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user image Arvind Swaroop Kushwaha - 18 May 2020 at 10:25 PM -

परंपरा

मृदा में यदि चूने का अनुपात घटेगा तो हमारे खाद्यान्न तथा दूध में भी कैल्शियम घटेगा। परिणामस्वरूप हमारी हड्डियां कमजोर पड़ेंगी और दवाओं पर हमारी निर्भरता बढ़ेगी। मृदा का कैल्शियम बनाये रखने के लिए हमें हड्डियों को (जलाकर अथवा बिना जलाये) नदियों में प्रवाहित करना ... बन्द करना होगा। कानूनी जटिलताओं को ध्यान में रखते हुए हमें अपनी अंत्येष्टि परम्पराओं में वायु प्रदूषण तथा मृदा की पोषकता के अनुरूप संशोधन करना चाहिए।

user image Pramod Sharma - 13 May 2020 at 7:40 PM -

श्री दुर्गा सप्तशती संपूर्ण

श्री दुर्गा सप्तशती संपूर्ण
जनकर्ता स्नान करके, आसन शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके, शुद्ध आसन पर बैठ जाएं, साथ में शुद्ध जल, पूजन सामग्री और श्री दुर्गा सप्तशती की पुस्तक सामने रखें। इन्हें अपने सामने काष्ठ आदि के शुद्ध आसन पर विराजमान कर दें। माथे पर ... अपनी पसंद के अनुसार भस्म, चंदन अथवा रोली लगा लें, शिखा बांध लें, फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्व शुद्धि के लिए चार बार आचमन करें। इस समय निम्न मंत्रों को बोलें-

ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥

तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें, फिर 'पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ' इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें-

चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है, किन्तु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गई है।

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकामने महामांगल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवं गुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रहकृतराजकृतसर्व-विधपीडानिवृत्तिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायुः पुष्टिधनधान्यसमृद्ध्‌यर्थं श्री नवदुर्गाप्रसादेन सर्वापन्निवृत्तिसर्वाभीष्टफलावाप्तिधर्मार्थ- काममोक्षचतुर्विधपुरुषार्थसिद्धिद्वारा श्रीमहाकाली-महालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थं शापोद्धारपुरस्परं कवचार्गलाकीलकपाठ- वेदतन्त्रोक्त रात्रिसूक्त पाठ देव्यथर्वशीर्ष पाठन्यास विधि सहित नवार्णजप सप्तशतीन्यास- धन्यानसहितचरित्रसम्बन्धिविनियोगन्यासध्यानपूर्वकं च 'मार्कण्डेय उवाच॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।' इत्याद्यारभ्य 'सावर्णिर्भविता मनुः' इत्यन्तं दुर्गासप्तशतीपाठं तदन्ते न्यासविधिसहितनवार्णमन्त्रजपं वेदतन्त्रोक्तदेवीसूक्तपाठं रहस्यत्रयपठनं शापोद्धारादिकं च किरष्ये/करिष्यामि।

इस प्रकार प्रतिज्ञा (संकल्प) करके देवी का ध्यान करते हुए पंचोपचार की विधि से पुस्तक की पूजा करें, योनिमुद्रा का प्रदर्शन करके भगवती को प्रणाम करें, फिर मूल नवार्ण मन्त्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें। इसके बाद शापोद्धार करना चाहिए। इसके अनेक प्रकार हैं।

'ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा'

इस मंत्र का आदि और अन्त में सात बार जप करें। यह शापोद्धार मंत्र कहलाता है। इसके अनन्तर उत्कीलन मन्त्र का जाप किया जाता है।

इसका जप आदि और अन्त में इक्कीस-इक्कीस बार होता है। यह मन्त्र इस प्रकार है- 'ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशति चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा।' इसके जप के पश्चात्‌ आदि और अन्त में सात-सात बार मृतसंजीवनी विद्या का जाप करना चाहिए, जो इस प्रकार है-

'ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा।'

मारीचकल्प के अनुसार सप्तशती-शापविमोचन का मन्त्र यह है-

'ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं।'

इस मन्त्र का आरंभ में ही एक सौ आठ बार जाप करना चाहिए, पाठ के अन्त में नहीं। अथवा रुद्रयामल महातन्त्र के अंतर्गत दुर्गाकल्प में कहे हुए चण्डिका शाप विमोचन मन्त्र का आरंभ में ही पाठ करना चाहिए। वे मन्त्र इस प्रकार हैं-

ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठ-नारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्री शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पितकार्यसिद्ध्‌यर्थे जपे विनियोगः।

ॐ (ह्रीं) रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥1॥
ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठ विश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥2॥
ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥3॥
ॐ क्षुं धुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥4॥
ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥5॥
ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥6॥
ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्र शापाद् विमुक्ता भव॥7॥
ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥8॥
ॐ जां जातिस्वरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥9॥
ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥10॥
ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥11॥
ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफलदात्र्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥12॥
ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥13॥
ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमसहितायै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥14॥
ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥15॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥16॥
ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै
ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥17॥
ॐ ऐं ह्री क्लीं महाकालीमहालक्ष्मी-
महासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः॥18॥
इत्येवं हि महामन्त्रान्‌ पठित्वा परमेश्वर।
चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशयः॥19॥
एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति यः।
आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशयः॥20॥

इस प्रकार शापोद्धार करने के अनन्तर अन्तर्मातृका बहिर्मातृका आदि न्यास करें, फिर श्रीदेवी का ध्यान करके रहस्य में बताए अनुसार नौ कोष्ठों वाले यन्त्र में महालक्ष्मी आदि का पूजन करें, इसके बाद छ: अंगों सहित दुर्गासप्तशती का पाठ आरंभ किया जाता है।

कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य- ये ही सप्तशती के छ: अंग माने गए हैं। इनके क्रम में भी मतभेद हैं। चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है, किन्तु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गई है।

जिस प्रकार सब मंत्रों में पहले बीज का, फिर शक्ति का तथा अन्त में कीलक का उच्चारण होता है, उसी प्रकार यहाँ भी पहले कवच रूप बीज का, फिर अर्गला रूपा शक्ति का तथा अन्त में कीलक रूप कीलक का क्रमशः पाठ होना चाहिए। यहाँ इसी क्रम का अनुसरण किया गया है।

(इसके बाद देवी कवच का पाठ करना चाहिए।)

॥ अथ देव्याः कवचम्‌ ॥

विनियोग
ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप्‌ छन्दः, चामुण्डा देवता, अंगन्यासोक्तमातरो बीजम्‌, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्‌, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोगः।

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै॥

मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्‌।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥

ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्‌।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥2॥
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्‌॥3॥
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्‌॥4॥
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥
अग्निता दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥
न तेषा जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥7॥
यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धि प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥
प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमानरूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥
माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥
श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥11॥
इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥12॥
दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शंख चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्‌॥13॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शांर्गमायुधमुत्तमम्‌॥14॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वस॥15॥
नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महावले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥
त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिन।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥17॥
दक्षिणेऽवतु वाराहीनैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥18॥
उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेद्धस्ताद् वैष्णवी तथा ॥19॥
एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया में चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥20॥
अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥
मालाधारी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥22॥
शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले च शांकरी॥23॥
नासिकायां सुगन्दा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥24॥
दन्तान्‌ रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥25॥
कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमंगला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥26॥
नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू में व्रजधारिणी॥27॥
हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च।
नखांछूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥।
स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥29॥
नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥30॥
कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जंघे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥
गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥32॥
नखान्‌ दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥
रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥34॥
पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥35॥
शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥
प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्‌।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥
रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥
आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥
गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान्‌ रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥40॥
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥41॥
रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥42॥
पदमेकं न गच्छेतु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥43॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्‌।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्‌॥44॥
निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्‌॥45॥
इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्‌।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥46॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥47॥
नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जंगमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्‌॥48॥
अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥49॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥50॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥51॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्‌॥52॥
यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥53॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्‌।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥54॥
देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्‌।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥55॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥56॥


॥ इति देव्याः कवचं संपूर्णम्‌ ॥

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 13 May 2020 at 11:38 AM -

Shaheed-e-Azam Munshi Premchand शहीद-ए-आज़म, मुंशी प्रेमचंद




कर्बला की दुर्घटना विश्व इतिहास की उन सर्वश्रेष्ठ घटनाओं में है जिन्होंने सभ्यता की दिशा परिवर्तित कर दी है। यजीद के खानदान में इस्लामी खिलाफत1 का जाना वास्तव में इस्लाम के विश्व-बंधुत्व और समानता के दीप का बुझ जाना था। यदि हजरत हुसैन के हाथों ... में खिलाफत होती तो इस्लामी परम्पराएँ अपने वास्तविक रूप में विकसित होतीं और विजयों तथा बादशाहत के वे बन्दर न आते जिन्होंने चाहे इस्लामी इतिहास को उलाहना न दिया हो मगर उस उद्देश्य से अवश्य ही गिरा दिया जो इस्लाम के अस्तित्व में आने का कारण बना था। इस्लाम का अवतरण दूसरे देशों को जीतने के लिए नहीं हुआ था, वह एक शुद्ध आध्यात्मिक आन्दोलन था जिसका उद्देश्य दुनिया से जुल्म और बादशाहत को समाप्त करके विश्वव्यापी समानता का प्राकट्य था। हजरत अबू बकर, हजरत फारूक और हजरत उस्मान का युग इस आन्दोलन का प्रारम्भिक काल था जिसमें इस्लामी परम्पराओं की नींव पड़ रही थी। हजरत अली के खिलाफत के अल्पकालिक युग में इस्लामी सभ्यता का विकास जिस नाम से हुआ वह यदि बना रहता तो आज इस्लाम अपनी शानो शौकत और विजयों के लिए नहीं, वरन् अपनी आध्यात्मिकता और सत्यनिष्ठा के लिए प्रतिष्ठित होता। देशों को जीतने की भूख हजरत मआविया के साथ इस्लाम में प्रविष्ट हुई और यह तत्त्व निरन्तर बढ़ता गया, यहाँ तक कि महमूद गजनवी के मूर्तिभंजक आक्रमणों और बर्बर विजयों के रूप में हम उसका निकृष्ट रूप देखते हैं। 

हजरत हुसैन अलेहिस्सलाम खिलाफत और बादशाहत के सैद्धान्तिक मतभेदों और महत्त्व को भली प्रकार समझते थे और इसीलिए अपने पक्ष में वातावरण न होने पर भी उन्होंने अपना सब कुछ, यहाँ तक कि अपना और अपने आत्मीय जनों का प्रिय जीवन भी इस्लामी प्रतिष्ठा के समर्थन और सुरक्षा की भेंट कर दिया। यह स्वीकार करने के लिए बुद्धि सहमत नहीं होती कि ऐसा निःस्वार्थ, ऐसा कामनारहित, ऐसा सिद्धान्तप्रिय पूर्वज मात्र निजी व्यक्तिगत अधिकार के लिए इतना भयावह युद्ध ठान बैठता। 

इस्लाम के अवतरण से पूर्व एकेश्वरवाद का स्वर गूँजने लगा था। इस विषय में हिन्दुस्तान को अग्रगामी होने का गौरव प्राप्त है। ईश्वर के अस्तित्व के अतिरिक्त अन्य सभी वस्तुएँ नष्ट होने वाली हैं, यह वास्तविकता पहली बार वेदों ने प्रकट की। इसके पश्चात् बौद्ध धर्म का आविर्भाव हुआ। बौद्ध धर्म ने ‘अहिंसा’ को श्रेष्ठ स्वीकार किया। बाद में हजरत ईसा अवतरित हुए और उन्होंने ‘दया’ को सर्वश्रेष्ठ सच्चाई माना। इस्लाम ने विश्व-बंधुत्व और समानता की पताका फहराई। उस समय भी संसार पारस्परिक खूनखराबे से तंग आ चुका था। उस खूनखराबे का कारण यही छोटे और बड़े, ऊँचे और नीचे का झगड़ा था। इस्लाम के प्रवर्तक ने संसार से खूनखराबे और शत्रुता को जड़ से मिटा देने का संकल्प कर लिया था और इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए समानता से उत्कृष्ट कोई उपाय नहीं था। आज भी संसार समानता की खोज में उलझा है। सोशलिज्म और साम्यवाद क्या है; उसी समानता की खोज। तेरह-चौदह शताब्दियों के बाद भी संसार जिस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास कर रहा है, उसे इस्लाम के प्रवर्तक ने कब का सुलझा दिया था। खेद है कि जिस क्षेत्र में उसका बीजारोपण किया गया था वह उस समय इस खेती के योग्य न था। 

हजरत मुहम्मद के जीवन-काल में और उसके कुछ दिनों बाद तक भाईचारा ही इस्लाम का विशेष गुण रहा जो हजरत हुसैन के बलिदान के साथ समाप्त हो गया। इस दृष्टिकोण से देखिए तो हजरत हुसैन का बलिदान संसार की सबसे महान् ऐतिहासिक घटना है। 

खलीफा का शासन। 

वैचारिक, मानवीय या भावनात्मक, किसी भी दृष्टि से देखिए, हजरत हुसैन के लिए बलिदान अनिवार्य था। कूफावासियों का बार-बार निमन्त्रण देना क्या कुछ महत्त्वपूर्ण बात नहीं थी? उन निमन्त्रणों को ठुकराना शिष्टाचार की दृष्टि से आपत्तिजनक था। इसके अतिरिक्त जब इस्लाम की सबसे प्रिय वस्तु को अधिकार में लेने का प्रयास किया जाता हो, तब इस्लामी प्रतिष्ठा के एकमात्र ध्वजवाहक व्यक्ति का इसके अतिरिक्त और क्या कर्त्तव्य हो सकता था कि वह व्यक्तिगत आशंकाओं को हेय समझे और यथासम्भव उसकी सुरक्षा करे। कूफियों के छल का भेद खुल जाने पर सम्भव था कि वे अधीनता स्वीकार करके जान बचा लेते, मगर मानवीय दृष्टि से यह दूषित कर्म होता। एक बार दृढ़ संकल्प कर लेने के बाद फिर बलिदान के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं था। सम्भवतः हजरत हुसैन बलिदान होकर ही इस्लाम की उत्कृष्ट सेवा कर सकते थे। यहाँ मुहर्रम और अजादारी1 के सम्बन्ध में अपनी राय प्रकट करना सम्भवतः कुछ मित्रों को अरुचिकर प्रतीत हो, लेकिन मैं इसे स्पष्ट करना अपना दायित्व समझता हूँ। 

राम, कृष्ण और बुद्ध इतिहास से होते हुए कहानियों की परिधि में आ गए हैं, यहाँ तक कि प्रायः शोधकर्ताओं के विचार में महाभारत और रामायण ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं हैं बल्कि आध्यात्मिक अनुभव हैं। महात्मा गांधी इन्हीं लोगों में हैं; उनकी आस्था है कि प्रत्येक हृदय रामायण और महाभारत का मंच है और इन कहानियों को ऐतिहासिक दृष्टि से देखना इनके महत्त्व को मिट्टी में मिलाना है। मगर कर्बला का युद्ध अभी तक प्रामाणिक ऐतिहासिक घटना है और सम्भवतः आज तक किसी अन्वेषक को यह कहने का साहस नहीं हुआ कि यह मात्र आध्यात्मिक अनुभव है और अच्छे व बुरे का अनादि काल से चला आता संघर्ष है जो प्रत्येक हृदय में सदैव होता रहता है। लेकिन इस पर भी हमारे कवियों और साहित्यकारों ने इस दुर्घटना को अपने नवचिन्तन का कार्यक्षेत्र बनाकर इसे कहानी का रूप दे दिया। इतिहास में काव्यात्मक अतिशयोक्ति को कोई स्थान नहीं होता। यदि हमारे साहित्यकारों ने स्वयं को ऐतिहासिक घटनाओं तक ही सीमित रखा होता तो शिकायत का कोई अवसर नहीं था लेकिन उन्होंने उनकी गाथा में उन समस्त शब्द तथा अर्थ-अलंकारों तथा नवोक्तियों का प्रयोग किया जो किसी विशुद्ध काव्यात्मक कहानी के लिए उचित था। और इस प्रकार इस दुर्घटना के ऐतिहासिक महत्त्व को ही नहीं, उसकी आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को भी हानि पहुँचाई। धार्मिक सम्मान की यह अपेक्षा थी कि कर्बला के युद्ध को काव्यात्मक उड़ानों से कहीं ऊँचा रखा जाता लेकिन प्रकृति समूचे संसार में एक समान है और हरेक धर्म में ऐसे लोगों की बड़ी संख्या होती है जिन्हें उस समय तक तसल्ली नहीं होती जब तक कि धार्मिक महापुरुषों को महामानव न बना दिया जाए। 

मुहर्रम के महीने में हजरत इमाम हुसैन के बलिदान का शोक मनाना, मातम करना, ताजिया बनाना, उठाना और रोशनी आदि करना। 

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 13 May 2020 at 8:47 AM -

मौत का तराजू

कोविड-19 के गम्भीर और मृतप्राय रोगी किस तरह से अन्य संक्रमित लोगों से अलग हैं ?

वर्तमान कोविड-19 पैंडेमिक में किसी भी वय अर्थात आयु, लिंग, नस्ल, धर्म, जाति का व्यक्ति इस विषाणु से संक्रमित हो सकता है, पर गम्भीर समस्या होने की आशंका उन्हें अधिक ... है, जो बड़ी उम्र के हैं अथवा जो किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हैं। ये ही वे लोग हैं, जिनमें मृत्यु-दर भी अधिक पायी जा रही है। ऐसे में यह सोचना स्वाभाविक है कि किसलिए सार्स-सीओवी- 2 विषाणु से संक्रमित होने पर वृद्धों व दीर्घकालिक या गंभीर रोगग्रस्त लोगों में ऐसा देखने को मिल रहा है।

एक ऐसे तराजू की कल्पना करिए जिसका एक पलड़ा दूसरे से बस थोड़ा ही हल्का है। सब्ज़ी-इत्यादि तौलते समय आपने ऐसी स्थिति अक्सर देखी होगी, जब एक किलो का बाट सब्ज़ीवाला एक पलड़े पर रखता है और दूसरे पलड़े में कोई सब्ज़ी ( मान लीजिए टमाटर ) होती है। दोनों पलड़ों की बराबरी की स्थिति लगभग आ चुकी है : बस थोड़ा सा अन्तर रह गया है। टमाटर वाला पलड़ा बाट वाले पलड़े से थोड़ा ही ऊपर है। तभी सब्ज़ीवाला एक छोटा टमाटर उठाता है और उसे टमाटर वाले पलड़े में रख देता है। बस ! तुरन्त टमाटर वाला पलड़ा नीचे आता है और दोनों पलड़े या तो बराबर हो जाते हैं या फिर सब्जी वाला पलड़ा नीचे चला जाता है। सब्जी एक किलो पूरी हो गयी यानी जिंदगी पूरी हो गयी।

जीवन को सब्ज़ी के इस सौदे-सा समझने का प्रयास कीजिए। जीवित व्यक्ति का टमाटर वाला पलड़ा हल्का है। जिसका जितना यह हल्का , उतना वह स्वस्थ। बच्चों और युवाओं में यह पलड़ा अमूमन हल्का रहा करता है। लगभग पैंतीस, चालीस या कई बार पैंतालीस की उम्र तक। फिर कोई-न-कोई रोग जीवन में लगने लगता है जैसे कि लकड़ी में दीमक। शोध बताते हैं कि पैंतालीस की वय तक आते-आते ढेरों लोगों ( लगभग 25 % ) में कम-से-कम एक दीर्घकालिक रोग लग जाता है, चाहे वह डायबिटीज़ हो, हायपरटेंशन हो अथवा फिर इस्कीमिक हार्ट डिज़ीज़। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती है, दूसरे दीर्घकालिक रोग भी व्यक्ति के शरीर से चिपकने लगते हैं। साठ की वय तक आते-आते लगभग 50% लोग दीर्घकालिक रोगों से ग्रस्त हो जाते हैं। पचहत्तर की वय तक यह प्रतिशत 75 % के क़रीब पहुँच जाता है। जितनी अधिक उम्र, उतनी अधिक दीर्घकालिक ( क्रॉनिक ) बीमारी की आशंका। बड़ी उम्र के लोगों में एक या एक-से-अधिक क्रॉनिक बीमारी बहुधा देखने को मिलती हैं।

बढ़ती उम्र के साथ, दीर्घकालिक रोगों के साथ, धूमपान व मदिरापान के कारण तराजू का सौदे वाला पलड़ा धीरे-धीरे झुकता जा रहा है। वह बाट वाले पलड़े से बराबरी की ओर बढ़ रहा है। बस तभी कोविड-19 उस छोटे टमाटर की तरह उस पलड़े में आ जाता है और दोनों पलड़े सन्तुलित हो जाते हैं। यही मृत्यु है।

सौदे वाले पलड़े का नित्य भारी होते जाना दरअसल शरीर में इन्फ्लेमेशन नामके प्रक्रिया का नित्य बढ़ते जाना है। बढ़ती उम्र और दीर्घकालिक रोग मानव-शरीर में एक इन्फ्लेमेशन की स्थिति पैदा करते जाते हैं। स्वस्थ युवा व्यक्ति की तुलना में वृद्धों और दीर्घकालिक रोगों से ग्रस्त लोगों में कोशिकाएँ ज्यादा मरती हैं और कम बनती हैं और प्रतिरक्षा-तन्त्र उनके शवों व उनसे निकले रसायनों का निस्तारण करने में ही लगे रहते रहते हैं। इन कोशिका-शवों का निस्तारण कम ज़रूरी मत समझिए : यह काम कीटाणुओं को मारने से कम आवश्यक नहीं है।

शवों को निस्तारित न किया जाए, तो क्या होगा? दुर्गन्ध फैलने से स्थिति का बिगाड़ शुरू होगा और बीमारियों तक जाएगा। शरीर के भीतर मृत-मृतप्राय कोशिकाओं व उनसे निकल रहे रसायनों के कारण ही इन्फ्लेमेशन का जन्म होता है। यह शरीर के भीतर होगा। अगर मृत कोशिकाओं के शरीरों का 'उचित अन्तिम संस्कार' नहीं किया गया अर्थात मृत या मृतप्राय कोशिकाओं से निकल रहे रसायनों को रोका जाएगा।

जब तक कोशिकीय स्तर पर चल रहा यह आपदा-काल समाप्त किया जाएगा। शरीर में पुरानी के स्थान पर नयी कोशिकाएँ जन्म लेंगी। कोशिका-शवों का त्वरित निस्तारण होगा , तभी तक शरीर की स्वास्थ्यपरक स्वच्छता बनी रहेगी।

बढ़ती उम्र के साथ कोशिकाओं का बूढ़ा होना और मरना नित्य बढ़ता जाता है। धूमपान करने वाले के शरीर की कोशिकाएँ भी सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक तेज़ी से मर रही होती हैं। अनिद्रा व तनाव भी यही करते हैं । प्रदूषण भी। दीर्घकालिक रोग भी कोशिका-मरण बढ़ाने में अपनी भूमिका निभाते हैं। इससे पैदा हुई इन्फ्लेमेशन की स्थिति एक ऐसे देश की तरह होती है, जहाँ एक आपदा की तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। तराज़ू का टमाटरी पलड़ा लगातार बाट वाले पलड़े की ओर झुक रहा है।

तभी सार्स-सीओवी 2 का शरीर में प्रवेश होता है। उस शरीर में जो वृद्ध है अथवा दीर्घकालिक रोगों से ग्रस्त है। इस शरीर के भीतर के प्रतिरक्षक सैनिक सालों से लड़ते रहे हैं। पूरे शरीर में इन्फ्लेमेशन की स्थिति सालों से रहती आयी हैं ; चारों ओर मृत-मृतप्राय कोशिकाओं के ढेर रोज़ लगते रहते हैं और उनसे लगातार आपदा-कालीन रसायन निकलते रहते हैं। अब इस थके बोझिल ऊबे-उकताये प्रतिरक्षा-तन्त्र को इस नये विषाणु-शत्रु से जूझना पड़ जाता है। वह जूझता भी है , पर इस मारामारी में इन्फ्लेमेशन का स्तर इतना बढ़ जाता है कि व्यक्ति की जान निकल जाती है। विषाणु ही सीधे-सीधे कोविड-रोगी को नहीं मारता , विषाणु और प्रतिरक्षक कोशिकाओं की लड़ाई में शरीर मारा जाता है। मित्र और शत्रु लड़ते हैं , जान व्यक्ति की जाती है।

इन्फ्लेमेशन पैदा करने वाली स्थितियाँ अगर टमाटर हैं , तो सार्स-सीओवी 2 तराज़ू बराबर करने के लिए जोड़ा गया अन्तिम छोटा टमाटर। बहुत हल्के टमाटरी पलड़े में विषाणु के छोटे टमाटरी इन्फ्लेमेशन से तराज़ू के पलड़े बराबर होने की उम्मीद बहुत कम है। इसलिए स्वस्थ रहने का अर्थ टमाटर-रूपी इन्फ्लेमेशन को पलड़े में कम-से-कम रखना है। बढ़ती उम्र का कुछ कर नहीं सकते , प्रदूषण भी सामूहिक प्रयासों से ही जाएगा। लेकिन धूमपान न करें , यह सम्भव है। मदिरापान से यथासम्भव दूरी रखें , यह भी। डायबिटीज़ और ब्लडप्रेशर की रोकथाम के लिए सन्तुलित भोजन , सम्यक् निद्रा , तनावमुक्ति व व्यायाम नित्य करें। ( बाक़ी कुछ टमाटर मानव के बुरे जीन भी हैं , उनका हम कुछ कर नहीं सकते। वे हमें माँ-बाप से तराज़ू के अपने पलड़े में विरासत में मिले हैं। )

विषाणु आएगा , देह-तुला का पलड़ा हल्का ही रहेगा। तुला सन्तुलित न हो सकेगी , जीवन चलता रहेगा। मृत्यु का सौदा टल जाएगा।

--- स्कन्द।

( पुनश्च : लेख में टमाटर केवल लाक्षणिक प्रतीक है इन्फ्लेमेशन पैदा करने वाली स्थितियों का। टमाटर व सब्ज़ियों-फलों के वास्तविक सेवन से शरीर का इन्फ्लेमेशन कम होता है , इनमें अनेक एंटीऑक्सीडेंट मौजूद रहते हैं। स्वस्थ लोग लगातार पौष्टिक भोजन लेते रहें और बीमार अपने डॉक्टरों से पूछकर आहार-विषयक निर्णय लें। )

#skandshukla22

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 12 May 2020 at 7:04 PM -

mahila sashakti - नारी सशक्ति

पैदा होते ही इस देश में तथाकथित संस्कृति के नाम पर लड़कियों का शोषण और दोहन शुरू हो जाता है..अरे कुछ निम्न विचारधारा वाले तो अब भी कोख में ही बेटियों को मारने से बाज नहीं आते.

संस्कृति के नाम पर बंधुआ बनी महिला 100 ... में से 90 परिवारों में मिल जायेगी..जो या तो खुद समाज के सामने घुटने टेक कर sacrifice कर जाती हैं या फिर जिनका समाज और संस्कृति के नाम पर दोहन बदस्तूर अब भी जारी है.

