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user image Arvind Swaroop Kushwaha - 02 Jul 2020 at 6:04 AM -

टाइटन titan

दोस्तो मैं आज आपको शनि ग्रह के चंद्रमा टाइटन के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ।
टाइटन शनि ग्रह का उपग्रह होने के साथ साथ अपनी विशेषताएँ भी रखता है क्योंकि इसका आकार बुध ग्रह से बड़ा है -
टाइटन (Titan), सौर मंडल के शनि ... ग्रह का सबसे बड़ा चंद्रमा है। यह सौर मंडल के सभी चंद्रमाओं में वातावरण वाला एकमात्र ज्ञात चंद्रमा है, और पृथ्वी के अलावा एकमात्र ऐसा खगोलीय पिंड है जिसके सतही तरल स्थानों, जैसे नहरों, सागरों आदि के ठोस प्रमाण उपलब्ध हों।
शनि के इस उपग्रह और पृथ्वी के बीच और भी कई समानताएं हैं। टाइटन पर ज्वालामुखी जैसी क्रियाएं भी देखने में आती हैं और यहां खाइयां, नदियों के पाट और मुहाने भी दिखते हैं, किन्तु बड़े पहाड़ नहीं दिखे। बहुत कम क्रेटर-जैसे गोलाकार गड्ढे हैं और किसी प्रकार का जीवन नहीं है। वातावरण अत्यंत ठंडा है। तरल मीथेन यहां पानी का काम करती है। हवा में प्रतिध्वनि भी होती है, पृथ्वी की तरह तरंगें भी पैदा होती हैं।
यह चंद्रमा पृथ्वी की अपेक्षा बेहद ठंडा है और औसत तापमान शून्य से भी 180 डिग्री सेल्सियस नीचे है, जो साइबेरिया से भी तीन गुना ठंडा है। नदियों और झीलों में पानी के बदले तरल मीथेन गैस बहती है। ज्वालामुखी से बर्फीली अमोनिया निकलती है। वायुमंडल में 98.4 प्रतिशत नाइट्रोजन गैस है और शेष 1.6 प्रतिशत अन्य गैसें हैं जिसमें मीथेन का अनुपात सर्वाधिक है। वायुमंडल बहुत सघन और गुरुत्वाकर्षण बल कम है। टाइटन शनि का सबसे बड़ा उपग्रह है। 5.150 किलोमीटर व्यास वाला ये चंद्रमा पृथ्वी के चंद्रमा से 1.624 किलोमीटर बड़ा है। उसका घना वायुमंडल पृथ्वी के वायुमंडल के विपरीत एक ऐसा विलोम ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करता है कि सूर्य की किरणें अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती हैं। इस कारण उसे जितना ठंडा होना चाहिये, उससे कहीं अधिक ठंडा है।
अफसोस की बात ये है कि टाइटन तेज गति से शनि ग्रह से दूर होता जा रहा है ठीक उसी प्रकार जैसे चांद पृथ्वी से हर साल 1.5 इंच दूर हो जाता है।

राहुल सेन से साभार

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 23 Jun 2020 at 8:04 AM -

अष्टांग योग

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि।।

ये 8 चरण योग के बताए गए हैं। ये काफी हद तक अनुमानित हैं। इन शब्दों का प्रयोग आज या तो नहीं हो रहा या फिर भिन्न अर्थों में ज्यादा हो रहा है।

यह वह शास्त्र है जिसके वास्तविक ... जानकार की पहचान होना आसान नहीं है।

सामान्य व्यक्ति के लिए योग का मतलब आसन, प्राणायाम तथा व्यायाम ही है।

जो इससे थोड़ा ऊपर हैं वो धारणा और ध्यान तक पहुंच जाते हैं।

समाधि तक पहुंचने वाले मुझ जैसे विरले ही हैं।

यह जिस प्रकार 8 चरणों मे बांटा गया है वैसा आवश्यक नहीं है।

इसको निम्नवत समझना चाहिए-
1- समाधि के लिए तन, इंद्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण का अभ्यास होना चाहिए। शरीर मे हीमोग्लोबिन पर्याप्त होना चाहिए। हीमोग्लोबिन के साथ ऑक्सीजन की सर्वांग अबाध आपूर्ति के लिए नसों, धमनियों, हृदय और फेफड़ों का स्वस्थ तथा बाधामुक्त होना आवश्यक है। मनुष्य को साहसी और गुरु पर विश्वास करने वाला होना चाहिए क्योंकि समाधि में पहुंचते समय मृत्यु न हो जाये ऐसी आशंका जन्म लेने लगती है। समाधि के दौरान व्यक्ति सांस भी नहीं लेता किन्तु जिस प्रकार एक कमरे में एक खिड़की खुली हो तो अणुओं की स्वाभाविक गति के कारण कुछ न कुछ ताजी हवा अपने आप अंदर आती रहती है उसी प्रकार नासिकाओं से मंद गति से ऑक्सीजन फेफड़ों तक पहुंचती रहती है। पहले पहल समाधि में एक घंटे से अधिक देर रहना खतरनाक हो सकता है किंतु बार बार अभ्यास करने से यह अवधि 3 या 4 घंटे तक बढ़ सकती है।
2- ध्यान के लिए मस्तिष्क में अबाध रक्तसंचार और अन्य इंद्रियों पर नियंत्रण आवश्यक है।
3- धारणा का यौगिक तात्पर्य वायु अर्थात ऑक्सीजन धारण करने की क्षमता है। जब आप करीब आधा मिनट से पौने दो मिनट प्रति स्वास की अति मंद गति पर घंटे भर तक रह सकने की क्षमता हासिल कर लें तो यह मानना चाहिए कि आपमे धारणा शक्ति आ गयी है। ऊपरी सीमा आपके समाधि में रह सकने की शारीरिक क्षमता का द्योतक है।
4- आसन और प्राणायाम के बिना ध्यान और धारणा का विकास संभव नहीं है।
5- नियमित व्यायाम के बिना समाधि संभव नहीं है। ध्यान के विकास के लिए भी नियमित व्यायाम बहुत फायदेमंद है।
6- बाकी बातें गुरु जी की अपनी शर्तें हैं।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 25 May 2020 at 2:20 PM -

टिड्डी दल

कोरोना काल में बड़ी मुश्किलों से पाली गई किसानों की उम्मीदों को भी टिड्डी दल तहस-नहस करने लगे हैं। मध्यप्रदेश से आने वाली सूचनाएं बताती हैं कि यहां पर मूंग की फसल पर टिड्डी दलों का जोरदार हमला हुआ है। वे मूंग को चट करते ... जा रहे हैं।
भारत में चाहे अभी भी जिस एक पेशे में सबसे ज्यादा लगे हैं, उसका नाम खेती है। लेकिन, करोड़ों लोगों की आजीविका का पालन करने वाले इस पेशे के प्रति कोई चिंता कहीं दिखाई पड़ती है। उनके दुख-दर्द को कहीं प्रमुखता से सबके सामने पहुंचाने की तलब दिखाई पड़ती है। मध्य प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा टिड्डी दलों की चपेट में है। यहां पर मूंग की दाल की पौधों को टिड्डी दल चट करने में लगे हुए हैं।
इसके अलावा, फलों और सब्जियों की नर्सरियों को भी वे साफ कर रहे हैं। जबकि, मिर्च और कपास की फसल पर भी उनके टूट पड़ने का खतरा है। माना जा रहा है कि यह बीते 27 सालों में टिड्डी दलों का सबसे खौफनाक हमला है और इससे आठ हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है।
टिड्डी दल अपने सामने आने वाली हर हरी चीज को खाने का दम रखते हैं। पेड़-पौधों की की हरी पत्तियों, कोंपलों और नई डालों तक को वे खा डालती हैं। एक कीड़ा हर दिन अपने वजन के बराबर का भोजन करता है और उनके हमले में हरे-भरे पेड़ नंगे-बुच्चे हो जाते हैं।
इस पर बहुत ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है। यह पहले ही कहा जा चुका है कि टिट्डी दलों की समस्या जलवायु संकट से उपजी समस्या है। इसलिए इसके दूरगामी समाधान की जरूरत है। लेकिन, तात्कालिक तौर पर भी बहुत कुछ किया जा सकता है।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 23 May 2020 at 8:30 AM -

