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user image Arvind Swaroop Kushwaha - 07 May 2020 at 9:31 PM -

समन्वय आचरण

आधुनिक बुद्ध के अनुसार समन्वित आचरण-
1.समय से उठना.
2.व्यायाम,ध्यान, विपश्यना.
3. साधारण,पौष्टिक खाना
4.बिना झूठ बोले उद्यम कर खुद,घर परिवार,पशु,संभव हो तो पक्षियों को भोजन पानी का इंतजाम करना.
5.पाली में नहीं, हिंदी या स्थानीय भाषा में ही ज्ञान, विज्ञान सम्मत चर्चा.
6.अपनी आंतरिक ऊर्जा, लाइफ एनर्जी को सक्रिय बनाये ... रखने के लिये सक्रिय ध्यान.
7.कभी भी क्रोध को अपने इर्द,गिर्द न फटकने देना, लेकिन अपने सही विचारों के प्रचार हेतु लगातार प्रयासरत रहना और अपने साथियों को सक्रिय बनाये रखना.
8. पर्यावरण संरक्षण, पानी ,बिजली की बचत के साथ यथासंभव आसपास, सफाई का ध्यान रखना और उसके प्रति लोगों को सचेत करते रहना.
9.अपने आसपास, नाते रिश्तेदार, मित्र दोस्तों में से किसी का शिशु अशिक्षित न रह जाय,ऐसी चौकन्नी निगाह रखना और संभव हो तो मददगार बनना.
10. किसी भी हालात में मनुष्य-मनुष्य और स्त्री-पुरूष के कमतर ,अधिकतर के सिद्धांत को नहीं मानना.
11. किसी भी तरह की अकेडमिक, साहित्यिक या ऐतिहासिक पुस्तकों का संरक्षण कर उन्हें जरुरतमंद विद्यार्थियों तक पहुंचाना नहीं तो अपनी विचारधारा के किसी पुस्तकालय को दान में देना ताकि जरूरत मंद उसका लाभ ले सकें.
12. यदि गांव में रहते हैं तो जल संरक्षण, वृक्षारोपण, घरेलू पशुपालन, बिना रसायन की खेती, ज्यादा उत्पादन, किसानों के लिये लाभकारी उत्पाद, उनके मूल्य,घूंघट,बुर्का विरोध, शिक्षा के प्रति जागरुकता,गांव की आपसी एकता,तर्क करने की शक्ति का विकास,राजनैतिक घटनाक्रमों का विश्लेषण,सरकार द्वारा किसानों,विद्यार्थियों ,मजदूरों, नागरिकों हेतु लाभकारी योजनाओं पर चर्चा करते रहना.
13. सत्य कड़वा होता है,लेकिन यदि विचारक अध्ययनशील, जानकारी और सूचनाओं से लैश,अपने आसपास के सामाजिक, राजनीतिक परिवेश के प्रति सचेत है तो लोग बात सुनते हैं.
14.घृणास्पद बातों से परहेज, किसी को बिना ठेस पहुंचाये अपने बात समझा देने की क्षमता रखना ही बुद्ध का मार्ग है.
15. नफरत किसी से नहीं, प्रेम सभी से,भरोसा सोच समझ कर.
16.कोई भी मनुष्य कभी पूर्ण नहीं हो सकता, अतः सर्वदा सीखने की ललक बनाये रखना.यदि इनसे ऊपर उठ गये हों तो प्रज्ञा शक्ति के विकास और गहन अध्ययन, विश्लेषण हेतु अपने जैसे ही साथियों से विमर्श करते रहना.

सुरेन्द्र कुशवाहा.

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 01 May 2020 at 9:23 AM -

herd immunity, हर्ड इम्यूनिटी

जब कोरोना-19 के खिलाफ कोई वैक्सीन ही नहीं बनी तो herd-immunity लायी कैसे जाए।

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 01 May 2020 at 9:07 AM -

सामाजिक सुरक्षा

आज के समय में समाज की दुर्दशा देखने के बाद ....

कुछ विचार मन में उत्पन्न हुए !