बेटियों को पराया धन किसने बोला कौन था वो मूर्ख.. जिसने ये कुत्सित विचारधारा को समाज पर थोंप गया?
कन्यादान महादान कहने वाला निम्न स्तर का पशुप्रवृत्ति का मूर्ख प्राणी कौन था..?हम कोई निर्जीव वस्तु हैं जिसका दान करोगे बिना हमारी स्वेच्छा जाने.
और उस जानवर का भी पता करो जिसने सारे एकाधिकार तथाकथित मर्दों को दे दिये और महिलाओं को मानसिक गुलाम बना कर हमेशा से बेडियों में जकडकर रखा?
एक बेटी इस मानसिकता से आजाद हुई तो पर्वत चढ़ गयी..एक ने 22बलात्कारियों को एक लाइन में खड़ा करके गोलियों से छलनी कर अपनी अस्मिता का प्रतिशोध ले लिया, तो एक अंतरिक्ष पर पहुँच गयी, एक देश के लिये गोल्ड मेडल ले आयी,एक कोरोंना से लड़ने का भीलवाड़ा माडल रख दिया..हजारों उदाहरण हैं..कितने गिनवाऊँ.
और कितना सबूत चाहिए तुम्हें महिला के साहस और प्रतिभा का ..जिसका दमन करने तरह तरह के जतन और शोषण करते हो.
महिला बच्चा पैदा करने की मशीन भर नहीं है.
महिला देश की हर संसाधनो की बराबर की हकदार है.
जागो उठो बालिकाओं.
ये समाज तुम्हें कभी बराबरी पर नहीं लाना चाहेगा..परदे से बाहर निकलकर देखो..ये दुनिया उतनी ही खूबसूरत दिखेगी जितनी तुम हो.
हमारी खूबसूरती हमारे रंग रूप में नहीं होती.बहुत दुख होता है जब रंग की वजह से किसी बेटी का घर नहीं बस पाता..तरह तरह के ताने सुनना पड़ता है उसे.
मानसिकता बदल लो पुरूषों.. स्री सम्मान और प्यार की भूखी है..ना कि तुम्हारे धन दौलत और तथाकथित वर्चस्व की.
जाग जाओ..मेरी नारी शक्तियों.
हक माँगना छोड़ो.
हक के लिये लड़ने आगे आओ.
अधिकार माँगे नहीं जाते.
मर्दवादी समाज के एकाधिकार को खत्म करना है तो खुद से अपने अधिकारों पर अधिकार रखना शुरू कर दो..
हज़ारों सालों से महिलाएं मंदिर जा रही है क्या मिला उन्हें बदले में ?
सती प्रथा, विधवा आश्रम, बाल विवाह, छोटी उम्र में विवाह
अब और नहीं ??
महिला शक्ति को नमन
#Happy Mother's Day❤

नीशा मौर्य... नमो वुद्धाय

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 11 May 2020 at 7:54 AM -

vitamin E के ये 10 फायदे

Skin Care : जानिए vitamin E के ये 10 फायदे

आपने विटामिन-ई के बारे में कई बार सुना होगा और पढ़ा भी होगा। कई फलों, तेलों और ड्राय फ्रूट्स में विटामिन-ई पाया जाता है, और यह सेहत के साथ-साथ सौंदर्य के लिए भी बेहद लाभदायक होता ... है।  खासतौर पर सोयाबीन, जैतून, तिल के तेल, सूरजमुखी, पालक, ऐलोवेरा, शतावरी, ऐवोकेडो के अलावा कई चीजों में वि‍टामिन-ई की मात्रा मौजूद होती है। जानिए विटामिन ई के  ऐसे ही 10 लाभ - 

 

1.बेहतरीन क्लिंजर -विटामिन-ई का उपयोग कई तरह के सौंदर्य प्रसाधनों में किया जाता है। इसका अहम कारण है, कि यह एक बेहतरीन क्लिंजर है, जो त्वचा की सभी परतों पर जमी गंदगी और मृत कोशिकाओं की सफाई करने में सहायक है।

 

2.आरबीसी निर्माण - शरीर में रेड ब्‍लड सेल्‍स यानि लाल रक्‍त कोशिकाओं का निर्माण करने में विटामिन-ई सहायक है। प्रेग्‍नेंसी के दौरान विटामिन- ई का सेवन बच्‍चे को एनीमिया यानि खून की कमी से बचाता है।

 

3.मानसिक रोग - एक शोध के अनुसार विटामिन-ई की कमी से मानसिक रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। शरीर में विटामिन-ई की पर्याप्‍त मात्रा मानसिक तनाव और अन्य समस्‍याओं को कम करने में मदद करती है।

 

4.एंटी एजिंग -  विटामिन-ई में भरपूर एंटी ऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो त्वचा पर बढ़ती उम्र के असर को कम करते हैं। इसके अलावा यह झुर्रियों को भी कम करने और रोकने में बेहद प्रभावकारी है।

 

5.हृदय रोग - शोध के अनुसार जिन लोगों के शरीर में विटामिन ई की मात्रा अधिक होती है, उन्हें दिल की बीमारियों का खतरा कम होता है। यह मेनोपॉज के बाद महिलाओं में होन वाले हार्ट स्ट्रोक की संभावना को भी कम करता है।

 

6.प्राकृतिक नमी - त्वचा को प्राकृतिक नमी प्रदान करने के लिए विटामिन-ई बेहद फायदेमंद है। इसके अलावा यह त्वचा में कोशिकाओं के नवनिर्माण में भी सहायक है।

 

7.यूवी किरणों से बचाव -सूरज की हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने में विटामिन-ई महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सनबर्न की समस्या या फोटोसेंसेटिव होने जैसी समस्याओं से विटामिन-ई रक्षा करता है।

 

8.विटामिन-ई का प्रयोग करने पर अल्जाइमर जैसी समस्याओं का खतरा कम होता है, इसके अलावा यह कैंसर से लड़ने में भी आपकी मदद करता है। एक शोध के अनुसार जिन लोगों को कैंसर होता है, उनके शरीर में विटामिन-ई की मात्रा कम होती है।

 

9.विटामिन ई की पर्याप्त मात्रा डायबिटीज के खतरे को कम करने में मदद करती है। यह ब्रेस्ट कैंसर की रोकथाम, इम्यून सिस्टम को मजबूती प्रदान करने के साथ-साथ एलर्जी से बचाव में भी उपयोगी होता है।

 

10.यह कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम करता है और शरीर में वसीय अम्लों के संतुलन को बनाए रखने में सहायता करता है। इसके साथ ही यह थायराइड और पिट्यूटरी ग्रंथि‍ के कार्य में होने वाले अवरोध को रोकता है।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 10 May 2020 at 2:28 PM -

जीवनी - मुंशी प्रेमचंद

 Hindi Kahani - हिंदी कहानी
Biography Munshi Premchand

जीवनी - मुंशी प्रेमचंद

प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936) हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक थे । मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव, प्रेमचंद को नवाब राय और मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी ... जाना जाता है। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें उपन्यास सम्राट कहकर संबोधित किया था। प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। आगामी एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य की यथार्थवादी परंपरा की नींव रखी। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी के विकास का अध्ययन अधूरा होगा। वे एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता तथा सुधी (विद्वान) संपादक थे। बीसवीं शती के पूर्वार्द्ध में, जब हिन्दी में तकनीकी सुविधाओं का अभाव था,उनका योगदान अतुलनीय है। प्रेमचंद के बाद जिन लोगों ने साहित्य को सामाजिक सरोकारों और प्रगतिशील मूल्यों के साथ आगे बढ़ाने का काम किया, उनमें यशपाल से लेकर मुक्तिबोध तक शामिल हैं। उनके पुत्र हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार अमृतराय हैं जिन्होंने इन्हें कलम का सिपाही नाम दिया था।

जीवन परिचय

प्रेमचंद का जन्म वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी था तथा पिता मुंशी अजायबराय लमही में डाकमुंशी थे। उनकी शिक्षा का आरंभ उर्दू, फारसी से हुआ और जीवनयापन का अध्यापन से पढ़ने का शौक उन्‍हें बचपन से ही लग गया। 13 साल की उम्र में ही उन्‍होंने तिलिस्म-ए-होशरुबा पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ 'शरसार', मिर्ज़ा हादी रुस्वा और मौलाना शरर के उपन्‍यासों से परिचय प्राप्‍त कर लिया । १८९८ में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए। नौकरी के साथ ही उन्होंने पढ़ाई जारी रखी।१९१० में उन्‍होंने अंग्रेजी, दर्शन, फारसी और इतिहास लेकर इंटर पास किया और १९१९ में बी.ए. पास करने के बाद शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए। 

सात वर्ष की अवस्था में उनकी माता तथा चौदह वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो जाने के कारण उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रहा। उनका पहला विवाह उन दिनों की परंपरा के अनुसार पंद्रह साल की उम्र में हुआ जो सफल नहीं रहा। वे आर्य समाज से प्रभावित रहे जो उस समय का बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक आंदोलन था। उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया और १९०६ में दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया। उनकी तीन संताने हुईं- श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव। १९१० में उनकी रचना सोज़े-वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया। सोजे-वतन की सभी प्रतियाँ जब्त कर नष्ट कर दी गईं। कलेक्टर ने नवाबराय को हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे, यदि लिखा तो जेल भेज दिया जाएगा। इस समय तक प्रेमचंद, धनपत राय नाम से लिखते थे। उर्दू में प्रकाशित होने वाली ज़माना पत्रिका के सम्पादक और उनके अजीज दोस्‍त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद वे प्रेमचन्द के नाम से लिखने लगे। उन्‍होंने आरंभिक लेखन ज़माना पत्रिका में ही किया। जीवन के अंतिम दिनों में वे गंभीर रूप से बीमार पड़े। उनका उपन्यास मंगलसूत्र पूरा नहीं हो सका और लम्बी बीमारी के बाद ८ अक्टूबर १९३६ को उनका निधन हो गया। उनका अंतिम उपन्यास मंगल सूत्र उनके पुत्र अमृत ने पूरा किया।

कार्यक्षेत्र

प्रेमचंद आधुनिक हिन्दी कहानी के पितामह और उपन्यास सम्राट माने जाते हैं। यों तो उनके साहित्यिक जीवन का आरंभ १९०१ से हो चुका था पर उनकी पहली हिन्दी कहानी सरस्वती पत्रिका के दिसम्बर अंक में १९१५ में सौत नाम से प्रकाशित हुई और १९३६ में अंतिम कहानी कफन नाम से प्रकाशित हुई। बीस वर्षों की इस अवधि में उनकी कहानियों के अनेक रंग देखने को मिलते हैं। उनसे पहले हिंदी में काल्पनिक, एय्यारी और पौराणिक धार्मिक रचनाएं ही की जाती थी। प्रेमचंद ने हिंदी में यथार्थवाद की शुरूआत की। " भारतीय साहित्य का बहुत सा विमर्श जो बाद में प्रमुखता से उभरा चाहे वह दलित साहित्य हो या नारी साहित्य उसकी जड़ें कहीं गहरे प्रेमचंद के साहित्य में दिखाई देती हैं।" प्रेमचंद के लेख 'पहली रचना' के अनुसार उनकी पहली रचना अपने मामा पर लिखा व्‍यंग्‍य थी, जो अब अनुपलब्‍ध है। उनका पहला उपलब्‍ध लेखन उनका उर्दू उपन्यास 'असरारे मआबिद' है। प्रेमचंद का दूसरा उपन्‍यास 'हमखुर्मा व हमसवाब' जिसका हिंदी रूपांतरण 'प्रेमा' नाम से 1907 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह सोज़े-वतन नाम से आया जो १९०८ में प्रकाशित हुआ। सोज़े-वतन यानी देश का दर्द। देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत होने के कारण इस पर अंग्रेज़ी सरकार ने रोक लगा दी और इसके लेखक को भविष्‍य में इस तरह का लेखन न करने की चेतावनी दी। इसके कारण उन्हें नाम बदलकर लिखना पड़ा। 'प्रेमचंद' नाम से उनकी पहली कहानी बड़े घर की बेटी ज़माना पत्रिका के दिसम्बर १९१० के अंक में प्रकाशित हुई। मरणोपरांत उनकी कहानियाँ मानसरोवर नाम से 8 खंडों में प्रकाशित हुई। कथा सम्राट प्रेमचन्द का कहना था कि साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है। यह बात उनके साहित्य में उजागर हुई है। १९२१ में उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी नौकरी छोड़ दी। कुछ महीने मर्यादा पत्रिका का संपादन भार संभाला, छह साल तक माधुरी नामक पत्रिका का संपादन किया, १९३० में बनारस से अपना मासिक पत्र हंस शुरू किया और १९३२ के आरंभ में जागरण नामक एक साप्ताहिक और निकाला। उन्होंने लखनऊ में १९३६ में अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन की अध्यक्षता की। उन्होंने मोहन दयाराम भवनानी की अजंता सिनेटोन कंपनी में कहानी-लेखक की नौकरी भी की। १९३४ में प्रदर्शित मजदूर नामक फिल्म की कथा लिखी और कंट्रेक्ट की साल भर की अवधि पूरी किये बिना ही दो महीने का वेतन छोड़कर बनारस भाग आये क्योंकि बंबई (आधुनिक मुंबई) का और उससे भी ज़्यादा वहाँ की फिल्मी दुनिया का हवा-पानी उन्हें रास नहीं आया। उन्‍होंने मूल रूप से हिंदी में 1915 से कहानियां लिखना और 1918 (सेवासदन) से उपन्‍यास लिखना शुरू किया। प्रेमचंद ने कुल करीब तीन सौ कहानियाँ, लगभग एक दर्जन उपन्यास और कई लेख लिखे। उन्होंने कुछ नाटक भी लिखे और कुछ अनुवाद कार्य भी किया। प्रेमचंद के कई साहित्यिक कृतियों का अंग्रेज़ी, रूसी, जर्मन सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। गोदान उनकी कालजयी रचना है। कफन उनकी अंतिम कहानी मानी जाती है। उन्‍होंने हिंदी और उर्दू में पूरे अधिकार से लिखा। उनकी अधिकांश रचनाएं मूल रूप से उर्दू में लिखी गई हैं लेकिन उनका प्रकाशन हिंदी में पहले हुआ। तैंतीस वर्षों के रचनात्मक जीवन में वे साहित्य की ऐसी विरासत सौंप गए जो गुणों की दृष्टि से अमूल्य है और आकार की दृष्टि से असीमीत।

कृतियाँ

प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि विभिन्न साहित्य रूपों में प्रवृत्त हुई। बहुमुखी प्रतिभा संपन्न प्रेमचंद ने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की। प्रमुखतया उनकी ख्याति कथाकार के तौर पर हुई और अपने जीवन काल में ही वे ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि से सम्मानित हुए। उन्होंने कुल १५ उपन्यास, ३०० से कुछ अधिक कहानियाँ, ३ नाटक, १० अनुवाद, ७ बाल-पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की लेकिन जो यश और प्रतिष्ठा उन्हें उपन्यास और कहानियों से प्राप्त हुई, वह अन्य विधाओं से प्राप्त न हो सकी। यह स्थिति हिन्दी और उर्दू भाषा दोनों में समान रूप से दिखायी देती है।

उपन्‍यास

प्रेमचंद के उपन्‍यास न केवल हिन्‍दी उपन्‍यास साहित्‍य में बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्‍य में मील के पत्‍थर हैं। प्रेमचन्द कथा-साहित्य में उनके उपन्यासकार का आरम्भ पहले होता है। उनका पहला उर्दू उपन्यास (अपूर्ण) ‘असरारे मआबिद उर्फ़ देवस्थान रहस्य’ उर्दू साप्ताहिक ‘'आवाज-ए-खल्क़'’ में ८ अक्टूबर, १९०३ से १ फरवरी, १९०५ तक धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। उनका दूसरा उपन्‍यास 'हमखुर्मा व हमसवाब' जिसका हिंदी रूपांतरण 'प्रेमा' नाम से 1907 में प्रकाशित हुआ। चूंकि प्रेमचंद मूल रूप से उर्दू के लेखक थे और उर्दू से हिंदी में आए थे, इसलिए उनके सभी आरंभिक उपन्‍यास मूल रूप से उर्दू में लिखे गए और बाद में उनका हिन्‍दी तर्जुमा किया गया। उन्‍होंने 'सेवासदन' (1918) उपन्‍यास से हिंदी उपन्‍यास की दुनिया में प्रवेश किया। यह मूल रूप से उन्‍होंने 'बाजारे-हुस्‍न' नाम से पहले उर्दू में लिखा लेकिन इसका हिंदी रूप 'सेवासदन' पहले प्रकाशित कराया। 'सेवासदन' एक नारी के वेश्‍या बनने की कहानी है। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार 'सेवासदन' में व्‍यक्‍त मुख्‍य समस्‍या भारतीय नारी की पराधीनता है। इसके बाद किसान जीवन पर उनका पहला उपन्‍यास 'प्रेमाश्रम' (1921) आया। इसका मसौदा भी पहले उर्दू में 'गोशाए-आफियत' नाम से तैयार हुआ था लेकिन 'सेवासदन' की भांति इसे पहले हिंदी में प्रकाशित कराया। 'प्रेमाश्रम' किसान जीवन पर लिखा हिंदी का संभवतः पहला उपन्‍यास है। यह अवध के किसान आंदोलनों के दौर में लिखा गया। इसके बाद 'रंगभूमि' (1925), 'कायाकल्‍प' (1926), 'निर्मला' (1927), 'गबन' (1931), 'कर्मभूमि' (1932) से होता हुआ यह सफर 'गोदान' (1936) तक पूर्णता को प्राप्‍त हुआ। रंगभूमि में प्रेमचंद एक अंधे भिखारी सूरदास को कथा का नायक बनाकर हिंदी कथा साहित्‍य में क्रांतिकारी बदलाव का सूत्रपात कर चुके थे। गोदान का हिंदी साहित्‍य ही नहीं, विश्‍व साहित्‍य में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। इसमें प्रेमचंद की साहित्‍य संबंधी विचारधारा 'आदर्शोन्‍मुख यथार्थवाद' से 'आलोचनात्‍मक यथार्थवाद' तक की पूर्णता प्राप्‍त करती है। एक सामान्‍य किसान को पूरे उपन्‍यास का नायक बनाना भारतीय उपन्‍यास परंपरा की दिशा बदल देने जैसा था। सामंतवाद और पूंजीवाद के चक्र में फंसकर हुई कथानायक होरी की मृत्‍यु पाठकों के जहन को झकझोर कर रख जाती है। किसान जीवन पर अपने पिछले उपन्‍यासों 'प्रेमाश्रम' और 'कर्मभूमि' में प्रेमंचद यथार्थ की प्रस्‍तुति करते-करते उपन्‍यास के अंत तक आदर्श का दामन थाम लेते हैं। लेकिन गोदान का कारुणिक अंत इस बात का गवाह है कि तब तक प्रेमचंद का आदर्शवाद से मोहभंग हो चुका था। यह उनकी आखिरी दौर की कहानियों में भी देखा जा सकता है। 'मंगलसूत्र' प्रेमचंद का अधूरा उपन्‍यास है। प्रेमचंद के उपन्‍यासों का मूल कथ्‍य भारतीय ग्रामीण जीवन था। प्रेमचंद ने हिंदी उपन्‍यास को जो ऊँचाई प्रदान की, वह परवर्ती उपन्‍यासकारों के लिए एक चुनौती बनी रही। प्रेमचंद के उपन्‍यास भारत और दुनिया की कई भाषाओं में अनुदित हुए, खासकर उनका सर्वाधिक चर्चित उपन्‍यास गोदान। 

असरारे मआबिद उर्फ़ देवस्थान रहस्य’ उर्दू साप्ताहिक ‘'आवाज-ए-खल्क़'’ में ८ अक्टूबर, १९०३ से १ फरवरी, १९०५ तक प्रकाशित। सेवासदन १९१८, प्रेमाश्रम १९२२, रंगभूमि १९२५, निर्मला १९२५, कायाकल्प १९२७, गबन १९२८, कर्मभूमि १९३२, गोदान १९३६, मंगलसूत्र (अपूर्ण), प्रतिज्ञा, प्रेमा, रंगभूमि, मनोरमा, वरदान।

कहानी

उनकी अधिकतर कहानियोँ में निम्न व मध्यम वर्ग का चित्रण है। डॉ॰ कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद की संपूर्ण हिंदी-उर्दू कहानी को प्रेमचंद कहानी रचनावली नाम से प्रकाशित कराया है। उनके अनुसार प्रेमचंद ने कुल ३०१ कहानियाँ लिखी हैं जिनमें ३ अभी अप्राप्य हैं। प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह सोज़े वतन नाम से जून १९०८ में प्रकाशित हुआ। इसी संग्रह की पहली कहानी दुनिया का सबसे अनमोल रतन को आम तौर पर उनकी पहली प्रकाशित कहानी माना जाता रहा है। डॉ॰ गोयनका के अनुसार कानपुर से निकलने वाली उर्दू मासिक पत्रिका ज़माना के अप्रैल अंक में प्रकाशित सांसारिक प्रेम और देश-प्रेम (इश्के दुनिया और हुब्बे वतन) वास्तव में उनकी पहली प्रकाशित कहानी है। 

उनके जीवन काल में कुल नौ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए- सोज़े वतन, 'सप्‍त सरोज', 'नवनिधि', 'प्रेमपूर्णिमा', 'प्रेम-पचीसी', 'प्रेम-प्रतिमा', 'प्रेम-द्वादशी', 'समरयात्रा', 'मानसरोवर' : भाग एक व दो और 'कफन'। उनकी मृत्‍यु के बाद उनकी कहानियाँ 'मानसरोवर' शीर्षक से 8 भागों में प्रकाशित हुई। प्रेमचंद साहित्‍य के मु्दराधिकार से मुक्‍त होते ही विभिन्न संपादकों और प्रकाशकों ने प्रेमचंद की कहानियों के संकलन तैयार कर प्रकाशित कराए। उनकी कहानियों में विषय और शिल्प की विविधता है। उन्होंने मनुष्य के सभी वर्गों से लेकर पशु-पक्षियों तक को अपनी कहानियों में मुख्य पात्र बनाया है। उनकी कहानियों में किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों, आदि की समस्याएं गंभीरता से चित्रित हुई हैं। उन्होंने समाजसुधार, देशप्रेम, स्वाधीनता संग्राम आदि से संबंधित कहानियाँ लिखी हैं। उनकी ऐतिहासिक कहानियाँ तथा प्रेम संबंधी कहानियाँ भी काफी लोकप्रिय साबित हुईं। प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों में ये नाम लिये जा सकते हैं- 

'पंच परमेश्‍वर', 'गुल्‍ली डंडा', 'दो बैलों की कथा', 'ईदगाह', 'बड़े भाई साहब', 'पूस की रात', 'कफन', 'ठाकुर का कुआँ', 'सद्गति', 'बूढ़ी काकी', 'तावान', 'विध्‍वंस', 'दूध का दाम', 'मंत्र' आदि।

नाटक

प्रेमचंद ने संग्राम (1923), कर्बला (1924) और प्रेम की वेदी (1933) नाटकों की रचना की। ये नाटक शिल्‍प और संवेदना के स्‍तर पर अच्‍छे हैं लेकिन उनकी कहानियों और उपन्‍यासों ने इतनी ऊँचाई प्राप्‍त कर ली थी कि नाटक के क्षेत्र में प्रेमचंद को कोई खास सफलता नहीं मिली। ये नाटक वस्‍तुतः संवादात्‍मक उपन्‍यास ही बन गए हैं।

लेख/निबंध

प्रेमचंद एक संवेदनशील कथाकार ही नहीं, सजग नागरिक व संपादक भी थे। उन्‍होंने 'हंस', 'माधुरी', 'जागरण' आदि पत्र-पत्रिकाओं का संपादन करते हुए व तत्‍कालीन अन्‍य सहगामी साहित्यिक पत्रिकाओं 'चाँद', 'मर्यादा', 'स्‍वदेश' आदि में अपनी साहित्यिक व सामाजिक चिंताओं को लेखों या निबंधों के माध्‍यम से अभिव्‍यक्‍त किया। अमृतराय द्वारा संपादित 'प्रेमचंद : विविध प्रसंग' (तीन भाग) वास्‍तव में प्रेमचंद के लेखों का ही संकलन है। प्रेमचंद के लेख प्रकाशन संस्‍थान से 'कुछ विचार' शीर्षक से भी छपे हैं। प्रेमचंद के मशहूर लेखों में निम्‍न लेख शुमार होते हैं- साहित्‍य का उद्देश्‍य, पुराना जमाना नया जमाना, स्‍वराज के फायदे, कहानी कला (1,2,3), कौमी भाषा के विषय में कुछ विचार, हिंदी-उर्दू की एकता, महाजनी सभ्‍यता, उपन्‍यास, जीवन में साहित्‍य का स्‍थान आदि।

अनुवाद

प्रेमचंद एक सफल अनुवादक भी थे। उन्‍होंने दूसरी भाषाओं के जिन लेखकों को पढ़ा और जिनसे प्रभावित हुए, उनकी कृतियों का अनुवाद भी किया। 'टॉलस्‍टॉय की कहानियाँ' (1923), गाल्‍सवर्दी के तीन नाटकों का हड़ताल (1930), चाँदी की डिबिया (1931) और न्‍याय (1931) नाम से अनुवाद किया। आजाद-कथा (उर्दू से, रतननाथ सरशार), पिता के पत्र पुत्री के नाम (अंग्रेजी से, जवाहरलाल नेहरू) उनके द्वारा रतननाथ सरशार के उर्दू उपन्‍यास फसान-ए-आजाद का हिंदी अनुवाद आजाद कथा बहुत मशहूर हुआ।

विविध

बाल साहित्य : रामकथा, कुत्ते की कहानी, जंगल की कहानियाँ, दुर्गादास 
विचार : प्रेमचंद : विविध प्रसंग, प्रेमचंद के विचार (तीन खंडों में) 
संपादन : मर्यादा, माधुरी, हंस, जागरण

समालोचना

प्रेमचन्द उर्दू का संस्कार लेकर हिन्दी में आए थे और हिन्दी के महान लेखक बने। हिन्दी को अपना खास मुहावरा और खुलापन दिया। कहानी और उपन्यास दोनो में युगान्तरकारी परिवर्तन किए। उन्होने साहित्य में सामयिकता प्रबल आग्रह स्थापित किया। आम आदमी को उन्होंने अपनी रचनाओं का विषय बनाया और उसकी समस्याओं पर खुलकर कलम चलाते हुए उन्हें साहित्य के नायकों के पद पर आसीन किया। प्रेमचंद से पहले हिंदी साहित्य राजा-रानी के किस्सों, रहस्य-रोमांच में उलझा हुआ था। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा। उन्होंने जीवन और कालखंड की सच्चाई को पन्ने पर उतारा। वे सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, ज़मींदारी, कर्ज़खोरी, ग़रीबी, उपनिवेशवाद पर आजीवन लिखते रहे। प्रेमचन्द की ज़्यादातर रचनाएँ उनकी ही ग़रीबी और दैन्यता की कहानी कहती है। ये भी गलत नहीं है कि वे आम भारतीय के रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में वे नायक हुए, जिसे भारतीय समाज अछूत और घृणित समझा था। उन्होंने सरल, सहज और आम बोल-चाल की भाषा का उपयोग किया और अपने प्रगतिशील विचारों को दृढ़ता से तर्क देते हुए समाज के सामने प्रस्तुत किया। १९३६ में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि लेखक स्वभाव से प्रगतिशील होता है और जो ऐसा नहीं है वह लेखक नहीं है। प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक हैं। उन्होंने हिन्दी कहानी में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की एक नई परंपरा शुरू की।

प्रेमचंद के जीवन संबंधी विवाद

इतने महान रचनाकार होने के बावजूद प्रेमचंद का जीवन आरोपों से मुक्‍त नहीं है। प्रेमचंद के अध्‍येता कमलकिशोर गोयनका ने अपनी पुस्‍तक 'प्रेमचंद : अध्‍ययन की नई दिशाएं' में प्रेमचंद के जीवन पर कुछ आरोप लगाकर उनके साहित्‍य का महत्‍व कम करने की कोशिश की। प्रेमचंद पर लगे मुख्‍य आरोप हैं- प्रेमचंद ने अपनी पहली पत्‍नी को बिना वजह छोड़ा और दूसरे विवाह के बाद भी उनके अन्‍य किसी महिला से संबंध रहे (जैसा कि शिवरानी देवी ने 'प्रेमचंद घर में' में उद्धृत किया है), प्रेमचंद ने 'जागरण विवाद' में विनोदशंकर व्‍यास के साथ धोखा किया, प्रेमचंद ने अपनी प्रेस के वरिष्‍ठ कर्मचारी प्रवासीलाल वर्मा के साथ धोखाधडी की, प्रेमचंद की प्रेस में मजदूरों ने हड़ताल की, प्रेमचंद ने अपनी बेटी के बीमार होने पर झाड़-फूंक का सहारा लिया आदि। कमलकिशोर गोयनका द्वारा लगाए गए ये आरोप प्रेमचंद के जीवन का एक पक्ष जरूर हमारे सामने लाते हैं जिसमें उनकी इंसानी कमजोरियों जाहिर होती हैं लेकिन उनके व्‍यापक साहित्‍य के मूल्‍यांकन पर इन आरोपों का कोई असर नहीं पड़ पाया है। प्रेमचंद्र को लोग आज उनकी काबिलियत की वजह से याद करते हैं जो विवादों को बहुत कम जगह देती है।