उम्मीद

 Hindi Kahani- हिंदी कहानी
इस कहानी को एडिट करना है।
Kaptaan Sahib - Munshi Premchand
कप्तान साहब - मुंशी प्रेम चंद

1
जगत सिंह को स्कूल जाना कुनैन की गोली खाने या मछली का तेल पीने से कम अप्रिय न लगता था। वह सैलानी, आवारा और घुमक्कड़ युवक था। ... वह कभी दरिया की सैर करता तो मल्लाहों की डोंगियों में बैठकर उस पार के देहातों में निकल जाता। कभी अमरूद के बागों की ओर निकल जाता तो अमरूदों के साथ साथ माली की गालियां भी बड़े मजे से खाता। । गालियां खाने में उसे विशेष आनंद आता था। गालियां खाने का कोई अवसर वह हाथ से जाने नहीं देता था। सवारी के घोड़े के पीछे ताली बजाना, इक्कों को पीछे से पकड़ कर अपनी ओर खींचना, बूढों की चाल की नकल करना, उसके मनोरंजन के प्रिय विषय थे। इस प्रकार का मनोरंजन करने में भी उसको बढ़िया बढ़िया किस्म की गालियां खाने को मिलती रहतीं। उसको आलसी कहना तो गलत होगा लेकिन कामचोर निसंदेह था। कामचोर काम तो नहीं करता; पर दुर्व्यसनों का दास होता है, और दुर्व्यसन धन के बिना पूरे नहीं होते। जगतसिंह को जब भी अवसर मिलता घर से रूपये उड़ा ले जाता। नकद न मिले, तो बरतन और कपड़े उठा ले जाने में भी उसे संकोच नहीं होता था। घर में जो भी शीशियां और बोतलें थीं, वह सब उसने एक-एक करके गुदड़ी बाजार पहुँचा दीं। पुराने दिनों की कितनी ही चीजें घर में पड़ी थीं, मगर उसके मारे एक भी न बची। वह इस कला में ऐसा दक्ष ओर निपुण था कि उसकी चतुराई और पटुता पर आश्चर्य होता था। एक बार बाहर ही बाहर, केवल कार्निसों के सहारे अपने दो-मंजिला मकान की छत पर चढ़ गया और ऊपर ही से पीतल की एक बड़ी थाली लेकर उतर आया। घर वालों को आहट तक न मिली। 
उसके पिता ठाकुर भगत सिहं अपने कस्बे के डाकखाने के मुंशी थे। अफसरों ने उन्हें शहर का डाकखाना बड़ी दौड़-धूप करने पर दिया था; किन्तु भगत सिंह जिन इरादों से यहाँ आये थे, उनमें से एक भी पूरा न हुआ। उलटी हानि यह हुई कि देहातो में जो भाजी-साग, उपले-ईधन मुफ्त मिल जाते थे, वे सब यहाँ बंद हो गये। यहाँ सबसे पुराना घराँव था। न किसी को दबा सकते थे, न सता सकते थे। इस दुरवस्था में जगतसिंह की हथलपकियॉँ बहुत अखरतीं। उन्होंने कितनी ही बार उसे बड़ी निर्दयता से पीटा। जगतसिंह भीमकाय होने पर भी चुपचाप मार खा लिया करता। अगर वह अपने पिता के दोनों हाथ पकड़ लेता, तो वह हिल भी न सकते; पर जगतसिंह इतना सीनाजोर न था। हाँ, मार-पीट, घुड़की-धमकी किसी का उस पर कोई असर न होता था। 
जगतसिंह ज्यों ही घर में कदम रखता; चारों ओर से कॉँव-कॉँव मच जाती, मॉँ दुर-दुर करके दौड़ती, बहने गालियॉँ देन लगती; मानो घर में कोई सॉँड़ घुस आया हो। घर के ताले उसकी सूरत से जलते थे। इन तिरस्कारों ने उसे निर्लज्ज बना दिया था। कष्टों के ज्ञान से वह निर्द्वन्द्व-सा हो गया था। जहाँ नींद आ जाती, वहीं पड़ रहता; जो कुछ मिल जाता, वही खा लेता। 
ज्यों-ज्यों घर वालें को उसकी चोर-कला के गुप्त साधनों का ज्ञान होता जाता था, वे उससे चौकन्ने होते जाते थे। यहाँ तक कि एक बार पूरे महीने-भर तक उसकी दाल न गली। चरस वाले के कई रूपये ऊपर चढ़ गये। गॉँजे वाले ने धुआँधार तकाजे करने शुरू किय। हलवाई कड़वी बातें सुनाने लगा। बेचारे जगत को निकलना मुश्किल हो गया। रात-दिन ताक-झॉँक में रहता; पर घात न मिलत थी। आखिर एक दिन बिल्ली के भागों छींका टूटा। भक्तसिंह दोपहर को डाकखानें से चले, जो एक बीमा-रजिस्ट्री जेब में डाल ली। कौन जाने कोई हरकारा या डाकिया शरारत कर जाए; किंतु घर आये तो लिफाफे को अचकन की जेब से निकालने की सुधि न रही। जगतसिंह तो ताक लगाये हुए था ही। पेसे के लोभ से जेब टटोली, तो लिफाफा मिल गया। उस पर कई आने के टिकट लगे थे। वह कई बार टिकट चुरा कर आधे दामों पर बेच चुका था। चट लिफाफा उड़ा दिया। यदि उसे मालूम होता कि उसमें नोट हें, तो कदाचित वह न छूता; लेकिन जब उसने लिफाफा फाड़ डाला और उसमें से नोट निक पड़े तो वह बड़े धर्मसंकट में पड़ गया। वह फटा हुआ लिफाफा गला-फाड़ कर उसके दुष्कृत्य को धिक्कारने लगा। उसकी दशा उस शिकारी की-सी हो गयी, जो चिड़ियों का शिकार करने जाए और अनजाने में किसी आदमी पर निशाना मार दे। उसके मन में पश्चाताप था, लज्जा थी, दु:ख था, पर उसमें भूल का दंड सहने की शक्ति न थी। उसने नोट लिफाफे में रख दिये और बाहर चला गया। 
गरमी के दिन थे। दोपहर को सारा घर सो रहा था; पर जगत की आँखों में नींद न थी। आज उसकी बुरी तरह कुटाई होगी- इसमें संदेह न था। उसका घर पर रहना ठीक नहीं, दस-पॉँच दिन के लिए उसे कहीं खिसक जाना चाहिए। तब तक लोगों का क्रोध शांत हो जाता। लेकिन कहीं दूर गये बिना काम न चलेगा। बस्ती में वह क्रोध दिन तक अज्ञातवास नहीं कर सकता। कोई न कोई जरूर ही उसका पता देगा ओर वह पकड़ लिया जायगा। दूर जाने केक लिए कुछ न कुछ खर्च तो पास होना ही चहिए। क्यों न वह लिफाफे में से एक नोट निकाल ले? यह तो मालूम ही हो जायगा कि उसी ने लिफाफा फाड़ा है, फिर एक नोट निकल लेने में क्या हानि है? दादा के पास रूपये तो हे ही, झक मार कर दे देंगे। यह सोचकर उसने दस रूपये का एक नोट उड़ा लिया; मगर उसी वक्त उसके मन में एक नयी कल्पना का प्रादुर्भाव हुआ। अगर ये सब रूपये लेकर किसी दूसरे शहर में कोई दूकान खोल ले, तो बड़ा मजा हो। फिर एक-एक पैसे के लिए उसे क्यों किसी की चोरी करनी पड़े! कुछ दिनों में वह बहुत-सा रूपया जमा करके घर आयेगा; तो लोग कितने चकित हो जाएेंगे! 
उसने लिफाफे को फिर निकाला। उसमें कुल दो सौ रूपए के नोट थे। दो सौ में दूध की दूकान खूब चल सकती है। आखिर मुरारी की दूकान में दो-चार कढ़ाव और दो-चार पीतल के थालों के सिवा और क्या है? लेकिन कितने ठाट से रहता हे! रूपयों की चरस उड़ा देता हे। एक-एक दॉँव पर दस-दस रूपए रख देता है, नफा न होता, तो वह ठाट कहाँ से निभाता? इस आननद-कल्पना में वह इतना मग्न हुआ कि उसका मन उसके काबू से बाहर हो गया, जैसे प्रवाह में किसी के पॉँव उखड़ जाएें ओर वह लहरों में बह जाए। 
उसी दिन शाम को वह बम्बई चल दिया। दूसरे ही दिन मुंशी भक्तसिंह पर गबन का मुकदमा दायर हो गया। 