इस समय हम सब किससे उम्मीद करें ? किस दरबार में जाकर फ़रियाद करें ?
कही सुनवाई नहीं है ! यदि सुनवाई नहीं हो ... रही है - तो गलती किसकी है ?

कोई समाज के लिए लड़ता क्यों नहीं है ? कोई समाज के दुखमय में रोड पर क्यों नहीं उतरता ?

गलतियां हम और आप जैसे बुद्धजिवियो ने किया है !
हम लोगो ने हमेशा अपने स्वार्थ के चक्कर में समाज से गलत व्यक्ति का चुनाव करवाया है !

कब तक हम लोग ' वोट ' वाले नेता के पीछे भागते रहेंगे ?
बिना ' वोट ' वाले भी नेता होते है - यही समझना जरूरी है !

आप यदि कही भी बिना ' वोट ' वाले नेता के साथ इकट्ठे हो गए - तो प्रशासन और शासन के हाथ - पांव फूल जाएंगे !

जागरूक समाज की यही पहचान भी है ....
की बिना किसी के कहे , एक दूसरे के दुख में खड़े हो जाएं !

वोट से बनने वाले नेता - आपके लिए जमीन पर नहीं उतरेंगे ? न ही आपके दुख या अत्याचार के लिए कोई रैली या बैठक करेंगे ?

वोट वाले नेताओ के बहाने ...
सरकार में हम नहीं है ? सरकार वालो के पास जाओ ?

सरकार वाले के पास जाओ ...
वहां का विधायक / सांसद विपक्ष वाले को चुने हो तुम लोग - मुख्यमंत्री जी नहीं सुनेंगे !

कहने का तात्पर्य यह है कि वह कोई न कोई ऐसा बहाना बना देगा या मज़बूरी दिखा देगा - जिस पर आपको भरोसा हो जाएगा !

इनकी व्यक्तिगत मज़बूरी होती है - आप से वोट लेना !
दूसरी मज़बूरी होती है - की इनकी खुद की नहीं चलती क्योंकि इनका ज़मीर नहीं होता !
ये सब लोग पहले से ही किसी न किसी राजनैतिक मामलों में फंसे रहते है !

इसलिए ये लोग सिर्फ मुंह से विरोध व आपका साथ दे सकते है !
कंधे से कंधा मिलाकर आपका साथ नहीं देंगे !
नहीं तो अगले पल उन पर भी कार्यवायी सम्भव है !

यदि एक नेता नहीं बल्कि हर क्षेत्र में बिना ' वोट ' वाला नेता बनाओ !
ताकि उसकी कोई मज़बूरी नहीं होगी और वह आपके साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलेगा !

आप के किसी भी परेशानी में आपके क्षेत्र के लोग ही सबसे पहले सामने आते है ! न कि दिल्ली व लखनऊ से - न ही दिल्ली व लखनऊ वाले आएंगे !

हम दिल्ली व लखनऊ वालो के चक्कर में क्यों रहते है - जब आपके हर समस्या में आपके क्षेत्र से ही किसी न किसी को आना है !

आज जो लोग समाज को बराबर एकजुट होने की बात करते है - और कहते है कि एकजुट नहीं होते !

आप सारे समाज को एक व्यक्ति के पीछे क्यों खड़ा करना चाहते है ?
यदि वह धोखा दे दिया तो फिर समाज किसी और के साथ खड़ा नहीं होगा बल्कि पूर्व में यही धोखेबाजी से आहत होकर - आज समाज किसी पर भरोसा नहीं करता !

आप सभी से निवेदन है कि - आप सभी अपने अपने क्षेत्र में संगठित हो !

ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रीय सामाजिक नेता बनाए !

नोट -
..वोट आपका निजी मामला है - आप पार्टीवादिता में या व्यक्तिगत दे !

user image Arvind Swaroop Kushwaha - 28 Apr 2020 at 7:46 AM -

भारतीय संविधान की प्रस्तावना-

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:
सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, तथा प्रतिष्ठा व अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए,
तथा उन ... सब में,
व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित कराने वाली, बन्धुता बढ़ाने के लिए,
दृढ़ संकल्प होकर अपनी संविधानसभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

user image Jigyasa Admin - 27 Jan 2019 at 11:51 PM -

आरक्षण में रोस्टर आखिर है क्या,जिसे लेकर मचा हुआ है देश में हंगामा
-अरविन्द कुमार

रोस्टर एक विधि है, जिसके जरिये नौकरियों में आरक्षण लागू किया जाता है. लेकिन अगर इसे लागू न किया जाए या लागू करने में बेईमानी हो तो आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों की ... धज्जियां उड़ जाती हैं.

संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 16(4) के तहत पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्ग) का पर्य़ाप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान किया है. लेकिन आरक्षण को कैसे लागू किया जाये, इसको लेकर देशभर के विश्वविद्यालय सत्तापक्ष की मिलीभगत से अड़ंगेबाजी करते रहे. इसका परिणाम रहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों का रिज़र्वेशन विश्वविद्यालयों में महज कागज की शोभा बनकर रह गया. यही हाल मण्डल कमीशन की संस्तुतियों के आधार पर लागू हुए ओबीसी रिज़र्वेशन का रहा.

विश्वविद्यालय लंबे समय तक अपनी स्वायत्तता का हवाला देकर आरक्षण लागू करने से ही मना करते रहे, लेकिन जब सामाजिक, राजनीतिक और कानूनी दबाव बनने लगा तो उन्होंने आरक्षण लागू करने की हामी तो भरी, लेकिन इसमें तमाम ऐसे चालबाजी कर दी, जिससे कि यह प्रभावी ढंग से लागू ही न हो पाये. इस चालबाजी में प्रमुख हैं-

– विभाग को आरक्षण लागू करने के लिए यूनिट बनाना
– एक एक पद के लिए विशेष योग्यता जोड़ना, ताकि कैंडीडेट ही न मिले,
– विभागों को छोटा-छोटा करना, ताकि आरक्षित वर्ग के लिए कभी सीट ही नहीं आए

इन चालबाजियों का परिणाम रहा कि विश्वविद्यालयों में आरक्षण ऐसे लागू हुआ, जिससे कि आरक्षित वर्ग को न्यूनतम सीटें मिलें. इस तरह की नीतियों का ही परिणाम है कि आज भी विश्वविद्यलयों में आरक्षित समुदाय के प्रोफेसरों, एसोसिएट प्रोफेसरों और असिस्टेंट प्रोफेसरों का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है. अभी हाल ही में छपी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि देशभर के विश्वविद्यालयों में आरक्षण लागू होने के बावजूद भी आरक्षित समुदाय के प्राध्यापकों का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है.

रोस्टर का जन्म:-

2006 में उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के दौरान विश्वविद्यालय में नियुक्तयों का मामला केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार के सामने आया. चूंकि इस बार आरक्षण उस सरकार के समय में लागू हो रहा था, जिसमें आरजेडी, डीएमके, पीएमके, जेएमएम जैसे पार्टियां शामिल थीं, जो कि सामाजिक न्याय की पक्षधर रहीं हैं, इसलिए पुराने खेल की गुंजाइश काफी कम हो गयी थी. अतः केंद्र सरकार के डीओपीटी मंत्रालय ने यूजीसी को दिसंबर 2005 में एक पत्र भेजकर विश्वविद्यालयों में आरक्षण लागू करेने में आ रही विसंगतियों को दूर करने के लिए कहा. उस पत्र के अनुपालन में यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन प्रोफेसर वीएन राजशेखरन पिल्लई ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर रावसाहब काले जो कि आगे चलकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति भी बनाए गए थे, की अध्यक्षता में आरक्षण लागू करने के लिए एक फॉर्मूला बनाने हेतु एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया था, जिसमें कानूनविद प्रोफेसर जोश वर्गीज़ और यूजीसी के तत्कालीन सचिव डॉ आरके चौहान सदस्य थे.