मुंशी के विषय में विवाद

प्रेमचंद को प्रायः "मुंशी प्रेमचंद" के नाम से जाना जाता है। प्रेमचंद के नाम के साथ 'मुंशी' कब और कैसे जुड़ गया? इस विषय में अधिकांश लोग यही मान लेते हैं कि प्रारम्भ में प्रेमचंद अध्यापक रहे। अध्यापकों को प्राय: उस समय मुंशी जी कहा जाता था। इसके अतिरिक्त कायस्थों के नाम के पहले सम्मान स्वरूप 'मुंशी' शब्द लगाने की परम्परा रही है। संभवत: प्रेमचंद जी के नाम के साथ मुंशी शब्द जुड़कर रूढ़ हो गया। प्रोफेसर शुकदेव सिंह के अनुसार प्रेमचंद जी ने अपने नाम के आगे 'मुंशी' शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया। उनका यह भी मानना है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है, जिसे प्रेमचंद के प्रशंसकों ने कभी लगा दिया होगा। यह तथ्य अनुमान पर आधारित है। लेकिन प्रेमचंद के नाम के साथ मुंशी विशेषण जुड़ने का प्रामाणिक कारण यह है कि 'हंस' नामक पत्र प्रेमचंद एवं 'कन्हैयालाल मुंशी' के सह संपादन में निकलता था। जिसकी कुछ प्रतियों पर कन्हैयालाल मुंशी का पूरा नाम न छपकर मात्र 'मुंशी' छपा रहता था साथ ही प्रेमचंद का नाम इस प्रकार छपा होता था- 
(हंस की प्रतियों पर देखा जा सकता है)। 
संपादक 
मुंशी, प्रेमचंद 
'हंस के संपादक प्रेमचंद तथा कन्हैयालाल मुंशी थे। परन्तु कालांतर में पाठकों ने 'मुंशी' तथा 'प्रेमचंद' को एक समझ लिया और 'प्रेमचंद'- 'मुंशी प्रेमचंद' बन गए। यह स्वाभाविक भी है। सामान्य पाठक प्राय: लेखक की कृतियों को पढ़ता है, नाम की सूक्ष्मता को नहीं देखा करता। आज प्रेमचंद का मुंशी अलंकरण इतना रूढ़ हो गया है कि मात्र 'मुंशी' से ही प्रेमचंद का बोध हो जाता है तथा 'मुंशी' न कहने से प्रेमचंद का नाम अधूरा-अधूरा सा लगता है।

विरासत

प्रेमचंद ने अपनी कला के शिखर पर पहुँचने के लिए अनेक प्रयोग किए। जिस युग में प्रेमचंद ने कलम उठाई थी, उस समय उनके पीछे ऐसी कोई ठोस विरासत नहीं थी और न ही विचार और प्रगतिशीलता का कोई मॉडल ही उनके सामने था । लेकिन होते-होते उन्होंने गोदान जैसे कालजयी उपन्यास की रचना की जो कि एक आधुनिक क्लासिक माना जाता है। उन्होंने चीजों को खुद गढ़ा और खुद आकार दिया। जब भारत का स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था तब उन्होंने कथा साहित्य द्वारा हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं को जो अभिव्यक्ति दी उसने सियासी सरगर्मी को, जोश को और आंदोलन को सभी को उभारा और उसे ताक़तवर बनाया और इससे उनका लेखन भी ताक़तवर होता गया। प्रेमचंद इस अर्थ में निश्चित रूप से हिंदी के पहले प्रगतिशील लेखक कहे जा सकते हैं। १९३६ में उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन को सभापति के रूप में संबोधन किया था। उनका यही भाषण प्रगतिशील आंदोलन के घोषणा पत्र का आधार बना। प्रेमचंद ने हिन्दी में कहानी की एक परंपरा को जन्म दिया और एक पूरी पीढ़ी उनके कदमों पर आगे बढ़ी, ५०-६० के दशक में रेणु, नागार्जुन औऱ इनके बाद श्रीनाथ सिंह ने ग्रामीण परिवेश की कहानियाँ लिखी हैं, वो एक तरह से प्रेमचंद की परंपरा के तारतम्य में आती हैं। 

प्रेमचंद एक क्रांतिकारी रचनाकार थे, उन्होंने न केवल देशभक्ति बल्कि समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों को देखा और उनको कहानी के माध्यम से पहली बार लोगों के समक्ष रखा। उन्होंने उस समय के समाज की जो भी समस्याएँ थीं उन सभी को चित्रित करने की शुरुआत कर दी थी। उसमें दलित भी आते हैं, नारी भी आती हैं। ये सभी विषय आगे चलकर हिन्दी साहित्य के बड़े विमर्श बने। प्रेमचंद हिन्दी सिनेमा के सबसे अधिक लोकप्रिय साहित्यकारों में से हैं। सत्यजित राय ने उनकी दो कहानियों पर यादगार फ़िल्में बनाईं। १९७७ में शतरंज के खिलाड़ी और १९८१ में सद्गति। उनके देहांत के दो वर्षों बाद के सुब्रमण्यम ने १९३८ में सेवासदन उपन्यास पर फ़िल्म बनाई जिसमें सुब्बालक्ष्मी ने मुख्य भूमिका निभाई थी। १९७७ में मृणाल सेन ने प्रेमचंद की कहानी कफ़न पर आधारित ओका ऊरी कथा नाम से एक तेलुगू फ़िल्म बनाई जिसको सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। १९६३ में गोदान और १९६६ में गबन उपन्यास पर लोकप्रिय फ़िल्में बनीं। १९८० में उनके उपन्यास पर बना टीवी धारावाहिक निर्मला भी बहुत लोकप्रिय हुआ था।

प्रेमचंद संबंधी नए अध्‍ययन

हिंदी साहित्‍य व आलोचना में प्रेमचंद को प्रतिष्ठित करने का श्रेय डॉ॰ रामविलास शर्मा को दिया जाता है परन्तु यह एक ग़लत धारणा है। दरअसल एक कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में प्रेमचंद की लोकप्रियता उनके जीवनकाल में ही इतनी ज़्यादा थी कि उन्हें 'उपन्यास सम्राट' कहा जाने लगा था। प्रेमचंद को स्थापित करने वाले उनके पाठक थे, आलोचक नहीं। प्रेमचंद के पत्रों को सहेजने का काम अमृतराय और मदनगोपाल ने किया। प्रेमचंद पर हुए नए अध्‍ययनों में कमलकिशोर गोयनका और डॉ॰ धर्मवीर का नाम उल्‍लेखनीय है। कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद के जीवन के कमजोर पक्षों को उजागर करने के साथ-साथ प्रेमचंद का अप्राप्‍य साहित्‍य (दो भाग) व 'प्रेमचंद विश्‍वकोश' (दो भाग) का संपादन भी किया है। डॉ॰ धर्मवीर ने दलित दृष्टि से प्रेमचंद साहित्‍य का मूलयांकन करते हुए प्रेमचंद : सामंत का मुंशी व प्रेमचंद की नीली आँखें नाम से पुस्‍तकें लिखी हैं।

पुरस्कार व सम्मान

प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाकतार विभाग की ओर से ३१ जुलाई १९८० को उनकी जन्मशती के अवसर पर ३० पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया। गोरखपुर के जिस स्कूल में वे शिक्षक थे, वहाँ प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई है। इसके बरामदे में एक भित्तिलेख है जिसका चित्र दाहिनी ओर दिया गया है। यहाँ उनसे संबंधित वस्तुओं का एक संग्रहालय भी है। जहाँ उनकी एक वक्षप्रतिमा भी है। प्रेमचंद की १२५वीं सालगिरह पर सरकार की ओर से घोषणा की गई कि वाराणसी से लगे इस गाँव में प्रेमचंद के नाम पर एक स्मारक तथा शोध एवं अध्ययन संस्थान बनाया जाएगा। प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी ने प्रेमचंद घर में नाम से उनकी जीवनी लिखी और उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को उजागर किया है, जिससे लोग अनभिज्ञ थे। यह पुस्तक १९४४ में पहली बार प्रकाशित हुई थी, लेकिन साहित्य के क्षेत्र में इसके महत्व का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे दुबारा २००५ में संशोधित करके प्रकाशित की गई, इस काम को उनके ही नाती प्रबोध कुमार ने अंजाम दिया। इसका अंग्रेज़ी व हसन मंज़र का किया हुआ उर्दू अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। उनके ही बेटे अमृत राय ने कलम का सिपाही नाम से पिता की जीवनी लिखी है। उनकी सभी पुस्तकों के अंग्रेज़ी व उर्दू रूपांतर तो हुए ही हैं, चीनी, रूसी आदि अनेक विदेशी भाषाओं में उनकी कहानियाँ लोकप्रिय हुई हैं। 

(विकिपीडिया पर आधारित) 

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 08 May 2020 at 7:21 PM -

लाइपोमा - एक बीमारी

:बिना दर्द की चर्बीवाली गांठों को लाइपोमा कहते हैं।
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लिव-वैल : इन गांठों से शरीर को कोई तकलीफ नहीं होती, किसी भी अंग में बन सकती हैं

लाइपोमा एक सामान्य रोग है जिसे चर्बी से बनी गांठ कहते हैं। ये गांठें एक जगह इकट्ठी होकर उभर आती ... हैं। खास बात है कि इनसे शरीर को कोई नुकसान नहीं होता। सिर्फ एक फीसदी मामले ही इनके कैंसर कोशिकाओं में तब्दील होने के आते हैं। ये 40-50 वर्ष की आयु वालों में अधिक होती हैं। इनका आकार 1-3 सेमी. होता है। ये गांठें त्वचा पर उभरी हुई व कई बार पेट या किसी अन्य अंग के अंदर भी ये बनने लगती हैं। इन्हें छूने पर गुदगुदी का अहसास होता है व दबाने से इनमें जमा फैट इधर-उधर चला जाता है।

गर्दन, कंधे, कमर, पीठ, पेट, बाजुओं और जांघों पर खासकर उभरने वाली गांठें शरीर के किसी भी हिस्से और अंग में हो सकती हैं। यह उभार तीन तरह का होता है- फैटी टिश्यु, ट्यूमर व कोशिकाओं का स्वत: बढऩा। बच्चों में होने वाला लाइपोमा दुर्लभ होता है जिसके मामले कम ही सामने आते हैं।

नसों पर गांठ होने पर होता दर्द
लाइपोमा यदि नसों पर उभर जाए तो इनमें दर्द होने लगता है। ऐसे में वजह जानने के लिए सीटी स्कैन, एमआरआई, एक्स-रे या अल्ट्रासाउंड जांच कराई जाती है। सर्जरी से दर्द वाली गांठों का इलाज होता है व जल्द से जल्द इन्हें निकलवा देना चाहिए। वहीं शरीर पर कोई गांठ ऐसी बनी हो जो दर्द नहीं कर रही है और ठोस है तो सतर्क होने की जरूरत है। ये गांठ कैंसर की हो सकती है। ऐसे में विशेषज्ञ तुरंत फाइन निडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी (एफएनएसी) जांच कराने की सलाह देते हैं। कुछ मामलों में गांठ की बायोप्सी जांच के तहत इसके अंदर सुई डालकर कुछ हिस्सा बाहर निकाल लेते हैं। इसमें मौजूद लिक्विड व अन्य पदार्थ की जांच कर पता करते हैं कि वे कैंसर है या नहीं।

कारण- लाइपोमा के स्पष्ट कारणों का पता अभी तक नहीं चला है। लेकिन दो मुख्य कारणों से यह समस्या सामने आती है। पहला लाइपोमेटोसिस, जो आनुवांशिक समस्या है। इसमें त्वचा-मांसपेशियों के बीच के हिस्से में गांठ बनती है। दूसरा मोटापा, जिसमें चर्बी वाली कोशिकाएं शरीर के विभिन्न हिस्सों में किसी एक जगह एकत्र होकर धीरे-धीरे गांठ का रूप लेती हैं। इनके अलावा जो लोग अधिक फास्ट फूड, डीप फ्रिज में रखा भोजन, मिठाई, नमकीन, बटर, घी, चीज और या फिर इनके साथ कोल्डड्रिंक अधिक पीते हैं उनमें इस तरह की गांठें बनने की आशंका अधिक होती है।

इलाज- आयुर्वेद में गुनगुना पानी पीने, सुपाच्य भोजन करने की सलाह देते हैं। पंचकर्म, शोधनवस्ती प्रक्रिया के अलावा उभार कम करने के लिए गांठ पर औषधियों का लेप लगाते हैं। कई बार चीरा लगाकर गांठ में मौजूद गाढ़े तत्त्व को निकालकर शोधन औषधियों का लेप लगाते हैं ताकि समस्या दोबारा न हो। होम्योपैथी में इसे साइकोटिक मियाज्म रोग कहते हैं। लक्षणों के अनुसार कैलकेरिया व लैपीसाइलबाई दवा रोगी को देते हैं।

सिकाई न करें
शरीर पर बनी कोई भी गांठ की सिकाई बिना डॉक्टरी सलाह के न करें। खासकर यदि गांठ लाइपोमा की और उसके अंदर का फैट दबने पर इधर से उधर हो तो। इन गांठों को लेकर लोग सोचते हैं कि सिकाई से ये सिकुड़ कर कम हो जाएंगी। जबकि ऐसा नहीं है। सिकाई करने से भीतर की चर्बी जलती है व अंदर ही अंदर जानलेवा संक्रमण हो सकता है।

लापरवाही न बरतें
शरीर के किसी भी अंग में गांठ उभरे तो डॉक्टरी सलाह जरूरी लें। कई बार गांठ के बने रहने से व्यक्ति तनाव में रहने लगता है जिससे स्थिति बिगड़ सकती है।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 07 May 2020 at 6:38 AM -

रोचक तथ्य

1919 में ये निर्णय हो चुका था कि भारत में संविधान लागू होगा, और भारत के नागरिकों को संवैधानिक अधिकार दिए जाएंगे,उसके बाद भी ये आजादी लड़ाई किस को दिखाने के लिए चलती रही और कुछ लोग मरते रहे(या यूं कहें कि सभी सूचनाएं ना ... दे कर मरवाया जाता रहा)

इसी कड़ी में 1921में जनगणना के बाद छत्रपति शाहू जी महाराज की संदिग्ध मृत्यु, इस घटना पर डॉ आंबेडकर चुप रहे जो क्षत्रपति शाहू जी को अपना पिता मानते थे।

1919 से 1927 तक का समय बहुत सारी महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी है !

1919 -भारत सरकार अधिनियम

1921 -जनगणना(जाति आधरित)

1922-छत्रपति साहूजी महाराज की सन्दिग्ध मृत्यु और डॉ आंबेडकर की खामोशी

1923-गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना

1925-आरएसएस की स्थापना

1927-मद्रास राज्य में पेरियार के द्वारा संख्या के अनुपात में पहली बार कानूनी रूप से प्रतिनिधित्व दिलवाना

1927- साइमन कमीशन का भारत आना(साइमन कमीशन का भारत आने का उद्देश्य सत्ता हस्तांतरण की स्थितियों का आंकलन करना)

1927-डॉ. अम्बेडकर के द्वारा मनुस्मृति जलने की घटना का प्रचार

1927 में ही AIMIM की स्थापना हुई थीं।

[[[[[ 1926-रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी (हिल्टन यंग कमीशन) केंद्रीय बैंक स्थापित करने का प्रस्ताव

1931-(ICBEC-भारतीय केंद्रीय बैंकिंग जाँच समिति) भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना के मुद्दे को भारत के लिए केंद्रीय बैंक के रूप में स्थापित करने का पुनः प्रस्ताव

1934-रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट 1934
1935-RBI की स्थापना

1943-आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना

1947 इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के द्वारा सत्ता के चेहरों को बदलना ]]]]

इन सारे प्रकरणों में किस की क्या भूमिका और क्या उद्देश्य था ? ये शोध का विषय है !

विकास तेली ✍️✍️✍️✍️✍️

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 03 May 2020 at 2:46 PM -

भगीरथ एक गप्प

राजा भगीरथ: एक मिथक

कोई बताये कि भगीरथ नाम का राजा कौनसे सन में पैदा हुआ था ?
इतिहास का अर्थ होता है- निश्चित ही ऐसा हुआ था , इतिहास का एक कालक्रम और वर्ष समय निर्धारित होता है। भारतीय इतिहास में भगीरथ नाम का ... कोई राजा पैदा ही नही हुआ।

भारतीय मूलनिवासियों में दो तरह का मृत्यु संस्कार प्रचलित था।
1)कुछ लोग मृत शरीर को मिट्टी में दबाकर अन्तिम संस्कार करते थे। मृत शरीर पर ऊँचा टीला बनाया जाता था जिसे स्तूप कहते थे।
2)शेष लोग मृत शरीर को अग्नि में जलाकर शरीर के अवशेषों को एक बरतन में रखते थे। इन अवशेषों के बरतन के ऊपर मिट्टी का ऊंचा टीला बनाते थे जिसे स्तूप कहा जाता था।

महापुरुषों के स्तूप पक्की ईंटों के बनाये जाते थे।

सम्राट अशोक काल तक ये स्तूप चार प्रकार के बनाये जाने लगे थे। इनमे छोटे आकार का स्तूप मनौती/ संकल्पित स्तूप कहलाता था जो अनुयायियों द्वारा बनाया जाता था। यह परम्परा विकृत रूप में अभी भी जारी है इसे वर्तमान में हम 'पितृ-देवता' कहते हैं जो खेत खलिहानों में बनाये जाते हैं। वो पितृ- देवता के रूप में बने स्तूप पर रविवार को या किसी उत्सव के दिन चिराग जलाते हैं।

12वी शताब्दी तक बौद्ध धर्म लगभग समाप्त हो चुका था। इसके बाद वैदिक ब्राह्मणों ने अनेक मनगढ़न्त कथाओं की रचना की जिससे हमारा इतिहास मिटाकर हमें गुलाम बनाया जा सके। इन्ही कहानियों मे एक कथा राजा भगीरथ की है। कथा के अनुसार राजा भगीरथ स्वर्ग से गंगा को धरती पर लाये थे, गंगा शिव की जटाओं से निकली है।


एक कथा राजा हरिश्चंद की भी है। राजा हरिश्चंद्र, भगीरथ के पूर्वज थे और पहले पैदा हुये थे। हरीश्चंद्र की कथा में बताया जाता है कि वो अपनी परीक्षा के अन्तिम दिनों मे काशी में गंगा नदी के किनारे मृतघाट पर मुर्दे जलाते थे।

प्रश्न- जब गंगा नदी हरीशचंद्र के समय मौजूद थी तो फिर उनके बाद पैदा होने वाले भगीरथ को गंगा धरती पर लाने की आवश्यक्ता क्यों पडी?

इन काल्पनिक कथाओं पर विश्वास करने वाले धर्मान्ध तनिक भी तर्क नही करते हैं।

जिस समय ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक समाज का आन्दोलन चल रहा था तो ब्राह्मणों ने उनके आदोलन को रोकने के लिये आर्य समाज की स्थापना करके बेवकूफ बनाया कि सभी लोग आर्य हैं कोई बाहर से नही आया है, ज्योतिबा फूले गलत बोलता है कि ब्राह्मण आर्य हैं और बाहर से आये हैं।

हमारे लोग ब्राह्मणों की बातों में आ गये। इस प्रकार आर्य समाजी ब्राह्मणो ने परिश्रमी जातियों को पौराणिक कथाओं से जोडा और फूले का अन्दोलन विफल कर दिया।
गंगा के आस- पास बसने वाले सैनी जो मूलतः काछी हैं का ज्योतिबा फूले से कोई सीधा संबंध नहीं है। वो अपने आपको राजा भगीरथ के वंशज भगीरथी क्षत्रिय मानते हैं।

कालांतर में सैनी टाइटल वाले काछियों ने स्वयं को भगीरथी सैनी बोलना शुरु कर दिया।

माली जाति में सैनी उपनाम 6 फरवरी 1937 के बाद आया। (देखें- राजस्थान सरकार का गजट)

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 30 Apr 2020 at 9:10 PM -

कैंसर, cancer

भारत मे कुल 84 लाख के आसपास मौतें हर साल होती हैं। कैंसर से मरने वालों की संख्या कुल मौतों का 13 प्रतिशत है। इस हिसाब से हर साल 10 लाख से भी ज्यादा लोग कैंसर से मरने को विवश हैं। और 10 लाख से ... अधिक नए लोग इसमे जुड़ते जाते हैं। कैंसर के इलाज के लिए जो अस्पताल बनाए गए हैं, उनमें साधन कम हैं, वेटिंग लिस्ट बहुत लंबी हैं। बीमार कई बार स्ट्रेचर पर ही दम तोड़ जाते हैं।

आमतौर पर कहीं दर्द होने पर हल्की फुल्की दवाइयां लेकर लोग काम चला लेते हैं। श्वेता जब बनारस आई थी तो उसी समय एक बार तौसीफ़ के यहाँ से कपड़े लेकर आते समय व रास्ते में कुछ काम पड़ जाने के बाद मेरे सिर में बहुत तेज दर्द होने लगा था। हालांकि ऐसा दर्द चार छह दिन में अमूमन हो जाता था। लेकिन इस बार मुकेश ने सेरेडॉन लाकर दिया और कुछ ही देर में हमें आराम हो गया था। तबसे मैं इस दवा को हमेशा अपने पास रखने लगा। जब भी दिक्कत होती खा लेता। इससे पहले ग्रेजुएशन के दिनों में पैरासिटामॉल का आदती हो गया था, यह आदत मास्टर्स तक बनी रही। अभी भी कॉलपोल हमारे बैग में पड़ी रहती है। चार छह दिन में एकाध बार असहनीय सिरदर्द अभी भी हो जाता है। सेरेडॉन तो मिल नहीं पाई, लेकिन हरारत होने पर कॉलपोल खा लेता हूँ।

खैर, इसमें से अधिकतर लोग इलाज नही करवा पाते क्योंकि कैंसर का मुकम्म्मल इलाज 12 से 15 लाख के बीच पड़ता है। यदि कैंसर इन्फेक्टेड पार्ट शरीर से निकाल देने का कोई विकल्प है तो मरीज के स्वस्थ होने की संभावना बची रहती है अन्यथा तीसरी स्टेज के 60 प्रतिशत रोगी एक बार ठीक होकर जल्द फिर से चपेट में आ जाते हैं। 40 प्रतिषत की मृत्यु पहले इलाज के दौरान ही हो जाती है क्योंकि कीमोथेरेपी को बर्दाश्त करना हर बॉडी के बस का नही है। चौथी स्टेज पर 10 प्रतिशत मरीज ही बच पाते हैं।

यह समय कोरोना काल है। कुल 30 लाख इन्फेक्टेड लोगों मे से 10 लाख लोग ठीक होकर घर जा चुके हैं जो मीडिया नही बताता। तमाम अमीर औऱ साधन संपन्न लोग बचा लिए गए हैं। फिर भी संसार बाकी तमाम काम रोककर कोरोना वैक्सीन खोजने में लगा है। कोरोना जिस दिन कैंसर की तरह इकॉनमी बूस्टर बीमारी बन जाएगी, यह समाचारों से गायब हो जाएगी। हमें यह बता दिया जाएगा कि कोरोना अब उतना घातक नहीं है। कैंसर, दमा, एड्स, डेंगू, हेपिटाइटिस बी से भी तो मरते हैं न लोग। लेकिन सरकार को भारी टैक्स और आमदनी देकर मरते हैं। लेकिन दवाई उद्योग को बड़ा करके मरते हैं। दवा उद्योग एक उद्योग है, और उद्योग अपने फ़ितरत में ही बेईमान होता है। ऐसे में कैंसर के इलाज के शोध करके कोई सस्ता इलाज नहीं निकाल सकता। बीमा कम्पनियां कैंसर पीड़ित का स्वास्थ्य बीमा नही करतीं।

अभी पिछले दिनों बिहार के भभुआ से सासाराम गई हुई जिस मुस्लिम महिला को कोरोना पॉज़िटिव बताया गया था, और सोशल मीडिया वालों ने इसमें इवेंट खोज लिया था। उसकी पूरी कहानी जानेंगे तो पैरों तले से धरती खिसक जाएगी। दो साल हुए, उन महिला को कैंसर हो गया है। पटना के अस्पताल में उन्हें 12 साल बाद की तारीख़ दी गई है। ग़रीब परिवार है, इधर-उधर की दुकानों से दवाई लेकर किसी तरह से अपने दर्द को काबू में रखने और मजूरी करने का काम करती हैं। इधर लॉकडाउन में उनके परिवार की हालत क्या हुई होगी, इसकी कल्पना करें आप। ऐसे में खाने के लिए काम की तलाश में निकली थीं और जिनके भी संपर्क में आई हों, परिणाम आपके सामने है। आप सरकार के पक्ष-विपक्ष में होकर अपनी सुविधानुसार इवेंट का हिस्सा बन कर ख़ुश हैं।

जब खाने को शुद्ध भोजन, पीने को शुद्ध पानी और शुद्ध हवा नहीं मिलेगी तब कैंसर आपको नहीं होगा तो किसे होगा। जहरमुक्त भोजन,पानी, हवा के लिए हमने सरकार पर कभी दबाव नहीं बनाया, कभी इसके लिए पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ मोर्चे नहीं खोले। किस तरीके से दूसरे विश्व युद्ध के बाद से योजनाबद्ध रूप में जनता को जहर खाने, जहर पीने और जहर के बीच में रहने को अभ्यस्त कर दिया गया है। हमें इसकी भनक तक नहीं लगी। जिन हथियार कम्पनियों ने लाखों लोगों की ज़िंदगी की कीमत पर अपने फ़ायदे कमाया था। उन्ही केमिकल का प्रयोग कीटाणुनाशक और फफूंदनाशक जैसी दवाओं को बनाने में किया जाने लगा। भारत में इसके लिए सबसे पहले सहारा लिया गया हरित क्रांति जैसी चीज का। इसे आज भी ग्लैमराइज करके परोसा जाता है।

हरित क्रांति ने सबसे पहले किसानों से उनके बीज पर स्वामित्व छीना, उनके बैल और हल छीने, उनके देशी उपचार छीने। इसका परिणाम यह हुआ की हाइब्रिड बीजों का प्रयोग करिए। उनमें रोग लगें तो उन्ही कंपनियों के बनाये गए जहरीले पदार्थों को डालकर ठीक करिए। फैक्टरियों और वाहनों के माध्यम से जलाशयों और हवा को जहरीला किया गया, ताकि दवाई, वाहन बनाने-बेचने वालों का धंधा दिनोदिन फलता फूलता रहे। किसान और दस्तकार समुदाय इसका विरोध न करे, इसके लिए धर्म की बूटी सुंघा दी गई। यह बूटी कितनी असरकारक है? यह देखने के लिए 1986 से लेकर आज तक की राजनीति, शोषण और दरबदर किये जाते समुदायों को देख लीजिए, मरते-मार खाते किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों को देख लीजिए। फौजी और पुलिस में गए बेटों से मार खाते किसान बाप-मां को देख लीजिए। जनता का खून कब खौलता है, जब उनके भगवान पर कोई समस्या खड़ी हो जाती है, तब। हसन निसार कहते हैं कि, "अगर 6 फीट के आदमी को 2×2 फ़ीट के पिंजरे में 20 साल के लिए बन्द कर दो तो फिर वो ना सिर्फ कुबड़ा बाहर निकलेगा बल्की हमेशा के लिए कुबड़ा वह हो चुका होगा।" म्मतलब आप समझ रहे होंगे।

अभी मेरे कई अजीज हैं, जिनके परिवार के किसी न किसी सदस्य को कैंसर है। हर गांव में कितने टीबी और कैंसर के मरीज हैं, उनकी कोई व्यवस्थित गिनती नहीं हो पाई है। जाने कितने लोग हृदय संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं, कई लोगों ने हार्ट फेल्योर, हार्ट अटैक जैसी सरकार द्वारा पैदा की गई बीमारियों से अपने अज़ीज़ों को खोया है। हमने भी विगत फरवरी में अपने बहुत अजीज को खोया है। दवाई वाले दुकानदार के साथ डॉक्टरों की सेटिंग है। दवाई कम्पनियां डॉक्टरों से सेटिंग करके चलती हैं। दोनो का उद्देश्य स्वास्थ्य न होकर मुनाफा है। तब हम क्या करें?