बम्बई के किले के मैदान में बैंड़ बज रहा था और राजपूत रेजिमेंट के सजीले सुंदर जवान कवायद कर रहे थे, जिस प्रकार हवा बादलों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बना बिगाड़ रहा था। 
जब कवायद खतम हो गयी, तो एक छरहरे डील का युवक नायक के सामने आकर खड़ा हो गया। नायक ने पूछा-क्या नाम है? सैनिक ने फौजी सलाम करके कहा-जगतसिंह? 
'क्या चाहते हो।' 
'फौज में भरती कर लीजिए।' 
'मरने से तो नहीं डरते?' 
'बिलकुल नहीं-राजपूत हूँ।' 
'बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।' 
'इसका भी डर नहीं।' 
'अदन जाना पड़ेगा।' 
'खुशी से जाऊँगा।' 
कप्तान ने देखा, बला का हाजिर-जवाब, मनचला, हिम्मत का धनी जवान है, तुरंत फौज में भरती कर लिया। तीसरे दिन रेजिमेंट अदन को रवाना हुआ। मगर ज्यों-ज्यों जहाज आगे चलता था, जगत का दिल पीछे रह जाता था। जब तक जमीन का किनारा नजर आता रहा, वह जहाज के डेक पर खड़ा अनुरक्त नेत्रों से उसे देखता रहा। जब वह भूमि-तट जल में विलीन हो गया तो उसने एक ठंडी सॉँस ली और मुँह ढॉँप कर रोने लगा। आज जीवन में पहली बर उसे प्रियजानों की याद आयी। वह छोटा-सा कस्बा, वह गॉँजे की दूकान, वह सैर-सपाटे, वह सुहूद-मित्रों के जमघट आँखों में फिरने लगे। कौन जाने, फिर कभी उनसे भेंट होगी या नहीं। एक बार वह इतना बेचैन हुआ कि जी में आय, पानी में कूद पड़े। 


जगतसिंह को अदन में रहते तीन महीने गुजर गए। भॉँति-भॉँति की नवीनताओं ने कई दिन तक उसे मुग्ध किये रखा; लेकिन पुराने संस्कार फिर जाग्रत होने लगे। अब कभी-कभी उसे स्नेहमयी माता की याद आने लगी, जो पिता के क्रोध, बहनों के धिक्कार और स्वजनों के तिरस्कार में भी उसकी रक्षा करती थी। उसे वह दिन याद आया, जब एक बार वह बीमार पड़ा था। उसके बचने की कोई आशा न थी, पर न तो पिता को उसकी कुछ चिन्ता थी, न बहनों को। केवल माता थी, जो रात की रात उसके सिरहाने बैठी अपनी मधुर, स्नेहमयी बातों से उसकी पीड़ा शांत करती रही थी। उन दिनों कितनी बार उसने उस देवी को नीव रात्रि में रोते देखा था। वह स्वयं रोगों से जीर्झ हो रही थी; लेकिन उसकी सेवा-शुश्रूषा में वह अपनी व्यथा को ऐसी भूल गयी थी, मानो उसे कोई कष्ट ही नहीं। क्या उसे माता के दर्शन फिर होंगे? वह इसी क्षोभ ओर नेराश्य में समुद्र-तट पर चला जाता और घण्टों अनंत जल-प्रवाह को देखा करता। कई दिनों से उसे घर पर एक पत्र भेजने की इच्छा हो रही थी, किंतु लज्जा और ग्लानिक कके कारण वह टालता जाता था। आखिर एक दिन उससे न रहा गया। उसने पत्र लिखा और अपने अपराधों के लिए क्षमा मॉँग। पत्र आदि से अन्त तक भक्ति से भरा हुआ थां अंत में उसने इन शब्दों में अपनी माता को आश्वासन दिया था-माता जी, मैने बड़े-बड़े उत्पात किय हें, आप लेग मुझसे तंग आ गयी थी, मै उन सारी भूलों के लिए सच्चे हृदय से लज्जित हूँ और आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जीता रहा, तो कुछ न कुछ करके दिखाऊँगा। तब कदाचित आपको मुझे अपना पुत्र कहने में संकोच न होगा। मुझे आर्शीवाद दीजिए कि अपनी प्रतिज्ञा का पालन कर सकूँ।' 
यह पत्र लिखकर उसने डाकखाने में छोड़ा और उसी दिन से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा; किंतु एक महीना गुजर गया और कोई जवाब न आया। आसका जी घबड़ाने लगा। जवाब क्यों नहीं आता-कहीं माता जी बीमार तो नहीं हैं? शायद दादा ने क्रोध-वश जवाब न लिखा होगा? कोई और विपत्ति तो नहीं आ पड़ी? कैम्प में एक वृक्ष के नीचे कुछ सिपाहियों ने शालिग्राम की एक मूर्ति रख छोड़ी थी। कुछ श्रद्धालू सैनिक रोज उस प्रतिमा पर जल चढ़ाया करते थे। जगतसिंह उनकी हँसी उड़ाया करता; पर आप वह विक्षिप्तों की भॉँति प्रतिमा के सम्मुख जाकर बड़ी देर तक मस्तक झुकाये बेठा रहा। वह इसी ध्यानावस्था में बैठा था कि किसी ने उसका नाम लेकर पुकार, यह दफ्तर का चपरासी था और उसके नाम की चिट्ठी लेकर आया थां जगतसिंह ने पत्र हाथ में लिया, तो उसकी सारी देह कॉँप उठी। ईश्वर की स्तुति करके उसने लिफाफा खोला ओर पत्र पढ़ा। लिखा था-'तुम्हारे दादा को गबन के अभियोग में पॉँच वर्ष की सजा हो गई। तुम्हारी माता इस शोक में मरणासन्न है। छुट्टी मिले, तो घर चले आओ।' 
जगतसिंह ने उसी वक्त कप्तान के पास जाकर कह -'हुजूर, मेरी मॉँ बीमार है, मुझे छुट्टी दे दीजिए।' 
कप्तान ने कठोर आँखों से देखकर कहा-अभी छुट्टी नहीं मिल सकती। 
'तो मेरा इस्तीफा ले लीजिए।' 
'अभी इस्तीफा नहीं लिया जा सकता।' 'मै अब एक क्षण भी नहीं रह सकता।' 
'रहना पड़ेगा। तुम लोगों को बहुत जल्द लाभ पर जाना पड़ेगा।' 
'लड़ाई छिड़ गयी! आह, तब मैं घर नहीं जाऊँगा? हम लोग कब तक यहाँ से जाएंगे?' 
'बहुत जल्द, दो ही चार दिनों में।' 


चार वर्ष बीत गए। कैप्टन जगतसिंह का-सा योद्धा उस रेजीमेंट में नहीं हैं। कठिन अवस्थाओं में उसका साहस और भी उत्तेजित हो जाता है। जिस महिम में सबकी हिम्मते जवाब दे जाती है, उसे सर करना उसी का काम है। हल्ले और धावे में वह सदैव सबसे आगे रहता है, उसकी त्योरियों पर कभी मैल नहीं आता; उसके साथ ही वह इतना विनम्र, इतना गंभीर, इतना प्रसन्नचित है कि सारे अफसर ओर मातहत उसकी बड़ाई करते हैं, उसका पुनर्जीतन-सा हो गया। उस पर अफसरों को इतना विश्वास है कि अब वे प्रत्येक विषय में उससे परामर्श करते हें। जिससे पूछिए, वही वीर जगतसिंह की विरूदावली सुना देगा-कैसे उसने जर्मनों की मेगजीन में आग लगायी, कैसे अपने कप्तान को मशीनगनों की मार से निकाला, कैसे अपने एक मातहत सिपाही को कंधे पर लेकर निल आया। ऐसा जान पड़ता है, उसे अपने प्राणों का मोह नही, मानो वह काल को खोजता फिरता हो! 
लेकिन नित्य रात्रि के समय, जब जगतसिंह को अवकाश मिलता है, वह अपनी छोलदारी में अकेले बैठकर घरवालों की याद कर लिया करता है-दो-चार आँसू की बँदे अवश्य गिरा देता हे। वह प्रतिमास अपने वेतन का बड़ा भाग घर भेज देता है, और ऐसा कोई सप्ताह नहीं जाता जब कि वह माता को पत्र न लिखता हो। सबसे बड़ी चिंता उसे अपने पिता की है, जो आज उसी के दुष्कर्मो के कारण कारावास की यातना झेल रहे हैं। हाय! वह कौन दिन होगा, जब कि वह उनके चरणों पर सिर रखकर अपना अपराध क्षमा करायेगा, और वह उसके सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद देंगे? 


