनुष्य का पैदा होना असंभव है। सीता जनक की एक रखैल कि बेटी थी, जिसके साथ जनक के नाजायज सम्बन्ध थे। इस बात को सीता ने कई बार रामायण में कहा है सीता कहती है “मैं बचपन से जवानी तक धुल में रही, अज्ञान के कारण मेरे माता पिता ने मेरी कोई परवाह नहीं की” अर्थात सीता कोई चरित्रवान औरत नहीं थी। वो किसी वैश्या या रखैल कि पुत्री थी। जिसको जनक उसकी जवानी में अपने घर ले के आया था। अब बात करते है असुर राज रावण की। रावण कितना बड़ा ज्ञानी और पराक्रमी राजा था ये बात उसके चरित्र से ही पता चल जाती है। रावन को दस आदमियों से भी ज्यादा ज्ञान था। इस लिए रावण के दस सिर प्रचारित किये गए। रावण से विष्णु, ब्रह्मा से लेकर सभी यूरेशियन आर्य डरते थे और उस के साथ आमने सामने की लड़ाई में कई बार हार चुके थे। रावण को उस समय के पुरे चमार दीप के राजा शंकर का आश्रीवाद या सहयोग प्राप्त था। जिसको बाद में वरदान कह कर प्रचारित किया गया। एक बार रावण जब राजा शंकर से मिलने गया तो वापिस लंका आते समय उसकी दृष्टि एक ऋषि कन्या पर पड़ी, रावण उस ऋषि कन्या से विवाह करने के लिए उस कन्या से जोर जबरदस्ती करता है। उसी के परिणाम स्वरुप कन्या रावण को श्राप देती है कि अगर आज के बाद तुमने किसी पवित्र नारी को उसकी इच्छा के बिना छुआ तो तुम्हारा सिर फट जायेगा और पूरा शारीर जल जायेगा। लेकिन बाद में रावण सीता को गोद में उठा का ले जाता है। अगर सीता सत्ती और पवित्र थी तो रावण का सिर क्यों नहीं फटा और उसके पुरे शारीर में आग क्यों नहीं लगी? इस का अर्थ सीधा सा है कि सीता एक दुष्ट चरित्र वाली वैश्या थी। ये बात भी सारी दुनिया जानती थी कि रावण यज्ञ जैसे कु-कृत्यों के खिलाफ था क्योकि यज्ञों के नाम पर होने वाली जीव हिंसा, मंदिर पान और शारीरिक सम्बन्धों कहा तक न्याय संगत है। आज सारा देश “फुल मून पार्टियों” का विरोध करता है, अगर कही कोई “फुल मून पार्टी” मनाता या आयोजन करता मिल जाता है तो उसे पुलिस उठा कर जेल में डाल देती है। तो रावण ने कौन सा बुरा काम किया था? सीता के साथ रावण के शारीरिक सम्बन्ध थे या नहीं इस बात का पता इस बात से चल जाता है कि जब रावण सीता के पास अशोक वाटिका में जाता है तो सीता कहती है “ मैं इस समय तुम्हारे अधिकार में हूँ, तुम राजा जो जो चाहे कर सकते हो” मतलब सीता ने सीधे तौर पर कोई स्वीकृति नहीं दी, लेकिन सीता के रावण के साथ भी शारीरिक सम्बन्ध थे।
अब रावण को मारा कैसे गया ये भी सारी दुनिया जानती है। रावण को धोखे से विभीषन के साथ मिल कर मारा गया। युद्ध में रावण को मारा इस बात का भी कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। ब्राह्मणों की लिखी रामायण के अनुसार अंतिम युद्ध सिर्फ रावण और राम के बीच ही हुआ था। बाकि सभी लोग आराम कर रहे थे। और उस समय वहां पर रात जैसा माहौल था। इसका मतलब है कि राम ने रावण को धोखे से मारा रात के समय मारा होगा। विभीष्ण ने रावण का राज्य हड़पने के उदेश्य से रावण को मारने में राम का साथ दिया। क्योकि सिर्फ विभीष्ण को ही लंका के अन्दर जाने और रावण तक पहुँचने का रास्ता मालूम था। जब राम सीता को लेकर वापिस अयोध्या पहुंचा तो उसने भरत को हटा कर अपना राज्य स्थापित किया। भरत पहले ही राम से डरा डरा रहता था तो उसने ज्यादा आना कानी नहीं कि और राम को राजा बना दिया गया। फिर अयोध्या में एक दिन राम की एक दासी राम को आकर कहती है कि “सीता रावण की याद में रो रही है, सीता ने रावण का चित्र बनाया है और उसे सीने से लगा कर आंसू बहा रही है और सीता गर्ववती है” राम का गुस्सा सातवे आसमान पर पहुँच जाता है वो सीता के कमरे में जाता है तो सच में सीता को रावण के चित्र से लिपटे हुए और आंसू बहते हुए पता है। जिस के कारण राम सीता को घर निकल देता है। इस से सिद्ध हो जाता है कि लव और कुश रावण की संतान थे जिनको बाद में अयोध्या से दूर अफ्गानिस्तान में भेज दिया गया था।
राम के द्वारा शम्भुक नामक शुद्र का वध भी एक उलेखनीय तथ्य है। अयोध्या में राम राज्य स्थापित होने के बाद एक दिन एक ब्राह्मण अपने मृत बेटे के शव को उठा कर राम के दरबार में ले कर आता है और राम को बताता है कि उसके गॉव के पास एक शम्भुक नाम का शुद्र भगवान् का नाम ले रहा है जीके कारण ब्राह्मण के बेटे की मृत्यु हो गई। ब्राह्मण का बच्चा अपनी मृत्यु मारा किसी के भगवान् को पूजने या ना पूजने से ब्राह्मण के बेटे का क्या सम्बन्ध? लेकिन नहीं राम ने बिना सोचे समझे ब्राह्मण की बातों में आ कर शम्भुक के आश्रम पर धावा बोल दिया। शम्भुक अकेला था, उसने खुद को राम से हवाले कर दिया और राम ने निर्दयिता पूर्वक शम्भुक का सिर काट कर शम्भुक की हत्या कर दी। राम के समय भी रावण जैसे महाज्ञानी और पराक्रमी राजा को जो मूल निवासियों के हित में सोचता था उसकी मृत्यु को दीपावली के नाम से मनाया गया।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 14 Jan 2019 at 3:19 PM -