अब होगा ये कि इन्ही हाइब्रिड बीजों और उनके जहर को 'ऑर्गेनिक' के नाम पर रंग, आकार-प्रकार और परची बदल कर बेचा जाएगा, वो भी कई गुना अधिक कीमत बढ़ाकर। आपको और हमको तय करना है कि हम किसके साथ खड़े हैं? अपने साथ या हमें मौत परोसने वालों के साथ। अपने साथ, अपनी जिंदगी के साथ खड़े होने का मतलब है कि आप किसान के साथ खड़े हों, न कि कृषि उपज के साथ। फैसला आपको करना है, ज़िन्दगी भी आपकी है। बस ख़्याल रहे कि, आप और हम इस धरती पर आख़िरी पीढ़ी नहीं हैं। कम से कम आने वाली पीढ़ी को जीने लायक हवा, पानी, खाना तो देकर जाएं। किसानों से और अपनी सभ्यता, अपनी ज़मीन, अपनी विरासत से ये नासमझी भरी दूरी आपको कहीं का नहीं छोड़ेगी। जल्द ही आप भी कैसंर या हृदय रोग से ग्रसित हो सकते हैं। आपको तो इरफ़ान खान जैसी सुविधा भी नहीं मिलेगी।

आज जब इसे लिख रहा हूँ तो भी सिर दर्द से फट रहा है, आँखें एकदम लाल हुई पड़ी हैं। पिछले चार दिनों से नींद बहुत दूर लग रही है।
Vikash Anand की वाल से साभार

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 28 Apr 2020 at 7:20 PM -

bcg का टीका

"यह बचाएगा कोविड-19 से भारत को ... और दुनिया को भी ! यह !" मदन भाई अपनी टीशर्ट का आधा बाज़ू ऊपर मोड़ते हुए उल्लास-भरे स्वर में कहते हैं। उनकी उँगली का इशारा बायीं भुजा की सतह पर बने उस निशान की ओर है , ... जिसे संसार बीसीजी के नाम से जानता है।

"बैसिलस कैलमेट गीरैन। आपको इससे इतनी उम्मीद क्यों हैं ?" मैं उनके समाचारीय सुख को टटोलता हूँ।

"अख़बारों में , टीवी-चैनलों में हर जगह छाया हुआ है यह बीसीजी का टीका। जहाँ इसे जनता लगवाती रही है , वहाँ कोविड-मामले भी कम हैं और मृत्यु-दर भी। तुम्हें नहीं लगता ? कुछ दम तो है इसमें !"

"अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी पुख़्ता तौर पर। किन्तु चलिए इसी बात पर बीसीजी की कहानी कही-सुनी जाए। सुनेंगे आप ?"

मदन भाई की उत्साही भौहें खिंच जाती हैं।

"निन्यानवे साल पुराना टीका है बीसीजी। यानी बैसिलस कैलमेट गीरैन। इस टीके में एक ख़ास माइकोबैक्टीरियम बोविस नाम का जीवाणु है , जिसे क्षीण यानी एटेनुएट किया गया है। यह जीवाणु गायों में टीबी-रोग पैदा करता है।"

"गायों में टीबी करता है ! पर यह जीवाणु टीबी से हमें कैसे बचाता है ? बीसीजी तो टीबी में काम करता है --- ऐसा सुना था !" मदन भाई का प्रश्न है।

"जी। टीबी-रोग मायोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस से होता है। किन्तु बीसीजी में एक दूसरा मायकोबैक्टीरियम बोविस है। ये कई मामलों में मिलते-जुलते हैं। अलबर्ट कैलमेट और कैमिल गीरैन से इस टीका का निर्माण किया। मनुष्यों में इसका पहला प्रयोग सन् 1921 में किया गया। तबसे न जाने कितने ही शिशुओं और नवजातों को यह लगाया जा चुका है। इसका मुख्य उद्देश्य : ट्यूबरकुलर मेनिन्जायटिस व डिस्सेमिनेटेड टीबी से व्यक्ति की रक्षा।"

"ये दोनों अजीब-ओ-ग़रीब नाम ऐसे हैं ?"

"ये टीबी-रोग के दो गम्भीर स्वरूप हैं। ट्यूबरकुलर मेनिन्जायटिस मस्तिष्क की मेनिंजेज़ नामक बाहरी झिल्लियों को प्रभावित करने वाला रोग है और डिस्सेमिनेटेड टीबी उस स्थिति को कहा जाता है , जब टीबी पूरे शरीर में फैल जाती है।"

"अरे ! तब तो ये बड़ी घातक बीमारियाँ हुईं ! एक दिमाग़ पर असर डाल रही है , दूसरी समूचे जिस्म पर !"

"यक़ीनन। तो इन्हीं को रोकने के लिए बीसीजी का इस्तेमाल किया जाने लगा। कामयाबी भी काफ़ी मिली , हालांकि टीबी इ अन्य स्वरूपों में इसकी सफलता विवादास्पद रही।"

"इनके अलावा भी कहीं यह टीका इस्तेमाल हुआ ?"

"जी। मूत्राशय के कैंसर में। वहाँ भी इसके प्रयोग से यूरोलॉजिस्टों-ऑन्कोसर्जनों ने रोगियों में लाभ होता पाया। लेकिन बीसीजी बड़ी दिलचस्प वैक्सीन रही दूसरे मायनों में।"

"कैसे ?"

"बीसीजी का टीका जब नवजातों को लगने लगा , तब ओवरऑल शिशु-मृत्यु-दर में भी कमी पायी जाने लगी। केवल टीबी से ही बच्चे कम मर रहे हों , ऐसा नहीं था। बीसीजी का टीका लगने से बच्चों में फेफड़ों के संक्रमण और सेप्सिस जैसे गम्भीर भी घटते पाये गये।"

"अरे वाह ! यह तो कमाल हो गया ! आम-के-आम-गुठलियों-के दाम !"

"हाँ , पर विज्ञान तो मुहावरों के आधार बना कर उत्सव मनाता नहीं। उसकी उल्लासधर्मिता को तो प्रमाण चाहिए पहले। सो दुनिया-भर के इम्यूनोलॉजिस्ट जुटे बीसीजी का अध्ययन करने के लिए कि ये एक-से-अधिक लाभ मिल क्यों और कैसे रहे हैं ? जानते हैं उन्हें क्या मिला ?"

"अब थोड़ी इम्यूनोलॉजी की जटिल भाषा को सरल करके समझाने का प्रयास करता हूँ। मोटी बात यह समझिए कि वैज्ञानिकों ने पाया कि बीसीजी का टीका शरीर में अन्य संक्रमणों से बचाने के लिए तीन स्तर पर काम करता है। मान लीजिए किसी बच्चे को बीसीजी का टीका लगा। टीके में एक जीवाणु है , जिसका नाम आप जान चुके हैं। शरीर के भीतर जो प्रतिरक्षक लिम्फोसाइट-कोशिकाएँ हैं ( दो प्रकार की : टी-लिम्फोसाइट व बी-लिम्फोसाइट ) उन्हें इस बीसीजी के जीवाणु का प्रयोग करके टीबी से लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है। यानी शरीर के सैनिकों को ट्रेनिंग देने वाली कोशिकाएँ बीसीजी के टुकड़े ( यानी एंटीजन ) इन लिम्फोसाइट-सैनिकों के सामने प्रस्तुत करते हुए कहती हैं कि , "इसे देख रहे हो ? बाहर जो टीबी की बीमारी पैदा करने वाला दुश्मन है न , वह इसी से मिलता-जुलता है। इससे लड़ने का अभ्यास करो। इससे लड़ना सीख लोगे , तो उससे लड़ने में भी आसानी होगी।" इस तरह से शरीर की टी-लिम्फोसाइट व बी-लिम्फोसाइट बीसीजी के टीके से ट्रेनिंग लेकर टीबी-रोग से लड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं। फिर ये शरीर में ट्रेनिंग की स्मृति लेकर चुपचाप पड़ी रहती हैं कि कब टीबी का जीवाणु भीतर दाखिल हो और कब वे इससे लड़ें। किन्तु जब टीबी के जीवाणु की जगह दूसरे श्वसन-रोग पैदा करने वाले विषाणु शरीर में घुसते हैं , तब ये स्मृतियुक्त लिम्फोसाइट इन विषाणुओं और बीसीजी-जीवाणु के टुकड़ों ( यानी एंटीजनों ) कुछ समानता पाते हैं और इन विषाणुओं पर हमला कर देते हैं।"

"यानी ट्रेनिंग बीसीजी से ली थी , टीबी के लिए ली थी और हमला करके मार दिये वायरस ! गज्जब भाई ! कमाल !"

"हाँ मदन भाई। आण्विक स्तर पर बीसीजी और विषाणुओं को एक-सा दिखना मॉलीक्यूलर मिमिक्री कहलाता है और इस मिमिक्री के कारण विषाणुओं का सफाया हो जाता है। यह बीसीजी-टीके का टीबी के अतिरिक्त अन्य संक्रामक रोगों में काम करने का पहला ढंग हुआ।"

"दूसरा ढंग क्या है ?"

"बीसीजी एक-दूसरे ढंग से सीधे प्रतिरक्षा-तन्त्र की इन बी व टी-लिम्फोसाइटों को विषाणुओं के खिलाफ़ सक्रिय कर सकता है। इस तरीक़े को हेटेरोलॉगस इम्यूनिटी कहा जाता है। इसमें बीसीजी और विषाणुओं के मिलते-जुलते एंटीजन ज़िम्मेदार नहीं होते , यह सीधे काम के लिए उन्हें तैयार करता है। यानी बीसीजी का टीका लगा तो केवल टीबी-रोग से लड़ने वाले सैनिक नहीं तैयार हुए , विषाणु से लड़ने वाले सैनिक भी तैयार हो गये।"

"और तीसरा ढंग क्या है ?"

"तीसरा ढंग अन्तिम और सर्वाधिक शोध का विषय बना हुआ है। इसे ख़ास नाम दिया गया है : ट्रेंड इम्यूनिटी। मोनोसाइट-मैक्रोफेजों जैसी प्रतिरक्षक कोशिकाओं के भीतर जीनों के ख़ास प्रमोटर नामके स्विचों को ऑन-ऑफ़ करके उनके भीतर प्रतिरक्षक रसायनों का निर्माण और स्राव कराया जाता है। यह रासायनिक निर्माण और स्राव भी बीसीजी कराता है। अब जब विषाणु शरीर में दाखिल होते हैं , तब बीसीजी के आधार पर मिली ट्रेनिंग के कारण ये मोनोसाइट-मैक्रोफेज उन्हीं रसायनों का उत्पादन और स्राव शुरू कर देते हैं , जिनकी ट्रेनिंग पहले बीसीजी ने उन्हें दी थी। इस रसायनों के तरह-तरह के प्रयोगों से विषाणु मारे जाते हैं।"

"यानी इन तीन तरीक़ों से बीसीजी विषाणुओं के खिलाफ़ इम्यूनिटी देता है। वाह ! तब तो कोविड-19 में इससे मिलने वाली प्रतिरक्षा की बात में दम है ! है न !"

"जैसा कि मैंने कहा कि विज्ञान उल्लास से पहले प्रमाण जुटाता है। बीसीजी काम करता है , इसके कुछ प्रमाण हैं। अवश्य हैं। पर यह काम करता है , तो क्या इतना जानने-भर से काम चल जाएगा ? यह सच है कि इटली और अमेरिका जैसे देशों में , जहाँ इस टीके का प्रयोग व्यापक रूप में नहीं है , वहाँ अधिक मौतें हुई हैं और दक्षिणी कोरिया , जापान और भारत जैसे देशों में कम , जहाँ इस टीके का ख़ूब इस्तेमाल होता रहा है। लेकिन यह प्रमाण परिवेश-जन्य भी हो सकता है और अनेक दूसरे कारण भी मौत के आँकड़ों में अन्तर के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं। अभी कई शोध चल रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया , नीदरलैंड्स व अमेरिका में बीसीजी का टीका स्वास्थ्य-कर्मियों को लगाया जा रहा है ताकि यह देखा जा सके कि क्या यह उनकी कोविड-19 से रक्षा करता है अथवा नहीं। फिर बुज़ुर्गों में इस टीके को लगाकर गम्भीर कोविड-संक्रमण की रोकथाम पर भी शोध चल रहे हैं। जर्मनी भी बीसीजी से मिलते-जुलते टीके को बुज़ुर्गों अथवा स्वास्थ्य-कर्मियों को लगाकर शोध में लगा हुआ है।"

"चलो यार ! बस नतीजे पॉज़िटिव आएँ !"

"केवल नतीजों के पॉज़िटिव आने से प्रश्न समाप्त नहीं होते मदन भाई। लोग पूछेंगे कि टीका लगने से कितने दिन-महीने-साल की सुरक्षा मिलेगी इस कोरोनाविषाणु से ? दूसरे देशों की जनता यह भी पूछेगी कि टीका लगवाने की सही उम्र क्या है ? कितनी बार ? क्या बचपन में लगा बीसीजी और जवानी या बुढ़ापे में लगा बीसीजी एक-सा काम करेंगे ?"

"सवाल तो लाज़िमी हैं ये सारे।"

"इसीलिए विज्ञान त्वरित उत्सवधर्मिता में कंजूसी दिखाता है। पहले वह यह सिद्ध करने में लगा है कि सचमुच बीसीजी कोविड-19 में काम करता है अथवा नहीं। फिर यह सिद्ध करने में की किस तरह। फिर बीसीजी-टीका देने-सम्बन्धी पॉलिसी के गठन के बारे में। इतना सब जानने के बाद ही वह उल्लसित हो सकता है।"

"तब तक हम आम लोग तो लॉकडाउन में ख़ुश हो ही सकते हैं न भाई ! टीका हम-हिन्दुस्तानियों को जन्म के तुरन्त बाद लगाया जाता है और सम्भावना जगा रहा है। इस बुरे दौर में उम्मीद पर इतना खुश होना तो बनता है न !" कहते हुए वे भुजा के उस बीसीजी के निशान को चूम लेते हैं।

"अन्वेषकों ने जनता को उम्मीद रखने से कहाँ रोका है ! वे तो बस इतना कह रहे हैं कि आसमान ताकते हुए ज़मीन पर जमे रहना है , गिरना नहीं। बीसीजी की इस नयी कहानी के सुखद अन्त की हम-सबको प्रतीक्षा है।"

--- स्कन्द।

#skandshukla
चिकित्सक-मित्र नेचर-रिव्यूज़-यूरोलॉजी

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 28 Apr 2020 at 6:06 PM -

कोशिका विज्ञान

मृत्यु एवं अमरता का विज्ञान
●Death Clock In Your DNA●
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पृथ्वी पर प्रतिदिन लगभग 151600 लोग अपना जीवन पूर्ण कर मृत्यु का ग्रास बन जाते हैं। इनमे से कई मौतों का कारण सड़क दुर्घटनाये अथवा लाइलाज बीमारिया होती है, जो कि स्वाभाविक है लेकिन आज मैं ... बात कर रहा हूँ "वृद्धावस्था के कारण हुई मौतों की"
आखिर हम बूढ़े क्यों होते है? क्या ऐसा कोई उपाय हो सकता है कि हम चिरयुवा बने रह सके?
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हमारा शरीर खरबो कोशिकाओ से बना हुआ है। ये कोशिकाए प्रतिपल मरती रहती है, नयी कोशिकाओ का जन्म होता रहता हैं।
प्रत्येक कोशिका में मौजूद डीएनए की संरचना के दोनों छोरो पे एक मृत नॉन कोडिंग डीएनए की कैप लगी होती है। जिस मृत डीएनए को हम टेलोमीयर (Telomere) कहते हैं। ये टेलोमीयर हमारे डीएनए की रक्षा कवच के रूप में कार्य करते हैं।
(Image In First Comment)
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जैसे ही कोई कोशिका... अपने जैसी नयी कोशिका को जन्म देती है तो इस प्रक्रिया में नयी कोशिका में मौजूद डीएनए में ये टेलोमीयर थोड़े छोटे हो जाते है। 50-60 बार ये प्रक्रिया दोहराने पर ये टेलोमीयर छोटे होते होते फाइनली खत्म हो जाते है।
जिस पल ऐसा होता है.. उस पल कोशिकाओ का जन्म रुक जाता है। पुरानी कोशिकाएं एक वक़्त के बाद शिथिल होकर गड़बड़ उत्पन्न करने लगती है।
परिणाम स्वरूप.. हम बूढ़े होने लगते है। शरीर की कार्य प्रणाली ध्वस्त होने लगती है और फाइनली एक दिन.. हम मर जाते है।
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कोई भी जीव कितने वक़्त तक जीवित रहेगा इसका सम्बन्ध कही ना कही टेलोमीयर की लंबाई अथवा कोशिकाओ के द्विगुणीत होने की क्षमता (Hayflick Limit) से होता है। कछुए जो 200 साल तक ज़िंदा रह सकते है, उनमे ये लिमिट 110 तो चूहे जिनका जीवन बेहद अल्प होता है , उनमे ये लिमिट 10-15 तक होती है।
मनुष्यो में कोशिकाओ के बनने की लिमिट 40-60 होती है जिस कारण किन्ही भी परिस्थितियों में मनुष्य जीवन 120 साल से ज्यादा होना असंभव प्रतीत होता है।
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तो प्रॉब्लम क्या है? जेनेटिक इंजीनियरिंग के प्रयोग से टेलोमीयर की लंबाई बढ़ा दीजिये और इंसान लंबे वक़्त तक चिरयुवा बना रहेगा? Right? Well Yes...
प्रयोगशालाओ में टेलोमीरेस नामक एंजाइम की सहायता से हम टेलोमीयर की क्षमता को कृतिम रूप से प्रभावित कर चुके है
तो मनुष्यो पर इसका प्रयोग क्यों नही करते?
वो इसलिए क्योंकि.. अगर हम एक कदम अमरता की ओर बढ़ाते है तो वही कदम हमें इस अमरता के एक भयावह पहलु के भी दर्शन कराता है। .
जैसा कि मैंने ऊपर कहा है कि हर पल आपके शरीर में मौजूद 20 लाख कोशिकाएं मरती है और अपने अंदर मौजूद डीएनए को कॉपी एंड ट्रांसफर करके नयी कोशिकाओ को जन्म देती हैं।
डीएनए कॉपी की इस प्रक्रिया में हमारी कोशिकाएं ऑन एवरेज 120000 गलतियां प्रति कोडिंग करती है। तब हमारा "Auto Correct Mode" पे चलने वाला शरीर उन त्रुटिपूर्ण कोशिकाओ को आत्महत्या का हुक्म सुना देता है। वे नयी कोशिकाएं जल्दी जल्दी द्विगुणीत होकर अपना टेलोमीयर खत्म करके मृत हो जाती है।
लेकिन...
कुछ ढीठ कोशिकाएं इन आत्महत्या के सिग्नल्स को नजरअंदाज करके... कोशिका के अंदर सुसुप्तावस्था में मौजूद "टेलोमीरेस" नामक एंजाइम को एक्टिवेट कर देती है... जिस कारण ये एंजाइम टेलोमीयर को स्टेबल कर देता है
नतीजन? ये त्रुटिपूर्ण कोशिकाएं अमर होके नयी डिफॉल्टर कोशिकाओ को जन्म देती रहती है और अन्ततः खराब कोशिकाओ का एक ऐसा समूह जन्म ले लेता है.. जिस समूह को हम एक बेहद फैंसी और भयावह नाम से पुकारते हैं।
"कैंसर"
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जी हाँ.. तो मेरे कहने का यहाँ निहितार्थ ये है कि अगर टेलोमीयर किसी प्रकार से स्टेबल कर दिए जाए तो परिणाम स्वरुप हर खराब कोशिका अनियंत्रित होकर वृद्धि को प्राप्त होने लगेगी और...
पृथ्वी पर मौजूद हर व्यक्ति पे कैंसर की तलवार लटकने लगेगी..
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यानी अमरता की कीमत शायद हमें "कैंसर" के खतरनाक रूप में चुकानी पड़े।
प्रकृति के खेल भी अजीब है.. उसके रहस्यों की हर कुंजी मानव प्रगति के एक नए आयाम का दर्शन कराती है तो वही कुंजी प्रकृति के चक्र से खिलवाड़ के संभावित खतरों से भी रूबरू कराती है।
शायद भविष्य में बेहतर वैज्ञानिक शोधो के साथ अमरता के रहस्यों को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
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बहरहाल.. आपके शरीर में मौजूद टेलोमीयर कितने लंबे होंगे..इसका सम्बन्ध आपके माँ और पिता से होता है। टेलोमीयर की लंबाई आपके जन्म के समय निश्चित हो जाती है।
अर्थात जैसे ही आप इस सृष्टि में जीवन का प्रथम चरण आरम्भ करते है
उसी पल.. आपके शरीर में मौजूद "मृत्यु रुपी टेलोमीयर अलार्म क्लॉक" की उलटी गिनती भी शुरू हो जाती है।
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What I Mean Here To Say Is
The Very First Moment You Are Born...
At That Time Only...
You Are Also Programmed To Die !!!
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And As Always
Thanks For Reading !!!

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 27 Apr 2020 at 7:57 PM -

वित्तीय आपात काल

अनुच्छेद 360, राष्ट्रपति को वित्तीय आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार देता है. यदि राष्ट्रपति संतुष्ट है कि देश में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसके कारण भारत की वित्तीय स्थिरता, भारत की साख या उसके क्षेत्र के किसी भी हिस्से की वित्तीय स्थिरता ... को खतरा है, तो वह केंद्र की सलाह पर वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है.

लेकिन यह ध्यान रहे कि 1978 के 44 वें संविधान संशोधन अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि राष्ट्रपति की ‘संतुष्टि’ न्यायिक समीक्षा से परे नहीं है, अर्थात सुप्रीम कोर्ट इसकी समीक्षा कर सकता है.

वित्तीय आपातकाल कैसे और कब तक के लिए लगाया जाता है (Parliamentary Approval and Duration of the Financial Emergency)

जिस दिन राष्ट्रपति, वित्तीय आपातकाल की घोषणा करता है उसके दो माह के अंदर ही इसको संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए. वित्तीय आपातकाल की घोषणा को मंजूरी देने वाले प्रस्ताव को संसद के किसी भी सदन द्वारा केवल एक साधारण बहुमत द्वारा पारित किया जा सकता है.

एक बार संसद के दोनों सदनों द्वारा अनुमोदित किए जाने के बाद, वित्तीय आपातकाल अनिश्चित काल तक जारी रहता है, जब तक कि इसे राष्ट्रपति द्वारा हटाया नहीं जाता है. इसके दो प्रावधान है;

a. इसके संचालन के लिए कोई अधिकतम अवधि निर्धारित नहीं है; और b. इसकी निरंतरता के लिए बार-बार संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है.
वित्तीय आपातकाल की उद्घोषणा को राष्ट्रपति द्वारा बाद में किसी भी समय रद्द किया जा सकता है. इस तरह की उद्घोषणा को संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है.
वित्तीय आपातकाल के प्रभाव (Effects of Financial Emergency)

1. वित्तीय आपातकाल के दौरान केंद्र के कार्यकारी अधिकार का विस्तार हो जाता है और वह किसी भी राज्य को अपने हिसाब से वित्तीय आदेश दे सकता है.

2. राज्य की विधायिका द्वारा पारित होने के बाद राष्ट्रपति के विचार के लिए आये सभी धन विधेयकों या अन्य वित्तीय बिलों को रिज़र्व रखा जा सकता है.

3. राज्य में नौकरी करने वाले सभी व्यक्तियों या वर्गों के वेतन और भत्ते में कमी की जा सकती है.

4. राष्ट्रपति, निम्न व्यक्तियों के वेतन एवं भत्तों में कमी करने का निर्देश जारी कर सकता है;

a. संघ की सेवा करने वाले सभी व्यक्तियों या किसी भी वर्ग के लोग

b. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश.

इस प्रकार, वित्तीय आपातकाल के संचालन के दौरान केंद्र; वित्तीय मामलों में राज्यों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लेता है जो कि राज्य की वित्तीय संप्रभुता के लिए खतरे वाली स्थिति होती है.

इससे पहले भारत में 1991 गंभीर वित्तीय संकट उत्पन्न हुआ थ लेकिन फिर भी वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) की घोषणा नहीं की गई थी.

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 27 Apr 2020 at 9:14 AM -

अर्नोल्ड सोमर फील्ड

आइंसटीन को सबसे ज्यादा iq वाला व्यक्ति और एडिसन को सबसे ज्यादा अविष्कार करने वाला व्यक्ति माना जाता है। महान वैज्ञानिकों की सूची में एक और नाम है सोमरफील्ड। सोमरफील्ड को नोबल पुरस्कार के लिए सर्वाधिक बार नामित किया गया है। दुर्भाग्य से उनको नोबल ... पुरस्कार नहीं मिल सका। मेरा मानना है कि सोमरफील्ड को नोबल पुरस्कार से जानबूझकर वंचित किया गया है और चूंकि उनका शोधकार्य अत्यन्त उच्चकोटि का रहा है इसलिए इंटरमीडिएट कक्षाओं के विज्ञान विद्यार्थी उनका नाम भी नहीं जान पाते।

एक विश्वसनीय स्रोत के अनुसार Arnold Somerfield को नोबल पुरस्कार के लिए 84 बार नामित किया गया।।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 02 Apr 2020 at 8:28 PM -

कोरोना ने दुनिया को बदल कर रख दिया। जब तक इससे लड़ना हम जान नहीं जाते तब तक के लिए हमें नए तरीके से जीना सीख लेना चाहिए-
मास्क लगाए रहने पर नाक और कान में दर्द होने लगता है। इससे बचने के लिए सूती कपड़े ... का मंकी कैप पहना जा सकता है। यह वायरस से बचाव की दृष्टि से भी बेहतर है।

अल्ला मार्किट और भगवान मार्किट बन्द रखने होंगे इन बाजारों में मिलने वाली चाट, बिंदी, सिंदूर, मिठाई, आभूषण आदि की बिक्री घर घर होनी चाहिए। लोग घर के नजदीक से ही ऐसी चीजें प्राप्त करें। एक दुकान पर एक समय में एक ही आदमी जाए। सामान को छुए बिना पसंद करे और खरीदे।

पुजारी, मौलवी, भंते आदि कथा, भागवत और तहरीर आदि की उम्मीद न करें। जो भी संस्कार करने हैं वो ऑन-लाइन ही करें तो बेहतर।

वर्तमान प्रारूप का लॉक डाउन लंबे समय तक नहीं चल पायेगा। इसमें कुछ दिन बाद कुछ संशोधन भी करने होंगे। सबसे पहले मोबाइल और मोटरसाइकिल जैसी चीजों की मरम्मत व बिक्री की छूट देनी होगी। फिर वर्दी और जूतों की भी सिलाई और बिक्री शुरू करनी होगी।

सबसे खास बात-
लोगों को बाल काटना खुद ही सीखना पड़ेगा। तथा चाट, पकौड़ी और जलेबी की व्यवस्था भी अपने घर पर ही करनी होगी।

user image Aneeeh Swaroop - 17 Oct 2019 at 10:33 AM -

General Provident Fund - सामान्य भविष्य निधि



16 सामान्य भविष्य निधि

1. पृष्ठभूमि
उत्तर प्रदेश सरकार के सरकारी सेवकों के लिए प्रदेश के लोक लेखे के अंतर्गत सामान्य भविष्य निधि नामक एक निधि स्थापित है जिसमें वे अभिदाता के ... रूप में अभिदान करते है। मूल नियम 16 के अंतर्गत उत्तर प्रदेश सरकार को अपने सरकारी सेवकों को भविष्य निधि में अभिदान करने के लिए निर्देशित करने की शक्ति प्राप्त है। सरकार अभिदाता के नाम भविष्य निधि खाते की धनराशि पर नियमानुसार ब्याज देती है। अभिदाता को अपने सामान्य भविष्य निधि खाते से नियमानुसार अग्रिम या अंतिम निष्कासन की सुविधा उपलब्ध रहती है। अभिदाता के सेवानिवृत्ति, सेवा त्याग, पृथक्करण पदच्युति या मृत्यु की स्थितियों में उसके सामान्य भविष्य निधि खाते से अंतिम भुगतान कर दिया जाता है। मृत्यु की स्थिति मे अंतिम भुगतान प्राप्त करने वाले को सरकार की तरफ से जमा सम्बद्ध बीमा योजना के अन्तर्गत धनराशि नियमानुसार अनुमन्य होने पर दी जाती है। सामान्य भविष्य निधि की धनराशि को किसी भी प्रकार के सम्बद्धीकरण, वसूली या समनुदेशन से पी0एफ0 ऐक्ट 1925 की धारा-3 के अंतर्गत सुरक्षा प्राप्त है। इससे सरकारी देयों की वसूली भी अभिदाता की सहमति के बिना नहीं की जा सकती है।

"Protection of Compulsory Deposit : (1) A Compulsory deposit in any Government or Railway Provident Fund shall not in any way be capable of being assigned or charged and shall not be liable to attachment under any decree or order of any Civil, Revenue or Criminal Court in respect of any debit or liability incurred by the subscriber or Depositor, and neither the official Assignee nor any recover appointed under the Provincial Insolvency Act 1920 shall be entitled to, or have any claim on, any such compulsory Deposit"