सवा चार वर्ष बीत गए। संध्या का समय है। नैनी जेल के द्वार पर भीड़ लगी हुई है। कितने ही कैदियों की मियाद पूरी हो गयी है। उन्हें लिवा जाने के लिए उनके घरवाले आये हुए है; किन्तु बूढ़ा भक्तसिंह अपनी अँधेरी कोठरी में सिर झुकाये उदास बैठा हुआ है। उसकी कमर झुक कर कमान हो गयी है। देह अस्थि-पंजर-मात्र रह गयी हे। ऐसा जान पड़ता हें, किसी चतुर शिल्पी ने एक अकाल- पीड़ित मनुष्य की मूर्ति बनाकर रख दी है। उसकी भी मीयाद पूरी हो गयी है; लेकिन उसके घर से कोई नहीं आया। आये कौन? आने वाल था ही कौन? 
एक बूढ़ किन्तु हृष्ट-पुष्ट कैदी ने आकर उसक कंधा हिलाया और बोला-कहो भगत, कोई घर से आया? 
भक्तसिंह ने कंपित कंठ-स्वर से कहा-घर पर है ही कौन? 
'घर तो चलोगे ही?' 
'मेरे घर कहाँ है?' 
'तो क्या यही पड़े रहोंगे?' 
'अगर ये लोग निकाल न देंगे, तो यहीं पड़ा रहूँगा।' 
आज चार साल के बाद भगतसिंह को अपने प्रताड़ित, निर्वासित पुत्र की याद आ रही थी। जिसके कारण जीतन का सर्वनाश हो गया; आबरू मिट गयी; घर बरबाद हो गया, उसकी स्मृति भी असहय थी; किन्तु आज नैराश्य ओर दु:ख के अथाह सागर में डूबते हुए उन्होंने उसी तिनके का सहार लियां न-जाने उस बेचारे की क्या दख्शा हुई। लाख बुरा है, तो भी अपना लड़का हे। खानदान की निशानी तो हे। मरूँगा तो चार आँसू तो बहायेगा; दो चिल्लू पानी तो देगा। हाय! मैने उसके साथ कभी प्रेम का व्यवहार नहीं कियां जरा भी शरारत करता, तो यमदूत की भॉँति उसकी गर्दन पर सवार हो जाता। एक बार रसोई में बिना पैर धोये चले जाने के दंड में मेने उसे उलटा लटका दिया था। कितनी बार केवल जोर से बोलने पर मैंने उस वमाचे लगाये थे। पुत्र-सा रत्न पाकर मैंने उसका आदर न कियां उसी का दंड है। जहाँ प्रेम का बन्धन शिथिल हो, वहाँ परिवार की रक्षा कैसे हो सकती है? 


सबेरा हुआ। आशा की सूर्य निकला। आज उसकी रश्मियॉँ कितनी कोमल और मधुर थीं, वायु कितनी सुखद, आकाश कितना मनोहर, वृक्ष कितने हरे-भरे, पक्षियों का कलरव कितना मीठा! सारी प्रकृति आश के रंग में रंगी हुई थी; पर भक्तसिंह के लिए चारों ओर धरे अंधकार था। 
जेल का अफसर आया। कैदी एक पंक्ति में खड़े हुए। अफसर एक-एक का नाम लेकर रिहाई का परवाना देने लगा। कैदियों के चेहरे आशा से प्रफुलित थे। जिसका नाम आता, वह खुश-खुश अफसर के पास जात, परवाना लेता, झुककर सलाम करता और तब अपने विपत्तिकाल के संगियों से गले मिलकर बाहर निकल जाता। उसके घरवाले दौड़कर उससे लिपट जाते। कोई पैसे लुटा रहा था, कहीं मिठाइयॉँ बॉँटी जा रही थीं, कहीं जेल के कर्मचारियों को इनाम दिया जा रहा था। आज नरक के पुतले विनम्रता के देवता बने हुए थे। 
अन्त में भक्तसिंह का नाम आया। वह सिर झुकाये आहिस्ता-आहिस्ता जेलर के पास गये और उदासीन भाव से परवाना लेकर जेल के द्वार की ओर चले, मानो सामने कोई समुद्र लहरें मार रहा है। द्वार से बाहर निकल कर वह जमीन पर बैठ गये। कहाँ जाएँ? 
सहसा उन्होंने एक सैनिक अफसर को घोड़े पर सवार, जेल की ओर आते देखा। उसकी देह पर खाकी वरदी थी, सिर पर कारचोबी साफा। अजीब शान से घोड़े पर बैठा हुआ था। उसके पीछे-पीछे एक फिटन आ रही थी। जेल के सिपाहियों ने अफसर को देखते ही बन्दूकें सँभाली और लाइन में खड़े हाकर सलाम किया। 
भक्तससिंह ने मन में कहा-एक भाग्यवान वह है, जिसके लिए फिटन आ रही है; ओर एक अभागा मै हूँ, जिसका कहीं ठिकाना नहीं। 
फौजी अफसर ने इधर-उधर देखा और घोड़े से उतर कर सीधे भक्तसिंह के सामने आकर खड़ा हो गया। 
भक्तसिंह ने उसे ध्यान से देखा और तब चौंककर उठ खड़े हुए और बोले-अरे! बेटा जगतसिंह! 
जगतसिंह रोता हुआ उनके पैरों पर गिर पड़ा। 