2019 में उप्र सरकार के राजकीय अवकाश

यूपी सरकार ने जारी की 2019 की छुट्टियों की लिस्ट-

लखनऊ। नए साल के आगमन से पहले ही यूपी सरकार ने 2019 में किस-किस दिन व कौन सी तारीखों पर छुट्टियां रहेंगी, इसका एलान कर दिया हैं। यूपी राज्यपाल राम नाईके ने 2019 के सार्वजनिक अवकाशों ... जैसे - पर्व/त्यौहार, राष्ट्रीय पर्व एवं महापुरुषों की जन्म तिथियों पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। इसमें साफ कहा गया है कि दी गई अवकाशों की सूची ही आधिकारिक अवकाश माने जाएंगे। यूपी सरकार द्वारा संबंधित शासन के नोटिफिकेशन में कहा गया है कि यदि किसी दिन कोई पर्व, राष्ट्रीय पर्व या महापुरुष की जन्मतिथि एक साथ घटती है तो ऐसी स्थिति में महापुरुष की जयंती के लिए अलग से अवकाश घोषित नहीं किया जाएगा।

देखें वर्ष 2019 में पड़ने वाली छुट्टियों की पूरी लिस्ट-

जनवरी-
1 जनवरी 2019 -- नववर्ष
13 जनवरी 2019-- गुरु गोविंद सिंह जयंती
15 जनवरी 2019 -- मकर संक्रांति
24 जनवरी 2019-- जननायक कर्पूरी ठाकुर जन्म दिवस
26 जनवरी 2019 -- गणतंत्र दिवस

फरवरी-
10 फरवरी 2019 -- बसंत पंचमी
19 फरवरी 2019 -- गुरू रविदास जयंती
19 फरवरी 2019 -- शिवाजी जयंती

मार्च-
4 मार्च-- महाशिवरात्रि
20 मार्च 2019 -- होलिका दहन
21 मार्च 2019-- होली/ हजरत अली जयंती
22 मार्च 2019 -- होली

अप्रैल-
5 अप्रैल 2019-- महर्षि कश्यप जयंती
6 अप्रैल 2019 -- चेटीचंड
13 अप्रैल 2019 -- रामनवमीं
14 अप्रेल 2019-- डां भीमराव अम्बेडकर जयंती
17 अप्रैल 2019 -- चंद्रशेखर जयंती
19 अप्रैल 2019 -- गुड फ्राइडे
20 अप्रैल 2019-- ईस्टर सैटरडे
21 अप्रैल 2019-- शबे बारात
22 अप्रैल 2019-- ईस्टर मंडे

मई-
7 मई 2019-- परशुराम जयन्ती
9 मई 2019 -- लोक नायक महाराणा प्रताप जयंती
31 मई 2019-- जमात-उल-विदा/रमजान