अत: स्पष्ट है कि सरकारी कर्मचारी की किसी देनदारी या उधारी के होते हुए भी उसके भविष्य निधि में जमा धन से न तो किसी प्रकार की वसूली ही की जा सकती है और न ही उसके भविष्य निधि खाते का सम्बद्धीकरण (attachment) किया जा सकता है।

2. प्रगति

(क) शासनादेश संख्या सा-4-ए0जी0-57/दस-84-510-84 दिनांक 26 दिसम्बर, 1984 द्वारा सभी वर्ग के राजकीय कर्मचारियों के लिए पासबुक प्रणाली लागू की गयी। इसके अन्तर्गत आहरण एवं वितरण अधिकारी प्रत्येक मास पास बुकों में जमा एवं भुगतानों की प्रविष्टियाँ करते हैं तथा वर्ष के अन्त में वार्षिक ब्याज का आगणन और वार्षिक लेखाबन्दी करते हैं। सेवानिवृत्ति के समय चतुर्थ श्रेणी के सरकारी सेवक की पासबुक में उपलब्ध धनराशि का पूर्ण भुगतान कर दिया जाता है जबकि अन्य सरकारी सेवकों के मामलें में उनकी पासबुक में उपलब्ध धनराशि के 90 प्रतिशत का भुगतान कर दिया जाता है तथा शेष 10 प्रतिशत का भुगतान सेवानिवृत्ति के विलम्बतम 3 माह के भीतर महालेखाकार के लेखों से मिलान करके महालेखाकार के प्राधिकार पत्र पर किया जाता है।

(ख) सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) नियमावली 1985

संविधान के अनुच्छेद 309 के परन्तुक द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करके राज्यपाल द्वारा सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) नियमावली 1985 बनायी गयी है। यह नियमावली 7 मार्च 1935 की अधिसूचना के साथ प्रकाशित जनरल प्रोवीडेन्ट फन्ड (उत्तर प्रदेश) रूल्स का अतिक्रमण करके बनाई गई। इस नियमावली में 28 नियम हैं तथा नियमावली के अन्त में चार अनुसूचियां तथा अस्थायी अग्रिम/अंतिम निष्कासन एवं सामान्य भविष्य निधि के 90 प्रतिशत भुगतान की स्वीकृति से सम्बन्धित आदेश के फार्म निर्धारित प्रारूप पर दिये गये हैं।

(ग) सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) (प्रथम संशोधन) नियमावली, 1997

इस नियमावली के द्वारा सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) नियमावली 1985 के नियम संख्या 4, 5 एवं 23 में संशोधन किये गये हैं जिन्हें यथास्थान नीचे आलेख में सम्मिलित किया जा रहा है।

(घ) सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) (द्वितीय संशोधन) नियमावली, 2000

इस नियमावली के द्वारा सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) नियमावली 1985 नियम संख्या 24 के नीचे स्तम्भ - 1 में दिये गये उप नियम (4) और (5) में संशोधन किये गये हैं। इस संशोधन के द्वारा सामान्य भविष्य निधि नियमावली 1985 की उस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है जिसके अन्तर्गत अधिवर्षता पर सेवानिवृत्ति के मामले में सेवानिवृत्ति के दिनांक के 6 मास पूर्व तथा अन्य मामलों में जब धनराशि देय हो जाये, के एक माह के भीतर अभिदाता अथवा उसके परिवार के सदस्य, जैसी भी स्थिति हो, को यथास्थिति प्रपत्र 425-क अथवा 425-ख पर आवेदन पत्र प्रस्तुत करना होता था। आवेदन पत्र प्रस्तुत करने में विलम्ब होने पर सामान्य भविष्य निधि के भुगतान में काफी विलम्ब हो जाता था और इसके लिए कार्यालय का उत्तरदायित्व नहीं बनता था। इस संशोधित व्यवस्था के अनुसार अब प्रपत्र 425-क अथवा 425-ख पर आवेदन की प्रतीक्षा किये बिना ही सम्बन्धित कार्यालय सामान्य भविष्य निधि के अंतिम भुगतान के संबंध में अपेक्षित कार्यवाही करेगा जिससे कि पाने वाला अधिवर्षता पर सेवानिवृत्ति के मामले में सेवानिवृत्ति के दिनांक को और अन्य मामलों में धनराशि देय हो जाने के दिनांक से तीन माह के भीतर भुगतान प्राप्त कर सके।

(ड़) सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) (संशोधन) नियमावली, 2005

इस नियमावली के द्वारा सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) नियमावली 1985 के नियम संख्या-4 में एक महत्वपूर्ण संशोधन यह किया गया है कि "कोई सरकारी सेवक जो 01 अप्रैल, 2005 को या उसके पश्चात सेवा में प्रवेश करता है, निधि में अभिदान नहीं करेगा।"

3. परिभाषाएँ (नियम 2)

(क) लेखाधिकारी - समूह घ के कर्मचारियों के लिये जिनका लेखा विभागीय प्राधिकारियों द्वारा रखा जाता है, लेखाधिकारी का तात्पर्य सम्बद्ध आहरण एवं वितरण अधिकारी से है। अन्य कर्मचारियों के सन्दर्भ में इस हेतु भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक द्वारा अधिकृत प्राधिकारी - महालेखाकार उत्तर प्रदेश से है।

(ख) परिलब्धियाँ - वित्तीय नियम संग्रह खण्ड 2 के भाग 2 से 4 में यथापरिभाषित वेतन, अवकाश वेतन, या जीवन निर्वाह अनुदान (सब्सिस्टेन्स ग्रांट)। इसमें वाह्य सेवा के सम्बन्ध में प्राप्त किये गये वेतन की प्रकृति के भुगतान तथा वेतन, अवकाश वेतन का जीवन निर्वाह अनुदान यदि देय हो पर देय समुचित मंहगाई वेतन भी सम्मिलित है।

(मूल वेतन के 50 प्रतिशत के बराबर मंहगाई भत्ते के मंहगाई वेतन में परिवर्तन संबंधी शासनादेश संख्या वे.आ.-2-075/दस-2005-41/04 दिनांक 22-9-2005 के प्रस्तर -4 के अनुसार इस मंहगाई वेतन को सामान्य भविष्य निर्वाह निधि (उत्तर प्रदेश) नियमावली 1985 के विभिन्न प्राविधानों के प्रयोजनार्थ मूल वेतन माना जायेगा।)

(ग) परिवार - अभिदाता के परिवार में निम्नलिखित का समावेश होगा :-

अभिदाता का पति/अभिदाता की पत्नी या पत्नियां

अभिदाता के बच्चे

अभिदाता के मृतक पुत्र की विधवा या विधवाएं

अभिदाता के मृतक पुत्र के बच्चे

बच्चे का तात्पर्य वैध बच्चों से है और उन मामलों में जहाँ गोद लेना अभिदाता के वैयक्तिक कानून के अंतर्गत मान्‍य हो, गोद लिये गये बच्चे भी शामिल है।

पुरूष अभिदाता, यह सिद्ध करने पर कि उसका अपनी पत्नी से कानूनी विलगाव हो चुका है या वह अपने समुदाय के कस्टमरी कानून के अंतर्गत गुजारा पाने की हकदार नहीं रह गई हैं, अपनी पत्नी को ऐसे मामले में जिनमें यह नियमावली सम्बन्धित हो परिवार की परिधि से बाहर कर सकता है। किन्तु वह लेखाधिकारी को सूचना दे कर इस प्रकार से बाहर की गई पत्नी को परिवार में पुन: शामिल कर सकता है। यदि महिला अभिदाता चाहे तो लेखाधिकारी को लिखित सूचना के द्वारा अपने पति को परिवार की परिधि से बाहर कर सकती है। किन्तु वह इस सूचना को लिखित रूप से रद्द कर के इस प्रकार से बाहर किये गये पति को परिवार में पुन: शामिल कर सकती है।

(घ) निधि - निधि‍ का तात्पर्य सामान्य भविष्य निधि से है।

(ड़) अवकाश - अवकाश का तात्पर्य वित्तीय नियम संग्रह खण्ड दो के भाग 2 से 4 में यथा उपबंधित किसी प्रकार के अवकाश से है।

(च) उपक्रम - 1. केन्द्र तथा उ0प्र0 राज्य के अधिनियम द्वारा या उसके अधीन निगमित परिनियत निकाय।

2. कंपनी ऐक्ट 1956 की धारा 617 के अर्थों में सरकारी कम्पनी।

3. उ0प्र0 जनरल क्लाजेज ऐक्ट, 1904 की धारा 4 के खण्ड (क्लाज) (25) के अर्थों में स्थानीय प्राधिकारी।

4. सोसाइटी रजिस्ट्रेशन ऐक्ट 1860 के अधीन पंजीकृत पूर्णत: या अंशत: राज्य या केन्द्र सरकार से नियंत्रित वैज्ञानिक संगठन।

(छ) वर्ष :- वर्ष का तात्पर्य वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च तक) से है।

नोट:- इस नियमावली में प्रयुक्त कोई भी अन्य अभिकथन (एक्सप्रेशन), जो कि भविष्य निधि अधिनियम 1925 या वित्तीय नियम संग्रह खण्ड दो भाग 2 से 4 में परिभाषित हो, उसी भाव में प्रयुक्त किया गया है।

4. पात्रता की शर्तें (नियम 4)

उ0प्र0 सामान्य भविष्य निधि की पात्रता की शर्तों में सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) प्रथम संशोधन नियमावली 1997 दिनांक 29 जुलाई 1997 के द्वारा संशोधन किया गया था जिसके अनुसार संविदा पर नियुक्त कर्मचारियों और पुनर्नियोजित पेंशनभोगियों से भिन्न समस्त स्थायी सरकारी सेवक और समस्त अस्थायी सरकारी सेवक (एप्रेन्टिस और प्रोबेशनर सहित), जिनकी सेवायें एक वर्ष से अधिक तक जारी रहने की संभावना हो, सेवा में कार्य भार ग्रहण करने की तिथि से निधि में अभिदान करेंगे किन्तु, शासनादेश संख्या सा-3-470/दस-2005-301(9)/03, दिनांक 7 अप्रैल, 2005 के द्वारा जारी अधिसूचना के द्वारा बनाई गई सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) (संशोधन) नियमावली, 2005 के अनुसार कोई सरकारी सेवक जो 1 अप्रैल, 2005 को या उसके पश्चात सेवा में प्रवेश करता है, निधि में अभिदान नहीं करेगा।

5. नामांकन (नियम 5)

(क) निधि का सदस्य बनने पर अभिदाता, अपनी मृत्यु की स्थिति में भविष्य निधि से संबंधित धनराशि प्राप्त करने के लिये एक या अधिक व्यक्तियों को नामांकित करेगा। व्यक्ति/व्यक्तियों (पर्सन) में कोई कम्पनी या व्यक्तियों (इन्डिविजुवल) का संगम या निकाय भी है चाहे वह निगमित हो या नहीं। नामांकन करते समय अभिदाता का परिवार हो तो परिवार के सदस्य या सदस्यों के पक्ष में ही नामांकन करना होगा।

(ख) नामांकन करते समय अभिदाता का परिवार न होने की दशा में वह नामांकन में व्यवस्था करेगा कि बाद में उसका परिवार हो जाने की दशा में वह अविधिमान्य हो जायेगा।

(ग) एक से अधिक व्यक्तियों के नामांकित होने की दशा में प्रत्येक को मिलने वाले हिस्से का उल्लेख होना चाहिये। यदि एक ही व्यक्ति का नामांकन है तब भी उसके नाम के सामने, हिस्से वाले स्तम्भ में, पूर्ण लिखा जाना चाहिये।

(घ) नामांकन निर्धारित प्रपत्र पर तथा जी0पी0एफ0 पास बुक में दिनांक तथा साक्षियों के हस्ताक्षर सहित होगा। कार्यालयाध्यक्ष/विभागाध्यक्ष इस पर अभिदाता के नाम व पद नाम सहित नामांकन प्राप्त होने की तिथि अंकित कर हस्ताक्षर करेंगे। नामांकन का प्रपत्र सामान्य भविष्य निधि (उत्तर प्रदेश) नियमावली - 1985 की अनुसूची 1 में दिया गया है।

(ड़) यदि कोई किसी अन्य भविष्य निधि का सदस्य रहा है तो उस फंड में किया गया नामांकन मान्‍य होगा, यदि उसे बदल न दिया जाये।

(च) नामांकन किसी भी समय निरस्त किया जा सकता है। निरस्तीकरण की सूचना के साथ या अलग से नया नामांकन भेजना होगा।

(छ) प्रत्येक नामांकन या निरस्तीकरण की सूचना, जहां तक विधिमान्य हो, विभागाध्यक्ष/कार्यालयाध्यक्ष को प्राप्त होने की तिथि से प्रभावी होगी।

(ज) उन आकस्मिकताओं के घटने पर, जिनका उल्लेख नामांकन में हो, नामांकन अविधिमान्य हो जायेगा।

(झ) यदि नामित व्यक्ति की अभिदाता से पहले मृत्यु हो जाती है तो उसकी नामांकित हिस्से का अधिकार नामांकन प्रपत्र में एतदर्थ उल्लिखित अन्य व्यक्ति(यों) को स्थानांतरित हो जायेगा, जब तक कि अभिदाता उस नामांकन को निरस्त करके दूसरा नामांकन न कर दे। किन्तु अगर नामांकन करते समय अभिदाता के परिवार में केवल एक सदस्य हो तो वह नामांकन में यह व्यवस्था करेगा कि परिवार से भिन्न वैकल्पिक नामांकिती को प्रदत्त अधिकार उसके परिवार में बाद में अन्य सदस्य या सदस्यों के शामिल हो जाने की दशा में अविधिमान्य हो जाएगा। यदि अभिदाता इस प्रकार का अधिकार एक से अधिक व्यक्तियों को देता है तो उसे प्रत्येक व्यक्ति का हिस्सा इस प्रकार निर्धारित कर देना चाहिये कि नामित व्यक्ति को देय समस्त धनराशि आच्छादित हो जाय।

6. अभिदान की शर्तें (नियम 7)

अभिदाता को सामान्य भविष्य निधि में मासिक अभिदान करना होता है जिसकी शर्तें निम्नवत है -

(क) निलंबन की अवधि में अभिदान नहीं करेगा। परन्तु पुन: स्थापन पर यदि अभिदाता निलंबन अवधि का पूरा वेतन प्राप्त करता है तो उस अवधि के लिये देय बकाया अभिदान का भुगतान एक मुश्त या किश्तों में जिस प्रकार निर्धारित किया जाये, अभिदाता को करना होगा। अन्य स्थितियों में अभिदाता अपने विकल्प पर, निलम्बन अवधि के देय बकाया अभिदान का भुगतान एक मुश्त में या किश्तों में जैसा अवधारित किया जाये करेगा।

(ख) ऐसे अवकाश के दौरान जिसके लिए या तो कोई वेतन न मिले या आधा वेतन या अर्द्ध औसत वेतन के बराबर अवकाश वेतन मिले, अभिदाता अपने चयन पर चाहे तो अभिदान नहीं करेगा। ऐसा चयन करने पर यदि किसी माह के भाग में ही ऐसे अवकाश पर था तो ड्यूटी के दिनों के अनुपात में उस माह का अभिदान करना होगा। अभिदान न करने की सूचना न देने पर यह समझा जायेगा कि उसने अभिदान करने का चुनाव कर लिया है। अभिदाता द्वारा दी गयी सूचना अंतिम होगी।

(ग) अभिदाता की सेवा निवृत्ति या अधिवर्षता के पूर्व उसके अंतिम छ: मास के वेतन से सामान्य भविष्य निधि में अभिदान के लिए कोई कटौती नहीं की जायेगी।

(घ) अभिदाता जिसने नियम 24 के अधीन सामान्य भविष्य निधि में अपने नाम से जमा धनराशि का आहरण कर लिया है, ऐसे आहरण के पश्चात निधि में अभिदान नहीं करेगा जब तक कि वह ड्यूटी पर न लौट आये।

7. अभिदान की धनराशि (नियम 8)

(क) मासिक अभिदान की धनराशि अभिदाता द्वारा प्रत्येक वर्ष के प्रारंभ में स्वयं निर्धारित की जायेगी तथा सूचित की जाएगी। यह धनराशि अभिदाता की परिलब्धि के 10 प्रतिशत से कम नहीं होगी तथा उसकी परिलब्धि की धनराशि से अधिक भी नहीं होगी तथा पूर्ण रूपयों में व्यक्त की जायेगी।

(ख) अभिदान निर्धारण के प्रयोजन से परिलब्धियाँ : पूर्ववर्ती वर्ष की 31 मार्च की परिलब्धियाँ होंगी किन्तु यदि अभिदाता उस दिनांक को अवकाश पर था और ऐसे अवकाश के दौरान उसने अभिदान न करने का चुनाव किया हो या उक्त दिनांक को निलंबित था तो उसकी परिलब्धि वह परिलब्धि होगी, जिसका वह ड्यूटी पर लौटने के प्रथम दिन का हकदार था।

(ग) इस प्रकार निर्धारित अभिदान की धनराशि को -

(अ) वर्ष के दौरान किसी समय एक बार कम किया जा सकता है।
(ब) वर्ष के दौरान दो बार बढ़ाया जा सकता है।

8. वाहय सेवा या भारत के बाहर प्रतिनियुक्ति पर स्थानान्तरण (नियम 9)

जब अभिदाता का स्थानान्तरण वाहय सेवा में कर दिया जाये या उसे भारत के बाहर प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया जाये तो वह निधि के अधीन उसी प्रकार रहेगा मानों उसका स्थानान्तरण नहीं किया गया हो या उसे प्रतिनियुक्ति पर नहीं भेजा गया हो।

9. अभिदान की वसूली (नियम 10)

(क) भारत में सरकारी कोषागार से या भारत के बाहर भुगतान के लिये किसी प्राधिकृत कार्यालय से वेतन आहरण की स्थिति में अभिदान की वसूली स्वयं परिलब्धियों से की जायेगी।

(ख) अभिदाता की तैनाती उत्तर प्रदेश में स्थित किसी उपक्रम में वाहय सेवा में होने पर अभिदान/अग्रिमों की वसूली प्रतिमाह उपक्रम द्वारा की जायेगी और उसे कोषागार में चालान के माध्यम से भारतीय स्टेट बैंक में जमा किया जायेगा।

(ग) उत्तर प्रदेश के बाहर स्थित किसी उपक्रम में प्रतिनियुक्ति पर अभिदाता के होने की दशा में उक्त वसूली प्रतिमाह उस उपक्रम द्वारा की जायेगी और भारतीय स्टेट बैंक के बैंक ड्राफ्ट के माध्यम से लेखाधिकारी को भेज दी जायेगी।

(घ) यदि अभिदाता उस दिनांक से जिस दिनांक को उससे निधि का सदस्य बनने की अपेक्षा की जाय अभिदान करने में विफल रहे या वर्ष के दौरान किसी मास य मासों में, नियम 7 में जैसा उपबंधित है उससे अन्यथा व्यतिक्रम करता है तो अभिदान के बकाये के मद्दे निधि में कुल धनराशि का भुगतान अभिदाता द्वारा तुरन्त कर दिया जायेगा या व्यतिक्रम करने पर उसकी वसूली परिलब्धियों से किस्तों में या अन्य प्रकार से जैसा कि सामान्य भविष्य निधि नियमावली की द्वितीय अनुसूची के पैरा 1 में विनिर्दिष्ट अधिकारी द्वारा निर्देश दिया जाय, कटौती करके की जायेगी। (नियम संख्या 10(3))

10. निधि से अग्रिम (REFUNDABLE ADVANCE) (नियम 13, 14 एवं 15)

(क) सक्षम स्वीकर्ता प्राधिकारी (नियम 13(1), 13(4) एवं द्वितीय अनुसूची)

(i) कोई अग्रिम जिसकी स्वीकृति के लिये नियम 13 के उपनियम (4) के अधीन विशेष कारण अपेक्षित नहीं है, फाइनेन्शियल हैण्डबुक खण्ड 5 भाग 1 के पैरा 249 के अधीन स्थानान्तरण पर वेतन के किसी अग्रिम को स्वीकृत करने के लिये सक्षम अधिकारी द्वारा अपने विवेकानुसार स्वीकृत किया जा सकता है। अत: इस हेतु कार्यालयाध्यक्ष या उनसे उच्च अधिकारी सक्षम प्राधिकारी है।

(ii) कोई अग्रिम जिसकी स्वीकृति के लिये नियम 13 के उपनियम (4) के अधीन विशेष कारण अपेक्षित है, सामान्य भविष्य निधि नियमावली 1985 की द्वितीय अनुसूची के पैरा-2 में उल्लिखित प्राधिकारियों द्वारा या ऐसे अन्य प्राधिकारियों द्वारा जिन्हें सरकार द्वारा समय-समय पर सक्षम घोषित किया जाये, स्वीकृत किया जा सकता है जैसे :

(i) उ0प्र0 शासन का विभाग

(ii) द्वितीय अनुसूची के पैरा-2 में विनिर्दिष्ट विभागाध्यक्ष एवं अन्य प्राधिकारी

(iii) केवल अराजपत्रित अधिकारियों के संबंध में द्वितीय अनुसूची के पैरा-2 में विशेष रूप से विनिर्दिष्ट प्राधिकारी

(iv) शासनादेश संख्या : जी-2-67/दस-2007-318/2006, दिनांक 24-1-2007 द्वारा विभागाध्यक्ष कार्यालयों से भिन्न कार्यालयों से भिन्न कार्यालयों के समूह "घ" के कर्मचारियों के सामान्य भविष्य निधि खातों से विशेष कारणों से अग्रिम तथा आंशिक अंतिम प्रत्याहरण की स्वीकृति के अधिकार संबंधित विभाग के जनपद-स्तर पर तैनात, वरिष्ठतम आहरण एवं वितरण अधिकारियों को प्रतिनिधानित कर दिए गए हैं। इस व्यवस्था के क्रम में अपने अधिकारों का प्रयोग करते समय संबंधित डी0डी0ओ0 कार्यालयाध्यक्षों द्वारा जी0पी0एफ0 के खातों के समुचित रख-रखाव की व्यवस्था सुनिश्चित करवाएंगे तथा इस प्रयोजनार्थ समय-समय पर इनसे संबंधित लेखों का परीक्षण भी करेंगे।

(iii) यदि अभिदाता स्वयं को स्वीकृत किये जाने वाले किसी अग्रिम का स्वीकर्ता अधिकारी हो तो वह अग्रिम के लिए अगले उच्चतर अधिकारी की स्वीकृति प्राप्त करेगा।

(iv) राज्यपाल विशेष परिस्थितियों में सामान्य भविष्य निधि नियमावली के नियम 13 के उपनियम (2) के उप खण्ड (एक) से (सात) में उल्लिखित प्रयोजनों (जो आगे वर्णित किये गये हैं) से भिन्न प्रयोजन के लिये किसी अभिदाता को अग्रिम का भुगतान करने की स्वीकृति दे सकते हैं यदि राज्यपाल उसके समर्थन में दिये गये औचित्य से संतुष्ट हो जायें।

(ख) स्वीकृति की शर्तें

(i) निधि से अस्थायी अग्रिम उपरोक्तानुसार सक्षम प्राधिकारी के विवेक पर नियम संख्या 13 के उपनियम (2), (3), (4), (5), (6) या (7) में उल्लिखित शर्तों के अधीन रहते हुए किया जा सकता है।

(ii) कोई अग्रिम तब तक स्वीकृत नहीं किया जा सकता जब तक स्वीकर्ता प्राधिकारी का समाधान न हो जाये कि आवेदक की आर्थिक परिस्थितियां उसकों न्यायोचित ठहराती है और उसका उपयोग नियम संख्या 13(2) में वर्णित उसी उद्देश्य हेतु किया जायेगा जिसके सम्बन्ध में स्वीकृत किया गया हो न कि अन्यथा।

(ग) अग्रिम के उद्देश्य

अभिदाता/उसके परिवार के सदस्यों/उस पर वास्तव में आश्रित किसी अन्य व्यक्ति के सम्बन्ध में निधि से अग्रिम स्वीकृत किया जा सकता है। अग्रिम के प्रयोजनों का वर्णन नियम 13(2) में किया गया है जिसका विवरण आगे दिया जा रहा है :

नियम 13 -

"(2) : कोई अग्रिम तब तक स्वीकृत नहीं किया जायेगा जब तक स्वीकृति प्राधिकारी का समाधान न हो जाय कि आवेदक की आर्थिक परिस्थितियां उसको न्यायोचित ठहराती हैं और कि उसका व्यय निम्नलिखित उद्देश्य या उद्देश्यों पर न कि अन्यथा किया जायेगा, अर्थात्

(एक) बीमारी, प्रसवावस्था या विकलांगता के सम्बन्ध में व्यय जिसके अंतर्गत, जहां आवश्यक हो, अभिदाता, उसके परिवार के सदस्यों या उस पर वास्तव में आश्रित किसी अन्य व्यक्ति का यात्रा व्यय भी है, की पूर्ति पर;

(दो) उच्च शिक्षा व्यय की पूर्ति पर, जिसके अंतर्गत, जहां आवश्यक हो, अभिदाता, उसके परिवार के सदस्यों या उस पर वास्तव में आश्रित किसी अन्य व्यक्ति का निम्नलिखित दशाओं में यात्रा व्यय भी है अर्थात् -

(क) हाईस्कूल स्तर के बाद शैक्षिक प्राविधिक, वृत्तिक या व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिये भारत के बाहर शिक्षा, और

(ख) हाईस्कूल स्तर के बाद भारत में चिकित्सा, अभियन्त्रण या अन्य प्राविधिक या विशेषित पाठ्यक्रम।

(तीन) अभिदाता की प्रास्थिति के अनुकूल पैमाने पर आबत्रकर व्यय की पूर्ति पर जिसे अभिदाता द्वारा रूढ़िगत प्रथा के अनुसार अभिदाता के विवाह के सम्बन्ध में या उसके परिवार के सदस्यों या उस पर वास्तविक रूप से आश्रित किसी अन्य व्यक्ति के विवाह, अन्त्येष्टि या अन्य गृहकर्म के सम्बन्ध में उपगत करना हो,

(चार) अभिदाता, उसके परिवार के किसी सदस्य या उस पर वास्तविक रूप से आश्रित किसी व्यक्ति द्वारा या उसके विरूद्ध संस्थित विधिक कार्यवाहियों के व्यय की पूर्ति पर,

(पाँच) अभिदाता के प्रतिवाद के व्यय की पूर्ति पर, जहां वह अपनी ओर से किसी तथाकथित पदीय कदाचार के संबंध में जाँच में अपना प्रतिवाद करने के लिए किसी विधि व्यवसायी की नियुक्ति करें।

(छ:) गृह या गृह स्थल के लिये या उसके निवास के लिये गृह निर्माण या उसके गृह के पुनर्निर्माण, मरम्मत या उसके परिवर्तन या परिवर्द्धन के लिये या गृह निर्माण योजना जिसके अंतर्गत स्ववित्तपोषित योजना भी है, के अधीन किसी विकास प्राधिकरण, स्थानीय निकाय, आवास परिषद या गृह निर्माण सहकारी समिति द्वारा उसे गृह स्थल या गृह के आवंटन के लिये भुगतान करने के लिये व्यय या उसके भाग की पूर्ति पर,

(सात) अभिदाता के उपयोग के लिये मोटर साईकिल, स्कूटर (मोपेड भी सम्मिलित हैं), साईकिल, रेफ्रिजरेटर, रूमकूलर, कुकिंग गैस या टेलीविजन सेट की लागत के व्यय की पूर्ति पर ।

परन्तु राज्यपाल विशेष परिस्थितियों में नियम 13(2) के उपर्युक्त उपखण्ड (एक) से (सात) में उल्लिखित प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजन के लिय भी किसी अभिदाता को अग्रिम भुगतान करने की स्वीकृति दे सकते हैं यदि राज्यपाल उसके समर्थन में दिये गये औचित्य से संतुष्ट हो जाये।"

अग्रिम (जिसके लिये विशेष कारण अपेक्षित न हों) की वसूली बराबर मासिक किश्तों में की जाएगी जो 12 से कम (जब तक अभिदाता ऐसा न चाहे) और 24 से अधिक नहीं होगी। कोई अभिदाता अपने विकल्प पर एक मास में एक से अधिक किस्तों का भुगतान कर सकता है। किस्तों का निर्धारण इस प्रकार किया जाना चाहिये कि पूरी वसूली सेवानिवृत्ति के छ: माह पहले तक वसूल हो जाय। (नियम 14 (1)) वसूली जिस माह में अग्रिम आहरित किया गया हो उसके अनुवर्ती मास के वेतन दिये जाने से प्रारम्भ होगी।(नियम 14 (2))