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 23 May 2020 at 8:30 AM -

Kaptaan Sahib - Munshi Premchand


कप्तान साहब - मुंशी प्रेम चंद

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जगत सिंह को स्कूल जान कुनैन खाने या मछली का तेल पीने से कम अप्रिय न था। वह सैलानी, आवारा, घुमक्कड़ युवक थां कभी अमरूद के बागों की ओर निकल जाता और अमरूदों के साथ माली की गालियॉँ बड़े शौक ... से खाता। कभी दरिया की सैर करता और मल्लाहों को डोंगियों में बैठकर उस पार के देहातों में निकल जाता। गालियॉँ खाने में उसे मजा आता था। गालियॉँ खाने का कोई अवसर वह हाथ से न जाने देता। सवार के घोड़े के पीछे ताली बजाना, एक्को को पीछे से पकड़ कर अपनी ओर खींचना, बूढों की चाल की नकल करना, उसके मनोरंजन के विषय थे। आलसी काम तो नहीं करता; पर दुर्व्यसनों का दास होता है, और दुर्व्यसन धन के बिना पूरे नहीं होते। जगतसिंह को जब अवसर मिलता घर से रूपये उड़ा ले जात। नकद न मिले, तो बरतन और कपड़े उठा ले जाने में भी उसे संकोच न होता था। घर में शीशियॉँ और बोतलें थीं, वह सब उसने एक-एक करके गुदड़ी बाजार पहुँचा दी। पुराने दिनों की कितनी चीजें घर में पड़ी थीं, उसके मारे एक भी न बची। इस कला में ऐसा दक्ष ओर निपुण था कि उसकी चतुराई और पटुता पर आश्चर्य होता था। एक बार बाहर ही बाहर, केवल कार्निसों के सहारे अपने दो-मंजिला मकान की छत पर चढ़ गया और ऊपर ही से पीतल की एक बड़ी थाली लेकर उतर आया। घर वालें को आहट तक न मिली। 
उसके पिता ठाकुर भक्त सिहं अपने कस्बे के डाकखाने के मुंशी थे। अफसरों ने उन्हें शहर का डाकखाना बड़ी दौड़-धूप करने पर दिया था; किन्तु भक्त सिंह जिन इरादों से यहाँ आये थे, उनमें से एक भी पूरा न हुआ। उलटी हानि यह हुई कि देहातो में जो भाजी-साग, उपले-ईधन मुफ्त मिल जाते थे, वे सब यहाँ बंद हो गये। यहाँ सबसे पुराना घराँव थां न किसी को दबा सकते थे, न सता सकते थे। इस दुरवस्था में जगतसिंह की हथलपकियॉँ बहुत अखरतीं। अन्होंने कितनी ही बार उसे बड़ी निर्दयता से पीटा। जगतसिंह भीमकाय होने पर भी चुपके में मार खा लिया करता थां अगर वह अपने पिता के हाथ पकड़ लेता, तो वह हल भी न सकते; पर जगतसिंह इतना सीनाजोर न था। हाँ, मार-पीट, घुड़की-धमकी किसी का भी उस पर असर न होता था। 
जगतसिंह ज्यों ही घर में कदम रखता; चारों ओर से कॉँव-कॉँव मच जाती, मॉँ दुर-दुर करके दौड़ती, बहने गालियॉँ देन लगती; मानो घर में कोई सॉँड़ घुस आया हो। घर ताले उसकी सूरत से जलते थे। इन तिरस्कारों ने उसे निर्लज्ज बना दिया थां कष्टों के ज्ञान से वह निर्द्वन्द्व-सा हो गया था। जहाँ नींद आ जाती, वहीं पड़ रहता; जो कुछ मिल जात, वही खा लेता। 
ज्यों-ज्यों घर वालें को उसकी चोर-कला के गुप्त साधनों का ज्ञान होता जाता था, वे उससे चौकन्ने होते जाते थे। यहाँ तक कि एक बार पूरे महीने-भर तक उसकी दाल न गली। चरस वाले के कई रूपये ऊपर चढ़ गये। गॉँजे वाले ने धुआँधार तकाजे करने शुरू किय। हलवाई कड़वी बातें सुनाने लगा। बेचारे जगत को निकलना मुश्किल हो गया। रात-दिन ताक-झॉँक में रहता; पर घात न मिलत थी। आखिर एक दिन बिल्ली के भागों छींका टूटा। भक्तसिंह दोपहर को डाकखानें से चले, जो एक बीमा-रजिस्ट्री जेब में डाल ली। कौन जाने कोई हरकारा या डाकिया शरारत कर जाए; किंतु घर आये तो लिफाफे को अचकन की जेब से निकालने की सुधि न रही। जगतसिंह तो ताक लगाये हुए था ही। पेसे के लोभ से जेब टटोली, तो लिफाफा मिल गया। उस पर कई आने के टिकट लगे थे। वह कई बार टिकट चुरा कर आधे दामों पर बेच चुका था। चट लिफाफा उड़ा दिया। यदि उसे मालूम होता कि उसमें नोट हें, तो कदाचित वह न छूता; लेकिन जब उसने लिफाफा फाड़ डाला और उसमें से नोट निक पड़े तो वह बड़े संकट में पड़ गया। वह फटा हुआ लिफाफा गला-फाड़ कर उसके दुष्कृत्य को धिक्कारने लगा। उसकी दशा उस शिकारी की-सी हो गयी, जो चिड़ियों का शिकार करने जाए और अनजान में किसी आदमी पर निशाना मार दे। उसके मन में पश्चाताप था, लज्जा थी, दु:ख था, पर उसे भूल का दंड सहने की शक्ति न थी। उसने नोट लिफाफे में रख दिये और बाहर चला गया। 
गरमी के दिन थे। दोपहर को सारा घर सो रहा था; पर जगत की आँखें में नींद न थी। आज उसकी बुरी तरह कुंदी होगी- इसमें संदेह न था। उसका घर पर रहना ठीक नहीं, दस-पॉँच दिन के लिए उसे कहीं खिसक जाना चाहिए। तब तक लोगों का क्रोध शांत हो जाता। लेकिन कहीं दूर गये बिना काम न चलेगा। बस्ती में वह क्रोध दिन तक अज्ञातवास नहीं कर सकता। कोई न कोई जरूर ही उसका पता देगा ओर वह पकड़ लिया जायगा। दूर जाने केक लिए कुछ न कुछ खर्च तो पास होना ही चहिए। क्यों न वह लिफाफे में से एक नोट निकाल ले? यह तो मालूम ही हो जायगा कि उसी ने लिफाफा फाड़ा है, फिर एक नोट निकल लेने में क्या हानि है? दादा के पास रूपये तो हे ही, झक मार कर दे देंगे। यह सोचकर उसने दस रूपये का एक नोट उड़ा लिया; मगर उसी वक्त उसके मन में एक नयी कल्पना का प्रादुर्भाव हुआ। अगर ये सब रूपये लेकर किसी दूसरे शहर में कोई दूकान खोल ले, तो बड़ा मजा हो। फिर एक-एक पैसे के लिए उसे क्यों किसी की चोरी करनी पड़े! कुछ दिनों में वह बहुत-सा रूपया जमा करके घर आयेगा; तो लोग कितने चकित हो जाएेंगे! 
उसने लिफाफे को फिर निकाला। उसमें कुल दो सौ रूपए के नोट थे। दो सौ में दूध की दूकान खूब चल सकती है। आखिर मुरारी की दूकान में दो-चार कढ़ाव और दो-चार पीतल के थालों के सिवा और क्या है? लेकिन कितने ठाट से रहता हे! रूपयों की चरस उड़ा देता हे। एक-एक दॉँव पर दस-दस रूपए रख देता है, नफा न होता, तो वह ठाट कहाँ से निभाता? इस आननद-कल्पना में वह इतना मग्न हुआ कि उसका मन उसके काबू से बाहर हो गया, जैसे प्रवाह में किसी के पॉँव उखड़ जाएें ओर वह लहरों में बह जाए। 
उसी दिन शाम को वह बम्बई चल दिया। दूसरे ही दिन मुंशी भक्तसिंह पर गबन का मुकदमा दायर हो गया। 


बम्बई के किले के मैदान में बैंड़ बज रहा था और राजपूत रेजिमेंट के सजीले सुंदर जवान कवायद कर रहे थे, जिस प्रकार हवा बादलों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बनाती और बिगाड़ती है, उसी भॉँति सेना नायक सैनिकों को नए-नए रूप में बना बिगाड़ रहा था। 
जब कवायद खतम हो गयी, तो एक छरहरे डील का युवक नायक के सामने आकर खड़ा हो गया। नायक ने पूछा-क्या नाम है? सैनिक ने फौजी सलाम करके कहा-जगतसिंह? 
'क्या चाहते हो।' 
'फौज में भरती कर लीजिए।' 
'मरने से तो नहीं डरते?' 
'बिलकुल नहीं-राजपूत हूँ।' 
'बहुत कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी।' 
'इसका भी डर नहीं।' 
'अदन जाना पड़ेगा।' 
'खुशी से जाऊँगा।' 
कप्तान ने देखा, बला का हाजिर-जवाब, मनचला, हिम्मत का धनी जवान है, तुरंत फौज में भरती कर लिया। तीसरे दिन रेजिमेंट अदन को रवाना हुआ। मगर ज्यों-ज्यों जहाज आगे चलता था, जगत का दिल पीछे रह जाता था। जब तक जमीन का किनारा नजर आता रहा, वह जहाज के डेक पर खड़ा अनुरक्त नेत्रों से उसे देखता रहा। जब वह भूमि-तट जल में विलीन हो गया तो उसने एक ठंडी सॉँस ली और मुँह ढॉँप कर रोने लगा। आज जीवन में पहली बर उसे प्रियजानों की याद आयी। वह छोटा-सा कस्बा, वह गॉँजे की दूकान, वह सैर-सपाटे, वह सुहूद-मित्रों के जमघट आँखों में फिरने लगे। कौन जाने, फिर कभी उनसे भेंट होगी या नहीं। एक बार वह इतना बेचैन हुआ कि जी में आय, पानी में कूद पड़े। 