प्रोफेसर काले कमेटी ने भारत सरकार के डीओपीटी मंत्रालय की 02 जुलाई 1997 की गाइडलाइन जो कि सुप्रीम कोर्ट के सब्बरवाल जजमेंट के आधार पर बनी है, को ही आधार बनाकर 200 पॉइंट का रोस्टर बनाया. इस रोस्टर में किसी विश्वविद्यालय के सभी विभाग में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर का तीन स्तर पर कैडर बनाने की सिफारिश की गयी. इस कमेटी ने विभाग के बजाय, विश्वविद्यालय/कालेज को यूनिट मानकर आरक्षण लागू करने की सिफारिश की, क्योंकि उक्त पदों पर नियुक्तियां विश्वविद्यालय करता है, न कि उसका विभाग. अलग-अलग विभागों में नियुक्त प्रोफेसरों की सैलरी और सेवा शर्तें भी एक ही होती हैं, इसलिए भी कमेटी ने उनको एक कैडर मानने की सिफारिश की थी.

रोस्टर 200 पॉइंट का क्यों, 100 पॉइंट का क्यों नहीं?

काले कमेटी ने रोस्टर को 100 पॉइंट पर न बनाकर 200 पॉइंट पर बनाया, क्योंकि अनुसूचित जातियों को 7.5 प्रतिशत ही आरक्षण है. अगर यह रोस्टर 100 पॉइंट पर बनता है तो अनुसूचित जातियों को किसी विश्वविद्यालय में विज्ञापित होने वाले 100 पदों में से 7.5 पद देने होते, जो कि संभव नहीं है.

अतः कमेटी ने अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और ओबीसी को 100 प्रतिशत में दिये गए क्रमशः 7.5, 15, 27 प्रतिशत आरक्षण को दो से गुणा कर दिया, जिससे यह निकलकर आया कि 200 प्रतिशत में अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति और ओबीसी को क्रमश: 15, 30, 54 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा. यानि अगर एक विश्वविद्यालय में 200 सीट हैं, तो उसमें अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, और ओबीसी को क्रमशः 15, 30, और 54 सीटें मिलेंगी, जो कि उनके 7.5, 15, 27 प्रतिशत आरक्षण के अनुसार हैं.

सीटों की संख्या का गणित सुलझाने के बाद कमेटी के सामने यह समस्या आई की यह कैसे निर्धारित किया जाये कि कौन सी सीट किस समुदाय को जाएगी? इस पहेली को सुलझाने के लिए कमेटी ने हर सीट पर चारों वर्गों की हिस्सेदारी देखने का फॉर्मूला अपनाया. मसलन, अगर किसी संस्थान में केवल एक सीट है, तो उसमें अनारक्षित वर्ग की हस्सेदारी 50.5 प्रतिशत होगी, ओबीसी की हिस्सेदारी 27 प्रतिशत होगी, एससी की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत होगी, और एसटी की हिस्सेदारी 7.5 प्रतिशत होगी. चूंकि इस विभाजन में सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है, इसलिए पहली सीट अनारक्षित रखी जाती है.

पहली सीट के अनारक्षित रखने का एक और लॉजिक यह है कि यह सीट सैद्धांतिक रूप से सभी वर्ग के उम्मीदवारों के लिए खुली होगी. यह अलग बात है कि धीरे-धीरे यह माना जाने लगा है कि अनारक्षित सीट का मतलब सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण. इस फॉर्मूले के आधार पर कमेटी ने सीट की स्थिति का निर्धारण करने के लिए 200 नंबर का एक चार्ट बना दिया, जिसको कि 200 पॉइंट का रोस्टर कहते हैं. इस रोस्टर के अनुसार अगर किसी विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कुल 200 पद हैं, तो उनका वितरण निम्न प्रकार होगा.

अनारक्षितः 01,02,03,05,06,09 वां……समेत बाकी सभी पद जो कि ओबीसी, एससी, एसटी मे नहीं सम्मिलित हैं.