(घ) विशेष कारणों से अस्थायी अग्रिम

यदि अभिदाता द्वारा आवेदित धनराशि तीन मास के वेतन अथवा सामान्य भविष्य निधि में जमा धनराशि के आधे (जो भी कम हो) से अधिक है अथवा धनराशि की इस सीमा के अन्तर्गत रहते हुये भी समस्त पूर्ववर्ती अग्रिमों का अंतिम प्रतिदान करने के पश्चात बारह मास व्यतीत न हुये हों तो आवेदित अस्थायी अग्रिम विशेष कारणों से अस्थायी अग्रिम कहलायेगा। परन्तु जब तक पहले से दी गयी किसी अग्रिम धनराशि तथा अपेक्षित नयी अग्रिम धनराशि का योग प्रथम अग्रिम की स्वीकृति के समय अभिदाता के तीन मास के वेतन या निधि में जमा धनराशि के आधे (जो भी कम हो) से अधिक न हो तब तक द्वितीय अग्रिम या अनुवर्ती अग्रिमों की स्वीकृति के लिये विशेष कारणों की अपेक्षा नहीं की जायेगी। अत: कोई उद्देश्य या प्रयोजन किसी अग्रिम को सामान्य या विशेष नहीं बनाते हैं अपितु सामान्य परिस्थितियों में उल्लिखित किसी एक अथवा दोनो शर्तों की पूर्ति न होने पर अस्थायी अग्रिम विशेष कारणों से अस्थायी अग्रिम कहलाता है। (नियम 13(4))

जब किसी पूर्ववर्ती अग्रिम की अंतिम किश्त के प्रतिदान की पूर्ति के पूर्व ही विशेष कारणों के अंतर्गत कोई अगला अग्रिम स्वीकृत किया जाये तो पूर्ववर्ती अग्रिम के वसूल न किये गये शेष को इस प्रकार स्वीकृत अग्रिम में जोड़ दिया जायेगा और वसूली की किश्तें संहत धनराशि के निदेश में होंगी।

विशेष कारणों से अस्थायी अग्रिम की वसूली 24 से अधिक किन्तु अधिकतम 36 बराबर मासिक किश्तों में की जा सकती है। वसूली विलम्बतम अभिदाता की सेवानिवृत्ति या अधिवर्षता की तिथि के 6 माह पूर्व तक पूरी हो जाए, इस प्रकार से किस्तों का निर्धारण करना चाहिये। कोई अभिदाता एक माह में एक से अधिक किस्तों का भुगतान कर सकता है। वसूली जिस माह में अग्रिम आहरित किया जाय उसके अनुवर्ती माह के वेतन दिये जाने से प्रारम्भ की जायेगी।

(ङ) साधारणतया अभिदाता को कोई अग्रिम उसकी अधिवर्षता या सेवानिवृत्ति के पूर्ववर्ती अंतिम छ: माह के दौरान स्वीकृत नहीं किया जायेगा। यदि अपरिहार्य हो तो नियम 13 (7) की प्रक्रिया के अनुसार स्वीकृत किया जा सकता है। (नियम 13 (7))

(च) अग्रिम का दोषपूर्ण उपयोग : नियम 15

इस नियमावली में किसी बात के होते हुए भी, यदि स्वीकृति प्राधिकारी को समाधान हो जाय कि नियम-13 के अधीन निधि से अग्रिम के रूप में आहरित धनराशि का उपयोग उस प्रयोजन से, जिसके लिए स्वीकृति अभिलिखित की गयी हो, भिन्न प्रयोजन के लिए किया गया हो तो वह अभिदाता को निधि में प्रश्नगत धनराशि का प्रतिदान तुरन्त करने का निदेश देगा, या चूक करने पर अभिदाता की परिलब्धियों से एक मुश्त कटौती करने/वसूल करने का आदेश देगा और यदि प्रतिदान की जाने वाली कुल धनराशि अभिदाता की परिलब्धियों के आधे से अधिक हो तो वसूली ऐसी मासिक किश्तों में की जायेगी जैसी अवधारित की जाय।

11. निधि से अंतिम प्रत्याहरण (Non Refundable Final Withdrawal)
(नियम 16, 17 एवं 18)

(क) स्वीकर्ता प्राधिकारी एवं धनराशि की सीमा -

निधि से अंतिम प्रत्याहरण की स्वीकृति विशेष कारणों से अस्थाई अग्रिम स्वीकृत करने के लिये सक्षम प्राधिकारी द्वारा दी जा सकती है जिनका उल्लेख इस लेख में पूर्व में किया गया है।

अंतिम प्रत्याहरण की पात्रता हेतु भिन्न-भिन्न उद्देश्यों के सम्बन्ध में अलग-अलग सेवा अवधियां निर्धारित हैं।

अंतिम प्रत्याहरण हेतु धनराशि की सीमा, यदि अन्यथा उपबंधित न हो तो, साधारणतया उसके खाते में उपलब्ध धनराशि के आधे या उसके 6 माह के वेतन जो भी कम हो से अधिक नहीं होगी। विशेष मामलों में अभिदाता के सामान्य भविष्य निधि खाते में जमा धनराशि के तीन चौथाई (3/4) तक धनराशि स्वीकृत की जा सकती है। अन्यथा उपबंधित सीमाएं आगे के प्रस्तरों में वर्णित है।

(ख) सेवा अवधि के अनुसार प्रत्याहरण के प्रयोजनों की श्रेणियाँ :-

अलग-अलग सेवा अवधियों के आधार पर अंतिम प्रत्याहरण के प्रयोजनों को भिन्न-भिन्न श्रेणियों में रखा गया है जो नियम 16 (1) में निम्नवत वर्णित है :-

नियम 16 (1) इसमें विनिर्दिष्ट शर्तों के अधीन रहते हुए अन्तिम प्रत्याहरण जो प्रतिदेय नहीं होगा, नियम 13 के उपनियम (4) के अधीन विशिष्ट कारणों से अग्रिम स्वीकृत करने के लिये सक्षम प्राधिकारी द्वारा किसी भी समय निम्नलिखित प्रकार से स्वीकृत किया जा सकता है ;

(क) अभिदाता द्वारा बीस वर्ष की सेवा (जिसके अंतर्गत निलम्बन की अवधि, यदि उसके पश्चात बहाली हो गई हो, और सेवा की अन्य खण्डित अवधियां यदि कोई हों, भी हैं) पूरी करने या अधिवर्षता पर उसकी सेवा-निवृत्ति के दिनांक के पूर्ववर्ती दस वर्ष के भीतर, जो भी पहले हो, निधि में उसके जमा खाते में विद्यमान धनराशि से निम्नलिखित एक या अधिक प्रयोजनों के लिये अर्थात् -

(ए) निम्नलिखित मामलों में

(एक) हाईस्कूल के बाद शैक्षिक, प्राविधिक, वृत्तिक या व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिए भारत के बाहर शिक्षा, और

(दो) हाईस्कूल के बाद भारत में चिकित्सा, अभियंत्रण या अन्य प्राविधिक या विशेषित पाठ्यक्रम में, अभिदाता य अभिदाता के किसी आश्रित संतान के उच्चतर शिक्षा पर व्यय जिसके अंतर्गत जहां आवश्यक हो, यात्रा व्यय भी है, की पूर्ति के लिये,

(बी) अभिदाता के पुत्रों या पुत्रियों और उस पर वास्तविक रूप से आश्रित किसी अन्य संबंधी के विवाह के सम्बन्ध में व्यय की पूर्ति के लिए,

(सी) अभिदाता, उसके परिवार के सदस्यों या उस पर वास्तविक रूप से आश्रित किसी अन्य व्यक्ति की बीमारी, प्रसवावस्था या विकलांगता के सम्बन्ध में व्यय जिसके अंतर्गत, जहां आवश्यक हो, यात्रा व्यय भी है, की पूर्ति के लिये,

(ख) अभिदाता द्वारा बीस वर्ष की सेवा (जिसके अंतर्गत निलम्बन की अवधि, यदि उसके पश्चात बहाली हुई हो, और सेवा की अन्य खण्डित अवधियां यदि कोई हैं) पूरी करने या अधिवर्षता पर उसकी सेवा-निवृत्ति के दिनांक के पूर्ववर्ती दस वर्ष के भीतर, जो भी पहले हो, और वित्तीय हस्तपुस्तिका खण्ड पाँच भाग 1 में दिये गये नियमों के अधीन मोटरकार, मोटर साइकिल या स्कूटर (जिसके अंतर्गत मोपेड भी है) के क्रय के लिये, अग्रिम की पात्रता के लिए प्रवृत्त वेतन के सम्बन्ध में निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए, निधि में उसके जमाखाते में विद्यमान धनराशि से निम्नलिखित एक या अधिक प्रयोजनों के लिये, अर्थात् -

(एक) वित्तीय हस्तपुस्तिका खण्ड पाँच भाग 1 में दिये गये नियमों के अधीन मोटरकार, मोटर साइकिल या स्कूटर (जिसके अंतर्गत मोपेड भी है) के क्रय या इस प्रयोजन के लिए पहले से लिये गये अग्रिम के प्रतिदान के लिए,
(नियम 17 के उपनियम (1) के खण्ड (ख) के अनुसार अधिकतम सीमा रू0 50,000/-)
(नियम 16(1) की टिप्पणी 9 के अनुसार यदि वित्तीय हस्तपुस्तिका खण्ड पाँच भाग 1 के अधीन उसी प्रयोजन हेतु अग्रिम पूर्व में लिया जा चुका हो तब भी मोटरकार, मोटर साइकिल या स्कूटर (मोपेड सहित) के लिए प्रत्याहरण नियम 17 (1) (ख) की मौद्रिक सीमा के अंतर्गत दिया जा सकता है बशर्ते कि इन दोनो स्त्रोतो से कुल धनराशि प्रस्तावित वाहन की वास्तविक कीमत से अधिक न हो।)
(दो) उसकी मोटरकार, मोटर साइकिल या स्कूटर की व्यापक मरम्मत या उसके ओवरहाल के लिए,
(नियम 17 के उपनियम (1) के खंड (ग) के अनुसार अधिकतम सीमा 5,000/-)

(ग) अभिदाता द्वारा पन्द्रह वर्ष की सेवा (जिसके अंतर्गत निलम्बन की अवधि, यदि उसके पश्चात बहाली हुई हो, और सेवा की अन्य खण्डित अवधियाँ, यदि कोई हों, भी हैं) पूरी करने के पश्चात या अधिवर्षता पर उसकी सेवानिवृत्ति के दिनांक के पूर्ववर्ती दस वर्ष के भीतर जो भी पहले हो, अर्थात् -

(क) उसके आवास के लिये उपयुक्त गृह बनाने, या उपर्युक्त गृह या तैयार बने फ्लैट के अर्जन के लिए जिसके अंतर्गत स्थल का मूल्य भी है,

(ख) उसके आवास के लिये उपयुक्त गृह बनाने, या उपर्युक्त गृह या तैयार बने फ्लैट के अर्जन के लिए स्पष्ट रूप से लिये गये ऋण के मद्दे बकाया धनराशि का प्रतिदान करने के लिये,
(नियम 16(1) की टिप्पणी-7 के अनुसार इस हेतु प्रस्तावित धनराशि और उक्त खण्ड (क) के अधीन पूर्व प्रत्याहृत धनराशि यदि कोई हो, आवेदन पत्र प्रस्तुत करने के दिनांक को विद्यमान अतिशेष के 3/4 से अधिक नहीं होगी।)

नियम 16(1) की टिप्पणी 8 के स्पष्टीकरण-3 के अनुसार गृह निर्माण के प्रयोजन के लिये लिये गये किसी प्रकार के ऋण के, चाहे वह वित्तीय हस्तपुस्तिका खण्ड पाँच भाग 1 के अधीन सरकार से, या निम्न या. Iq‡;‡;Jq‡;M .. Iq‡;‡;Jq‡;M Bhs-1.Õjpgÿÿÿÿÿÿÿÿdena-Õbank-matDENA-B~1JPG Iq‡;;Kh‡; \Bhs-2.5jpgÿÿÿÿÿÿÿÿdena-5bank-matDENA-B~2JPG Iq‡;;®h‡; ¾¾Bhs-3.–jpgÿÿÿÿÿÿÿÿdena-–bank-matDENA-B~3JPG *Iq‡;;9i‡;– çkBhs-4.vjpgÿÿÿÿÿÿÿÿdena-vbank-matDENA-B~4JPG FIq‡;;’i‡;› Á(AThumb¤s.dbÿÿÿÿÿÿTHUMBS DB &mIq‡;;ØeŒ;Î šåmathsn .exeÿÿÿÿåATHS~1 EXEŠqXŽ;Ž;Çu£8ú¿¡fåmathsn .exeÿÿÿÿåATHS~1 EXE(ZŽ;Ž;Çu£8äÁ¡fåmathsn .exeÿÿÿÿåATHS~1 EXEÄ^Ž;Ž;Çu£8XÁ¡fåmathsn .exeÿÿÿÿåATHS~1 EXEgEg;;Çu£8ŠÁ¡fEO.pdfÿÿÿÿÿÿÿÿÿÿÿÿÿÿper-of-Bank-Pe-Aptitude-Pad-Quantitativ7087363-Solve708736~1PDF T;;q^Œ;Q DBestioŽn.pdfÿÿÿÿbank Žquant quBANKQU~1PDF LT;;NcŒ;w çFBort_cnut.pdfÿÿbank nquant shBANKQU~2PDF vT;;„bŒ;‚ ÂÛBlved.Npdfÿÿÿÿÿÿÿÿbank Nquant soBANKQU~3PDF ŒT;;¡^Œ;Ž Bude-X]LRI.pdfQuant]ityAptitQUANTI~1PDF #U;;ÎeŒ;‘ ‡Dank-P&O.pdfÿÿÿÿde-Pa&per-of-Btativ&e-AptituSolve&d-QuantiSOLVED~1PDF HU;;ÔeŒ;œ DAmathsn .exeÿÿÿÿMATHS~1 EXE ½‡z;;Çu£8LÆ¡fåATHS EXEuw;;Ç ;×ɼ 25;ी भूमि (farm land) या कारोबार परिसर (business premises) या दोनो का अर्जन करने (aquiring) के प्रयोजन के लिये।

निधि में प्रत्याहरण विषयक अन्य महत्वपूर्ण बिन्दु

1- एक प्रयोजन के लिये केवल एक प्रत्याहरण की अनुमति दी जाएगी किन्तु निम्नलिखित को एक ही प्रयोजन नहीं समझा जायेगा :

(क) विभिन्न संतानों का विवाह

(ख) विभिन्न अवसरों पर बीमारी

(ग) गृह या फ्लैट में ऐसा अग्रेतर परिवर्तन या परिवर्द्धन जो गृह/फ्लैट के क्षेत्र की नगरपालिका, निकाय द्वारा सम्यक रूप से अनुमोदित नक्शे के अनुसार हो

(घ) जीवन बीमा की पालिसियों के प्रीमियम/प्रीमिया के भुगतान

(ङ) विभिन्न वर्षों में संतानों की शिक्षा

(च) यदि अभिदाता को क्रय किये गये स्थल या गृह या फ्लैट के लिए या किसी योजना के अधीन जिसके अंतर्गत विकास प्राधिकरण, आवास विकास परिषद स्थानीय निकाय या गृह निर्माण सहकारी समिति की स्व-वित्त पोषित योजना भी है, निर्मित गृह या फ्लैट का भुगतान किश्तों में किया जाना है तो अंतिम प्रत्याहरण किस्तों में स्वीकृत होगा और प्रत्येक किस्त को अलग प्रयोजन माना जायेगा।

(छ) एक ही गृह को पूरा करने के लिये 16(1) ग के उपखण्ड (क) या (ख) के अधीन द्वितीय या अनुवर्ती प्रत्याहरण की अनुमति 16 (1) की टिप्पणी 5 के अधीन दी जाएगी।

यदि दो या अधिक विवाह साथ-साथ सम्पन्न किये जाने हों तो प्रत्येक विवाह के संबंध में अनुमन्य धनराशि का अवधारण उसी प्रकार किया जायेगा, मानों एक के पश्चात दूसरा प्रत्याहरण पृथक-पृथक स्वीकृत किया गया हो।

2- नियम 16(1) की टिप्पणी-6 में व्यवस्था दी गई है कि नियम 16(1) के खण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों (भूमि, भवन, फ्लैट आदि से संबंधित) के लिये प्रत्याहरण स्वीकृत करने से पहले स्वीकृति अधिकारी निम्नलिखित का समाधान करेगा -

(एक) धनराशि अभिदाता द्वारा अपेक्षित प्रयोजनों के लिए वास्तव में अपेक्षित है।

(दो) अभिदाता का प्रस्तावित स्थल पर कब्जा है या तुरन्त उस पर गृह निर्माण करने का अधिकार अर्जित करना चाहता है,

(तीन) प्रत्याहृत धनराशि और ऐसी अन्य बचत, यदि कोई हो, जो अभिदाता की हो, प्रस्तावित प्रकार के गृह अर्जन या मोचन के लिए पर्याप्त होगी।

(चार) गृह स्थल, गृह या तैयार बने फ्लैट के क्रय के लिए प्रत्याहरण के मामले में अभिदाता गृह स्थल, गृह या फ्लैट जिसके अंतर्गत स्थल भी है, पर निर्विवाद हक प्राप्त करेगा।

(पाँच) उपर्युक्त (चार) में निर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए अभिदाता ने ऐसे आवश्यक विलेख-पत्र और कागजात स्वीकृति अधिकारी को प्रस्तुत कर दिये हैं जिससे प्रश्नगत सम्पत्ति के संबंध में उसका हक साबित हो।

3- गृह स्थल, फ्लैट आदि विषयक नियम 16(1)(ग) में वर्णित प्रयोजनों हेतु प्रत्याहरण का आवेदन करते समय एवं स्वीकृति के समय नियम 16(1) की टिप्पणी 1, 2, 4, 5, 6, 7 एवं 8, नियम 17(1) एवं उसकी टिप्पणी 1 एवं 2क, नियम 17(2) तथा इसकी टिप्पणी 2 एवं 3 एवं सुसंगत प्राविधानों का सावधानीपूर्वक अध्ययन कर लेना चाहिए जिनके मुख्य बिन्दु इस प्रकार है :

यदि अभिदाता ने वित्तीय हस्तपुस्तिका खण्ड पाँच भाग 1 में दिये गये नियमों के अधीन गृह निर्माण अग्रिम का लाभ ले रखा हो या उसे इस संबंध में किसी अन्य सरकारी स्त्रोत से कोई सहायता प्राप्त हो चुकी हो तब भी उसे नियम 16(1) के खण्ड (ग) के उपखण्ड (क), (ग), (घ) और (च) के प्रयोजनों हेतु नियम 17 (1) में विनिर्दिष्ट सीमा तक उपर्युक्त नियमों के अधीन लिये गये किसी ऋण के प्रतिदान के प्रयोजन से अंतिम प्रत्याहरण स्वीकृत किया जा सकता है। (नियम 16 (1) की टिप्पणी 4)

ऐसा गृह, फ्लैट या गृह के लिये स्थल जिसके लिये उपर्युक्तानुसार धनराशि के प्रत्याहरण का प्रस्ताव हो, अभिदाता के ड्यूटी के स्थान पर या सेवानिवृत्ति के पश्चात उसके आवास के अभिप्रेत स्थान पर स्थित होगा।
यदि अभिदाता के पास कोई पैतृक गृह है या उसने सरकार से लिये गये ऋण की सहायता से ड्यूटी से भिन्न स्थान पर गृह का निर्माण कर लिया है तो वह अपनी ड्यूटी के स्थान पर किसी गृह स्थल के क्रय के लिये या किसी अन्य गृह के निर्माण के लिये या तैयार बने फ्लैट का अर्जन करने के लिये नियम 16 (1) के खण्ड (ग) के उपखण्ड (क), (ग) और (च) के प्रयोजनों हेतु अंतिम प्रत्याहरण स्वीकृत किया जा सकता है।
(नियम 16 (1) की टिप्पणी 5)

नियम 16 (1) के खण्ड (ग) के उपखण्ड (क), (घ) के अधीन प्रत्याहरण की अनुमति उस स्थल में भी दी जाएगी जब गृह स्थल या गृह पत्नी या पति के नाम में हो यदि वह अभिदाता द्वारा भविष्य निधि के नामांकन में प्रथम नामांकिती हो। (नियम 16 (1) की टिप्पणी 8)

जब अभिदाता संयुक्त संपत्ति में ऐसे अंश से भिन्न जो स्वतंत्र आवासीय प्रयोजन के लिये उपयुक्त न हो पहले से किसी गृह स्थल या गृह फ्लैट का स्वामी हो, वहाँ उसे यथास्थिति, गृह स्थल या गृह फ्लैट के क्रय, निर्माण, अर्जन या मोचन के लिये कोई प्रत्याहरण स्वीकृत नहीं किया जायेगा।
(नियम 16(1) की टिप्पणी 8 का स्पष्टीकरण-1)

स्थानीय निकायों से पट्टे पर किसी भूखण्ड के अर्जन या ऐसे भूखण्ड पर गृह निर्माण करने के लिये भी प्रत्याहरण की अनुमति दी जा सकेगी।
(नियम 16 (1) की टिप्पणी 8 का स्पष्टीकरण-2)

नियम 17 (1) की टिप्पणी 1 के अनुसार गृह निर्माण हेतु प्रत्याहरण की स्वीकृति प्रत्याहरण की सम्पूर्ण धनराशि के लिये जारी की जाएगी और यदि आहरण किस्तों में किया जाना हो तो उसकी संख्या स्वीकृति आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएगी।

4- नियम 17 (3) के अनुसार कोई अभिदाता जिसे, नियम 16 (1) के खण्ड (ग) के उपखण्ड (क), (ख) या (ग) के अधीन निधि में अपने जमा खाते में विद्यमान धनराशि से धन के प्रत्याहरण की अनुज्ञा दी गई हो, राज्यपाल की पूर्व अनुज्ञा के बिना इस प्रकार प्रत्याहृत धनराशि से निर्मित या अर्जित किये गये गृह या क्रय किये गये गृह स्थल के कब्जे से, चाहे विक्रय, गिरवी (राज्यपाल को गिरवी से भिन्न) दान, विनिमय द्वारा या अन्य प्रकार से अलग नहीं होगा (shall not part with the possession of the house built or acquired or house site purchased with the money so withdrawn, whether by way of sale, mortgage (other than mortgage to the Governor), gift, exchange or otherwise, without permission of the Governor) :-

परन्तु ऐसी अनुज्ञा -

(एक) तीन वर्ष से अनधिक किसी अवधि के लिये पट्टे पर दिये गये गृह या गृह स्थल के लिये, या

(दो) आवास परिषद, विकास प्राधिकरण, स्थानीय निकाय, राष्ट्रीयकृत बैंक, जीवन बीमा निगम के या केन्द्रीय या राज्य सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी अन्य निगम के जो नये गृह के निर्माण के लिये या किसी वर्तमान गृह में परिवर्द्धन या परिवर्तन करने के लिये ऋण देता हो, पक्ष में उसके गिरवी रखे जाने के लिये आवश्यक नहीं होगी।

5- नियम 17(2) के अनुसार अभिदाता, जिसको नियम 16 के अधीन प्रत्याहरण की अनुमति दी गई हो, स्वीकृति प्राधिकारी का ऐसी युक्तियुक्त अवधि के भीतर, जो उस प्राधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट की जाय, समाधान करेगा कि धन का प्रयोग उस प्रयोजन के लिये कर लिया गया है जिसके लिये उसका प्रत्याहरण किया गया था। नियम 17 के उपनियम (2) की टिप्पणियों में कुछ प्रयोजनों के लिए उपयोग की अवधियाँ निर्धारित की गयी है :-
प्रत्याहरण का प्रयोजन उपयोग की अवधि
क- विवाह तीन मास के भीतर
ख- गृह निर्माण गृह का निर्माण धनराशि के प्रत्याहरण के 6 मास के भीतर प्रारम्भ कर दिया जायेगा। और निर्माण प्रारम्भ होने के एक वर्ष के अन्दर पूरा हो जाना चाहिए।
ग- गृह का क्रय या मोचन या इस प्रयोजन के लिये पूर्व लिये गए प्राइवेट ऋण का प्रतिदान प्रत्याहरण के तीन मास के भीतर
घ- गृह स्थल का क्रय प्रत्याहरण या प्रथम किस्त के प्रत्याहरण के एक माह के भीतर/उपयोग प्रतीक स्वरूप विक्रेता गृह निर्माण समिति आदि द्वारा दी गयी रसीदें प्रस्तुत करने की अपेक्षा स्वीकर्ता अधिकारी करेगा।
ङ- बीमा पालिसी के लिये प्रत्याहरण उस दिनांक तक जिस दिनांक का प्रीमियम का भुगतान किया जाना हो। जीवन बीमा निगम द्वारा दी गई रसीद की प्रमाणित या फोटोस्टेट प्रस्तुत न करने पर इस हेतु अग्रेतर प्रत्याहरण नहीं दिया जायेगा।

यदि अभिदाता स्वीकृति अधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट युक्तियुक्त अवधि में प्रत्याहरण की धनराशि का उपयोग प्रत्याहरण के प्रयोजन पर किये जाने के बारे में, स्वीकर्ता प्राधिकारी का समाधान करने में विफल रहता है तो सम्पूर्ण प्रत्याहृत धनराशि या उसका वह भाग जिसका स्वीकृति के प्रयोजन पर उपयोग नही किया गया है अभिदाता द्वारा निधि में एक मुश्त प्रतिदान की जाएगी और ऐसा न करने पर स्वीकर्ता अधिकारी उसकी परिलब्धियों से एक मुश्त या मासिक किस्तों की ऐसी संख्या में जो अवधारित की जाय वसूल करने के आदेश दिया जायेगा।

(नियम 17(2))

6- साधारणतया किसी अभिदाता की अधिवर्षता पर उसकी सेवानिवृत्ति के पूर्ववर्ती अन्तिम 6 मास के दौरान कोई प्रत्याहरण स्वीकृत नही किया जायेगा। विशेष मामले में यदि अपरिहार्य हो तो स्वीकृति प्राधिकारी लेखाधिकारी को तथा समूह "घ" से भिन्न अभिदाताओं के मामले में आहरण एवं वितरण अधिकारी को भी तुरन्त अधिसूचित किया जाना सुनिश्चित करेंगे और उनसे पावती अविलम्ब प्राप्त करेंगे। वे यह भी सुनिश्चित करेंगे कि प्रत्याहरण की धनराशि नियम 24 के उपनियम (4) या उपनियम (5) के खण्ड (ख) के अंतर्गत अंतिम भुगतान के प्रति सम्यक रूप से समायोजित हो जाय।

7- यदि नियम 13 के अधीन कोई अग्रिम उसी प्रयोजन के लिये और उसी समय स्वीकृत किया जा रहा हो तो नियम 16 के अंतर्गत प्रत्याहरण स्वीकृत नहीं किया जायेगा।
(नियम 16(1) की टिप्पणी 11(1))

8- अग्रिम का प्रत्याहरण में परिवर्तन नियम - 18

यदि किसी अभिदाता ने किसी ऐसे प्रयोजन के लिये पहले ही अग्रिम आहरित कर लिया हो जिसके लिये अंतिम प्रत्याहरण भी नियम 16 में अनुमन्य हो और वह लिखित अनुरोध करे तो विशेष कारणों से अग्रिम स्वीकृत करने के लिये सक्षम अधिकारी नियम 16 और 17 में निर्धारित शर्तों के पूरा करने पर अग्रिम के देय अतिशेष को प्रत्याहरण में परिवर्तित कर सकते है। प्रत्याहरण में परिवर्तित किये जाने वाले अग्रिम की धनराशि नियम 17(1) में निर्धारित सीमा से अधिक नही होगी और इस प्रयोजन के लिये परिवर्तन के समय अभिदाता के खाते में विद्यमान अतिशेष तथा अग्रिम की बकाया धनराशि को निधि में उसके जमा खाते में विद्यमान अतिशेष समझा जाएगा। प्रत्येक प्रत्याहरण को एक पृथक प्रत्याहरण समझा जाएगा और यही सिद्धान्त एक से अधिक परिवर्तनों की दशा में भी लागू होगा।

12. अन्तिम भुगतान (नियम संख्या-20, 21, 22 एवं 24)

(क) दशाएँ - जब

अभिदाता सेवानिवृत्त हो जाये।

अभिदाता की मृत्यु हो जाये।

अभिदाता सेवा छोड़ दे।

अभिदाता को सक्षम चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा सेवा के आयोग्य ठहरा दिया जाय।