जगतसिंह को अदन में रहते तीन महीने गुजर गए। भॉँति-भॉँति की नवीनताओं ने कई दिन तक उसे मुग्ध किये रखा; लेकिन पुराने संस्कार फिर जाग्रत होने लगे। अब कभी-कभी उसे स्नेहमयी माता की याद आने लगी, जो पिता के क्रोध, बहनों के धिक्कार और स्वजनों के तिरस्कार में भी उसकी रक्षा करती थी। उसे वह दिन याद आया, जब एक बार वह बीमार पड़ा था। उसके बचने की कोई आशा न थी, पर न तो पिता को उसकी कुछ चिन्ता थी, न बहनों को। केवल माता थी, जो रात की रात उसके सिरहाने बैठी अपनी मधुर, स्नेहमयी बातों से उसकी पीड़ा शांत करती रही थी। उन दिनों कितनी बार उसने उस देवी को नीव रात्रि में रोते देखा था। वह स्वयं रोगों से जीर्झ हो रही थी; लेकिन उसकी सेवा-शुश्रूषा में वह अपनी व्यथा को ऐसी भूल गयी थी, मानो उसे कोई कष्ट ही नहीं। क्या उसे माता के दर्शन फिर होंगे? वह इसी क्षोभ ओर नेराश्य में समुद्र-तट पर चला जाता और घण्टों अनंत जल-प्रवाह को देखा करता। कई दिनों से उसे घर पर एक पत्र भेजने की इच्छा हो रही थी, किंतु लज्जा और ग्लानिक कके कारण वह टालता जाता था। आखिर एक दिन उससे न रहा गया। उसने पत्र लिखा और अपने अपराधों के लिए क्षमा मॉँग। पत्र आदि से अन्त तक भक्ति से भरा हुआ थां अंत में उसने इन शब्दों में अपनी माता को आश्वासन दिया था-माता जी, मैने बड़े-बड़े उत्पात किय हें, आप लेग मुझसे तंग आ गयी थी, मै उन सारी भूलों के लिए सच्चे हृदय से लज्जित हूँ और आपको विश्वास दिलाता हूँ कि जीता रहा, तो कुछ न कुछ करके दिखाऊँगा। तब कदाचित आपको मुझे अपना पुत्र कहने में संकोच न होगा। मुझे आर्शीवाद दीजिए कि अपनी प्रतिज्ञा का पालन कर सकूँ।' 
यह पत्र लिखकर उसने डाकखाने में छोड़ा और उसी दिन से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा; किंतु एक महीना गुजर गया और कोई जवाब न आया। आसका जी घबड़ाने लगा। जवाब क्यों नहीं आता-कहीं माता जी बीमार तो नहीं हैं? शायद दादा ने क्रोध-वश जवाब न लिखा होगा? कोई और विपत्ति तो नहीं आ पड़ी? कैम्प में एक वृक्ष के नीचे कुछ सिपाहियों ने शालिग्राम की एक मूर्ति रख छोड़ी थी। कुछ श्रद्धालू सैनिक रोज उस प्रतिमा पर जल चढ़ाया करते थे। जगतसिंह उनकी हँसी उड़ाया करता; पर आप वह विक्षिप्तों की भॉँति प्रतिमा के सम्मुख जाकर बड़ी देर तक मस्तक झुकाये बेठा रहा। वह इसी ध्यानावस्था में बैठा था कि किसी ने उसका नाम लेकर पुकार, यह दफ्तर का चपरासी था और उसके नाम की चिट्ठी लेकर आया थां जगतसिंह ने पत्र हाथ में लिया, तो उसकी सारी देह कॉँप उठी। ईश्वर की स्तुति करके उसने लिफाफा खोला ओर पत्र पढ़ा। लिखा था-'तुम्हारे दादा को गबन के अभियोग में पॉँच वर्ष की सजा हो गई। तुम्हारी माता इस शोक में मरणासन्न है। छुट्टी मिले, तो घर चले आओ।' 
जगतसिंह ने उसी वक्त कप्तान के पास जाकर कह -'हुजूर, मेरी मॉँ बीमार है, मुझे छुट्टी दे दीजिए।' 
कप्तान ने कठोर आँखों से देखकर कहा-अभी छुट्टी नहीं मिल सकती। 
'तो मेरा इस्तीफा ले लीजिए।' 
'अभी इस्तीफा नहीं लिया जा सकता।' 'मै अब एक क्षण भी नहीं रह सकता।' 
'रहना पड़ेगा। तुम लोगों को बहुत जल्द लाभ पर जाना पड़ेगा।' 
'लड़ाई छिड़ गयी! आह, तब मैं घर नहीं जाऊँगा? हम लोग कब तक यहाँ से जाएंगे?' 
'बहुत जल्द, दो ही चार दिनों में।' 


चार वर्ष बीत गए। कैप्टन जगतसिंह का-सा योद्धा उस रेजीमेंट में नहीं हैं। कठिन अवस्थाओं में उसका साहस और भी उत्तेजित हो जाता है। जिस महिम में सबकी हिम्मते जवाब दे जाती है, उसे सर करना उसी का काम है। हल्ले और धावे में वह सदैव सबसे आगे रहता है, उसकी त्योरियों पर कभी मैल नहीं आता; उसके साथ ही वह इतना विनम्र, इतना गंभीर, इतना प्रसन्नचित है कि सारे अफसर ओर मातहत उसकी बड़ाई करते हैं, उसका पुनर्जीतन-सा हो गया। उस पर अफसरों को इतना विश्वास है कि अब वे प्रत्येक विषय में उससे परामर्श करते हें। जिससे पूछिए, वही वीर जगतसिंह की विरूदावली सुना देगा-कैसे उसने जर्मनों की मेगजीन में आग लगायी, कैसे अपने कप्तान को मशीनगनों की मार से निकाला, कैसे अपने एक मातहत सिपाही को कंधे पर लेकर निल आया। ऐसा जान पड़ता है, उसे अपने प्राणों का मोह नही, मानो वह काल को खोजता फिरता हो! 
लेकिन नित्य रात्रि के समय, जब जगतसिंह को अवकाश मिलता है, वह अपनी छोलदारी में अकेले बैठकर घरवालों की याद कर लिया करता है-दो-चार आँसू की बँदे अवश्य गिरा देता हे। वह प्रतिमास अपने वेतन का बड़ा भाग घर भेज देता है, और ऐसा कोई सप्ताह नहीं जाता जब कि वह माता को पत्र न लिखता हो। सबसे बड़ी चिंता उसे अपने पिता की है, जो आज उसी के दुष्कर्मो के कारण कारावास की यातना झेल रहे हैं। हाय! वह कौन दिन होगा, जब कि वह उनके चरणों पर सिर रखकर अपना अपराध क्षमा करायेगा, और वह उसके सिर पर हाथ रखकर आर्शीवाद देंगे? 


सवा चार वर्ष बीत गए। संध्या का समय है। नैनी जेल के द्वार पर भीड़ लगी हुई है। कितने ही कैदियों की मियाद पूरी हो गयी है। उन्हें लिवा जाने के लिए उनके घरवाले आये हुए है; किन्तु बूढ़ा भक्तसिंह अपनी अँधेरी कोठरी में सिर झुकाये उदास बैठा हुआ है। उसकी कमर झुक कर कमान हो गयी है। देह अस्थि-पंजर-मात्र रह गयी हे। ऐसा जान पड़ता हें, किसी चतुर शिल्पी ने एक अकाल- पीड़ित मनुष्य की मूर्ति बनाकर रख दी है। उसकी भी मीयाद पूरी हो गयी है; लेकिन उसके घर से कोई नहीं आया। आये कौन? आने वाल था ही कौन? 
एक बूढ़ किन्तु हृष्ट-पुष्ट कैदी ने आकर उसक कंधा हिलाया और बोला-कहो भगत, कोई घर से आया? 
भक्तसिंह ने कंपित कंठ-स्वर से कहा-घर पर है ही कौन? 
'घर तो चलोगे ही?' 
'मेरे घर कहाँ है?' 
'तो क्या यही पड़े रहोंगे?' 
'अगर ये लोग निकाल न देंगे, तो यहीं पड़ा रहूँगा।' 
आज चार साल के बाद भगतसिंह को अपने प्रताड़ित, निर्वासित पुत्र की याद आ रही थी। जिसके कारण जीतन का सर्वनाश हो गया; आबरू मिट गयी; घर बरबाद हो गया, उसकी स्मृति भी असहय थी; किन्तु आज नैराश्य ओर दु:ख के अथाह सागर में डूबते हुए उन्होंने उसी तिनके का सहार लियां न-जाने उस बेचारे की क्या दख्शा हुई। लाख बुरा है, तो भी अपना लड़का हे। खानदान की निशानी तो हे। मरूँगा तो चार आँसू तो बहायेगा; दो चिल्लू पानी तो देगा। हाय! मैने उसके साथ कभी प्रेम का व्यवहार नहीं कियां जरा भी शरारत करता, तो यमदूत की भॉँति उसकी गर्दन पर सवार हो जाता। एक बार रसोई में बिना पैर धोये चले जाने के दंड में मेने उसे उलटा लटका दिया था। कितनी बार केवल जोर से बोलने पर मैंने उस वमाचे लगाये थे। पुत्र-सा रत्न पाकर मैंने उसका आदर न कियां उसी का दंड है। जहाँ प्रेम का बन्धन शिथिल हो, वहाँ परिवार की रक्षा कैसे हो सकती है? 