जून-
6 जून 2019 -- ईद-उल-फितर
5 जून 2019 -- ईद-उल-फित्र

अगस्त-
12 अगस्त, 2019-- बकरीद
13 अगस्त, 2019-- बकरीद
15 अगस्त 2019 -- स्वतंत्रता दिवस/रक्षा बंधन
23 अगस्त 2019 -- जन्माष्ठमी

सितंबर-
10 सितंबर 2019 -- मोहर्रम
11 सितंबर 2019 -- मोहर्रम
12 सितंबर 2019 -- अनन्त चतुर्दशी
17 सितंबर 2019 -- विश्वकर्मा पूजा
27 सितंबर 2019-- महाराज अग्रसेन जयंती

अक्टूबर-
2 अक्टूबर 2019 -- महात्मा गांधी जयंती
6 अक्टूबर 2019- दशहरा (महाअष्टमी)
7 अक्टूबर 2019- दशहरा (महानवमी)
8 अक्टूबर 2019- दशहरा (विजयदशमी)
13 अक्टूबर 2019- महर्षि बाल्मीकि जयंती
19 अक्टूबर 2019-- चेहल्लुम
26 अक्टूबर 2019-- नरक चतुर्थी
27 अक्टूबर 2019 -- दीपावली
28 अक्टूबर 2019 -- गोवर्धन पूजा
29 अक्‍टूबर 2019 -- भाई-दूज
31 अक्टूबर 2019-- सरदार बल्लभ भाई पटेल एवं आचार्य नरेंद्र देव जयंती


नवम्बर-
2 नवम्बर 2019-- छठ पूजा
10 नवम्बर 2019-- बारावफात
12 नवंबर 2019 -- गुरू नानक जयंती
16 नवंबर 2019-- वीरांगना ऊदा देवी शहीद दिवस
24 नवंबर 2019-- गुरू तेग बहादुर शहीद दिवस


दिसम्बर-
23 दिसम्बर 2019-- चौधरी चरण सिंह जन्मदिवस
24 दिसम्बर 2019-- क्रिसमस ईव
25 दिसंबर 2019 -- क्रिसमस

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 19 Dec 2018 at 5:54 PM -

2019 में उप्र सरकार के राजकीय अवकाश

यूपी सरकार ने जारी किए 2019 के छुट्टीयो की लिस्ट।


लखनऊ। नए साल के आगमन से पहले ही यूपी सरकार ने 2019 में किस-किस दिन व कौन सी तारीखों पर छुट्टियां रहेंगी, इसका एलान कर दिया हैं। यूपी राज्यपाल राम नाईके ने 2019 के सार्वजनिक अवकाशों ... जैसे - पर्व/त्यौहार, राष्ट्रीय पर्व एवं महापुरुषों की जन्म तिथियों पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। इसमें साफ कहा गया है कि दी गई अवकाशों की सूची ही आधिकारिक अवकाश माने जाएंगे। यूपी सरकार द्वारा संबंधित शासन के नोटिफिकेशन में कहा गया है कि यदि किसी दिन कोई पर्व, राष्ट्रीय पर्व या महापुरुष की जन्मतिथि एक साथ घटती है तो ऐसी स्थिति में महापुरुष की जयंती के लिए अलग से अवकाश घोषित नहीं किया जाएगा।

देखें वर्ष 2019 में पड़ने वाली छुट्टियों की पूरी लिस्ट-

जनवरी-
1 जनवरी 2019 -- नववर्ष
13 जनवरी 2019-- गुरु गोविंद सिंह जयंती
15 जनवरी 2019 -- मकर संक्रांति
24 जनवरी 2019-- जननायक कर्पूरी ठाकुर जन्म दिवस
26 जनवरी 2019 -- गणतंत्र दिवस

फरवरी-
10 फरवरी 2019 -- बसंत पंचमी
19 फरवरी 2019 -- गुरू रविदास जयंती
19 फरवरी 2019 -- शिवाजी जयंती

मार्च- 
4 मार्च-- महाशिवरात्रि
20 मार्च 2019 -- होलिका दहन
21 मार्च 2019-- होली/ हजरत अली जयंती
22 मार्च 2019 -- होली

अप्रैल-
5 अप्रैल 2019-- महर्षि कश्यप जयंती
6 अप्रैल 2019 -- चेटीचंड
13 अप्रैल 2019 -- रामनवमीं
14 अप्रेल 2019-- डां भीमराव अम्बेडकर जयंती
17 अप्रैल 2019 -- चंद्रशेखर जयंती
19 अप्रैल 2019 -- गुड फ्राइडे
20 अप्रैल 2019-- ईस्टर सैटरडे
21 अप्रैल 2019-- शबे बारात
22 अप्रैल 2019-- ईस्टर मंडे