अभिदाता को सेवा से निकाल दिया जाय।

(ख) अंतिम भुगतान की जा चुकी धनराशि की वापसी
(i) किसी अभिदाता के सेवा से पदच्युत जाने (dismissal) के बाद सेवा में पुन: वापस लिये जाने के प्रकरण में यदि सरकार अपेक्षा करे तो अभिदाता अंतिम भुगतान की धनराशि एक मुश्त या किश्तों में वापस करेगा, जो उसके खाते में जमा की जाएगी। (नियम 20 का परन्तुक)

(ii) यदि अवकाश पर रहते हुए किसी अभिदाता को सेवानिवृत्त होने की अनुमति दी गई हो या सक्षम चिकित्साधिकारी द्वारा आगे की सेवा के लिए अयोग्य घोषित किया गया हो और वह सेवा में वापस आ जाये तो अपनी इच्छा पर अन्तिम भुगतान की धनराशि निधि में वापस जमा कर सकता है। (नियम 21(ख))

(ग) जब कोई अभिदाता सेवा छोड़ता है तब निधि में उसके जमा खाते में विद्यमान धनराशि उसको देय हो जायेगी। (नियम 20)

(घ) अभिदाता सेवा छोड़ने के बाद केन्द्रीय सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार या किसी उपक्रम के अधीन किसी नए पद पर किसी क्रमभंग सहित या रहित नियुक्ति प्राप्त कर लेता है तो उसके अभिदानों की समस्त धनराशि तथा उस पर प्रोदभूत ब्याज को, यदि वह ऐसा चाहे, उसके नए भविष्य निधि लेखा में अंतरित किया जा सकेगा, यदि, यथास्थिति सम्बद्ध सरकार या उपक्रम भी ऐसे अंतरण के लिये सहमत हों। किन्तु यदि अभिदाता ऐसे अंतरण के लिये विकल्प न करे या सम्बद्ध सरकार या उपक्रम उसके लिये सहमत न हो तो उपर्युक्त धनराशि अभिदाता को वापस कर दी जाएगी।

(नियम 20 का द्वितीय परन्तुक)

(ङ) अभिदाता की मृत्यु हो जाने पर अन्तिम भुगतान (नियम 22)

यदि अभिदाता की मृत्यु खाते के अतिशेष के देय हो जाने के पूर्व या देय हो जाने के बाद किन्तु भुगतान होने के पूर्व हो जाय तो भुगतान निम्नानुसार किया जाएगा

(i) यदि नामांकन है तो वह धनराशि जिसका नामांकन किया गया है, नामांकन के अनुसार भुगतान की जायेगी।
(ii) यदि सम्पूर्ण धनराशि का या उसके किसी अंश का नामांकन नहीं है तो वह धनराशि जिसके सम्बन्ध में नामांकन उपलब्ध नहीं है, परिवार के सदस्यों के बीच बराबर-बराबर बांट दी जायेगी किन्तु यदि परिवार के सदस्यों की निम्नवत वर्णित श्रेणियों, (1) से (4) के अतिरिक्त परिवार में अन्य कोई सदस्य है तो निम्नलिखित का कोई हिस्सा नहीं लगाया जायेगा -

(1) अभिदाता के वयस्क पुत्र

(2) अभिदाता की वे विवाहित पुत्रियाँ, जिनके पति जीवित हों।

(3) अभिदाता के मृत पुत्र के वयस्क पुत्र।

(4) अभिदाता के मृत पुत्र की वे विवाहित पुत्रियाँ, जिनके पति जीवित हों।
परन्तुक यह भी है कि यदि मृत अभिदाता का उससे पूर्व मृत्यु को प्राप्त हो चुका पुत्र अभिदाता की मृत्यु के समय तक जीवित रहा होता और तत्समय अवयस्क रहा होता तो उसकी विधवा या विधवाओं को तथा बच्चे या बच्चों को केवल उस भाग का बराबर-बराबर हिस्सा मिलेगा जो अभिदाता की मृत्यु के समय जीवित रहे होने पर मृतक पुत्र को मिलता।

(iii) परिवार न हो तो अनामांकित धनराशि के सम्बन्ध में सामान्य भविष्य निधि ऐक्ट 1925 की धारा-4 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) और खण्ड (ग) के उपखण्ड (दो) के सुसंगत उपबंधों के अनुसार कार्यवाही की जायेगी।

(च) अंतिम भुगतान की प्रक्रिया (नियम संख्या 24)

अंतिम भुगतान की प्रक्रिया में सामान्य भविष्य निधि (उ0प्र0) (द्वितीय संशोधन) नियमावली-2000 द्वारा संशोधन किये गये हैं। संशोधन के अनुसार, अब आहरण एवं वितरण अधिकारी अंतिम भुगतान हेतु प्रपत्र 425 क (समूह 'घ' के अतिरिक्त अन्य अभिदाताओं हेतु) या 425 ख (समूह 'घ' के अभिदाताओं हेतु) पर आवेदन की प्रतीक्षा किये बिना ही अभिदाता के खाते की वर्तमान तथा 5 पूर्ववर्ती वर्षों की आगणन शीट तैयार करेंगे। समूह घ से भिन्न अभिदाताओं के मामले में 2 प्रतियों में आगणन शीट, जाँचकर्ता अधिकारी (विभागाध्यक्ष से सम्बद्ध लेखा के वरिष्ठतम अधिकारी या ऐसे अधिकारी न हों तो जिले के कोषागार के प्रभारी अधिकारी) को, सामान्य भविष्य निधि पासबुक के साथ प्रेषित करेंगे। विभागाध्यक्ष से सम्बद्ध लेखा के वरिष्ठतम अधिकारी जांच का कार्य अपने अधीनस्थ वित्त एवं लेखा सेवा के अधिकारी को सौंप सकते हैं। जाँचकर्ता अधिकारी जाँच पूरी करके सामान्य भविष्य निधि पासबुक में अवशेष 90 प्रतिशत के भुगतान हेतु अपनी संस्तुति के साथ प्रकरण विशेष कारणों से अग्रिम के स्वीकर्ता अधिकारी को, एक माह के अन्दर प्रेषित कर देंगे। यदि कोई आपत्ति होगी तो वे आहरण एवं वितरण अधिकारी से उसका निराकरण करने को कहेंगे, जिन्हें तत्परता पूर्वक निराकरण कर देना चाहिये। स्वीकर्ता अधिकारी तदोपरान्त निर्धारित प्रपत्र पर 90 प्रतिशत के भुगतान के आदेश पारित करके आहरण एवं वितरण अधिकारी तथा कोषाधिकारी को समय से उपलब्ध करा देंगे ताकि अंतिम भुगतान अधिवर्षता पर सेवानिवृत्ति के मामले में सेवानिवृत्ति की तिथि को तथा अन्य मामलों में देय होने की तिथि के तीन माह के अन्दर मिल जाये। स्वीकर्ता अधिकारी 90 प्रतिशत के भुगतान के आदेश की एक प्रति के साथ आगणन शीट और सामान्य भविष्य निधि पासबुक भी लेखाधिकारी को भेजेंगे ताकि वे अभिदाता के खाते में अवशेष धनराशि (जमा सम्बद्ध बीमा योजना का समायोजन यदि कोई हो तो करते हुये) भुगतान हेतु प्राधिकृत कर सकें। यह अग्रसारण अधिवर्षता पर सेवानिवृत्ति के मामले में सेवानिवृत्ति के तीन माह पूर्व तथा अन्य मामलों में बिना अपरिहार्य विलम्ब के किया जाना चाहिये। लेखा अधिकारी अवशिष्ट धनराशि के भुगतान के आदेश समाधान एवं समायोजनोपरांत देंगे ताकि पाने वाला अधिवर्षता पर सेवानिवृत्ति के मामले में सेवानिवृत्ति के दिनांक को या उसके पश्चात यथासम्भव शीघ्र किन्तु ऐसे दिनांक के 3 माह के भीतर ही और अन्य मामलों में धनराशि देय होने के दिनांक से 3 माह के भीतर भुगतान प्राप्त कर सके।

समूह घ के अभिदाता के मामले में आहरण एवं वितरण अधिकारी प्रपत्र 425 ख में आवेदन की प्रतीक्षा किये बिना, समायोजन यदि कोई हो, के अधीन रहते हुए अभिदाता के सामान्य भविष्य निधि पास बुक में उसके नाम विद्यमान धनराशि का भुगतान अधिवर्षता पर सेवानिवृत्ति के मामले में सेवानिवृत्ति के दिनांक को और अन्य मामलों में धनराशि देय होने के दिनांक से 3 मास के भीतर करेंगे।

(छ) ऐसी धनराशियाँ जिनका भुगतान इस नियमावली के अधीन भुगतान प्राधिकार पत्र जारी करने के पश्चात छ: मास के भीतर नहीं लिया गया हो वर्ष के अंत में निक्षेप खाते में अंतरित कर दी जाएगी और उसके संबंध में निक्षेपों से संबंधित सामान्य नियम लागू होंगे।। निक्षेप का संबंधित लेखाशीर्षक निम्नवत है :-

8443- सिविल जमा 124- सामान्य भविष्य निधि में अदावाकृत जमा

13. ब्याज (नियम 11)

(क) यदि कोई अभिदाता मना न कर दे तो वर्ष की अंतिम तिथि को, उ0प्र0 सरकार द्वारा - भारत सरकार द्वारा निर्धारित दरों पर ब्याज, अभिदाता के खाते में जमा किया जायेगा। कोई अभिदाता यदि आहरण एवं वितरण अधिकारी को सूचित कर दे कि उसकी इच्छा ब्याज लेने की नहीं है तो उसके खाते में ब्याज जमा नहीं किया जायेगा। किन्तु वह अभिदाता जिसने ब्याज लेने से मना कर दिया था, बाद में पुन: ब्याज लेने की मांग करे तो मांग करने के वर्ष की पहली तिथि से उसके खाते पर ब्याज देना प्रारम्भ कर दिया जायेगा।

(ख) ब्याज की गणना करते समय विगत वर्ष के अंतिम शेष पर वर्तमान वर्ष के अंत तक का तथा विगत वर्ष की अंतिम तिथि के बाद वर्तमान वर्ष में जमा धनराशि पर जमा की तिथि से वर्तमान वर्ष के अंत तक का ब्याज वर्ष के अंत में अभिदाता के भविष्य निधि खाते में जमा किया जाता है। वर्ष के बीच में अवशेष धनराशि देय हो जाने की तिथि तक का ही ब्याज दिया जाएगा। किसी अंडरटेकिंग में प्रतिनियुक्त अभिदाता के वहां पूर्वगामी तिथि से संविलीन होने की दशा में संविलयन आदेश निर्गत होने की तिथि तक का ब्याज दिया जायेगा। वर्तमान वर्ष में आहरित धनराशि के आहरण के माह के प्रथम दिन से ब्याज नहीं दिया जाता है। ब्याज का पूर्णांकन पूर्ण रूपयों में ही किया जाता है।

(ग) ब्याज की गणना हेतु अभिदान या अन्य जमा किस तिथि से जमा माने जायेंगे, इस सम्बन्ध में स्थिति नियम संख्या 11(3) में बताई गई है। परिलब्धियों से काटकर निधि में जमा की गई धनराशि के मामले में परिलब्धियाँ जिस माह से सम्बंधित हैं, उसके अगले माह की पहली तारीख से ब्याज दिया जायेगा भले ही वास्तवित भुगतान ऐसे अगले माह में न होकर उसके पहले या बाद में किया गया हो। मँहगाई भत्ता अवशेष, वेतन समिति/आयोग की संस्तुतियों के अनुसार वेतन अवशेष आदि से कटौती के द्वारा सामान्य भविष्य निधि में जमा के प्रकरणों में जमा माने जाने की तिथि संबंधित शासनादेश में दी रहती है।

14. सामान्य भविष्य निधि अभिलेख व उनका रखरखाव (नियम 6, 27 एवं 28)

(क) प्रत्येक अभिदाता के नाम एक खाता खोलकर उसके वार्षिक लेखे में निम्नलिखित को दर्शाया जाता है :-

प्रारंभिक शेष

उसके अभिदान

समय-समय पर सरकार के निर्देशानुसार जमा की गई अन्य विशेष जमा धनराशियाँ

निधि से लिये गये अग्रिम की वापसी

ब्याज

निधि से निकाले गये अग्रिम एवं अंतिम प्रत्याहरण

अंतिम अवशेष

(ख) आहरण एवं वितरण अधिकारी भविष्य निधि के अभिदातावार लेखे लेजर एवं पास बुक में रखते हैं। लेजर में प्रत्येक अभिदाता के एक वर्ष के लेखे के लिये एक पृष्ठ आवंटित किया जाता है। आहरण एवं वितरण अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि वेतन बिल के साथ जो सामान्य भविष्य निधि शिड्यूल संलग्न किया जाता है उसकी एक कार्यालय प्रति रखी जाय और उस कार्यालय प्रति से प्रत्येक माह की 5 तारीख तक प्रत्येक अधिकारी/कर्मचारी के लेजर तथा पास बुकों में कटौतियों की आहरण एवं वितरण अधिकारी के द्वारा हस्ताक्षरित प्रविष्टियाँ अवश्य की जाएंगी। लेजरों तथा पास बुकों में अस्थाई अग्रिम तथा अंतिम निष्कासनों की आवश्यक प्रविष्टियाँ प्रत्येक दशा में बिल बनाने के साथ-साथ की जाएँ। आहरण एवं वितरण अधिकारी ब्राडशीट का भी रखरखाव करते हैं जिसके वित्तीय वर्षवार पृष्ठों पर अधिष्ठान के सभी अभिदाताओं के प्रारंभिक शेष, वर्ष भर के जमा विवरण (माहवार), ब्याज, अस्थाई अग्रिम, अंतिम निष्कासन तथा अंतिम अवशेष दर्शाए जाते हैं। कर्मचारी के सामान्य भविष्य निधि का वर्ष भर का ब्यौरा ब्राडशीट की एक ही पंक्ति में लिखा जाता है। अगली पंक्ति में अन्य कर्मचारी का एतदविषयक विवरण होता है। ब्राडशीट सीधे लेजरों से पोस्ट की जाती है। और इसकी पोस्टिंग प्रत्येक माह 10 तारीख तक प्रत्येक दशा में कर लेनी चाहिये। ब्राड शीट की काल अवधि (रिटेन्शन पीरियड) 36 वर्ष होगी।
शासनादेश संख्या-जी-2-67/दस-2007-318/2006 दिनांक 24 जनवरी 2007 द्वारा निर्धारित व्यवस्था के अनुसार संबंधित विभाग के जनपद स्तर पर तैनात वरिष्ठतम आहरण एवं वितरण अधिकारी विभागाध्यक्ष कार्यालयों से भिन्न कार्यालयों के समूह - "घ" के कर्मचारियों के सामान्य भविष्य निधि खातों के विशेष कारणों से अग्रिम तथा आंशिक अंतिम प्रत्याहरण की स्वीकृति के अधिकार का प्रयोग करते समय कार्यालयाध्यक्षों द्वारा सामान्य भविष्य निधि के खातों के समुचित रख-रखाव की व्यवस्था सुनिश्चित करवायेंगे तथा इस प्रयोजनार्थ समय-समय पर इनसे संबंधित लेखों का निरीक्षण भी करेंगे।

(ग) सामान्य भविष्य निधि नियमावली के प्रथम संशोधन 1997 द्वारा प्रत्येक आहरण वितरण अधिकारी का यह दायित्व नियम संख्या 27 में जोड़ दिया गया है कि वे महालेखाकार कार्यालय की लेखापर्ची/लेजरों की लुप्त प्रविष्टियों को, सामान्य भविष्य निधि पासबुकों की प्रमाणित प्रतियां भेजकर या अपने व्यक्तिगत प्रयासों के माध्यम से ठीक कराएं।

(घ) अभिदाता के लेखों को दर्शाने वाली पास बुक प्रणाली की व्यवस्था नियम संख्या-28 में दी हुई है। शासनादेश संख्या सा-4-ए.जी.57/दस-84-510-84, दिनांक 26 दिसम्बर, 1984 द्वारा तृतीय एवं उससे उच्च श्रेणी के सभी राजकीय सरकारी सेवकों पर समान रूप से लागू की गई। पासबुक के प्रारंभिक पृष्ठों में अभिदाता के तथा उसके सेवा संबंधी और परिवार के विवरण के अतिरिक्त नामांकनों का विवरण भी भरा जाना होता है। इसके आगे प्रत्येक वर्ष के विवरण हेतु आमने सामने के दो-दो पृष्ठों को मिलाकर प्रपत्र छपे होते है जिन पर वर्ष भर के जमा के माहवार पूर्ण विवरण के साथ ही खाते से निकाली गई धनराशि का भी पूर्ण विवरण लिखा जाता है। अंत में वार्षिक लेखा भी बनाया जाता है जिसके बगल के स्थान पर अधिकारी के वार्षिक प्रमाणन तथा अभिदाता द्वारा वर्ष में दो बार निरीक्षणों के प्रमाण स्वरूप हस्ताक्षर के लिये स्थान निर्धारित होता है। आहरण वितरण अधिकारी द्वारा जमा तथा आहरण की प्रत्येक प्रविष्टि को प्रमाणित किया जाना चाहिये। यदि किसी वर्ष कोई आहरण न किया गया हो तब भी आहरण की प्रविष्टियाँ अंकित करने के लिये बायें हाथ सबसे नीचे की तरफ निर्धारित स्थान पर आहरण शून्य लिख कर प्रमाणित किया जाना चाहिये।

(ङ) लेखाधिकारी द्वारा प्रत्येक अभिदाता को सामान्य भविष्य निधि लेखा संख्या आवंटित की जाती है। इसके दो भाग होते हैं। पहला भाग सीरीज बताता है और दूसरा भाग अद्वितीय लेखा संख्या जैसे - जी ए यू 9378। इस लेखा संख्या का उल्लेख अभिदाता के सामान्य भविष्य निधि से संबंधित समस्त अभिलेखों और लेखाओं में तथा अन्य सभी पत्राचार स्वीकृतियों, आदेशों और विवरणियों आदि में अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिये।

(च) तृतीय एवं उच्च श्रेणी के अधिकारियों कर्मचारियों के लिये पासबुक प्रणाली 1-4-1985 से लागू की गई। इस प्रकार के तत्कालीन अभिदाताओं की पासबुक में 1-4-1985 को प्रारंभिग अवशेष का आधार महालेखाकार द्वारा वित्तीय वर्ष 1983-84 के लिये निर्गत लेखा पर्ची का अंतिम अवशेष रखा गया। इस अंतिम अवशेष का आगणन करने के लिये इस अंतिम अवशेष में आहरण एवं वितरण अधिकारी के अभिलेखों के अनुसार जमा की गई धनराशि, प्रोत्साहन बोनस यदि कोई हो, 1984-85 में आगणित ब्याज को जोड़कर जो योगफल आये उसमें से 1984-85 में लिये गये अस्थाई अग्रिम तथा अंतिम निष्कासन को घटाया जाना था।

(छ) स्थानान्तरण होने पर पासबुक को अंतिम वेतन प्रमाणपत्र के साथ विशेष वाहक से (यदि स्थानान्तरण स्थानीय हो) या रजिस्टर्ड ए0डी0 के द्वारा भेजी जानी चाहिये। दोनो ही स्थितियों में पासबुक की रसीद प्राप्त कर लेनी चाहिये।

15. जमा से सम्बद्ध बीमा योजना (नियम 23)

(क) स्वीकर्ता प्राधिकारी एवं धनराशि की सीमा

अभिदाता की मृत्यु की दशा में अंतिम भुगतान स्वीकृत करने वाले प्राधिकारी द्वारा अभिदाता के खाते में विगत तीन वर्षों में जमा धनराशि के औसत के बराबर धनराशि (अधिकतम सीमा - रूपये 30,000) का भुगतान अभिदाता के सामान्य भविष्य निधि खाते की धनराशि का अंतिम भुगतान प्राप्त करने वाले को स्वीकृत कर देंगे, जिसकी स्वीकृति अनुदान संख्या 62-वित्त विभाग (अधिवर्ष भत्ते तथा पेंशनें) के लेखाशीर्षक "2235- सामाजिक सुरक्षा और कल्याण - आयोजनेत्तर, 60-अन्य सामाजिक सुरक्षा तथा कल्याण कार्यक्रम, 104- जमा-सम्बद्ध बीमा योजना-सरकारी भविष्य निधि, 03- जमा सम्बद्ध बीमा योजना, 42- अन्य व्यय" के अंतर्गत दी जायेगी। भुगतान पूर्ण रूपयों में किया जायेगा- 50 पैसे से कम की धनराशि छोड़ दी जायेगी और 50 पैसे से अधिक को अगले रूपये में पूर्णांकित कर दिया जायेगा। ज्ञातव्य है कि भविष्य निधि अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत भविष्य निधि की धनराशियों को प्रदान की गई सुरक्षा जमा से सम्बद्ध बीमा योजना के भुगतान को प्राप्त नहीं है। इस योजना के अंतर्गत कम या अधिक भुगतान का समायोजन सामान्‍य भविष्य‍ निधि अंतिम भुगतान की 90 प्रतिशत भुगतान के बाद भुगतान के लिए अवशेष धनराशि में से लेखा अधिकारी द्वारा कर लिया जायेगा।

(ख) शर्तें

अभिदाता ने मृत्यु के समय कम से कम 5 वर्ष की सेवा अवश्य पूरी कर ली हो।

इस योजना के अधीन देय अतिरिक्त धनराशि रूपये 30,000 से अधिक नहीं होगी।

मृत्यु के पूर्ववर्ती तीन वर्षों में अभिदाता के खाते में विद्यमान इतिशेष कभी भी निम्नलिखित सीमा से कम न हुआ हो :-

क्रमांक मृत्यु के पूर्ववर्ती तीन वर्ष की अवधि के वृहत्तर भाग से अभिदाता द्वारा धारित पद के वेतनमान का अधिकतम (पंचम वेतन आयोग से पूर्व) खाते में विद्यमान इतिशेष निम्नलिखित सीमा से कम न हुआ हो
(1) (2) (3)
1 रूपये 4000 या अधिक हो रूपये 12000
2 रूपये 2900 या उससे अधिक, किन्तु रूपये 4000 से कम हो रूपये 7500
3 रूपये 1151 या उससे अधिक, किन्तु रूपये 2900 से कम हो रूपये 4500
4 रूपये 1151 से कम हो रूपये 3000

(ग) विगत तीन वर्षों में जमा धनराशि के औसत का आगणन

इसके लिए एक आगणन शीट तैयार की जाती है जिसमें विगत 36 महीनों के इतिशेषों का आगणन (एक माह का आगणन एक पंक्ति में) किया जाता है।

किसी माह का इतिशेष = पूर्ववर्ती माह का इतिशेष + माह में कुल जमा - माह में कुल आहरण

वर्षवार ब्याज की धनराशि को मार्च के इतिशेष में सम्मिलित किया जायेगा, किन्तु यदि अंतिम माह मार्च नहीं है तब भी ऐसे माह के इतिशेष में ब्याज की धनराशि सम्मिलित की जायेगी।

औसत = मासिक इतिशेषों का योग/महीनों की संख्या (36)

16. अस्थायी अग्रिम, अंतिम निष्कासन, अंतिम भुगतान या जमा सम्बद्ध बीमा योजना के अंतर्गत अधिक भुगतान के मामलों में अपेक्षित कार्यवाही

(नियम 11 (6) से 11 (8) तक)

अस्थायी अग्रिम, अंतिम निष्कासन, अंतिम भुगतान के अंतर्गत अभिदाता के खाते में उपलब्ध धनराशि से अधिक के भुगतान के मामलों में सर्वप्रथम अभिदाता/प्राप्तकर्ता से अपेक्षा की जायेगी कि वह अधिक भुगतान की गई धनराशि को ब्याज सहित जमा कर दे। यदि वह ऐसा नहीं करे तो परिलब्धियों/अन्य पावनों से अधिक भुगतान की धनराशि की रिकवरी की जायेगी। यदि अभिदाता सेवा में है तो वसूली सामान्यत: एक मुश्त की जायेगी या यदि वसूली की धनराशि उसकी परिलब्धियों के आधे से अधिक हो तो मासिक किस्तों में वसूली के आदेश किये जायेंगे। किस्तों की धनराशि का निर्धारण अभिदाता की सेवानिवृत्ति में शेष अवधि को दृष्टिगत रखते हुए किया जायेगा। यदि अभिदाता सेवा में न हो तो उससे वसूली एकमुश्त की जायेगी। उन सभी मामलों में जहां अधिक भुगतान की धनराशि या उसका कोई अंश अन्य प्रकार से वसूल न हो सके उसके भू-राजस्व के बकाये के रूप में वसूली की कार्यवाही की जायेगी।

अति आहरित/अधिक भुगतान की गई धनराशि को वसूली के बाद विभागीय प्राप्ति के लेखाशीर्षक के अंतर्गत सरकार के खाते में जमा किया जायेगा। वसूल किये जाने वाले ब्याज की दर सामान्य भविष्य निधि पर प्रचलित दर से 2 1/2 प्रतिशत अधिक होगी और इसे सरकार के खाते में मुख्य लेखाशीर्षक 0049 - ब्याज प्राप्तियां के अन्तर्गत जमा किया जायेगा।

यदि नियम 23 के अधीन (जमा सम्बद्ध बीमा योजना) कोई अधिक या गलत भुगतान कर दिया जाय तो अधिक या गलत भुगतान की गई धनराशि को ब्याज की सामान्य दर से 2 1/2 प्रतिशत अधिक दर पर ब्याज सहित मृत अभिदाता की परिलब्धियों या अन्य देयों से वसूल किया जायेगा और यदि ऐसा कोई देय नहीं है या अधिक भुगतान की गयी धनराशि की पूर्ण वसूली उससे नहीं हो पाती हे तो देय धनराशि की वसूली, यदि आवश्यक हो, उस व्यक्ति से जिसने अधिक या गलत भुगतान प्राप्त किया हो, भू-राजस्व के बकाये की भाँति की जायेगी। वसूलियों को उक्तानुसार जमा किया जायेगा।

17. महालेखाकार को प्रेषित की जाने वाली सूचनाएँ :-

सामान्य भविष्य निधि प्रथम संशोधन नियमावली-1997 द्वारा जोड़े गये नियम 28(2) - क के अनुसार आहरण एवं वितरण अधिकारी द्वारा महालेखाकार को निम्नलिखित सूचनाएँ प्रेषित किए जाने की अपेक्षा की गयी -

(क) ऐसे अभिदाताओं का नाम और लेखा संख्या जिनका पूर्व एक वर्ष में नामांकन हुआ हो।

(ख) ऐसे अभिदाताओं की सूची जिन्होंने अन्य कार्यालयों में स्थानान्तरण द्वारा वर्ष के मध्य में कार्यभार ग्रहण किया हो।

(ग) ऐसे अभिदाताओं की सूची जो वर्ष के मध्य में अन्य कार्यालयों को स्थानान्तरित हुए हो।

(घ) ऐसे अभिदाताओं की सूची जो आगामी 18 मास के दौरान सेवानिवृत्त होने वाले हों।

शासनादेश संख्या जी 2-664/दस-2003-308/2002 दिनांक 30-4-2003 द्वारा निर्देशित किया गया है कि प्रत्येक वर्ष 01 जनवरी तथा 01 जुलाई को अगले 24 माह के अंतर्गत सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों की सूची, महालेखाकार फण्ड, महालेखाकार कार्यालय, उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद को भेजी जाये जिससे उनके स्तर पर सामान्य भविष्य निधि के अन्तिम भुगतान की नियमित समीक्षा की जा सके।

शासनादेश संख्या जी 2-1005/दस-2004 दिनांक 2-7-2004 के अनुसार प्रत्येक वर्ष सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों की सूची महालेखाकार, उ0प्र0 को भिजवाया जाना सुनिश्चित करने के साथ ही ऐसे अधिकारियों/कर्मचारियों के सामान्य भविष्य निधि पास बुक की सत्यापित छाया प्रति जिसमें प्रथम पृष्ठ पर सारी प्रविष्टियां (यथा, नाम, जन्म तिथि आदि) अंकित हो, भी महालेखाकार उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद को उपलब्ध कराई जानी है ताकि उनके लेखा को महालेखाकार उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद द्वारा अद्यावधिक किया जा सके।

18. महालेखाकार, उत्तर प्रदेश के लेखों में पुस्तांकित धनराशि का मिलान :