सबेरा हुआ। आशा की सूर्य निकला। आज उसकी रश्मियॉँ कितनी कोमल और मधुर थीं, वायु कितनी सुखद, आकाश कितना मनोहर, वृक्ष कितने हरे-भरे, पक्षियों का कलरव कितना मीठा! सारी प्रकृति आश के रंग में रंगी हुई थी; पर भक्तसिंह के लिए चारों ओर धरे अंधकार था। 
जेल का अफसर आया। कैदी एक पंक्ति में खड़े हुए। अफसर एक-एक का नाम लेकर रिहाई का परवाना देने लगा। कैदियों के चेहरे आशा से प्रफुलित थे। जिसका नाम आता, वह खुश-खुश अफसर के पास जात, परवाना लेता, झुककर सलाम करता और तब अपने विपत्तिकाल के संगियों से गले मिलकर बाहर निकल जाता। उसके घरवाले दौड़कर उससे लिपट जाते। कोई पैसे लुटा रहा था, कहीं मिठाइयॉँ बॉँटी जा रही थीं, कहीं जेल के कर्मचारियों को इनाम दिया जा रहा था। आज नरक के पुतले विनम्रता के देवता बने हुए थे। 
अन्त में भक्तसिंह का नाम आया। वह सिर झुकाये आहिस्ता-आहिस्ता जेलर के पास गये और उदासीन भाव से परवाना लेकर जेल के द्वार की ओर चले, मानो सामने कोई समुद्र लहरें मार रहा है। द्वार से बाहर निकल कर वह जमीन पर बैठ गये। कहाँ जाएँ? 
सहसा उन्होंने एक सैनिक अफसर को घोड़े पर सवार, जेल की ओर आते देखा। उसकी देह पर खाकी वरदी थी, सिर पर कारचोबी साफा। अजीब शान से घोड़े पर बैठा हुआ था। उसके पीछे-पीछे एक फिटन आ रही थी। जेल के सिपाहियों ने अफसर को देखते ही बन्दूकें सँभाली और लाइन में खड़े हाकर सलाम किया। 
भक्तससिंह ने मन में कहा-एक भाग्यवान वह है, जिसके लिए फिटन आ रही है; ओर एक अभागा मै हूँ, जिसका कहीं ठिकाना नहीं। 
फौजी अफसर ने इधर-उधर देखा और घोड़े से उतर कर सीधे भक्तसिंह के सामने आकर खड़ा हो गया। 
भक्तसिंह ने उसे ध्यान से देखा और तब चौंककर उठ खड़े हुए और बोले-अरे! बेटा जगतसिंह! 
जगतसिंह रोता हुआ उनके पैरों पर गिर पड़ा। 

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 18 May 2020 at 10:25 PM -

परंपरा

मृदा में यदि चूने का अनुपात घटेगा तो हमारे खाद्यान्न तथा दूध में भी कैल्शियम घटेगा। परिणामस्वरूप हमारी हड्डियां कमजोर पड़ेंगी और दवाओं पर हमारी निर्भरता बढ़ेगी। मृदा का कैल्शियम बनाये रखने के लिए हमें हड्डियों को (जलाकर अथवा बिना जलाये) नदियों में प्रवाहित करना ... बन्द करना होगा। कानूनी जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए हमें अपनी अंत्येष्टि परम्पराओं में वायु प्रदूषण तथा मृदा की पोषकता के अनुरूप संशोधन करना चाहिए।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 15 May 2020 at 7:54 AM -

प्रश्न और उत्तर

सामान्य ज्ञान से जुड़े कुछ प्रश्न-

Q1. घडी के अन्दर रात मे चमकने वाला पदार्थ क्या है
Ans = बेरियम सल्फाइड।
Q2. थर्मामीटर मे चमकने वाला पदार्थ क्या है
Ans = पारा
Q3. कौन सी गैस सूंघने पर आदमी हँसने लगता है ?
Ans = नाइट्रस आक्साइड (N2O)
Q4. मनुष्य के ऑसू ... मे क्या पाया जाता है ?
Ans = सोडीयम क्लोराइड
Q5. पीने के पानी मे कौनसी गैस मिलाते है ?
Ans = क्लोरीन (Cl)
Q6. बिजली के हीटर मे किस धातु का तार होता है ?
Ans = नाइक्रोम का तार
Q7. पानी किन गैसों के रासायनिक मिलन से बनता है ?
Ans = हाइड्रोजन और आक्सीजन
Q8. किस ग्रह को इवनिंग स्टार (शाम का तारा ) कहते है ?
Ans = शुक्र ग्रह
Q9. किस ग्रह को रेड स्टार (लाल तारा) कहते है ?
Ans = मंगल ग्रह
Q10. पेड़ की पत्तियों का रंग हरा क्यो होता है ?
Ans = क्लोरोफिल के कारण
Q11. मनुष्य के शरीर मे कुल कितनी हड्डियां होती है ?
Ans = (206) और शिशुओं में ज्यादा होती हैं।
Q12. आग मे कौन सा पदार्थ नही जलता है ?
Ans = एसबेस्टस
Q13. सबसे कठोर पदार्थ (न कि धातु) है ?
Ans = हीरा
Q14. कौनसा पदार्थ पानी मे जलता है ?
Ans = सोडियम
Q15. सबसे जहरीला पदार्थ कौन सा होता है ?
Ans = पोटैशियम आइसो सायनाइड
Q16. किन-किन धातुओ को मिलाकर पीतल बनाते है ?
Ans = तांबा व जस्ता
Q17. किन - किन धातुओं को मिलाकर चुम्बक बनता है ?
Ans = अल्यूमिनियम, निकल व क्रोमियम।
Q18. कौनसी गैस बिना कष्ट के जान ले लेती है ?
Ans = कार्बन मोनोऑक्साइड?
Q19. वायुमण्डल मे कौनसी गैस नही है ?
Ans = क्लोरीन?
Q20. कौनसा खनिज हमारे देश मे सर्वाधिक पाया जाता है ?
Ans = अभ्रक
Q21. बर्फ पानी मे क्यों तैरता है ?
Ans = बर्फ का आपेक्षिक घनत्व पानी के आपेक्षिक घनत्व से कम होता है !!

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 03 May 2020 at 4:45 PM -

कोरोना वैक्सीन की आशा

कोविड-19 के टीके पर सारी उम्मीदों को टिका देना ? क्या टीका बन ही जाएगा ?

मनुष्य-जाति में सात कोरोनाविषाणु संक्रमण करते रहे हैं। सातवाँ कोरोनाविषाणु अभी कुछ महीनों पहले नया-नया हमारी सूक्ष्म-जैविक जनसंख्या का सदस्य बना है और इसके कारण हम एक वैश्विक महामारी झेल ... रहे हैं। ऐसे में सरकारों , वैज्ञानिकों-डॉक्टरों , मीडिया व आम जन की ढेर सारी उम्मीदें वैक्सीन यानी टीके से हैं। 'टीका बन जाने के बाद ...' , 'जब टीका बन जाएगा ...' , 'कब-तक टीका बन जाएगा ...' --- जैसे आशान्वित वाक्य जगह-जगह सुनायी देने लगे हैं। पर ऐसे में यह चिन्ताजनक प्रश्न भी अपना महत्त्व रखता है कि अगर टीका बन ही न सका , तो क्या होगा ?

इस प्रश्न को सुनकर ढेरों लोग निराश महसूस कर सकते हैं। ऐसा भी सम्भव है कि वे आशा के अतिरेक में इसे खारिज करने लगें। अरे , जब फ़्लू के खिलाफ़ टीका बन गया तो इसके खिलाफ़ क्यों नहीं बनेगा ! पोलियो का टीका है , चेचक का है और ख़सरे का भी है। ढेरों टीके छोटे बच्चों को लगते रहते हैं। ऐसे में वर्तमान कोरोनाविषाणु के खिलाफ़ टीका क्यों न बनेगा ! कैसी नकारात्मक प्रश्नीयता है यह !