मई- 
7 मई 2019-- परशुराम जयन्ती
9 मई 2019 -- लोक नायक महाराणा प्रताप जयंती
31 मई 2019-- जमात-उल-विदा/रमजान

जून-
6 जून 2019 -- ईद-उल-फितर
5 जून 2019 -- ईद-उल-फित्र

अगस्त-
12 अगस्त, 2019-- बकरीद
13 अगस्त, 2019-- बकरीद
15 अगस्त 2019 -- स्वतंत्रता दिवस/रक्षा बंधन
23 अगस्त 2019 -- जन्माष्ठमी

सितंबर-
10 सितंबर 2019 -- मोहर्रम
11 सितंबर 2019 -- मोहर्रम
12 सितंबर 2019 -- अनन्त चतुर्दशी
17 सितंबर 2019 -- विश्वकर्मा पूजा
27 सितंबर 2019-- महाराज अग्रसेन जयंती

अक्टूबर-
2 अक्टूबर 2019 -- महात्मा गांधी जयंती
6 अक्टूबर 2019- दशहरा (महाअष्टमी)
7 अक्टूबर 2019- दशहरा (महानवमी)
8 अक्टूबर 2019- दशहरा (विजयदशमी)
13 अक्टूबर 2019- महर्षि बाल्मीकि जयंती
19 अक्टूबर 2019-- चेहल्लुम
26 अक्टूबर 2019-- नरक चतुर्थी
27 अक्टूबर 2019 -- दीपावली
28 अक्टूबर 2019 -- गोवर्धन पूजा
29 अक्‍टूबर 2019 -- भाई-दूज
31 अक्टूबर 2019-- सरदार बल्लभ भाई पटेल एवं आचार्य नरेंद्र देव जयंती


नवम्बर-
2 नवम्बर 2019-- छठ पूजा
10 नवम्बर 2019-- बारावफात
12 नवंबर 2019 -- गुरू नानक जयंती
16 नवंबर 2019-- वीरांगना ऊदा देवी शहीद दिवस
24 नवंबर 2019-- गुरू तेग बहादुर शहीद दिवस


दिसम्बर-
23 दिसम्बर 2019-- चौधरी चरण सिंह जन्मदिवस
24 दिसम्बर 2019-- क्रिसमस ईव 
25 दिसंबर 2019 -- क्रिसमस

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 08 Nov 2018 at 3:03 PM -

पेप्टिक अल्सर

यह एक गंभीर बीमारी होती है. इस रोग में पेट और आँतों में छाले या अल्सर हो जाते हैं और उनमे जख्म हो जाता है. बड़ी आंत की अंदरूनी परत में सूजन भी हो जाती है और पेट दर्द के साथ उल्टी भी होने लगती ... है और किसी किसी को मल में आंव भी निकलने लगते हैं.
यह रोग अधिक मिर्च-मसाले खाने और अधिक चिंता करने से होता है.

अतः आप इस रोग का उपचार निम्न तरह से करें –
1. सबसे पहले आप सल्फर 200 को सुबह 7 बजे, दोपहर को आर्निका 200 और रात्रि को आठ बजे नक्स वोम 200 की पांच बूँद आधा कप पानी से एक हफ्ते तक ले.
2. HSL कम्पनी की होम्योकाम्ब नं. 6 की दो गोली दिन में चार बार ले.
3. आप केल्केरिया फास 6X, केल्केरिया सल्फ़ 6X, काली फास 12X, नेट्रम फास 6X, नेट्रम सल्फ़ 6X, साइलिसिया 12X; इन सभी की एक-एक गोली मिलकर पुडिया बना ले और उसे दिन में चार बार चूसते रहे.
4. आप सुबह दो से चार गिलास कुनकुना पानी पीकर 5 मिनिट तक कौआ चाल (योग क्रिया) करें.
5. साथ ही पांच या अधिक से अधिक दस बार तक सूर्य नमस्कार करें. फिर 200 से 500 बार तक कपाल-भांति करें. इसके बाद प्राणायाम करें.
6. रोज सुबह और रात को 15-15 मिनिट का शवासन भी करें.
7. गेंहू, जौ, देसी चना और सोयाबीन को सम भाग मिलाकर पिसवा ले और उसकी रोटी सादे मसाले की रेशेदार सब्जी से खाएं. दाल का प्रयोग न करे.
8. बारीक आटे व मैदे से बनी वस्तुएं, तली वस्तुएं एव गरिष्ठ भोजन का पूर्ण रूप से त्याग करे।