ओबीसीः 04, 08, 12, 16, 19, 23, 26, 30,34, 38, 42, 45,49,52, 56,60,63, 67,71,75, 78,82,86, 89,93,97, 100, 104, 109,112, 115, 119,123,126, 130,134, 138, 141,145,149, 152,156, 161,163, 167,171,176, 178, 182, 186, 189,193,197,200 वां पद

एससी: 7,15,20,27,35,41,47,54,61,68,74,81,87,94,99,107,114,121,127,135, 140,147,154,162,168,174,180,187,195,199 वां पद

एसटी: 14,28,40,55,69,80,95,108,120,136,148,160,175,188,198वां पद

विवाद की वजह:-

प्रो. काले कमेटी द्वारा बनाए गए इस रोस्टर ने विश्वविद्यालों द्वारा निकाली जा रही नियुक्तियों में आरक्षित वर्ग की सीटों की चोरी को लगभग नामुमकिन बना दिया, क्योंकि इसने यह तक तय कर दिया कि आने वाला पद किस समुदाय के कोटे से भरा जाना है. इस वजह से बीएचयू, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, शांति निकेतन विश्वविद्यालय समेत कई विश्वविद्यालय इस रोस्टर के खिलाफ हो गए थे.

ऐसा इसलिए हुए, क्योंकि यह रोस्टर तब से लागू माना जाना था, जब से उस विश्वविद्यालय ने अपने यहां आरक्षण लागू किया था. मान लीजिए कि किसी विश्वविद्यालय ने 2005 से अपने यहां आरक्षण लागू किया, लेकिन उसने अपने यहां उसके बाद भी किसी एसटी, एससी, ओबीसी को नियुक्त नहीं किया. ऐसी सूरत में उस विश्वविद्यालय में 2005 के बाद नियुक्त हुए सभी असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसरों की सीनियरिटी के अनुसार तीन अलग-अलग लिस्ट बनेगी. अब मान लीजिये कि अगर उस विश्वविद्यालय ने असिस्टेंट प्रोफेसर पर अब तक 43 लोगों को नियुक्त कर चुका है, जिसमें कोई भी एससी, एसटी और ओबीसी नहीं है, तो रोस्टर के अनुसार उस विश्वविद्यालय में अगले 11 असिस्टेंट प्रोफेसरों को सिर्फ ओबीसी उम्मीदवार से, 06 को एसटी, और 03 को एसटी उम्मीदवारों से भरे बिना, उक्त विश्वविद्यालय कोई भी असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर अनारक्षित वर्ग की नियुक्ति नहीं कर सकता.

चूंकि ज़्यादातर विश्वविद्यालयों ने अपने यहां आरक्षण सिर्फ कागज पर ही लागू किया था, इसलिए इस रोस्टर के आने के बाद वो फंस गए. चूंकि वो नया पद अनारक्षित वर्ग के लिए तब तक नहीं निकाल सकते थे, जब तक कि पुराना बैकलॉग भर न जाय. ऐसे में इलाहाबाद विश्वविद्यालय, बीएचयू, डीयू, और शांति निकेतन समेत तमाम विश्वविद्यालयों ने इस रोस्टर को विश्वविद्यालय स्तर पर लागू किए जाने का विरोध करने लगे. उन्होंने विभाग स्तर पर ही रोस्टर लागू करने की मांग की. इन विश्वविद्यालयों ने 200 पॉइंट रोस्टर को जब लागू करने से मना कर दिया, तो यूजीसी के तत्कालीन चेयरमैन प्रोफेसर सुखदेव थोराट ने प्रो. राव साहब काले की ही अध्यक्षता में इनमें से कुछ विश्वविद्यालयों के खिलाफ जांच कमेटी बैठा दी तो दिल्ली विश्वविद्यालय का फंड तक रोक दिया था. दिल्ली विश्वविद्यालय का फंड तब प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप से ही रिलीज हो पाया था. चूंकि उन दिनों केंद्र की यूपीए सरकार के तमाम घटक दलों में क्षेत्रीय पार्टियां थीं, इसलिए तब इन विश्वविद्यालयों में विरोध परवान नहीं चढ़ पाया था.
Jitendra Narayan

user image Arvind Swaroop Kushwaha

फेसबुक की तरह फ़ास्ट बनाने की कोशिश जारी है।

Friday, February 1, 2019
user image Arvind Swaroop Kushwaha

जी यह अभी बेबी एप्प है।

Friday, February 1, 2019
user image Bal Krishna Kushwaha

Yah aap slow chalta hai

Wednesday, January 30, 2019