जहाँ दुनिया-भर के वैज्ञानिक अहर्निश इस विषाणु के खिलाफ़ प्रतिरोधी टीके के निर्माण में लगे पड़े हैं , वहाँ इस सत्य से हम-आप मुँह नहीं मोड़ सकते कि पिछले छह कोरोनाविषाणुओं में से एक के खिलाफ़ भी हमारे पास टीका नहीं है। और अन्य प्रजातियों के विषाणुओं के खिलाफ़ उपलब्ध वैक्सीनों के कारण हम इस सार्ससीओवी 2 के खिलाफ़ टीके के लिए अत्युत्साह और अत्याशा से भर कर नहीं रह सकते।

हर विषाणु भिन्न है , उसकी संरचना अलग। जिस तरह से ह्यूमन पैपिलोमा विषाणु त्वचा पर मस्सों से लेकर योनि-शिश्न का कैंसर तक उत्पन्न करता है ,वह तरीक़ा उस एचआईवी से अलग है , जो रक्तकोशिकाओं को नष्ट करके प्रतिरक्षा को क्षीण करता है। ख़सरे का विषाणु अलग ढंग से काम करता है , पोलियो का अलग ढंग से। ऐसे में एक विषाणु की समझ से दूसरे को पूरी तरह समझ पाने का भरोसा बहुधा ग़लत भी साबित हो सकता है। यहाँ तक कि पिछली फ़्लू-महामारियों से भी कोविड-19 की तुलना जब-तब की जा रही है। यह बात लोगों को ध्यान नहीं रहती कि वह विषाणु एक इल्फ्लुएन्ज़ा-विषाणु है और यह एक कोरोनाविषाणु। दोनों एकदम भिन्न परिवार के हैं : ऐसे में एक से मिले सबकों से दूसरे को समझना कितना उचित कहा जा सकता है ?

प्रश्न से प्रश्न निकलते हैं। अब यह प्रश्न उठता है कि पिछले किसी कोरोनाविषाणु के खिलाफ़ हम-लोग टीका क्यों न बना सके ? सार्स का टीका क्यों बन सका ? मर्स का क्यों न बना ? इसके लिए यह समझ ज़रूरी हो जाती है कि टीका-निर्माण उतना आसान नहीं , जितना मीडिया व आम जन समझते हैं। मनुष्य के ऊपरी श्वसन-मार्ग को समझना भी वर्तमान कोरोनाविषाणु-संक्रमण को समझने के लिए आवश्यक है। ऊपरी श्वसन-मार्ग यानी नाक से आरम्भ होकर जो वायुमार्ग श्वासनली तक जाता है , वह कई भिन्नताएँ लिए हुए है। वैक्सीन-तकनीकी के लिए यह इतना सुगम ढंग से भेद्य नहीं है। व्यावहारिक ढंग से इसे आप त्वचा के ही रूप में समझकर देखिए : त्वचा का वह हिस्सा जो भीतर श्वास-मार्ग की ओर चला गया है।

क्या त्वचा पर मौजूद विषाणु की किसी टीके से रोकथाम की गयी है अब तक ? उत्तर लगभग 'न' है। त्वचा व ऊपरी श्वसन-मार्ग जैसे रास्ते विषाणुओं से अपने ढंग से लड़ते हैं और चूँकि ये एक तरह से शरीर से 'बाहर' हैं , इनसे 'भीतरी' शत्रुओं की तरह लड़ा नहीं जा सकता। ध्यान रहे , शरीर के भीतरी शत्रु-कीटाणुओं से लड़ने के लिए टीके बनाना कहीं आसान है , जबकि शरीर के बाहर सतह पर बैठे कीटाणुओं के खिलाफ़ बनाना अपेक्षाकृत मुश्किल। इन बाहरी सतहों पर आ-बैठा विषाणु प्रतिरक्षा-तन्त्र को उस तरह सक्रिय नहीं करता , जिस तरह यह विषाणु भीतर पहुँचने पर करता है। इसे इस तरह समझिए : आपके घर के बाहर कोई आवांछित व्यक्ति खड़ा होता है , तब आपकी प्रतिक्रिया क्या होती है ? क्या यह प्रतिक्रिया उतनी और वैसी ही होती है , जैसी वह तब होती जब यह व्यक्ति आपके बेडरूम में होता ? आपके फेफड़े आपका बेडरूम हैं , आपकी नाक व श्वासनली आपके घर का दरवाज़ा या फिर हद-से-हद बैठक-भर। ऐसे में प्रतिरक्षा-तन्त्र की सजगता और फिर सुरक्षा एक-जैसी कैसे हो सकती हैं ?

अगर कोई विषाणु प्रतिरक्षा-तन्त्र को सजग नहीं करता और उसे 'मूर्ख' बना लेता है , तब उसके खिलाफ़ टीका बनाना मुश्किल होगा। प्रतिरक्षा-तन्त्र को ही जो चकमा दे गया , उससे टीके से हम-आप कितना लड़ पाएँगे ! फिर अगली समस्या टीके के बनने व लगने के बाद शुरू हो सकती है। टीके के कारण मिलने वाली प्रतिरक्षा गलत या अत्यधिक हो सकती है। यानी टीका लगाने के बाद जो प्रतिरक्षण उत्पन्न हुआ , उसने शरीर को ही हानि पहुँचानी शुरू कर दी ! ऐसा पिछले कोरोना-टीकों के साथ हुआ है। टीका लगने के बाद व्यक्ति अधिक बीमार पड़ गया : इससे बेहतर तो वह तब था , जब वह अपने प्रतिरक्षा-तन्त्र-भर के सहयोग से लड़ रहा था ! सार्स के खिलाफ़ टीका-विकास में यह दुष्परिणाम हमें देखने को मिल चुके हैं : टीका लगने के बाद पशु-शरीर पहले से भी अधिक रोगग्रस्त हो गया यानी स्वयं टीके ने पशुओं की स्वास्थ्य-स्थिति बिगाड़ दी।

वर्तमान कोरोनाविषाणु के खिलाफ़ सक्षम व सफल टीका बनाना आसान नहीं होगा। ऐसे में टीके के ऊपर अपनी सारी उम्मीदें टिका देना जेठ में सावन की आशा पालना है। रोकथाम के विशिष्ट वैज्ञानिक उपायों पर जब अतिनिर्भर हो जाते हैं , जब सामान्य सामाजिक उपायों की उपेक्षा करने लगते हैं। हमें यही नहीं करना है : टीका जब आएगा , तब आएगा। और नहीं भी आया , तब स्वच्छता और शुचिता के नवीन मानदण्डों के साथ इस नये विषाणु से जूझना है।

--- स्कन्द।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 11 Jan 2019 at 6:22 AM -

वायु प्रदूषण के लक्षण

आपके आसपास की वायु कितनी प्रदूषित है यह जानने के लिए सबसे कारगर तरीका है पानी। आप दो जारों में पानी भरकर रख दें। एक का मुह खुला रखें और एक का बंद। 10 घंटे बाद दोनों का पानी चखें। आपको खुले जार का पानी ... कड़वा लगेगा। महक में भी अंतर हो सकता है। यदि आप मोरटीन क्वाइल जलाकर छोड़ दें तो खुले जार वाला पानी और भी ज्यादा खराब लगेगा।
यदि आप गीले कपड़े फैला दें तो ऐसे प्रदूषण का बहुत सा भाग इन गीले कपड़ों द्वारा अवशोषित कर लिया जाएगा।
अक्सर हमारे आसपास के प्रदूषण में बारीक कण और भारी गैसें होती हैं। ये गैसें धीरे धीरे नीचे की ओर बढ़ती रहती हैं। इस दृष्टि से जमीन पर सोने के बजाय चारपाई पर सोना बेहतर है। इस दृष्टि से कुएं के पानी की बजाय हैण्डपम्प का पानी पीना बेहतर है। इस दृष्टि से अप्रयुक्त कुएं में उतारना खतरनाक हो सकता है।
खुद भी सावधान रहें और दूसरों को भी सावधान करें तो अच्छा रहेगा।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 08 Dec 2018 at 5:50 AM -

प्रश्न :- देश में माल परिवहन के लिए निम्नांकित में से कौन सबसे बड़े माध्यम के रूप में प्रयुक्त होता है ?
1⃣ नौ परिवहन सेवा
2⃣ सड़क परिवहन
3⃣ वायु सेवा
4⃣ रेलवे