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user image Arvind Swaroop Kushwaha - 15 Jan 2019 at 7:01 AM -

मौर्यकालीन विद्वान चपड़

संस्कृत भाषा प्राकृत के बाद पैदा हुई है।
तमाम प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि मौर्य सम्राटों के दरबार में संस्कृत को कोई भी स्थान प्राप्त नहीं था।
जबकि चाणक्य के नाम पर जो भी साहित्य उपलब्ध है वह संस्कृत में उपलब्ध ... है।

ज्ञात सबूतों के आधार पर यह माना जा सकता है कि सम्राट अशोक के दरबार का सबसे बड़ा विद्वान चपड़ था।

ब्रह्मगिरी और जटिंग-रामेश्वर जैसे शिलालेखों के नीचे लेखक चपड़ का नाम दर्ज है।

आश्चर्य है कि लेखक चपड़ का नाम किसी किताब में दर्ज नहीं है।

इतिहासकारों द्वारा मौर्यकालीन लेखकों में चाणक्य की गणना बड़े विश्वास के साथ की गई है, किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि चपड़ को जानबूझकर छोड़ दिया है।

मौर्यकाल का जो ऐतिहासिक लेखक है, वह गायब है, जो अनैतिहासिक है, वहीं सिर चढ़कर बोल रहा है।

यह आश्चर्यजनक है कि जिस चाणक्य का इतिहास नहीं मिलता ऐतिहासिक सुबूत नहीं मिलते उसे स्कूल के सिलेबस में पढ़ाया जाता है और जिस मौर्यकालीन नीतिनिपुण चपड़ के ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद हैं वह स्कूल के पाठ्यक्रम से गायब है।

मौर्यकालीन ब्रह्मगिरि के शिलालेख का उदहारण देते हुए प्रो राजेंद्र प्रसाद सिंह कहते हैं "ज्ञात सबूतों के आधार पर कहा जाएगा कि सम्राट अशोक के दरबार का सबसे बड़ा लेखक चपड़ था।"

इसका मतलब यह हुआ कि भारतवासियों ने अपने महान पूर्वज चपड़ को याद रखने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया।

आज भी हमारे गावों में जब कोई बीच-बीच में अधिक बोलने लगता है तो लोग कहते है कि "ज्यादा चपड़-चपड़ मत करों"। संभव है विद्वान चपड़ के संदर्भ से बहुत कुछ बोला जाता होगा जिसको हतोत्साहित करने के उद्देश्य से "ज्यादा चपड़-चपड़ मत करों"। बोला जाता होगा। आज हमें चपड़ के विरुद्ध नफरत के कारणों की जानकारी नहीं है। किंतु तथागत बुद्ध के विरुद्ध नफरत के प्रमाण रामायण में मौजूद हैं और उनसे इस बात का आभास हो जाता है कि चपड़ से नफरत क्यों रही होगी।

इस कहावत से चपड़ के ज्ञान व उनकी विद्वता का संकेत साफ दिखाई पड़ रहा है।

चंद्रगुप्त मौर्य के साथ उनके तथाकथित गुरु चाणक्य का नाम जोड़े जाने से चंद्रगुप्त मौर्य की महानता को बहुत बड़ी क्षति हुई है।

ऐसा प्रतीत होता है कि चाणक्य नामक कोई भी व्यक्ति इतिहास में नहीं हुआ है।
चाणक्य, कौटिल्य और विष्णुगुप्त नामक काल्पनिक पात्रों का निर्माण साहित्य की रोचकता को बढ़ाने के लिए किया गया प्रतीत होता है।

अलेक्जेंडर
और मौर्यकालीन विचारक डायोडोरस सिलिकस, प्लुटार्च, जस्टिन, पोम्पियस ट्रोगस, ऐपियन, स्ट्रैबो, प्लिनी जैसे प्रख्यात ग्रीक इतिहासकारों की किताबों में चाणक्य, कौटिल्य या विष्णुगुप्त का नाम कहीं पर भी नहीं मिलता हैं।
इन इतिहासकारों ने लिखा है कि, चंद्रगुप्त खुद के बलबूते पर विजयी हुआ था। चंद्रगुप्त मौर्य के ग्रीक सलाहकार मैगस्थनीज ने भी अपनी किताब इंडिका मे चाणक्य का नाम नहीं लिया है। अलेक्जेंडर तक्षशिला विश्वविद्यालय में दस आचार्यों से मिला था लेकिन उनमें किसी का भी नाम चाणक्य नहीं है।
काल्पनिक पात्र चाणक्य का निर्माण मध्ययुगीन कथा 'चाणक्य-चंद्रगुप्त कथा' के रूप में लिखकर चंद्रगुप्त मौर्य के जीवन में चाणक्य को घुसाया गया प्रतीत होता है। काल्पनिक चाणक्य की मनगढ़न्त बातों का विस्तृत वर्णन आठवीं सदी में लिखे गए नाटक 'मुद्राराक्षस' में दिया गया है। यह नाटक चंद्रगुप्त मौर्य के लगभग चौदह सौ साल बाद लिखा गया था और उसमें काल्पनिक पात्र चाणक्य का महिमामंडन किया गया है। चंद्रगुप्त मौर्य के वास्तविक शौर्य और बुद्धिकौशल को हम भूल गए।
यह बात समझने योग्य है कि मौर्य साम्राज्य के दृष्टिगत चाणक्य, कौटिल्य या विष्णुगुप्त एक काल्पनिक पात्र हैं।

#नकल_किया_हुआ।