सामान्य भविष्य निधि नियमावली के प्रथम संशोधन 1997 द्वारा प्रत्येक आहरण वितरण अधिकारी का यह दायित्व नियम 27 में जोड़ दिया गया है कि वे महालेखाकार कार्यालय की लेखापर्ची/लेजरों की लुप्त प्रविष्टियों को, सामान्य भविष्य निधि पासबुकों की प्रमाणित प्रतियां भेजकर या अपने व्यक्तिगत प्रयासों के माध्यम से ठीक कराएँ।

एतदविषयक शासनादेश दिनांक 15-3-2005 की व्यवस्था स्पष्ट करते हुए शासनादेश संख्या जी-2-205/दस/2006 दिनांक 23 फरवरी, 2006 जारी किया गया। इसमें बताया गया है कि शासनादेश दिनांक 15-3-2005 से इस आशय के निर्देश निर्गत किये गये थे कि सेवानिवृत्ति के नजदीक पहुंच चुके कर्मचारियों/ अधिकारियों के सामान्‍य भविष्य निधि खाते के इन्द्राज का मिलान कार्यालय महालेखाकार, उ0प्र0, इलाहाबाद में अनुरक्षित लेखों से भी समय रहते करवा लिया जाय ताकि त्रुटिपूर्ण भुगतान की गुंजाइश न रहे। इस परिप्रेक्ष्य में यह उचित होगा कि उपर्युक्त पत्र दिनांक 15-3-2005 में दिये गये निर्देशों के अनुसार सामान्य भविष्य निधि पास बुक के इन्द्राज का समय रहते कार्यालय महालेखाकार, उ0प्र0, इलाहाबाद के लेखों से मिलान करवा लिया जाय। यदि सेवानिवृत्ति के पूर्व किन्हीं कारणों से ऐसा मिलान करने की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो पाती हो मात्र इस आधार पर स्वीकृति प्राधिकारी द्वारा सेवानिवृत्ति के समय भविष्य निधि के 90 प्रतिशत अतिशेष का भुगतान रोका नहीं जायेगा, परन्तु ऐसे भुगतान की प्रमाणकता के लिये स्वीकृति प्राधिकारी स्वयं उत्तरदायी होंगे।

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परिशिष्ट-एक

सामान्य भविष्य निर्वाह निधि पर समय-समय पर घोषित/लागू ब्याज दरें
क्रमांक- वर्ष वार्षिक ब्याज दर
1 - 1957-58 सकल जमा धनराशि पर एक समान 3.75%
2 1958-59 सकल जमा धनराशि पर एक समान 3.75%
3 1959-60 सकल जमा धनराशि पर एक समान 3.75%
4 1960-61 सकल जमा धनराशि पर एक समान 3.75%
5 1961-62 सकल जमा धनराशि पर एक समान 3.75%
6 1962-63 से 1964-65 सकल जमा धनराशि पर एक समान 4.00%
7 1965-66 सकल जमा धनराशि पर एक समान 4.25%
8 1966-67 सकल जमा धनराशि पर एक समान 4.60%
9 1967-68 सकल जमा धनराशि पर एक समान 4.80%
10 1968-69 5.10% 10,000 तक; अधिक पर 4.80%
11 1969-70 5.25% 10,000 तक; अधिक पर 4.80%
12 1970-71 5.50% 10,000 तक अधिक पर 4.80%
13 1971-72 5.70% 10,000 तक; अधिक पर 5.00%
14 1972-73 6.00% 10,000 तक; अधिक पर 5.30%
15 1973-74 सकल जमा धनराशि पर एक समान 6.00%
16 1974-75 (31.7.74 तक 1.8.74 से 31.3.75 तक) 6.50% 15,000 तक; अधिक पर 5.80%
7.50% 25,000 तक ; अधिक पर 7.00%
17 1975-76 7.50% 25,000 तक ; अधिक पर 7.00%
18 1976-77 सकल जमा धनराशि पर एक समान 7.50%
19 1977-78 से 1979-80 8.00% 25,000 तक; अधिक पर 7.50%
20 1980-81 8.50% 25,000 तक; अधिक पर 8.00%
21 1981-82 9.00% 25,000 तक; अधिक पर 8.50%
22 1982-83 9.00% 35,000 तक; अधिक पर 8.50%
23 1983-84 9.50% 40,000 तक; अधिक पर 9.00%
24 1984-85 सकल जमा धनराशि पर एक समान 10.00%
25 1985-86 सकल जमा धनराशि पर एक समान 10.50%
26 1986-87 से 1999-2000 तक सकल जमा धनराशि पर एक समान 12.00%
27 2000-2001 सकल जमा धनराशि पर एक समान 11.00%
28 2001-2002 सकल जमा धनराशि पर एक समान 9.5%
29 2002-2003 सकल जमा धनराशि पर एक समान 9.0%
30 2003-2004 सकल जमा धनराशि पर एक समान 8%
31 2004-2005 सकल जमा धनराशि पर एक समान 8%
32 2005-2006 सकल जमा धनराशि पर एक समान 8%
33 2006-2007 सकल जमा धनराशि पर एक समान 8%
34 2007-2008 सकल जमा धनराशि पर एक समान 8%

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 15 Jun 2019 at 7:54 AM -

गंगा

डाॅ. सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या ने बताया है कि प्राचीन चीनी में जो " कांग " है, दक्षिणी चीनी में जो " किआंग " है, उत्तरी चीनी में जो " चिआंग " है, वही भारत में " गांग " है और इसी " गांग " का संस्कृत ... रूप " गंगा " है। इसलिए मूल रूप से गंगा नदी का नाम नहीं बल्कि नदी का वाचक है जैसे कांग, किआंग और चिआंग नदी का नाम नहीं बल्कि नदी का वाचक है।

आज भी चकमा भाषा में नदी को " गांग " कहते हैं। सिंहली में तो सभी नदियों को " गंगा " ही कहा जाता है।

जैसे चीन में अनेक नदियों के नाम में " किआंग " जुड़ा होता है, वैसे भारत में भी अनेक नदियों के नाम में " गंगा " जुड़ा होता है। इसलिए कि गंगा और किआंग नदी बोधक शब्द हैं। चीन में सी - किआंग है, यू - किआंग है, लुंग - किआंग है, पे - किआंग है, लो - किआंग है। भारत में भी बाण गंगा है, रुद्र गंगा है, राम गंगा है, वैन गंगा है, गिरथी गंगा है।

डाॅ. चन्द्रेश बहादुर सिंह ने एक शोध में लिखा है कि भारत में कुल मिलाकर 46 नदियाँ ऐसी हैं जिनके नाम में " गंगा " जुड़ा है। इन 46 नदियों में 32 नदियाँ गंगा में मिलती हैं। शेष 14 नदियाँ गंगा से कहीं नहीं मिलती हैं। ये 14 नदियाँ जो गंगा से नहीं जुड़ी हैं, उनके नाम में भी गंगा का जुड़ना शायद इसीलिए है कि गंगा कभी नदी का वाचक शब्द था।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 21 May 2019 at 5:20 AM -

अंडा खाने के दस फायदे-


1 अंडे में नौ अमीनो एसिड होते हैं, जो शरीर की जरूरतों को पूरा करते हैं। इसमें विटामिन ए, बी, बी12, विटामिन डी, और विटामिन ई भी भरपूर मात्रा में होता है। इसके अलावा यह फॉलेट, सेलेनियम और कई खनिज लवणों का अच्छा स्त्रोत है।

2 ... अंडे में मौजूद ओमेगा 3, विटामिन्स और फैटी एसिड दिमाग के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। इसमें कोलीन पाया जाता है, जिसके प्रयोग से स्मरण शक्ति तो बढ़ती ही है, दिमाग की कार्यक्षमता बढ़ जाती है और वह बेहतर काम करता है।



3 अगर मूड खराब हो, तो अंडा आपके लिए मददगार है। क्योंकि इसमें उपस्थि‍त विटामिन बी-12 तनाव को दूर करने में मदद करता है। इसके अलावा इसमें कुछ ऐसे तत्व भी पाए जाते हैं जो आपके मूड को बेहतर बनाते हैं और डिप्रेशन दूर करते हैं।

4 गर्भावस्था में भी अंडा एक सेहतमंद फूड है। यह गर्भस्थ शि‍शु के शारीरिक और मानसिक विकास में मदद करता है। इसके अलावा यह शरीर में जरूरी पोषक तत्वों की पूर्ति करता है। इसलिए डॉक्टर्स भी इस दौरान अंडा खाने की सलाह देते हैं।


5 एक शोध के अनुसार अंडे का सेवन करने से मोतियांबिंद का खतरा कम हो जाता है और आंखों की मांसपेशियां भी मजबूत होती हैं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स, रेटीना को मजबूती देने का काम करता हैं।

6 वजन को संतुलित रखने में अंडा बहुत मददगार होता है। इसे खाने के बाद देर तक पेट भरा रहता है, और शरीर को उर्जा मिलती रहती है, जिससे आपको भूख कम लगती है और आपकी डाइट कम हो जाती है। इससे आपका वजन नियंत्रित रहता है।



7 अंडा प्रोटीन का अच्छा स्त्रोत है, इसलिए यह बालों और नाखूनों के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। यह बालों को मजबूत बनाने के साथ ही उसकी गुणवत्ता में बदलाव लाता है साथ ही इससे नाखून भी मजबूत होते हैं।

8 त्वचा में कसाव लाने के साथ ही चेहरे की रौनक बढ़ाने में अंडा आपकी मदद कर सकता है। अंडे की जर्दी को फेसपैक या मास्क की तरह उपयोग कर आप त्वचा की झुर्रि‍यों को कम कर सकते हैं।



9 अंडे का प्रयोग एनर्जी बूस्टर के रूप में भी किया जाता है। सुबह के नाश्ते में अंडे का प्रयोग आपको दिनभर उर्जा देता है। इसका अंदरूनी पीला भाग सेहत से भरपूर और उर्जा देने वाला होता है

10 महिलाओं में होने वाले स्तन कैंसर के खतरे को कम करने के लिए प्रतिदिन अंडे का प्रयोग काफी फायदेमंद होता है। इसके अलावा यह आपकी कार्यक्षमता में इजाफा भी करता है।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 10 Dec 2018 at 5:45 AM -

विटामिन डी

विटामिन डी वसा-घुलनशील प्रो-हार्मोन का एक समूह होता है। इसके दो प्रमुख रूप हैं: विटामिन डी२ (या अर्गोकेलसीफेरोल) एवं विटामिन डी३ (या कोलेकेलसीफेरोल)। सूर्य के प्रकाश, खाद्य एवं अन्य पूरकों से प्राप्त विटामिन डी निष्क्रीय होता है। इसे शरीर में सक्रिय होने के लिये कम ... से कम दो हाईड्रॉक्सिलेशन अभिक्रियाएं वांछित होती हैं। शरीर में मिलने वाला कैल्सीट्राईऑल (१,२५-डाईहाईड्रॉक्सीकॉलेकैल्सिफेरॉल) विटामिन डी का सक्रिय रूप होता है। त्वचा जब धूप के संपर्क में आती है तो शरीर में विटामिन डी निर्माण की प्रक्रिया आरंभ होती है। यह विटामिन मछलियों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। विटामिन डी की मदद से कैल्शियम को शरीर में बनाए रखने में मदद मिलती है जो हड्डियों की मजबूती के लिए अत्यावश्यक होता है। इसके अभाव में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं व टूट भी सकती हैं। छोटे बच्चों में विटामिन डी की कमी से हड्डियां मुड़ जाती हैं, यह स्थिति रिकेट्स कहलाती है। वयस्कों में हड्डी के कमजोर होने को ओस्टीयोमलेशिया कहते हैं। इसके अलावा, विटामिन डी की कमी से वयस्कों की हड्डियों में कैल्शियम का घनत्व कम ही जाता है जिससे हड्डियों की भंगुरता बढ़ जाती है इस दशा को ओस्टीयोपोरोसिस कहते हैं।

इसके अलावा विटामिन डी कैंसर, क्षय रोग तथा हृदय के अनेक रोगों से भी बचाव करता है।

कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार विटामिन डी शरीर की टी-कोशिकाओं की क्रियाविधि में वृद्धि करता है, जो किसी भी बाहरी संक्रमण से शरीर की रक्षा करती हैं। इसकी मानव प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मुख्य भूमिका होती है और इसकी पर्याप्त मात्रा के बिना प्रतिरक्षा प्रणाली की टी-कोशिकाएं बाहरी संक्रमण पर प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहती हैं। टी-कोशिकाएं सक्रिय होने के लिए विटामिन डी पर निर्भर रहती हैं। जब भी किसी टी-कोशिका का किसी बाहरी संक्रमण से सामना होता है, यह विटामिन डी की उपलब्धता के लिए एक संकेत भेजती है। इसलिये टी-कोशिकाओं को सक्रिय होने के लिए भी विटामिन डी आवश्यक होता है। यदि इन कोशिकाओं को रक्त में पर्याप्त विटामिन डी नहीं मिलता, तो वे चलना भी शुरू नहीं करतीं हैं।

अधिकता:
विटामिन डी की अधिकता से शरीर के विभिन्न अंगों, जैसे गुर्दों में, हृदय में, रक्त रक्त वाहिकाओं में और अन्य स्थानों पर, एक प्रकार की पथरी उत्पन्न हो सकती है। ये विटामिन कैल्शियम का बना होता है, अतः इसके द्वारा पथरी भी बन सकती है। इससे रक्तचाप बढ सकता है, रक्त में कोलेस्टेरॉल बढ़ सकता है और हृदय पर प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही चक्कर आना, कमजोरी लगना और सिरदर्द, आदि भी हो सकता है। पेट खराब होने से दस्त भी हो सकता है।

स्रोत
इसके मुख्य स्रोतों में अंडे का पीला भाग, मछली के तेल, विटामिन डी युक्त दूध और मक्खन होते हैं। इनके अलावा मुख्य स्रोत धूप सेंकना होता है। दूध और अनाज प्रायः विटामिन डी के भरपूर स्रोत होते हैं।
वसा-पूर्ण मछली, जैसे साल्मन विटामिन डी के प्राकृतिक स्रोतों में से एक हैं।

धूप सेंकने की नियमित क्रिया से विटामिन डी की पर्याप्त मात्रा शरीर मे बनी रहती है।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 29 Nov 2018 at 7:53 AM -

हनुमान जी के बारे में व्यापक शोध जारी है-
1- कांधे मूँज जनेऊ साजे।
इसका मतलब ब्राह्मण थे।
2- नाशे शोक हरे सब पीरा।
इसका मतलब डॉक्टर थे।
3- शूद्र थे और इसलिए शादी नहीं किया कि कहीं उनको कोई घोड़ी से न उतार दे।
4- सभी जातियों के लोग पूजते ... आ रहे हैं। इसका मतलब राम और कृष्ण की तरह ओबीसी थे।
5- भीम रूप धरि असुर संहारे।
इसका मतलब अगले अवतार में भीम राव अम्बेडकर बनकर जन्मे और संविधान बनाकर असुर अर्थात ब्राह्मणवादियों को और sc/st एक्ट बनाकर असुर यानी ओबीसी को पीटा।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 29 Oct 2018 at 8:22 AM -

तथागत बुद्ध से जुड़ी 50 बातें

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तथागत बुद्ध से जुड़ी 50 बातें।
1. बौद्ध धर्म के संस्थापक कौन थे ? - गौतम बुद्ध
2. गौतम बुद्ध का जन्म कब हुआ था ? - 563 ई०पू०
3. गौतम बुद्ध के जन्म ... स्थान का नाम क्या है ? - कपिलवस्तु के पास लुम्बिनी नामक स्थान।
4. किसे Light of Asia के नाम से जाना जाता है ? - महात्मा बुद्ध
5. गौतम बुद्ध के बचपन का नाम क्या था ? - सिद्धार्थ
6. गौतम बुद्ध के पिता का नाम क्या था ? - शुद्धोधन
7. इनकी मा का नाम था ? - महामाया
8. महात्मा बुद्ध की सौतेली मा का नाम क्या था ? - प्रजापति गौतमी
9. महात्मा बुद्ध की पत्नी का नाम क्या था ? - यशोधरा
10. गौतम बुद्ध के पुत्र का नाम क्या था ? - राहुल
11. गौतम बुद्ध के सारथी का नाम क्या था ? - चन्ना
12. गौतम बुद्ध कितने वर्ष की अवस्था में गृह त्याग कर सत्य की खोज में निकल पड़े ? - 29 वर्ष
13. सिद्धार्थ के गृह त्याग की घटना को बौद्ध धर्म में क्या कहा जाता है ? - महाभिनिष्क्रमण
14. बुद्ध ने अपना प्रथम गुरु किसे बनाया था ? - आलारकालाम
15. बुद्ध ने अपने प्रथम गुरु से कौन सी शिक्षा प्राप्त की ? - सांख्य दर्शन
16. गौतम बुद्ध के दूसरे गुरु का नाम क्या था ? - रुद्रक
17. उरुवेला में कितने ब्राह्मण बुद्ध के शिष्य बने ? - पांच
18. बुद्ध के पांचों शिष्यों के नाम क्या थे ? - कौण्डिन्य, वप्पा, भादिया, अस्सागी और महानामा
19. 35 वर्ष की आयु में बिना अन्न-जल ग्रहण किए आधुनिक बोधगया में निरंजना (फल्गु) नदी के तट पर, पीपल वृक्ष के नीचे कितने वर्ष की कठिन तपस्या के बाद बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई ? - 6 वर्ष
20. ज्ञान प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ को क्या कहा गया ? - गौतम बुद्ध और तथागत
21. सिद्धार्थ का गोत्र क्या था ? - गौतम
22. गौतम बुद्ध को किस दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई ? - वैशाखी पूर्णिमा
23. गौतम बुद्ध ने अपना पहला उपदेश कहाँ दिया था ? - वाराणसी के निकट सारनाथ
24. उपदेश देने की इस घटना को क्या कहा जाता है ? - धम्मचक्रप्रवर्तन
25. महात्मा बुद्ध की देशनाएँ किस भाषा में थीं? - पाली
26. बौद्ध धर्म के कौन-कौन से त्रिरत्न हैं? - बुद्ध, धम्म और संघ
27. बौद्ध धर्म में प्रविष्टि को क्या कहा जाता था ? - उपसम्पदा
28. बुद्ध के अनुसार देवतागण भी किस सिद्धान्त के अंतर्गत आते है ? - कर्म फल सिद्धान्त
29. बुद्ध ने तृष्णा समाप्ति की घटना को क्या कहा है ? - निर्वाण
30. बुद्ध के अनुयायी कितने भागों में बंटे थे ? - दो भिक्षुक और उपासक
31. जिस स्थान पर बुद्ध ने ज्ञान की प्राप्ति की थी, वह स्थान क्या कहलाया ? - बोधगया
32. महात्मा बुद्ध की मृत्यु कब और कहाँ हुई थी ? - 483 ई०पू० में कुशीनगर उत्तर प्रदेश
33. महात्मा बुद्ध की मृत्यु की घटना को बौद्ध धर्म में क्या कहा गया है ? - महापरिनिर्वाण
34. महात्मा बुद्ध द्वारा दिया गया अंतिम उपदेश क्या था ? - “सभी वस्तुए क्षरणशील होती है अतः मनुष्य को अपना पथ-प्रदर्शक स्वयं होना चाहिए
35. प्रथम बौद्ध संगीति किसके शासन काल में हुई थी? - अजातशत्रु
36. तृतीय बौद्ध संगीति कहाँ हुई थी?- पाटलिपुत्र
37. गौतम बुद्ध के सबसे प्रिय और आत्मीय शिष्य कौन थे ? - आनंद
38. बौद्ध धर्म को अपनाने वाली प्रथम महिला कौन थी ? - बुद्ध की माँ प्रजापति गौतमी
39. भारत से बाहर बौद्ध धर्म को फैलाने का श्रेय किस राजा को जाता है ? - सम्राट अशोक
40. बुद्ध के प्रथम दो अनुयायी कौन कौन थे ? - काल्लिक, तपासु
41. बुद्ध की प्रथम मूर्ति कहाँ बनी थी? - मथुरा
42. सबसे अधिक संख्या में बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण किस शैली में किया गया था ? - गांधार शैली
43. बौद्ध का परम धर्म लक्ष्य है - निर्वाण
44. धार्मिक जुलूस की शुरुआत सबसे पहले किस धर्म से शुरू की गयी थी ? - बौद्धधर्म
45. बौद्धों का सर्वाधिक पवित्र त्योहार क्या है ? - वैशाख पूर्णिमा
46. वैशाख पूर्णिमा किस नाम से विख्यात है ? - बुद्ध पूर्णिमा
47. अनीश्वरवाद को मानने वाले कौन-कौन से धर्म है ? - बौद्धधर्म एवं जैनधर्म
48. बुद्ध ने किसकी प्रमाणिकता को स्पस्टतः नकार दिया था ? - वेदों की
49. सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म में किसने दीक्षित किया था ? - मोगलीपुत्त तिस्स
50. चतुर्थ बौद्ध संगीति कहाँ हुई थी? - कुण्डलवन कश्मीर

Copied..

user image Aneeeh Swaroop

Very useful information

Monday, October 29, 2018
user image Jigyasa Editor

अच्छी जानकारी

Friday, October 26, 2018
user image Arvind Swaroop Kushwaha - 26 Oct 2018 at 2:39 PM -

अलसी या तीसी के औषधीय गुण

अलसी के औषधीय गुण तथा विभिन्न बीमारियों में उपयोग व फायदे-(अधिकांशतः सुनी हुई बातें हैं)-

अनेक जटिल समस्याओं के लिए अचूक औषधि है अलसी। अलसी का मराठी नाम जवस है। इसे उत्तर भारत में तीसी के नाम से भी जाना जाता है। अलसी असरकारी ऊर्जा, स्फूर्ति ... व जीवटता प्रदान करता है। अलसी, तीसी, अतसी, कॉमन फ्लेक्स और वानस्पतिक लिनभयूसिटेटिसिमनम नाम से विख्यात तिलहन अलसी के पौधे बागों और खेतों में खरपतवार के रूप में तो उगते ही हैं, इसकी खेती भी की जाती है। इसका पौधा दो से चार फुट तक ऊंचा, जड़ चार से आठ इंच तक लंबी, पत्ते एक से तीन इंच लंबे, फूल नीले रंग के गोल, आधा से एक इंच व्यास के होते हैं। इसके बीज और बीजों का तेल औषधि के रूप में उपयोगी है। अलसी रस में मधुर, पाक में कटु, पित्तनाशक, वीर्यवर्धक, वात एवं कफ नाशक व खांसी मिटाने वाली है। इसके बीज चिकनाई व मृदुता उत्पादक, बलवर्घक, शूल शामक और मूत्रल हैं। इसका तेल विरेचक (दस्तावर) और व्रण पूरक होता है।

अलसी की पुल्टिस का प्रयोग गले एवं छाती के दर्द, सूजन तथा निमोनिया और पसलियों के दर्द में लगाकर किया जाता है। इसके साथ यह चोट, मोच, जोड़ों की सूजन, शरीर में कहीं गांठ या फोड़ा उठने पर लगाने से शीघ्र लाभ पहुंचाती है। एंटी फ्लोजेस्टिन नामक इसका प्लास्टर डॉक्टर भी उपयोग में लेते हैं। चरक संहिता में इसे जीवाणु नाशक माना गया है। यह श्वास नलियों और फेफड़ों में जमे कफ को निकाल कर दमा और खांसी में राहत देती है।

इसकी बड़ी मात्रा विरेचक तथा छोटी मात्रा गुर्दो को उत्तेजना प्रदान कर मूत्र निष्कासक है। यह पथरी, मूत्र शर्करा और कष्ट से मूत्र आने पर गुणकारी है। अलसी के तेल का धुआं सूंघने से नाक में जमा कफ निकल आता है और पुराने जुकाम में लाभ होता है। यह धुआं हिस्टीरिया रोग में भी गुणकारी है। अलसी के काढ़े से एनिमा देकर मलाशय की शुद्धि की जाती है। उदर रोगों में इसका तेल पिलाया जाता हैं।

तनाव के क्षणों में शांत व स्थिर बनाए रखने में सहायक है। कैंसर रोधी है तथा हार्मोन्स की सक्रियता बढ़ाता है। अलसी इस धरती का सबसे शक्तिशाली पौधा है। कुछ शोध से ये बात सामने आई कि इससे दिल की बीमारी, कैंसर, स्ट्रोक और मधुमेह का खतरा कम हो जाता है। इस छोटे से बीज से होने वाले फायदों की फेहरिस्त काफी लंबी है,​​ जिसका इस्तेमाल सदियों से लोग करते आए हैं। इसके रेशे पाचन को सुगम बनाते हैं, इस कारण वजन नियंत्रण करने में अलसी सहायक है। रक्त में शर्करा तथा कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करता है। जोड़ों का कड़ापन कम करता है। प्राकृतिक रेचक गुण होने से पेट साफ रखता है। हृदय संबंधी रोगों के खतरे को कम करता है। उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करता है। त्वचा को स्वस्थ रखता है एवं सूखापन दूर कर एग्जिमा आदि से बचाता है। बालों व नाखून की वृद्धि कर उन्हें स्वस्थ व चमकदार बनाता है। इसका नियमित सेवन रजोनिवृत्ति संबंधी परेशानियों से राहत प्रदान करता है। मासिक धर्म के दौरान ऐंठन को कम कर गर्भाशय को स्वस्थ रखता है। अलसी का सेवन त्वचा पर बढ़ती उम्र के असर को कम करता है। अलसी का सेवन भोजन के पहले या भोजन के साथ करने से पेट भरने का एहसास होकर भूख कम लगती है। प्राकृतिक रेचक गुण होने से पेट साफ रख कब्ज से मुक्ति दिलाता है।
अलसी कैसे काम करती है
अलसी के चमत्कार को दुनिया ने माना है, आधुनिक युग में स्त्रियों की यौन-इच्छा, कामोत्तेजना, चरम-आनंद विकार, बांझपन, गर्भपात, दुग्धअल्पता की महान औषधि है। स्त्रियों की सभी लैंगिक समस्याओं के सारे उपचारों हेतु सर्वश्रेष्ठ और सुरक्षित है अलसी।

सबसे पहले तो अलसी आप और आपके जीवनसाथी की त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनायेगी। आपके केश काले, घने, मजबूत, चमकदार और रेशमी हो जायेंगे। अलसी आपकी देह को ऊर्जावान और मांसल बना देगी। शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी रहेगी, न क्रोध आयेगा और न कभी थकावट होगी। मन शांत, सकारात्मक और दिव्य हो जायेगा। अलसी में ओमेगा-3 फैट, आर्जिनीन, लिगनेन, सेलेनियम, जिंक और मेगनीशियम होते हैं जो स्त्री हार्मोन्स, टेस्टोस्टिरोन और फेरोमोन्स (आकर्षण के हार्मोन) के निर्माण के मूलभूत घटक हैं। टेस्टोस्टिरोन आपकी कामेच्छा को चरम स्तर पर रखता है।

अलसी में विद्यमान ओमेगा-3 फैट और लिगनेन जननेन्द्रियों में रक्त के प्रवाह को बढ़ाती हैं, जिससे कामोत्तेजना बढ़ती है। इसके अलावा ये शिथिल पड़ी क्षतिग्रस्त नाड़ियों का कायाकल्प करती हैं जिससे मस्तिष्क और जननेन्द्रियों के बीच सूचनाओं एवं संवेदनाओं का प्रवाह दुरुस्त हो जाता है। नाड़ियों को स्वस्थ रखने में अलसी में विद्यमान लेसीथिन, विटामिन बी ग्रुप, बीटा केरोटीन, फोलेट, कॉपर आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अलसी से, देह के सारे चक्र खुल जाते हैं।
अलसी के बीज के चमत्कारों का हाल ही में खुलासा हुआ है कि इनमें 27 प्रकार के कैंसररोधी तत्व खोजे जा चुके हैं। अलसी में पाए जाने वाले ये तत्व कैंसररोधी हार्मोन्स को प्रभावी बनाते हैं, विशेषकर पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर व महिलाओं में स्तन कैंसर की रोकथाम में अलसी का सेवन कारगर है। दूसरा महत्वपूर्ण खुलासा यह है कि अलसी के बीज सेवन से महिलाओं में सेक्स रोगों यथा गोनोरिया, नेफ्राइटिस, अस्थमा, सिस्टाइटिस, कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह, कब्ज, बवासीर, एक्जिमा आदि के उपचार में भी उपयोगी है।

user image Jigyasa Editor

उत्कृष्ट जानकारी

Friday, October 26, 2018
user image Aneeeh Swaroop

Nice information!!!! Thank you for this...

Friday, October 26, 2018